Arya and the Mystery of the Dark Staff Ch. 3

आर्य और काली छड़ी का रहस्य - Chapter 3

Posted by Aman Aj • Jan 06, 2025 02:20 PM

अध्याय 1

12 साल बाद

भाग-2

★★★

ठंडी हवाओं का सिलसिला जंगल में भी जारी था। लंबे पेड़ों के बीच आर्य और विष्णुवर एक-दूसरे के आगे-पीछे वहाँ बनी पगडंडी पर टहल रहे थे। आर्य के हाथ में लकड़ी का एक लंबा ठंडा था, जिससे वह बीच-बीच में आने वाली झाड़ियों को इधर-उधर कर रहा था।

आर्य चलते हुए अपने बाबा से बोला, “बाबा... आपको याद है आपने मुझे एक बार कहानी सुनाई थी? कुछ खतरनाक और अच्छे लोगों की कहानी।”

विष्णुवर कहानी के बारे में सोचने लगा। वह कहानी नहीं, बल्कि हकीकत थी। विष्णुवर ने उसे शैतानी दुनिया के बारे में बताया था—एक ऐसी दुनिया जो हमारी दुनिया से अलग, कहीं दूर किसी कोने पर स्थित है। वहाँ जितनी भी बुरी शक्तियाँ हैं, वे वहीं रहती हैं। कोई भी इस कहानी पर यकीन नहीं करता, लेकिन यह एक असली हकीकत थी।

विष्णुवर बोला, “हाँ बेटा। मुझे वह कहानी अच्छे से याद है। हमारे समाज में तीन तरह के लोग रहते हैं: पहले इंसान, दूसरे बुरी आत्माएँ, जिनमें प्रत्येक बुरा शैतान शामिल है, और तीसरे, शैतानों से लड़ने वाले लोग। बुरी आत्माओं का मकसद इस दुनिया पर कब्ज़ा कर अपना साम्राज्य बसाना है, जिसके लिए उन्हें अंधेरे के शहंशाह को इस दुनिया पर लाना ज़रूरी है। अंधेरे के शहंशाह के आने से इंसानों में खौफ फैलेगा, वहीं उनकी सेना को ताकत मिलेगी, और वे इंसानों पर कब्ज़ा कर लेंगे। लेकिन उनसे लड़ने वाला समूह उन्हें ऐसा करने नहीं दे रहा है। उनकी वजह से शैतान अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाते। उन्होंने शैतानों की दुनिया के रास्ते को खास जादुई ताकतों से बंद कर दिया है, जिसे खोलने के लिए दो छड़ियों की आवश्यकता है। हालाँकि, सब जानते हैं कि शैतानों को आने से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता, जिसके पीछे कई कारण हैं। एक तो शैतानों की संख्या बहुत ज़्यादा है, और दूसरा, उनके पास जो ताकत है वह दूसरे लोगों के पास नहीं है। इस वजह से उनसे लड़ने वाले लोग काफी कम हैं, और उनमें से भी उन लोगों की संख्या और भी कम है जिनके पास अलग तरह की ताकत हो—गिनती के चार या पाँच। इस समस्या से निपटने के लिए शैतानों से लड़ने वाले लोगों ने ताकत बढ़ाने के लिए एक अलग जगह की स्थापना की, जो हिमालय में बर्फीले पहाड़ों के बीच में बनी हुई है। सब उस जगह को ‘वर्ष वर्धन’ नाम से जानते हैं। वहाँ नए छात्रों को शामिल किया जाता है, और फिर उन्हें जादू और तलवारबाज़ी समेत अन्य चीज़ें सिखाई जाती हैं।”

“जादू...” अचानक आर्य ने हैरत से कहा, “मगर क्या आपको लगता है कि जादू जैसी चीज़ें संभव हैं? और फिर, वहीं अगर शैतानों को रोकने की कोशिश नाकामयाब हो गई और उनका शहंशाह दुनिया पर आ गया, तो क्या होगा? क्या वह अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा?”

