My Stupid Baby - Chapter 1
अजमेर स्टेशन पर रात साढ़े आठ बजे योगा एक्सप्रेस आ चुकी थी।
"हाँ मम्मा, मैं पहुँच गया स्टेशन! अरे आप तो मेरी ऐसी चिंता करती हो जैसे मैं आपका बेटा नहीं, बेटी हूँ। हाँ हाँ, मैं समझ गया, ओके... हाँ, पहुँचते ही फोन कर दूँगा।"
ये थे नयन शेखावत, दिखने में क्यूट, शरारती और नादान। उम्र 23 साल थी, लेकिन दिखने में अभी भी 18 साल के लगते थे।
नयन ने फोन जेब में रखा और ट्रेन में चढ़ गया।
"डब्बा न. S4," ये कहते हुए वह आगे बढ़ रहा था।
जब वह S4 में आया, तो उसने देखा कि कुछ लोग सो रहे थे, तो कुछ बैठे हुए थे। वह अपनी सीट ढूँढने लगा। उसे सीट मिल गई, लेकिन उसकी सीट पर पहले से ही कोई बैठा हुआ था।
"ऐ मिस्टर!" नयन ने उस शख्स के सामने चुटकी बजाते हुए कहा, जो अपने लैपटॉप में नज़रें गड़ाये बैठा था।
उसने अपना सिर उठाकर नयन को देखा।
ये शख्स थे चन्द्र सिंह राठौड़, उम्र 28 साल, दिखने में काफी हैंडसम और समझदार। हमेशा समझदारी से काम लेते थे, लेकिन जब बात हक़ की होती थी, तो किसी को पलटकर जवाब देने से भी पीछे नहीं हटते थे।
चन्द्र ने नयन को देखा और कहा, "कहिये!"
"कहिये नहीं, आप उठिये यहाँ से, ये सीट मेरी है।" नयन ने बड़े हक़ से कहा।
"शायद तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है, ये मेरी सीट है।" चन्द्र ने भी अपनी बात कही।
"अच्छा! खिड़की वाली सीट देखी नहीं कि बैठ गए उस पर और बड़े हक़ से उसे अपनी बता रहे हो। ये सीट मेरी है, उठो यहाँ से।" नयन ने उसे उंगली से उठने का इशारा करते हुए कहा।
तभी चन्द्र ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और नयन को दिखाते हुए बोला, "देखो मेरी टिकट, ये सीट मेरी ही है।"
"अच्छा! टिकट तो मेरे पास भी है, अभी दिखाता हूँ।" ये कहते हुए नयन ने भी अपना मोबाइल निकालकर उसके सामने कर दिया।
जिसे देखकर चन्द्र हल्का सा मुस्कुराया और नयन की तरफ़ देखकर बोला, "तुम अपनी आँखों को चेक कराओ, 13 और 18 में फर्क नज़र नहीं आता तुम्हें!"
ये सुनकर नयन ने मोबाइल देखा और अपनी गलती जानकर उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, फिर धीरे से खोलते हुए चन्द्र की ओर देखा।
"ये सीट न. 13 है बच्चे, जोकि मेरी है और तुम्हारी 18 न. सामने किनारे वाली जो सीट है ना, वो है।" चन्द्र ने अपनी आँखों से ही उसकी सीट की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
"क्या हुआ भाई?" चन्द्र का छोटा भाई राज, जो ऊपर वाली सीट पर सो रहा था, उसने नीचे झाँकते हुए कहा।
ये था राज सिंह राठौड़, उम्र 20 साल। ये भी दिखने में क्यूट और चंचल स्वभाव के थे, और ये थोड़े शैतान भी थे।
"कुछ नहीं, तू सो जा, इन्हें बस थोड़ी सी गलतफहमी हो गई थी, जो अब दूर हो गई है।" चन्द्र ने नयन को देखते हुए कहा, जो अभी भी वहाँ खड़ा चन्द्र को घूर रहा था। फिर इसी तरह घूरते हुए अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। वहीं राज भी उबासी लेते हुए फिर से सो गया।
