पिशाच का जुनून - Chapter 2
ओम ठाकुर ने इस साल सत्रहवीं लड़की का खून पीकर उसकी जान ले ली थी। उस शहर से एक और लड़की गायब होकर वहाँ के न्यूज़पेपर और टीवी चैनल की सुर्खियाँ बन चुकी थीं।
ओम अपने बॉयज़ हॉस्टल रूम में आराम से सोया हुआ था। ओम को इतने आराम से सोया हुआ देखकर उसका एक दोस्त बोला, "देखा तूने? एक खूबसूरत लड़की का खून पीकर कितनी आराम से सोया हुआ है! और देखो इसके चेहरे की तरफ़! क्या इसके इतने स्मार्ट, चार्मिंग, डैशिंग और अट्रैक्टिव लुक को देखकर कोई कह सकता है कि इस हैंडसम से चेहरे के पीछे कितना बड़ा खूनी पिशाच छुपा हुआ है?"
तब दूसरा दोस्त उसे अपनी उंगली के इशारे से चुप रहने का इशारा किया, पर वह चुप होने के बजाय बोलता गया, "ये क्या? बार-बार मुँह पर उंगली रख रहे हो? मेरी बात मानो! इसकी ज़िन्दगी से निकल लो और इस खूनी पिशाच से अपनी जान छुड़ा लेते हैं!"
जैसे ही उसके उस दोस्त ने यह कहा, तुरंत उसे अपने कंधों पर कुछ भार सा महसूस हुआ। जैसे ही उसने अपनी बराबर में देखा, तो ओम ठाकुर खड़ा था। ओम को देखते ही उसके दोस्त की जुबान गले में अटक गई थी। और जहाँ वह शेर बना हुआ बोले जा रहा था, अब उसके मुँह से "मे...मे...मे..." की आवाज़ निकलने लगी थी। वह बकरे की तरह "मे...मे...मे..." करने लगा था।
उसकी हालत देखकर बाकी के दोस्त, ओम समेत, उस पर हँसने लगे थे। तब ओम हँसते-हँसते एकदम से चुप हुआ और अपने उस दोस्त के बिल्कुल करीब जाकर उंगली दिखाते हुए बोला, "मैं जानता हूँ तुम लोग मुझसे दूर जाना चाहते हो, मेरे साये से भागना चाहते हो, लेकिन ऐसा पॉसिबल नहीं है। तुम लोगों को दोस्ती के लिए ओम ठाकुर ने चुना है, तो जब तक ओम ठाकुर चाहेगा, तब तक तुम लोग मेरी ज़िन्दगी में रहोगे।"
अभी ओम कुछ और आगे कहने वाला ही था कि तभी उसका फ़ोन बज उठा। यह फ़ोन किसी और का नहीं, बल्कि ओम के पिता, ज़मींदार साहब का था।
ज़मींदार ने अपने बेटे ओम ठाकुर के कानों में यह बात डाली, "तेरी शादी उस मास्टर की बेटी से होगी, तो तू जल्द से जल्द गाँव लौट आ।" संगीता के बारे में जानकर वह जादुई आवाज़ वाली लड़की के पीछे की सच्चाई जानना चाहता था। ओम ठाकुर अपनी हालत से भली-भांति परिचित था, इसलिए वह किसी भी लड़की से शादी नहीं करना चाहता था। लेकिन उसके पिता ने उसे बताया था कि उसे इस शाप से बचाने के लिए एक विशेष नेकदिल वाली लड़की से उसकी शादी होनी चाहिए, क्योंकि कुछ महात्माओं ने उसकी कुंडली को लेकर यही भविष्यवाणी की थी। इसीलिए ज़मींदार साहब ने अपने बेटे की जान बचाने के लिए मास्टर जी की बेटी संगीता को अपनी बहू बनाने का फ़ैसला कर लिया था। उन्हें लगा था कि यह विशेष सुरीली आवाज़ वाली लड़की ही उसके बेटे को ठीक कर सकती थी।