विष्णुवर एक साथ दो सवालों से घिर चुका था। उसने पहले सवाल का जवाब देते हुए कहा, “देखो, जहाँ तक बात जादू की है, तो तुम्हारे पास जो क्षमता है, वह भी एक ऐसी क्षमता है जिस पर कोई यकीन नहीं कर सकता। अगर उसका वजूद है, तो जादू का भी वजूद है। रही बात शैतान की दुनिया पर आ जाने की, तो इसे लेकर एक भविष्यवाणी है। भविष्यवाणी में कहा गया है कि कोई खास तरह का लड़का, जब 21 साल का हो जाएगा, तो वह शैतान को मार सकता है। तब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह दुनिया में आए या ना आए। लेकिन आश्रम के लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते। उनकी कोशिश तो यही है कि वह शैतान दुनिया पर ही ना आने पाए—एक तरह से, ‘ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी’। मतलब, जब दुनिया पर किसी तरह का खतरा ही नहीं आएगा, तो भविष्यवाणी का कोई मतलब नहीं रह जाता।”

“आह... मतलब आपके ये आश्रम वाले लोग काफी समझदार हैं। वे नियति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका सीधा-साधा दूसरा मतलब निकल कर आता है: मुसीबत के इलाज से बेहतर, मुसीबत को ही मत आने दो।”

विष्णुवर हँस पड़ा। “यहाँ धागे के दो छोर एक जैसे हैं बेटा। कहीं से भी पकड़ लो, चीज़ एक ही मिलेगी। संभावनाओं को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता, ना?”

दोनों ही चलते-चलते एक ऐसी जगह पर आ गए थे जहाँ उनके ठीक सामने एक खूबसूरत झरना बह रहा था। झरने का पानी ऊँचाई से गिरते हुए एक मनमोहक आवाज़ पैदा कर, एक शानदार दृश्य का निर्माण कर रहा था। झरने के आस-पास काफी सारे रंग-बिरंगे फूल थे, जिन पर तितलियाँ उड़ रही थीं।

आर्य ने लंबी अंगड़ाई लेते हुए कहा, “हमारा घर शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह के पास मौजूद है। इस तरह के खूबसूरत झरने का दृश्य शायद ही किसी को अपने घर के पास देखने को मिले। मेरा तो अब नहाने का मन करने लगा है।”

विष्णुवर ने अपने सामने बहते पानी को देखा। “मेरे ख़्याल से तुम्हारा यहाँ नहाना ठीक नहीं है। यहाँ का पानी शांत है, बहाव में तेज़ी नहीं है; इस तरह के पानी में मगरमच्छ अधिक संख्या में मौजूद रहते हैं। कोई भी धोखे से तुम पर हमला कर सकता है।”

आर्य यह सुनकर हल्के से हँसने लगा। “आपको पता है ना बाबा मैं कौन हूँ, और मुझमें क्या-क्या ख़ास है। मुझे ठंड नहीं लगती, गर्मी नहीं लगती—यह नई बात है। मगर मुझे जख्म भी नहीं होते—यह तो काफी पुरानी बात है। आप इसे कैसे भूल गए?”

यह सुनकर विष्णुवर ने उसे एक समझदार शिक्षक के नज़रिए से देखते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारी यह ख़ासियत इसलिए नहीं कि तुम किसी ख़तरों से भरी जगह में खुद को एक शिकार की तरह डाल दो। तुम्हें अपनी इस आदत को बदलना होगा। अपनी ताकत को जानते हुए भी ख़तरों से सतर्क रहना होगा। ऐसे रहना होगा जैसे तुम एक आम इंसान हो। तुम्हारा रहन-सहन का तरीका, तुम्हारा लोगों से बोलने का तरीका, कठिन परिस्थितियों का सामना करने का तरीका—ये चीज़ें तुम्हें महान बनाएँगी, ना कि तुम्हारी क्षमताएँ। वे बस तुम्हारी मदद के लिए हैं। अगर तुम इसे लेकर महत्वाकांक्षी हो गए, तो हो सकता है किसी मुक़ाबले में तुम्हें मुँह के बल मात खानी पड़े।”

आर्य ने झुके हुए चेहरे से हामी भरी। “मैं आपकी बात का मतलब समझ गया बाबा। आप यही कहना चाहते हैं ना कि मुझे अपनी ख़ास क्षमताओं का हर वक़्त इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें ज़रूरत के हिसाब से, सही वक़्त पर आज़माना चाहिए।” इसके बाद वह झरने की तरफ़ देखते हुए बोला, “आपका कहना सही है। मैं नहाने के लिए किसी सुरक्षित जगह की तलाश करता हूँ... शायद झरने के सबसे पास की जगह ज़्यादा बेहतर रहेगी। वहाँ पानी का बहाव तेज़ है, तो ख़तरनाक मगरमच्छ हमला नहीं करेंगे।”

