Cruel hearted lover' - Chapter 1
एक बड़े से होटल का कमरा था, जिसके बाहर चार-पाँच लोग बंदूक लिए खड़े थे। कमरे से एक लड़की और लड़के की मदहोश भरी आवाज़ आ रही थी।
बाहर खड़े, बंदूक लिए हुए एक लड़के ने दूसरे से कहा,
"क्या करें? अंदर चलें? अंदर की आवाज़ें सुनकर लगता है अंदर का माहौल काफ़ी गर्म होगा।"
दूसरा बंदूकधारी आदमी बोला,
"अरे यार! इन लोगों के चक्कर में कितने ही दिनों से हम अपनी-अपनी बीवियों और गर्लफ्रेंड से दूर रहे हैं, और इन्हें देखो, ये लोग कितने मज़े कर रहे हैं! मज़ा तो इसी बात में है कि हम इनके मज़े को भंग कर दें।"
ऐसा कहकर एक लड़के ने अपनी साइलेंसर लगी बंदूक से बंद कमरे के दरवाज़े का लॉक तोड़ दिया।
अंदर मौजूद लड़के और लड़की को इस बात का पता ही नहीं चला था कि उनका दरवाज़ा खुल चुका था, क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे को प्यार करने में पूरी तरह से व्यस्त थे।
जब उन दोनों का प्यार पूरे शबाब पर था, बाहर खड़े लड़कों में से एक ने जोर से दरवाज़े पर लात मारी। एक झटके से दरवाज़ा खुल गया।
पाँचों लड़के उस कमरे में जा पहुँचे और उन्होंने अंदर जाकर एक-दूसरे से चिपके हुए लड़के-लड़की पर बंदूक तान दी।
"हैंड्स अप!"
अंदर जो लड़की थी, उसने जल्दी से अपने आप को एक चादर से कवर कर लिया। अचानक आई मुसीबत का उन दोनों को दूर-दूर तक कोई अंदाजा नहीं था। वे दोनों पूरी तरह से एक-दूसरे में डूबे हुए थे।
पाँचों आदमियों ने उन दोनों को कुछ मिनट का समय दिया और कहा,
"जल्द से जल्द अपने कपड़े पहन लो, वरना इसी हालत में ही हम तुम्हें यहाँ से गिरफ्तार करके ले जाएँगे।"
उन पाँचों पुलिस अफ़सरों की बात सुनकर वह दोनों लड़का-लड़की एक-दूसरे का मुँह देखने लगे थे और जल्दी ही उन्होंने अपने-अपने कपड़े पहन लिए।
तब तक पुलिस वालों ने अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया था, लेकिन यही उन्होंने बहुत बड़ी भूल कर दी थी। जैसे ही उन लोगों ने अपने कपड़े पहने, उन्होंने अपनी बंदूकें भी रेडी कर लीं और उन्होंने अचानक से उन पुलिस वालों पर धड़ाधड़ गोली चलानी शुरू कर दी।
उन पाँच पुलिस वालों में से एक के हाथ पर गोली लग गई थी। पुलिस वाले भी तैश में आ गए थे और उन्होंने भी उन लोगों पर वापस से फायरिंग शुरू कर दी।
जिससे उस लड़की के हाथ में गोली लगी और उस लड़के के पैर में गोली लगी। जल्दी ही पुलिस वालों ने उन दोनों लड़का-लड़की को गिरफ्तार कर लिया था और अपने साथ एक स्पेशल गुप्त स्थान पर ले गए।
उन पुलिस वालों ने उन लड़का-लड़की को वहाँ पर ले जाकर बहुत ही ज़्यादा टॉर्चर करना शुरू कर दिया। हर कोई केवल एक ही सवाल पूछ रहा था,
"राणा कहाँ है? कहाँ है राणा? जवाब दो! कहाँ है राणा? कहाँ छिपाकर रखा है तुम लोगों ने उसे? बोलो! जवाब दो!"
