बंधन ( एक मर्यादा ) - Chapter 2
बिहार (मधुबनी)
चौधरी निवास,
नारायण जी अपनी बात कहकर खामोश हो गए। सब खामोश होकर बैठे थे। सुधीरा जी भी शांति से बैठी थीं; उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वे क्या बोलें। बंधन भी शांति से बैठी हुई अपनी ही सोच में गुम थी। लेकिन कोई था जिसे यह शांति काटने को दौड़ रही थी, और वह था हमारा प्यारा सा केशव, जिसे शांति बिल्कुल भी पसंद नहीं थी।
केशव (खामोशी तोड़ते हुए) "पापा, दीदी को जाने दो ना। हम सब कैसे भी पैसे का इंतज़ाम कर ही लेंगे। और दीदी वहाँ पर रहेंगी तो जब मेरा बोर्ड हो जाएगा तो मैं भी आगे की पढ़ाई के लिए दीदी के पास ही चला जाऊँगा।"
सुधीरा जी (चिढ़ते हुए) "तू तो हर जगह पर खुद को फिट करता रहता है। पहले दसवीं तो कर ले।"
बंधन उदासी में बैठी थी। जिसे देखते हुए नारायण जी बोले।
नारायण जी (बंधन से) "देखो ना, कोई ऑनलाइन कोर्स हुआ तो ऑनलाइन ही कर लेना।"
बंधन (नारायण जी की तरफ़ देखते हुए) "पिता जी, ऑनलाइन कोर्स तो मिल जाएगा, लेकिन मैं रियल लाइफ़ को भी देखना चाहती हूँ। मैं भी देखना चाहती हूँ कि बड़े शहर में लोग कैसे रहते हैं? कैसे ऑफिस जाकर काम करते हैं? कैसे लाइफ़ को और बेहतर बना सकते हैं। मैं लाइफ़ के हर फेज़ को जीना चाहती हूँ, रियल लाइफ़ की प्रॉब्लम खुद से हैंडल करना चाहती हूँ।"
सुधीरा जी (बंधन से) "इतनी बड़ी भी नहीं हुई है कि ये सब खुद करेगी। और वैसे भी लड़की जाती है, ऐसे कैसे अकेले दिल्ली जाने दे? वैसे भी माहौल कुछ ठीक नहीं है। गाँव घर में, या मधुबनी जैसे शहर में ही ये हाल है, कहीं कोई घटना होती है तो कहीं कोई, और दिल्ली तो महानगर है, कि वहाँ तो पता नहीं क्या हाल होगा?"
बंधन (शांति से) "माँ, आप जो कह रही हैं सब ठीक है अपनी जगह, लेकिन ज़माना आगे और भी खराब हो होगा, ये अब ठीक होने वाला नहीं है, इसलिए इसका तो कोई इलाज नहीं है। लेकिन इस डर से कि क्या होगा? हम आगे बढ़ना तो नहीं छोड़ सकते हैं ना? हम इन सिचुएशन्स से लड़ सकते हैं, और लड़कर ही आगे बढ़ सकते हैं। मैं भी लड़ना चाहती हूँ, ज़माने के साथ आगे बढ़ना चाहती हूँ।"
बंधन इतना बोलकर शांत हो गई। नारायण जी थोड़ी देर तक बंधन को खामोशी से देखते रहे, फिर सुधीरा जी को देखकर बोले।
नारायण जी (सुधीरा जी से) "आप गाड़ी की चाबी ले आइए, मुझे दुकान के लिए जाना है।"
सुधीरा जी (नारायण जी से) "पहले आप नहा लीजिए और पूजा पाठ से निवृत हो जाइए, इसके बाद दुकान जाइएगा। क्योंकि बंधन अपने कंप्यूटर क्लास के लिए चली जाएगी और केशव को आज जल्दी स्कूल में बुलाया है। दुकान पर बैठने के लिए कोई नहीं रहेगा, इसलिए पहले आप अपने काम ख़त्म करके ही जाइए।"
नारायण जी उठकर नहाने के लिए चले गए।
सुधीरा जी (बंधन और केशव से) "तुम दोनों भी अपने क्लास की तैयारी करो। केशव, अपना बैग सेट कर लो और जैसे ही पापा नहाकर निकलें, तुम भी नहा लो। बंधन, घर की सफ़ाई ख़त्म करके जल्दी से नहा लो, ठीक है? तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूँ, वरना तुम्हारा बाप बिना खाए निकल जाएँगे।"