नयन अपनी सीट पर बैठ तो गया था, लेकिन उसे वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। उसे खिड़की वाली सीट चाहिए थी, लेकिन बदकिस्मती से उसे ये किनारे वाली सीट मिली थी। उसने अपने पास वाली सीट की ओर देखा, जहाँ एक औरत अपने बच्चे के साथ सोई हुई थी। वैसे रात का समय था, उस हिसाब से तो नयन को भी सबसे ऊपर वाली सीट पर जाकर सो जाना चाहिए था, क्योंकि स्लीपर के हिसाब से वो सीट उसकी थी, लेकिन वो सोना नहीं चाहता था। क्योंकि वो जानता था कि अगर वो एक बार सो गया, तो उठ नहीं पाएगा। घर पर तो जब उसकी मम्मा चिल्ला-चिल्लाकर उसे उठाती थी, तब जाकर उसका सवेरा होता था।
नयन ने देखा कि चन्द्र ने अपना लैपटॉप उठाकर ऊपर बैग में रख दिया और वापस अपनी सीट पर खिड़की की ओर मुँह करके बैठ गया। नयन ने भी अपने बैग को ऊपर रख दिया और वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया। वो चन्द्र को देख रहा था, जो अभी भी खिड़की की ओर मुँह किये बैठा था।
"ना जाने इस अंधेरे में कौन सा नज़ारा देख रहा है?" नयन ने अपने मन में ये सोचा और चन्द्र को देखकर मुँह सिकोड़ लिया।
तभी चन्द्र उठकर चल दिया, शायद वो बाथरूम जा रहा था। उसके जाने के बाद नयन ने उसकी खाली सीट की ओर देखा और उछलकर उसकी सीट पर बैठ गया। नयन खिड़की की ओर मुँह करके वहाँ से आती ठंडी हवा को अपने चेहरे पर महसूस करने लगा।
"ले लिया ठंडी हवा का आनंद।"
ये आवाज़ सुनकर जब नयन ने उस ओर देखा, तो पाया कि चन्द्र उसके सामने खड़ा उसे ठंडी निगाहों से घूर रहा था।
"चलो उठो यहाँ से।" चन्द्र ने उसे उठने का इशारा करते हुए कहा।
"मुझे यहीं बैठने दो ना, मेरी सीट पर जाकर बैठ जाओ, मुझे वहाँ अच्छा नहीं लग रहा।" नयन ने मासूम सी शक्ल बनाकर कहा।
"ओह्ह! मुझे तो जैसे वहाँ बैठकर परम आनंद की प्राप्ति होगी, है ना! देखो, मैं इस ट्रेन में कोई फ्री में सफ़र नहीं कर रहा, मैंने भी इस सीट के लिए पैसे दिए हैं, अब अगर तुम्हें वो सीट मिली है तो इसमें मैं क्या करूँ, उठो यहाँ से।" इस बार चन्द्र ने थोड़ा तल्खी से पेश आते हुए कहा।
"नहीं उठता मैं, कर लो जो करना है।" नयन ने भी अकड़ते हुए कहा।
"बड़े ढीठ हो।"
"हाँ, हूँ तो।"
"तो तुम ऐसे नहीं उठोगे।"
"नहीं।" नयन ये कहते हुए मुँह फेरकर बैठ गया।
"ठीक है।" ये कहते हुए चन्द्र ने एकदम से नयन को अपनी गोद में उठा लिया।
"अर्रे! ये ये क्या कर रहे हो...!!!" नयन ये कहते हुए अपने पैर हिलाने लगा, लेकिन चन्द्र ने उस पर कोई ध्यान ना देते हुए उसे उसकी सीट पर बिठा दिया और खुद अपनी सीट पर जाकर आराम से बैठ गया। नयन तो जैसे सदमे में ही चला गया था।
"ना जाने किस टाइप का इंसान है ये, ऐसे कैसे मुझे गोद में उठा लिया।" नयन ने ये सोचते हुए थूक निगल लिया। चन्द्र के लिए उसके मन में अलग ही इमेज बन चुकी थी।
चन्द्र ने जब उसकी ओर देखा, तो नयन ने घबराकर दूसरी ओर मुँह फेर लिया। चन्द्र ये देखकर हल्का सा मुस्कुरा दिया और खिड़की की ओर मुँह करके आँखें बंद कर लीं।
थोड़ी देर तो नयन बैठा रहा, लेकिन अब वो बोर हो रहा था। उसने अपना मोबाइल निकाला, तो देखा कि उसकी बैटरी भी ख़त्म होने वाली थी।
"ओह शिट, ये भी मरने वाला है।" ये कहते हुए उसने फिर से मोबाइल अपनी पॉकेट में डाल लिया। फिर उसने ऊपर अपने बैग की ओर देखा।
