आर्य और काली छड़ी का रहस्य - Chapter 2
अध्याय 1
बारह साल बाद
भाग-1
यह एक अद्भुत सुबह थी; मीठी और फूलों की सुगंध से भरी सुबह। परिदृश्य जंगल का था, जहाँ घने पेड़ों के बीच बने एक घर के चारों ओर सुंदर बाग़ जैसे फूल, लम्बे, छरहरे पेड़-पौधों की छाया, और सूखे पत्तों की मोटी चादर, जो जमीन पर बिछी हुई थी, मौजूद थी।
आर्य एक सोलह वर्षीय अपरिपक्व युवक था; गोरा रंग, मगर कमज़ोर शरीर। नीली आँखें, लम्बे भूरे बाल जो उसके माथे को भी ढँकते थे, थोड़ी लम्बी ठोड़ी, और अंदर की ओर धँसे हुए गाल; लेकिन इसके बावजूद उसमें एक अलग तरह का आकर्षण था।
सुबह के इस समय वातावरण में उसके द्वारा बनाए जा रहे भोजन की सुगंध भी व्याप्त थी। जिस घर में भोजन बन रहा था, वह घर कुछ ज़्यादा ख़ास नहीं था; एक छोटा, लकड़ी का बना घर, जिसमें दो कमरे, एक रसोई और एक बरामदा था। घर के बाहर चार सीढ़ियाँ बनी हुई थीं जो नीचे की ओर उतरती थीं।
बरामदे में एक लम्बा, गोल मेज़ था, जिस पर बैठा विष्णुवर अपनी आयु के अंतिम पड़ाव में भोजन का इंतज़ार कर रहा था। इंतज़ार में उसकी आँखों के सामने वह दृश्य घूम रहे थे जहाँ घोर अंधकार था, उसके पीछे अंधेरे के प्रतिनिधि लगे हुए थे, और वह अपनी जान बचाने के लिए खाई में कूद गया था। उस समय वह भाग्यशाली था, क्योंकि जब वह खाई में कूदा तो वह वहाँ एक पेड़ से जा लटका था; ऐसे पेड़ से जो जमीन से ज़्यादा ऊँचा नहीं था। इस वजह से उसकी जान बच गई और उसके साथ-साथ बच्चे की भी। वह इसे बच्चे का करिश्मा मानता था; आर्य का करिश्मा। भविष्यवाणी उसके साथ हुई थी, तो उसे सामान्य किसी भी नज़र में नहीं कहा जा सकता था।
जल्द ही आर्य भोजन लेकर बाहर आया और बोला, "बाबा, गरमागरम भोजन तैयार है। चलिए, अब जल्दी से भोजन शुरू कीजिए।"
आर्य के बोलते ही विष्णुवर अपनी पुरानी यादों से बाहर आ गया। उसने भोजन की ओर देखा और कहा, "तुम भी अपनी थाली ले आओ, आर्य… काफी दिनों से हमने साथ में भोजन नहीं किया।"
यह बात सच थी। आर्य हमेशा अपने बाबा के भोजन करने के बाद ही भोजन करता था। उसने सहमति प्रकट की, "मैं अभी ले आता हूँ…" इसके बाद वह पलक झपकते ही अंदर गया और वापस बाहर आ गया।
उसका अंदर जाना और वापस बाहर आना करिश्मे के तौर पर हुआ था; वह इसे हवा से भी तेज चलना कहता था। विष्णुवर उसकी इस तेज गति को भी तब से देखता आ रहा था जब से आर्य ने अपनी आयु के आठवें वर्ष में प्रवेश किया था। वह इसके बारे में कई तरह के सिद्धांत बना चुका था।
एक तो आर्य ऐसे समुदाय से आता था जो विशेष प्रकार की क्षमताएँ रखते थे; इसमें उसके माता-पिता की खूबियाँ भी शामिल थीं, जिनके रहस्य अज्ञात हैं। एक, वह भविष्यवाणी के अनुसार पैदा हुआ था, तो उसका अलग होना किसी तरह का आश्चर्य नहीं था।
जल्द ही दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर भोजन करने लगे। भोजन करते हुए आर्य बोला, "बाबा, आपको पता है, आजकल मैंने एक नई चीज़ की खोज की है। मैंने सुबह चाय बनाते वक़्त इस बात पर ध्यान दिया कि मेरा हाथ आग में नहीं जलता। यह कुल मिलाकर मेरी चौथी ऐसी खूबी है जो मुझे इस वर्ष देखने को मिली। ठंड का एहसास तो पहले ही नहीं होता था, और अब आग का एहसास भी नहीं होता।"
विष्णुवर ने गहरी साँस ली, "अभी तो और भी बहुत कुछ है जो तुम्हें अपने आप में देखने को मिलेगा। मेरे ख़्याल से इक्कीस वर्ष के होने तक तुम अपनी सारी क्षमताओं को जान जाओगे।"
"वह तो ठीक है, बाबा। लेकिन मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? आपने मुझे अभी तक नहीं बताया कि इन सब की वजह क्या है?"