पुलिस वालों को इस तरह से सवाल पूछता हुआ देखकर वह लड़की, जो वहाँ पाई गई थी, अपने होंठों पर आए खून को बुरी तरह से रगड़ते हुए हँसते हुए बोली,
"हा हा हा हा हा हा! तो तुम लोग राणा की तलाश में आए हो? ओ हो! इसीलिए तुम लोग हम तक पहुँच पाए हो। अफ़सर! क्या तुम्हें नहीं पता? राणा अगर किसी से मिलता है, तो सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से मिलता है। वह किसी का गुलाम नहीं है कि कोई उसे आदेश दे सके। वह राणा है! राणा! अगर उसका मन होगा, तो वह तुम लोगों से मिलेगा; अगर उसका मन नहीं होगा, तो वह तुम लोगों से नहीं मिलेगा।"
जैसे ही उस लड़की ने यह सब कुछ कहा, उस पुलिस वाले का दिमाग घूम गया था और उसने एक और जोरदार थप्पड़ उस लड़की के मुँह पर मार दिया। वह लड़की एक बार फिर गिर गई और उसके सिर से भी अब खून बहने लगा।
वह पुलिस वाला बोला,
"बहुत घमंड है ना तुम लोगों को उस राणा पर? देखना, एक दिन जब वह मेरे हाथों चढ़ जाएगा, तो मैं उसकी ऐसी हालत करूँगा, ऐसी हालत करूँगा कि उसे अपने जन्म पर अफ़सोस होगा! समझी तू..."
उसने बड़ी ही गंदी गाली देकर उस लड़की से फिर पूछा,
"बता! कहाँ है राणा?"
ऐसा कहकर उन पुलिस वालों ने बिना लड़का-लड़की को देखे हुए बेल्ट से मारना शुरू कर दिया।
लेकिन उस लड़की और लड़के के मुँह से दर्द भरी एक भी आवाज़ नहीं निकल रही थी, क्योंकि वे दोनों राणा के आदमी थे और उन्हें पूरा यकीन था कि राणा उन्हें हर हाल में बचा लेगा।
जब उन लोगों को लगा कि ये दोनों इतने ढीठ हैं, ये इतनी आसानी से जुबान नहीं खोलेंगे, तब उनमें से एक पुलिस वाले ने कुछ ज़्यादा ही अपनी हद को पार करते हुए एक लोहे की रॉड को खूब तेज़ गर्म करने लगा।
उसने दोनों की ओर इशारा करते हुए बोला,
"बहुत शौक है ना तुम लोगों को वफ़ादारी का? आज हम भी देखते हैं, हम लोगों के कहर से तुम लोगों को कौन बचाएगा? और वैसे भी, आतंकवादियों के लिए हमारे मन में किसी भी तरह का कोई रहम नहीं है! तो तुम लोगों की भलाई इसी में है कि तुम लोग हमें बता दो, कहाँ है राणा? अगर तुम लोग हमें इसका जवाब दे दोगे, तो हो सकता है कि तुम लोग इन सब तकलीफ़ों से बच जाओ।"
उस पुलिस वाले की बात सुनकर वह लड़का-लड़की एक-दूसरे की ओर देखने लगे थे और फिर उन्होंने उस पुलिस वाले के ऊपर थूकते हुए कहा,
"जो करना चाहे कर ले, लेकिन तू हमारा मुँह कभी भी नहीं खुलवा पाएगा।"
ऐसा कहकर इतने दर्द के बावजूद वे दोनों बुरी तरह से पागलों की तरह हँसने लगे।
इतना पागलपन देखकर वे पुलिस वाले बहुत ही ज़्यादा हैरान रह गए थे। वे सोच भी नहीं सकते थे कि ये लोग उन पर इस तरह से हँस सकते थे।
वहीं दूसरी ओर, एक आदमी बड़ी ही बेरहमी से चाकू से लगातार एक आदमी के सीने पर वार कर रहा था। उसका पूरा मुँह खून में हो चुका था, लेकिन वह उस आदमी पर वार करना बंद नहीं कर रहा था।
जिस पर वह आदमी वार कर रहा था, वह कोई और नहीं, बल्कि उस शहर का नया डीजीपी, गौरव ठाकुर था।
राणा ने डीजीपी ठाकुर के सीने में अनगिनत वार किए थे और इतना ही नहीं, गौरव ठाकुर की जान जाने के बाद भी उसने उस पर वार करना बंद नहीं किए थे।
