The 10th Avatar of God Ch. 3

The 10th Avatar of God - Chapter 3

Posted by Aman Aj • Jan 02, 2025 06:07 PM

उस बच्चे के जन्म के साथ ही बाहर का तूफ़ान धीरे-धीरे शांत होने लगा और देखते ही देखते पूरा तूफ़ान बंद हो गया। मानो यह तूफ़ान बच्चे के जन्म तक ही था और जैसे ही बच्चे ने जन्म लिया, किसी तरह का चमत्कार हुआ जिसने इस तूफ़ान को ख़त्म कर दिया। बच्चे के चेहरे पर एक मुस्कान थी।

धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया। कुछ दिनों के बीत जाने के बाद बच्चे का पिता आया। वह दीवार पर पहरा देने वाले सैनिकों में से एक था। उसकी कमर में तलवार लटकी हुई थी और उसने लोहे का कवच पहन रखा था। घर पर आते ही उसने अपना कवच उतारा और दौड़कर आहुदी के पास आ गया। फिर अपने बच्चे की ओर देखते हुए बोला, “हे भगवान निर्माण की कृपा से हमें कितना सुंदर बच्चा हुआ है! यह बिल्कुल दिखने में भगवान निर्माण की तरह ही है...”

आहुदी ने भी हाँ में सिर हिलाया, “यह बच्चा हमें उन्हीं की कृपा से हुआ है। जब हमारे गाँव के वैद्य ने भी कह दिया था कि मैं माँ नहीं बन सकती, तो मैंने भी उम्मीद हार दी थी; लेकिन फिर भी मैंने भगवान निर्माण के मंदिर में जाना नहीं छोड़ा और हर दिन उनसे प्रार्थना करनी भी नहीं छोड़ी, और देखो, उनकी प्रार्थना के फलस्वरूप कैसे आज हमें अपनी खुशी मिल गई।”

उस पिता ने अपने बच्चे को उठाया और गोद में लेकर उसे खिलाते हुए बोला, “देखना, मेरा बच्चा बड़ा होकर मुझसे भी बड़ा योद्धा बनेगा; यह हमारे इस गाँव को आदमखोरों के ख़तरों से बचाएगा, हमारा नाम रोशन करेगा...” उसने बच्चे को ऊपर उठाया; बच्चे के चेहरे पर खुशी थी।

यह गाँव समुद्र के बीचो-बीच मौजूद एक टापू पर बना हुआ था और चारों तरफ़ जंगल और पहाड़ी इलाक़ों से घिरा हुआ था। इस गाँव से बाहर मौजूद समुद्र में आगे चलकर क्या है, इसके बारे में किसी भी गाँव वाले को नहीं पता था। पिछले हज़ारों सालों से गाँव वाले इसी टापू पर अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे थे और पीढ़ी दर पीढ़ी इसे आगे बढ़ा रहे थे।

गाँव के लोग मुख्यतः उगाए जाने वाले अनाज और समुद्र में पाई जाने वाली मछलियों पर ही निर्भर रहते थे। इसमें आदमखोरों का ख़तरा एक ऐसा ख़तरा था जिसका सामना उन्हें आए दिन करना पड़ता था। गाँव के आस-पास जो पहाड़ियाँ मौजूद थीं, उनमें हज़ारों की संख्या में सुरंगें थीं और उन सुरंगों में आदमखोर रहते थे; अजीब से जानवर जो खेतों में आकर नुकसान पहुँचाते थे और अनाज को खा जाते थे।

गाँव के चारों तरफ़ एक दीवार भी बनी हुई थी जो लकड़ी और पत्थरों से बनाई गई थी और वहाँ पर गाँव के लोग हमेशा पहरा देते रहते थे। कुछ आदमखोर इस दीवार को पार करने की कोशिश करते थे ताकि वे इंसानों का मांस भी खा सकें। आदमखोर अनाज और मांस दोनों ही खा सकते थे और गाँव के लोग इन आदमखोरों से बचने के लिए दीवार पर मौजूद रहकर हमेशा इनका सामना करते थे; जिससे गाँव वालों की जान बचती थी।

गाँव में रहने वाले तमाम मर्द इन दीवारों पर पहरा देने में ही लगे रहते थे; चाहे मौसम कितना भी ख़राब क्यों न हो, चाहे उनके घर पर कुछ भी क्यों न हो रहा हो, वे अपना पहरा छोड़कर वापस नहीं आ सकते थे। बीच-बीच में उन्हें छुट्टियाँ मिलती थीं और इसी बीच कुछ लोगों को घर आने की इजाज़त भी दे दी जाती थी। हालाँकि गाँव ज़्यादा बड़ा नहीं था, मगर फिर भी कोई पहरा छोड़कर घर पर नहीं आता था।

