पिशाच का जुनून Ch. 3

पिशाच का जुनून - Chapter 3

Posted by Shayna choudhary • Jan 06, 2025 05:50 PM

ओम इंग्लैंड से लौट आया था। गाँव के मास्टर दीनानाथ जी ने अपनी बेटी संगीता की शादी उससे करने से मना कर दिया था। इससे ओम के अंदर गुस्से की आग भड़क उठी थी।

वह संगीता को प्यार नहीं करता था; उसने उसे देखा तक नहीं था, केवल सुना था उसके बारे में।

वह बिना देखे ही संगीता को अपनी जिद बना चुका था। ओम ठाकुर यह बात हजम नहीं कर पा रहा था कि कोई लड़की उसे रिजेक्ट करके कहीं जाकर छुप गई हो। अब ओम ने सोच लिया था कि वह जादूई आवाज वाली लड़की की सच्चाई पता लगाकर रहेगा।

ओम संगीता के गाँव से अपने घर लौट आया था। वहाँ आकर वह अपने कमरे में इधर-उधर बुरी तरह टहलने लगा। उसके तीनों दोस्त, गौरव, रोनित और मयंक, वहीं थे।

ओम को इस तरह बेचैन होकर टहलता देख, वे हल्के-हल्के डरने लगे थे।

उनके हाथों में जो खाने-पीने का सामान था, उन्होंने उसे एक-एक तरफ अलग-अलग रख दिया था। वे जानते थे कि अगर वे ओम के सामने इस तरह खाना खाएँगे, तो ओम उनका खून पी जाएगा।

उन्हें अच्छी तरह अंदाजा था कि गुस्से में ओम किस हद तक जा सकता था।

तब एक दोस्त ने हिम्मत करके ओम से पूछा, "क्या हुआ ओम? क्यों परेशान हो रहा है? अगर वह लड़की नहीं मिली, तो छोड़ दे। तेरे लिए लड़कियों की कोई कमी है क्या? हम वापस विदेश लौट जाते हैं। वहाँ मैं वादा करता हूँ, तेरे लिए हर रोज एक नई लड़की लेकर आऊँगा। जैसा तू कहेगा, वैसा करूँगा। तू उस मामूली लड़की के लिए परेशान मत हो।"

जैसे ही उसके दोस्त ने यह कहा, ओम का दिमाग खराब हो गया और वह तेजी से अपने माथे पर हाथ मारने लगा।

उसका वह दोस्त, जो उसे संगीता को भूलने के लिए कह रहा था, अब अपने कदम पीछे लेने लगा था।

क्योंकि वह जान चुका था कि ओम अब गुस्से से पागल हो चुका है। यह उसकी बचपन से ही आदत थी; जब भी ओम को हद से ज़्यादा गुस्सा आता था, तो वह अपना हाथ अपने माथे पर मारने लगता था।

उसका दोस्त डर के मारे काँपने लगा। तभी ओम एक झटके से उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

और ओम ने एक झटके से उसका गला पकड़ लिया। ओम बहुत ही ज़्यादा गुस्से में था। तभी उसके बाकी के दो दोस्त ओम का हाथ पकड़कर उसे रोकने की कोशिश करने लगे।

और कहने लगे, "ओम, प्लीज़, उसे जाने दो। उससे गलती हो गई। और यह तुम्हारा बचपन का दोस्त है। छोड़ दो, छोड़ दो!"

लेकिन ओम कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं था। तब उनमें से एक दोस्त ने कहा, "वह गौरव को जाने दो। उस लड़की को ढूँढने के लिए हम तुम्हारी मदद करेंगे। मैं वादा करता हूँ। छोड़ दो इसे।" संगीता का ज़िक्र आने पर ओम कुछ हल्का पड़ा और उसने उसे छोड़ दिया। उसका दोस्त गौरव जोर-जोर से साँसें लेने लगा। उसे तो ऐसा लग रहा था कि आज उसका काम तमाम हो ही जाएगा।

तब मयंक ने गौरव को एक गिलास पानी दिया और उसकी पीठ सहलाने लगा ताकि उसे साँस लेने में आसानी हो।