अचानक विष्णुवर के हाथ भोजन करते-करते रुक गए। उसने कई बार आर्य को इन सब के पीछे के कारणों के बारे में बताने का फ़ैसला किया था, लेकिन हर बार यही सोचा कि आर्य अभी छोटा है; जब तक वह बीस वर्ष के आस-पास नहीं पहुँच जाता, तब तक उसे इस बारे में नहीं बताया जाए। कहीं ऐसा ना हो कि जब वह इस बारे में जाने तो पूरी तरह से टूट जाए, या कमज़ोर पड़ जाए, या फिर डर जाए, अथवा डगमगा जाए। उसे नहीं पता था आने वाले समय में उसका मुकाबला किससे होने वाला है। उसे अंधेरे से लड़ना था; दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति से।
आर्य दुबारा बोला, "क्या इसमें कोई ख़ास बात है, बाबा…?"
विष्णुवर सोच में डूबा हुआ था, तो उसने अपनी सोच से निकलते हुए कहा, "नहीं बेटा, इसमें कोई ख़ास बात नहीं है। मगर इतना ज़रूर है कि संसार में कुछ चीज़ें हमेशा अद्भुत होती हैं; अद्भुत और दूसरों से बिल्कुल अलग। उन चीज़ों को हम कीमती या अनमोल कहते हैं। तुम ऐसी ही चीज़ों में से एक हो; बिल्कुल अलग, कीमती। यही वजह है कि तुममें ये सब गुण हैं; ऐसे गुण जो किसी में नहीं होते। और तुम्हें आगे आने वाले समय में हमेशा इस पर गर्व होगा।"
"आगे आने वाले समय का तो पता नहीं, मगर अभी इस समय मैं अपनी इन चीज़ों को लेकर काफी दुविधा में रहता हूँ। दिमाग पर बोझ सा बना रहता है। यह क्या है, क्या नहीं…"
विष्णुवर इस बात को समझ सकता था। किसी सोलह वर्षीय बच्चे के पास रहस्यमयी शक्तियाँ होंगी तो उस पर क्या बीतेगी, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। विष्णुवर ने उसे दिलासा देते हुए कहा, "तुम्हें धीरे-धीरे इसकी आदत लग जाएगी। समय सभी चीज़ों को ठीक कर देता है। चलो, अब भोजन कर लो। भोजन करने के बाद हमें जंगल में भ्रमण के लिए जाना है।"
जंगल में भ्रमण ऐसी चीज़ थी जिसे वे रोज़ाना करते आ रहे थे। दिन में भोजन करने के बाद वे हमेशा जंगल में भ्रमण के लिए जाते थे; कभी पहाड़ों पर, कभी पेड़-पौधों की गहराई में, तो कभी कहीं और। वहाँ कभी-कभी आर्य अपनी क्षमताओं का भी परीक्षण करता था। लेकिन आज बाहर का मौसम कुछ ठीक नहीं था। बाहर काले बादल उमड़ रहे थे जो बारिश और तूफ़ान का प्रतीक थे; साथ ही किसी और चीज़ का भी… अंधकार…!!