★★★

आर्य ने झरने के पास एक सुरक्षित जगह की तलाश की और स्नान करने लगा। वहीं उसके बाबा विष्णुवर झरने से थोड़ी दूर एक पत्थर की चट्टान पर जाकर बैठ गए। वह खुद को थका हुआ महसूस कर रहे थे—शारीरिक तौर पर नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर। आर्य जैसे लड़के का उनके कंधों पर भार उन्हें थका रहा था। वह यह बात अच्छे से जानते थे कि उन्हें आर्य की जिस ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना है, वह उसके लायक नहीं हैं; उसे किसी लड़ाई के लिए तैयार करना उनके वश की बात नहीं है। इसके लिए उसे वहाँ जाना चाहिए जिसके लिए वह बना है, मगर वे उलझन में थे। वे सही और उचित समय के मायाजाल में उलझे हुए थे। क्या सही रहेगा, क्या नहीं—इसका फ़ैसला करना उनके वश की बात नहीं थी।

आर्य को देखते-देखते उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और टटोलते हुए कुछ बाहर निकाला। वह एक अंगूठी थी—एक छोटी, सुनहरे रंग की अंगूठी जो बीच-बीच में सूरज की किरणों की वजह से चमक रही थी। उन्होंने अंगूठी को देखते हुए कहा, “आर्य, यह अंगूठी तुम्हारे सफ़र की शुरुआत के लिए बनी है—एक ऐसे सफ़र की शुरुआत के लिए जहाँ तुम्हें हज़ारों मुसीबतों से गुज़रते हुए मंज़िल तक पहुँचना है, ताकतवर दुश्मनों का सामना करना है। लेकिन तुम इस रास्ते पर कब निकलोगे, इसका फ़ैसला या तो तुम खुद करोगे, या यह वक़्त। इन दोनों के सिवा कोई भी तुम्हारे इस सफ़र को शुरू नहीं करेगा।”

वे अभी बात ही कर रहे थे कि उन्होंने देखा कि ऊपर का आसमान अविश्वसनीय तौर पर काला होता जा रहा था। उन्होंने अब तक कई दफ़ा काले बादलों को आसमान में आते हुए देखा था, मगर जिस तरह से आज काले बादल अचानक से पूरे आसमान को ढँक रहे थे, वह हैरतअंगेज था। कुछ समय पहले जो धूप नज़र आ रही थी, वह गायब होती जा रही थी। धूप की जगह ऐसा मौसम हो रहा था जैसे शाम पूरी तरह से ढल चुकी हो।

विष्णुवर अचंभित होते हुए अपनी जगह से खड़ा हो उठा।

वहीं आर्य पानी में नहा रहा था, तो नहाते-नहाते उसने ऊपर आसमान की तरफ़ नज़र डाली। आसमान के गहरे काले रंग को देखकर वह भी हैरान हो गया था। लेकिन उसकी हैरानी तब और ज़्यादा बढ़ गई जब उसने इससे भी हैरतअंगेज कुछ और देखा—जिस पानी में वह नहा रहा था, वह पूरा का पूरा पानी काला पड़ गया था। आर्य यह देखकर घबरा गया। उसने तुरंत तेज़ी दिखाई और पानी से निकलकर बाहर विष्णुवर के पास आ गया।

आर्य पानी से बाहर आने के बाद झरने की तरफ़ देखते हुए बोला, “बाबा... झरने का पानी ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा काला पड़ चुका है। आखिर यह सब हो क्या रहा है? क्या हम किसी तरह की मुसीबत में फँसने वाले हैं? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा।”

विष्णुवर के माथे पर सिलवटें आती जा रही थीं। उसकी बूढ़ी चमड़ी सिकुड़ रही थी। शायद वह जान चुका था कि यह घटना क्यों घट रही है। यह एक प्रतीक था, एक सूचना—शैतानों के आने की।

“अरे... तो हमारे कुछ दोस्त यहाँ छुपे बैठे हैं... देखो तो जंगल में अपने छिपने के लिए इन्होंने कौन सी जगह ढूँढ़ी है—झरने के नीचे, फूलों के बीच...” अचानक उनके ठीक पीछे हवा के अंदर कुछ अंधेरी परछाइयाँ प्रकट हुईं, और उनमें से एक अंधेरी परछाई बोली।