ओम उन तीनों पर एक गहरी नज़र डालता हुआ वहाँ से निकल गया। ओम के जाने के बाद तीनों ने राहत की साँस ली। तब रोनित गौरव से बोला, "तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। तुम जानते हो ना ओम को। बचपन से ही उसे किसी चीज़ को पाने की ज़िद लग जाती है, तो वह उसे पाकर ही रहता है।"

"आज थोड़ी भी देर हो जाती, तो तुम जानते हो क्या हो सकता था तुम्हारे साथ। अब मेरी बात ध्यान से सुनो। ओम उस लड़की को अपनी जिद बना चुका था। उसे अब हर हाल में केवल संगीता चाहिए थी, किसी भी कीमत पर।"

इसलिए ओम ने संगीता के गाँव में चारों ओर अपने आदमी फैला दिए थे।

लेकिन कोई कुछ भी पता नहीं लगा पाया था।

संगीता को उसके गाँव में केवल कुछ लोगों ने ही देखा था। सभी लोगों ने केवल उसकी आवाज़ ही सुनी थी।

केवल उसके पिता की उम्र वाले लोगों ने ही उसे आज तक देखा था।

वह परदे के पीछे से ही गाना गाती थी, जिसे घर के बाहर खड़े लोग सुनते थे।

और अब चारों ओर उसे जादूई आवाज़ वाली लड़की के नाम से बुलाया जाता था।

मास्टर जी का एक शिष्य मोहन शहर में काम करता था।

मास्टर जी की बदौलत ही वह एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया था और साथ ही साथ अपने घर के खर्च के लिए पार्ट टाइम काम भी करता था।

उसने एक छोटा सा घर खरीद रखा था। मास्टर जी जब शहर गए, तब किस्मत से मोहन उनसे टकरा गया और वह मास्टर जी और उनके परिवार को अपने साथ अपने कमरे पर ले गया।

मोहन एक आम सी शक्ल-सूरत का लड़का था। वह बड़ा ही मेहनती और ईमानदार था; वह पढ़ाई में भी बेहद तेज था।

मास्टर जी उससे काफी प्रभावित थे।

मोहन ने संगीता को नहीं देखा था, क्योंकि वह हमेशा अपना चेहरा छुपाकर रखती थी।

मास्टर जी ने उसे सख्त हिदायत दे रखी थी कि किसी को भी अपना चेहरा नहीं दिखाना है।

मास्टर जी ने मोहन से संगीता की शादी और उसके गुणों की बात छुपा ली थी।

और अपनी बेटी की पढ़ाई का हवाला देते हुए मोहन से कहा,

"मोहन बेटा, तुम तो जानते हो गाँव में बड़े स्कूल नहीं हैं, और मेरी बेटी संगीता को पढ़ने का बेहद शौक है। इसीलिए मैं इसे लेकर शहर चला आया हूँ।"

"इसकी पढ़ाई के लिए शहर के तौर-तरीके हम लोग ज़्यादा नहीं जानते हैं,"

"इसलिए हम तुमसे सहयता चाहते हैं। तुम संगीता को कॉलेज में दाखिला दिला दो, और साथ ही साथ कोई छोटा सा घर भी हमें रहने के लिए दिला दो बेटा। तुम्हारी बहुत मेहरबानी होगी।"

"मास्टर जी, आप कैसी बातें कर रहे हैं?"

"मास्टर जी, आपने ही तो मुझे आज इस काबिल बनाया है। आपके काफी एहसान हैं मुझ पर। मैं हर तरह से आपकी सहयता करूँगा, और संगीता का दाखिला भी अपने ही कॉलेज में करवा दूँगा। मेरा कॉलेज शहर का सबसे बड़ा कॉलेज है।"

मास्टर जी के पास जो जमा पूँजी थी, वह सब अपने साथ ले आए थे और उन्होंने मोहन की मदद से एक छोटा सा घर खरीद लिया था।

और संगीता का एडमिशन भी शहर के बड़े कॉलेज में करा दिया।

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