खाने-पीने का सामान उनके पास सीधे ही पहुँचा दिया जाता था। ज़्यादातर वक़्त गाँव के आदमियों का पहरा देने में निकल जाता था और फिर जो वक़्त बचता था, उसे दीवार से आगे जाकर खेती करने में और फिर खेतों की हिफ़ाज़त करने में लगा देते थे ताकि अनाज भी उगाया जा सके और फिर गाँव में मौजूद घर वालों का पेट भरा जा सके।

एक के बाद एक दिन बीतते गए और तक़रीबन छह महीने बीतने के बाद देवांश अपने घर में ही इधर-उधर घूमने लगा। घूमते हुए वह घर से बाहर भी आ जाता था और काफ़ी दूर तक भी चला जाता था। आहुदी को हर बार उसे दूर-दूर से पकड़कर लेकर आना पड़ता था।

यहाँ तक कि रात को भी, अगर उस पर नज़र न रखी जाए तो वह मौके की नज़ाकत को देखकर रात को भी फ़रार हो जाता था और फिर उसे बड़ी मुश्किल से कुछ औरतों के साथ जाकर आहुदी को ढूँढ़ना पड़ता था।

जब भी आहुदी देवांश को ढूँढ़कर लाती थी, तब वह उसे डाँटती थी और उसे डंडे से इशारा करते हुए यह भी कहती थी कि तुम्हें घर से बाहर नहीं जाना है; लेकिन देवांश फिर भी नहीं समझता था।

वह इसके बावजूद घर से बाहर चला जाता था। आहुदी ने उसे घर से बाहर जाने से रोकने के लिए कुछ और भी किया; जैसे उसने घर के बाहर एक बाड़ बना दी ताकि देवांश उस बाड़ को पार करके बाहर न जा सके; मगर देवांश उसमें से भी किसी तरह से रास्ता ढूँढ़ लेता था।

बाड़ में कहीं न कहीं कोई जगह ऐसी रह जाती थी जहाँ पर लकड़ियाँ और काँटे नहीं होते थे और देवांश उनमें से निकलकर बाहर चला जाता था।

बीच में, जब उसके पिता अपने पाँच दिनों की छुट्टियों में घर वापस आए थे, तब उन्होंने लकड़ी के पट्टों की एक दीवार बना दी थी ताकि देवांश घर से बाहर न जा सके; लेकिन देवांश ने इसके अंदर से भी रास्ता बना लिया था। पता नहीं कैसे, पर अजीब से तरीक़े से उसने निकलने के लिए रास्ता बना लिया था जो किसी कुत्ते के बनाए हुए बिल की तरह लगता था।

हालाँकि यह बिल देवांश ने बनाया था या फिर कुत्ते ने खोदा था, यह किसी को नहीं पता था; लेकिन वह रास्ता देवांश के बाहर जाने का टिकट था।

आहुदी हमेशा सोचती थी कि आखिर देवांश को बाहर जाने की इतनी क्या जल्दी रहती है; लेकिन उसके पास इस सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब था और वह यह था कि यह बच्चा है और बच्चों के दिमाग़ में कुछ भी चलता रहता है। उन्हें कौन समझाए या फिर उन्हें कौन सा पता होता है कि क्या करना है?

फिर यह भी है कि बच्चे जिज्ञासु होते हैं और अगर एक बार वे किसी तरफ़ जाने का सोच लें तो उन्हें चाहकर भी नहीं रोका जा सकता है। बच्चे सबसे पहले उस काम को करेंगे जिससे उन्हें रोका जाता है, चाहे इसके लिए कुछ भी क्यों न कर लिया जाए या फिर बच्चों के हाथ-पैर भी क्यों न बाँध दिए जाएँ।

छह महीने का वक़्त कब चार साल में बदल गया, किसी को पता नहीं चला। चार साल के बाद देवांश बड़ा हो गया था और वह चलते हुए दीवार तक भी पहुँच जाता था। इतना ही नहीं, वह दीवार के दूसरी ओर जाने की कोशिश करता था; लेकिन वहाँ पर हमेशा उसे बाकी के लोगों द्वारा रोक लिया जाता था।

लखन ने उसका हाथ पकड़कर उसे पीछे की ओर ले जाते हुए कहा, “मेरे बेटे, तुम्हें कितनी बार कहा है कि अपनी माँ के पास रहा करो! तुम यहाँ आते ही क्यों हो? इस दीवार के दूसरी ओर ख़तरनाक जानवर रहते हैं; अगर किसी ने भी तुम्हें पकड़ लिया तो तुम ज़िंदा नहीं मिलोगे; वे तुम्हारी हड्डियाँ भी खा जाएँगे...”