ऐसा लग रहा था मानो वह उसकी जान ही ना ले रहा हो, बल्कि वह उसको उसके किसी गुनाह की सज़ा दे रहा हो। जब उसे लगा कि गौरव डीजीपी गौरव ठाकुर के शरीर की एक-एक खून की बूँद अब निचोड़ चुकी है, तब जाकर उसने उसे छोड़ा था और जल्दी ही उसके आदमियों ने डीजीपी गौरव ठाकुर की लाश को ठिकाने लगा दिया था।
राणा उठा और अपने बड़े से खूबसूरत महल के सामने जो बड़ा सा तालाब बना हुआ था, जाकर खून से सने हाथ और कपड़ों समेत उसके बीचो-बीच बने बहुत ही खूबसूरत से तालाब में जाकर कूद गया।
और कितने ही देर तक वह अपने शरीर पर लगे खून को बहता रहा था, क्योंकि उसका पूरा शरीर एकदम लाल हो चुका था, क्योंकि डीजीपी गौरव के खून की एक-एक बूँद उसके शरीर पर थी। ऐसा लग रहा था मानो वह उसके खून से नहाया हुआ हो।
कुछ देर नहाने के बाद राणा को एक नोटिफ़िकेशन की आवाज़ सुनाई दी थी और एक बार फिर से उसने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियों को कस लिया था और फिर जल्दी से तैयार होकर बाहर की ओर रवाना हो चुका था। उसको जाता हुआ देखकर उसके पीछे खड़ा हुआ उसका असिस्टेंट, देव, बोला,
"पता नहीं अब किसकी शामत आई है।"
ऐसा कहकर वह भी उसके पीछे-पीछे दूसरी गाड़ी में बॉडीगार्ड समेत निकल गया।
वहीं दूसरी ओर, एक इक्कीस साल की बड़ी ही खूबसूरत लड़की थी, जो इस वक़्त आराम से अपने शानदार बेड पर सोई हुई थी।
उसकी आँखें सोते हुए इधर-उधर टिमटिमा रही थीं। इसका मतलब साफ़ था कि वह एक बुरा सपना देख रही थी और सपने में वह देख रही थी कि,
एक बारह साल की लड़की अपने माँ-बाप से नाराज़ होकर घर से निकल जाती है और गलती से वह एक ऐसी बस में बैठ जाती है, जो बस उसे एक अँधेरे गाँव में ले जाकर छोड़ देती है।
उस लड़की को दूर-दूर तक कोई अंदाज़ा नहीं था कि वह कहाँ आ गई है। वह बस में इसलिए बैठी थी क्योंकि एक बस उसकी बुआ के घर जाती थी, जिसका रास्ता केवल दस मिनट का था, लेकिन वह इतने गुस्से में थी कि वह सही से बस को नहीं देख पाई थी और वह एक ऐसी बस में जाकर बैठ गई थी, जो बस उसे एक ऐसे गाँव में ले आई थी जहाँ पर सुख-सुविधाएँ, मोबाइल, इंटरनेट, बिजली, किसी भी चीज़ का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था।
वह बारह साल की बच्ची उस गाँव में पहुँचकर एक ऐसे आदमी के घर फँस जाती है, जो कि खुद पन्द्रह-सोलह साल का लड़का था, लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जिसे देखकर उसे गाँव का बच्चा-बच्चा भी डरता था।
वह बच्चा, जो कि केवल पन्द्रह साल का था, वह कोई आम बच्चा नहीं था। उसे देखकर पूरा गाँव थर-थर काँप रहा था और वह लड़की गलती से उसी के घर में चली जाती है। वह लड़का उसे लड़की को कुछ नहीं कहता है, केवल घूर-घूरकर उसे देखता रहता है। लेकिन जैसे ही वह लड़की वहाँ से भागने की कोशिश करती है और पूरे गाँव में इधर-उधर दौड़कर चक्कर लगाती है और चिल्लाती है,
"कोई तो मेरी मदद करो! कोई तो उसके बाबा को कॉल करवा दो! कोई तो उसे बस स्टैंड तक छुड़वा दो! कोई तो उसे यह रास्ता बता दो कि कहाँ से बस शहर की ओर जाती है!"