लेकिन जब से ओम ने संगीता के बारे में सुना था, तब से वह उसके बारे में जानना चाहता था और उससे मिलना चाहता था। इसलिए उसने अपने गाँव वापस लौटने का फ़ैसला कर लिया था। जैसे ही उसके दोस्तों ने यह सुना कि ओम गाँव जा रहा है, तो उन तीनों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। लेकिन उनकी वह खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी थी, क्योंकि ओम उन्हें भी अपने साथ लेकर अपने गाँव पहुँच गया था। वह ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी करके अपने दोस्तों समेत गाँव लौट गया था।
और घर आकर जब उसे यह पता चला कि गाँव के मास्टर ने अपनी बेटी की शादी उससे करने के लिए मना कर दिया है, तो वह अंदर ही अंदर तप गया था। अब संगीता से मिलने का उस पर जुनून सवार हो गया था। फिर एक दिन वह अपना वेश बदलकर उसके गाँव पहुँच गया था। संगीता और ओम के गाँव दोनों एक-दूसरे से मिले हुए थे, और वहाँ पहुँचकर उसे आसानी से मास्टर जी के घर का पता मिल गया था।
उसने उनके घर के बाहर दस्तक दी। लेकिन कितनी देर तक दरवाज़ा खटखटाने के बाद भी कोई जवाब ना मिलने पर उसे एहसास हो गया था कि घर पर कोई नहीं है। उसने आस-पास मास्टर जी और उनके परिवार के बारे में पता किया, लेकिन किसी को कुछ भी नहीं पता था।
धीरे-धीरे यह बात पूरे गाँव में फैल गई और सब लोग मास्टर जी और उनके परिवार को ढूँढने निकल पड़े। पर किसी को कोई भी सुराग नहीं मिला। सब बहुत दुखी थे और सबकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके दुख-दर्द बाँटने वाला परिवार अब वहाँ नहीं है।
आखिर रातों-रात मास्टर जी का परिवार कहाँ चला गया था? सबके मन में यही सवाल चल रहा था।
दूसरी ओर, मास्टर जी ज़मींदार साहब की धमकी से बेहद डर गए थे। वह अपनी बेटी की शादी उनके बेटे से नहीं करना चाहते थे, क्योंकि ओम ठाकुर आस-पास के गाँव वालों की नज़र में एक बिगड़ा हुआ अमीरज़ादा था। उसने कोई काम ऐसा नहीं किया था जिससे उसे कोई पसंद करे। यह बात चारों ओर फैली हुई थी। इसीलिए कोई भी शरीफ़ बाप उसे अपनी बेटी नहीं दे सकता था।
मास्टर जी की बेटी कोई आम लड़की नहीं थी। वह तो देवी सरस्वती का रूप थी। गाँव का हर आदमी उसे प्यार और सम्मान देता था। उसकी शादी ऐसे ही किसी के भी साथ नहीं हो सकती थी। मास्टर जी ने उसे बेहद लाड़-प्यार से पाला था। वह उसे कोई भी तकलीफ़ नहीं होने देना चाहते थे।
इसीलिए रात में सबके सो जाने के बाद मास्टर जी अपनी बेटी और पत्नी को लेकर शहर चले गए थे, हमेशा के लिए।
ओम ठाकुर यह बात बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। बचपन से लेकर आज तक उसने जो चाहा था, वह पाया था। अगर वह किसी चीज़ को अपना नहीं बना पाता था, तो वह उसे नष्ट कर देता था, किसी और के लायक भी नहीं छोड़ता था। पहले तो वह मास्टर जी की बेटी से शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन उनके यूँ अचानक लापता हो जाने के बाद उसे अब संगीता को देखने और उसे अपना बनाने की जुनून और ज़िद चढ़ गई थी।
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