सुधीरा जी उठकर किचन की तरफ़ चली गईं, और केशव भी अपना बैग ठीक करने चला गया। बंधन कुछ देर तक वैसे ही बैठने के बाद उठकर काम पर लग गई। सबसे पहले अपने मम्मी-पापा का कमरा साफ़ करती है, फिर अपना और लास्ट में केशव का। इसके बाद वह जाकर नहा लेती है, और मंदिर में जाकर पूजा करती है।
बंधन (मंदिर में) "हे बंसीधर, मेरी प्रार्थना सुनो प्रभु, मैं कभी भी किसी पर निर्भर नहीं होना चाहती हूँ। मैं जीवन के हर समय के लिए तैयार होना चाहती हूँ। मुझे आजादी चाहिए प्रभु, स्वतंत्रता चाहिए विचारों का, निर्णयों का। मैं चाहती हूँ कि अपने जीवन रथ की सारथी मैं खुद रहूँ, और आप मेरे मार्गदर्शक। हे मोहन, मेरी प्रार्थना सुनो प्रभु, मेरे जीवन को एक नवीन रंग प्रदान करो।"
वह पूजा ख़त्म करके चली जाती है। उसके जाते ही मंदिर में जो दीप जल रहा था, जिसे बंधन ने जलाया था, उसमें रोशनी एकदम से तेज हो जाती है, जैसे प्रभु ने उसकी प्रार्थना सुन ली हो और यह उसका संकेत हो। सब एक साथ बैठकर नाश्ता करते हैं। नाश्ते में रोटी और आलू का भुजिया बना था। सब नाश्ता करते हैं। नारायण जी दुकान के लिए निकल जाते हैं। केशव और बंधन एक साथ ही अपने क्लास के लिए निकलते हैं। रास्ते में बंधन बिल्कुल खामोश थी।
केशव (बंधन को देखकर) "क्या सोच रही हो?"
बंधन (केशव को देखकर उदास होते हुए) "लगता है मेरा आगे अच्छे कॉलेज में पढ़ने का सपना, सपना ही रह जाएगा।"
केशव (बंधन से) "उल्टा क्यों सोचती हो? देखो, पापा फ़ाइनेंशियल इश्यू दिखा रहे हैं। अगर इसी से निपट लिया जाए तो... मतलब तब कोई बहाना नहीं बचेगा ना।"
बंधन (कन्फ़्यूज़ होते हुए) "मतलब क्या है तेरा? हम क्या कर सकते हैं?"
केशव (चहकते हुए) "और दीदी, ये बोलो कि हम क्या नहीं कर सकते हैं। मतलब समझ रही हो? (बंधन धीरे से ना में सर हिला देती है) अरे, मैं समझाता हूँ। पापा ने कहा कि पैसे की दिक्क़त है इसलिए ऑनलाइन देखो। अब आपका ग्रेजुएशन कम्पलीट है, इसलिए आप किसी भी कंपनी में एक पी.ए. की तौर पर काम कर सकती हो। आप बड़ी कंपनी में देखो, वहाँ अच्छे सैलरी के साथ जॉब मिल जाएगा और कौन सा रोज-रोज क्लास करना पड़ेगा आपको? और तो और कॉर्पोरेट का माहौल भी पता लग जाएगा।"
बंधन (खुश होते हुए) "क्या सही दिमाग लगाया है! ये बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं। वैसे मेरे संगत में रहकर तेरा दिमाग भी तेज हो गया है। वेल डन।"
इसके बाद वह केशव की पीठ को जोर से थपथपा देती है।
केशव (चिढ़ते हुए) "और दीदी, मारो मत, चोट लगती है।"
बंधन (रुकते हुए) "सुन तो, आज पक्का रहा, शाम को हम दोनों ही कंपनी सर्च करेंगे जिसकी हमें रिक्वायरमेंट है। और हाँ, आज घर पर ही रुकना, दोस्तों के साथ मत निकल जाना, वरना पिताजी को बोल दूँगी कि तू जयनगर गया था घूमने के लिए, उस आवारा मोहित के साथ उसकी बाइक पर।"
केशव (हाथ जोड़ते हुए) "हाँ देवी, समझ गया।"
तो आगे क्या होगा इस कहानी में? क्या केशव का आइडिया काम करेगा? जानने के लिए बने रहें बंधन (एक मर्यादा)!