वह उसे पूरे गाँव में घर-घर घूमकर अपने लिए मदद माँगती है, लेकिन उसे बारह साल की बच्ची की कोई भी मदद करने को तैयार नहीं रहता है, क्योंकि उस लड़के के डर की वजह से उसे कोई बस स्टैंड का रास्ता बताने के लिए तैयार नहीं था।
और फिर उस लड़के के आदमी उस लड़की को वापस से उसी के घर में ले जाते हैं। लेकिन उसके बाद भी लड़की के भागने की कोशिश पर वह लड़का उसे लड़की को कुछ नहीं कहता, केवल उसे घूर-घूरकर देखने लगता है।
वह लड़की उस जगह पर रहकर बहुत ही ज़्यादा घबराती है, क्योंकि उसे पूरे घर में उस लड़के के अलावा और कोई नहीं रहता था। उसे लड़की को एक कमरा दिया गया था जहाँ पर वह सोया करती थी, लेकिन खाना वह केवल नाम का ही खाया करती थी और वह दिन को कोसती थी कि क्यों वह अपने माँ-बाप से गुस्सा होकर बस में बैठी थी।
फिर एक दिन, जब उस लड़की ने एक बार फिर से भागने की कोशिश की, तो वह एक ऐसे घर में चली गई जिसने उसकी मदद करने के लिए हाँ कह दिया था और उसे इशारों ही इशारों में बस स्टैंड का रास्ता बता दिया था। तो वह छोटी सी बच्ची किसी तरह से वहाँ से भागकर उस लड़के के आदमियों से बचती-बचाती बस स्टैंड तक पहुँच गई थी और जैसे ही वह बस में चढ़ने वाली थी, तभी उस लड़की का हाथ उस लड़के ने पकड़ लिया।
तब उस लड़की ने रोते-रोते उस लड़के की ओर देखते हुए कहा,
"प्लीज़! मुझे मेरे मॉम के पास जाने दो! प्लीज़! मुझे छोड़ दो!"
उस लड़की की आँखों में आँसू देखकर ना जाने उस लड़के को क्या हुआ कि उसने एकदम से उसका हाथ छोड़ दिया था और वह लड़की फिर जैसे ही बस में बैठकर आगे बढ़ी,
तुरंत ही जो खूबसूरत लड़की यह सपना देख रही थी, अचानक से डर के मारे वह चिल्लाकर उठ बैठी थी और उसका यह सपना टूट गया था।
जैसे ही वह खूबसूरत सी लड़की चिल्लाई, उसके माँ-बाप, जो बराबर वाले कमरे में सोए हुए थे, वे तुरंत उसके पास आए थे और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,
"क्या हुआ बेटा? क्यों परेशान हो? क्या फिर से वही बुरा सपना देखा?"
तब उस लड़की के चेहरे पर पसीने की बूँदें आने लगी थीं और वह बहुत ही ज़्यादा घबराई हुई लग रही थी। तब उसकी माँ ने बड़े ही प्यार से उसके चेहरे को पोंछा था और फिर कहा,
"तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है बेटा। अब तुम अपने घर पर हो। तुम्हें परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। कोई तुम्हें हमसे अलग नहीं कर सकता है। उस बात को बीते हुए, बेटा, पूरे-पूरे दस साल हो चुके हैं। अब तुम्हें वह सब बातें भूल जानी चाहिए।"
अपनी माँ की बात सुनकर वह लड़की हल्का सा हाँ में गर्दन हिलाने लगी थी और उसके बाद अपनी माँ से लिपट गई थी।
वहीं दूसरी ओर, जैसे ही वे पुलिस वाले लोहे की गरम रॉड से उस लड़की और लड़के को मारने के लिए आगे बढ़े, तभी अचानक वहाँ की पृथ्वी में कंपन होना शुरू हो गई।
उस कंपन को महसूस करने के बाद वह लड़का-लड़की इतने ज़्यादा दर्द के बावजूद खिल-खिलाकर हँसने लगे थे और बोले रहे थे,
"बहुत शौक था ना तुम लोगों को राणा से मिलने का? देखो, आ गया राणा! अब बच सकते हो तो बच जाओ!"
ऐसा कहकर वे तेज़-तेज़ हँसने लगे।
और पुलिस वाले उस लड़का-लड़की की बात सुनकर हल्का सा घबराकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
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