आवाज़ सुनते ही आर्य और विष्णुवर पीछे की तरफ़ पलट गए। उनके ठीक सामने काले चोगों में छह अंधेरी परछाइयाँ खड़ी थीं, जिनके चेहरे नहीं थे, बल्कि उनके चेहरों की जगह काला धुआँ तैर रहा था।

आर्य ने इस तरह की प्रजाति अपनी अब तक की उम्र में कभी नहीं देखी थी। उन्हें देखते ही उसका डरना जायज़ था। वह थोड़ा सहमता हुआ बोला, “बाबा... मुझे... मुझे ये ख़तरनाक लग रहे हैं... हमें यहाँ से भागना चाहिए।”

विष्णुवर ने आर्य का हाथ पकड़ा और कहा, “शांत रहो। मुझे पता है तुमने ये सब आज से पहले कभी नहीं देखा, इसलिए तुम्हारे मन में डर है। लेकिन मैं इनका कई बार सामना कर चुका हूँ। बस तुम डरना मत, और जैसा मैं कहूँगा वैसा करना।” कहते-कहते विष्णुवर ने अपने हाथ में पकड़ी अंगूठी आर्य के हाथ में पकड़ा दी। “अब तुम पीछे हो जाओ...” आर्य धीमे-धीमे कदमों से पीछे हटने लगा। वहीं विष्णुवर ने कुछ कदम आगे की ओर बढ़ाए और उनके सामने जाकर खड़ा हो गया।

जो शैतानी परछाई पहले बोली थी, उसने दोबारा कहा, “हम पिछले 12 सालों से आश्रम के लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर मार रहे हैं। उनके सुरक्षा-चक्र बनाने के बाद हम सिर्फ़ उन्हें ही नुकसान पहुँचा सकते थे जो उनके सुरक्षा-चक्र से बाहर हैं। और तुम्हें यह जानकर खुशी होगी कि तुम हमारे 816वें शिकार हो। आश्रम वाले सिर्फ़ दो ही काम कर सकते हैं: या तो तुम लोगों को मरते हुए देख सकते हैं, या फिर दोनों ही छड़ियाँ हमारे हवाले कर सकते हैं।”

“हमारे लोग सच्चाई को जानते हैं। उन्हें पता है कि तुम लोग अपने शैतानी मकसद में कभी कामयाब नहीं हो सकते। ना तो तुम लोगों को आश्रम से वे दोनों सुरक्षित छड़ियाँ मिलेंगी, ना ही तुम लोग कभी शैतानों के शहंशाह को यहाँ धरती पर ला पाओगे।”

यह सुनकर वे शैतानी परछाइयाँ ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगीं। हँसते हुए उसने कहा, “तुम्हें पता है, इस दुनिया में मुझे सबसे ज़्यादा इंसान पसंद हैं। क्यों? क्योंकि उनकी कहावतें बड़ी मज़ेदार होती हैं। उनके पास हर एक बुरी से बुरी और अच्छी से अच्छी स्थिति के लिए कहावत है। जैसे कि अब इस मामले में, जहाँ तुम हमें ज्ञान दे रहे हो, वहाँ यह वाली कहावत बड़ी जँचती है: ‘मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती’। और हम हमारे आका के गुलाम हैं; तब तक मेहनत करते रहेंगे जब तक हम अपने मकसद में कामयाब नहीं हो जाते, जब तक हमारे शहंशाह यहाँ इस दुनिया में नहीं आ जाते।”

“पूलावी ख़्वाब देखने वाले कभी कुछ हासिल नहीं कर पाते। उनके ख़्वाब बस ख़्वाब रह जाते हैं।” विष्णुवर अपने कदमों को गति देकर उनकी ओर पास जा रहा था। सभी शैतानी परछाइयाँ उसे पास आता देख चौंकनी हो रही थीं। वहीं आर्य दूर से अपने बाबा को उनके पास जाते हुए देख रहा था। यह बात उसकी समझ से परे थी कि उसके बाबा ऐसा क्यों कर रहे हैं, आखिर वे करना क्या चाहते हैं। लेकिन वह जो भी करना चाहते थे, उसका नतीजा अच्छा नहीं रहने वाला था।

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