देवांश ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, “मुझे छोड़ दीजिए पिताजी, मुझे खेतों में जाना है, मुझे और आगे जाना है...”

बाप और बच्चे की यह जुगलबंदी देखकर दूर खड़े आदमी ने कहा, “अरे लखन, इसे आदमखोरों के पास जाने की कुछ ज़्यादा ही जल्दी है... तुम इसे तलवारबाज़ी सिखा दो; जिस तरह की इसकी हरकतें हैं, ऐसा लग रहा है जैसे यह दस साल की उम्र में ही आदमखोरों को मारने लगेगा...”

लखन ने उस आदमी की ओर देखा और बोला, “वीर, यह बस शरारती है और कुछ नहीं... पता नहीं यह कैसे इतना शरारती बन गया। हमारे पूरे खानदान में कोई इतना शरारती नहीं था। मैंने भी बचपन में इतनी शरारत नहीं की थी जितनी यह करता है; घर पर यह अपनी माँ की नाक में दम कर देता है और यहाँ पर मेरी नाक।”

लखन उसे दीवार से नीचे लेकर आया और फिर वहाँ पर खड़ी एक लड़की को देखा और कहा, “श्री, इसे घर ले जाओ; अगर यह नहीं जाए तो ज़बरदस्ती ले जाना, इसके कान पकड़कर ले जाना।”

श्री वीर की बेटी थी जो लगभग देवांश की ही उम्र की थी। अपने चार साल की उम्र में देवांश दिखने में काफ़ी सुंदर और क्यूट लगता था और उसके सर पर एक चोटी भी रहती थी जो उसे अलग ही लुक देती थी। वहीं श्री भी दिखने में काफ़ी सुंदर थी और लड़की होने की वजह से उसकी चोटी उसकी कमर तक आती थी।

देवांश जैसे ही उसके पास आया और आगे जाने की कोशिश की, श्री ने उसे चोटी से पकड़ा और बोली, “तुम घर चलते हो या मैं अभी तुम्हारे कान के नीचे दो लगा दूँ...” उसने तुतलाती हुई आवाज़ में कहा था जो काफ़ी प्यारा लग रहा था।

देवांश अभी भी दीवार की ओर जाना चाहता था; मगर श्री ने उसकी चोटी को नहीं छोड़ा और उसे चोटी से ही पकड़कर घर ले गई।

देवांश घर पर गिर गया क्योंकि श्री ने उसे धक्का मारकर गिराया था। वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और तुतलाती हुई आवाज़ में श्री की ओर देखते हुए बोला, “तो क्या हुआ? मैं उन्हें हाथों से ख़त्म कर दूँगा...”

देवांश ने अपने हाथ को ऊपर करके कुछ करने की कोशिश की, जैसे वह अंदर से जोर लगाकर अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर रहा हो; लेकिन इससे कुछ भी नहीं हुआ।

श्री बोली, “यूँ करके किसी को ख़त्म नहीं किया जा सकता है; इसके लिए तुम्हें तलवार चलाना सीखना होगा और तलवार सीखने के लिए तुम अभी काफ़ी छोटे हो; पहले बड़े हो जाओ और फिर तलवार सीखकर उन्हें ख़त्म करना; तब तक दीवार के इस तरफ़ ही रहो।”

यह कहकर श्री अपने घर की ओर चली गई; वहीं देवांश ने दोनों हाथ अपनी कमर पर रखे और बोला, “हूँह, अभी मेरी शक्तियाँ काम नहीं कर रही हैं; वक़्त आने दो, फिर मैं बता दूँगा सबको कि मैं क्या चीज़ हूँ।”

श्री ने देवांश को तो डाँट दिया था; वह दीवार के इस पार ही रहेगा; लेकिन उसे क्या पता था कि वह तो पैदा ही हुआ था दीवारों को पार करने के लिए; सिर्फ़ इस दीवार को नहीं, बल्कि वह अपने रास्ते में आने वाली हर एक दीवार को पार करके अपने दुश्मन तक पहुँचेगा और उसे ख़त्म करेगा। देवांश इस दुनिया से बुराई को ख़त्म करेगा; उस बुराई को जड़ से ही मिटा देगा।

100%