"ऐसा करता हूँ, लैपटॉप में ही कोई मूवी देख लेता हूँ, रात तो निकल ही जाएगी।" ये सोचकर वो अपने बैग से लैपटॉप निकालने के लिए उठा। जैसे ही उसने अपने बैग की चैन खोली, उसकी नज़र वहीं पास में सो रहे चन्द्र पर पड़ी, जो अभी भी वैसे ही खिड़की की ओर मुँह करके सोया हुआ था।
"चाहे बैठे-बैठे ही सोना पड़े, लेकिन खिड़की से दूर नहीं हटेगा, कैसा चिपका हुआ है खिड़की से चमगादड़।" नयन ने ये सोचते हुए अजीब सी शक्ल बना ली।
तभी अचानक से ट्रेन रुक गई, शायद किसी ने चेन खींची थी। इस तरह अचानक ट्रेन के रुकने से नयन संभल नहीं पाया और सीधा चन्द्र के ऊपर जा गिरा। उसके होंठ चन्द्र के गाल पर जाकर टिक गए और हाथ कंधों पर। अचानक से चन्द्र ने चिल्लाते हुए अपनी आँखें खोलीं। इससे पहले कि वो अपना मुँह सीधा करता, नयन जल्दी से हड़बड़ाते हुए उसके ऊपर से उठ गया। चन्द्र ने हैरान नज़रों से उसकी ओर देखा।
"स्स्स... सॉरी... मैं तो ब... ब... बस अपना लैपटॉप लेने आया था... ये ट्रेन ही अचानक से रुक गई... मैंने जानबूझकर नहीं किया..." नयन हड़बड़ाते हुए अपनी सफाई पेश कर रहा था, तो चन्द्र बस उसे हैरानी से एकटक देख रहा था, क्योंकि उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो आखिर बोले तो क्या बोले?
जब नयन ने उसे इस तरह खुद को देखता हुआ पाया, तो हड़बड़ाते हुए जल्दी से अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। चन्द्र अब भी उसे देख रहा था। नयन उसकी ये नज़रें सहन नहीं कर पा रहा था, इसलिए वो जल्दी से उठा और सबसे ऊपर वाली सीट पर जाकर करवट लेकर दूसरी ओर मुँह करके लेट गया।
चन्द्र उसकी ये सब हरकतें देखकर अपने मन में सोचने लगा, "क्या अनाड़ी लड़का है, ऐसा भी क्या हो गया जो इतना रिएक्ट कर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये मुझे कुछ और ही समझ रहा हो।" ये सोचते हुए उसने अपने घुटने पर कोहनी टिकाते हुए अपना हाथ माथे पर रख लिया और ना में सिर हिलाते हुए सोचा, "ओह गॉड! ये आजकल के बच्चे भी ना जाने क्या-क्या सोचते हैं।"
रात गहराती जा रही थी और ट्रेन अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी। कितने स्टेशन आए और गए।
सुबह साढ़े चार बजे ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर रुकी। चन्द्र ने अपने भाई को उठाया और फिर वो दोनों अपना बैग उठाकर चलने लगे। चन्द्र ने एक नज़र नयन को देखा, जो अब भी सोया हुआ था।
चन्द्र के छोटे भाई राज ने जब उसे देखा, तो कहने लगा, "भाई! ये स्टेशन तो लास्ट है ना, तो फिर ये भाई साहब और आगे कहाँ जाएँगे?" उसने नयन की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
चन्द्र ने ये सुनकर नयन को आवाज़ लगाते हुए थोड़ा तेज आवाज़ में कहा, "अरे सुनो! ये लास्ट स्टेशन है।" चन्द्र ने अपने बैग से नयन के पैर को हिलाते हुए कहा, क्योंकि उसे हाथ लगाकर वो उसके मन में अब और गलतफहमी पैदा नहीं करना चाहता था। उसके इस तरह उठाने का कोई असर नहीं हुआ नयन पर, उसके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी।
"लगता है तेरी तरह कुंभकर्ण है।" चन्द्र ने राज से कहा।
राज हँसते हुए बोला, "अच्छा तो अब आप देखना कि ये कुंभकर्ण इस कुंभकर्ण को कैसे उठाता है।" ये कहते हुए राज ने अपना बैग चन्द्र को थमाया और नीचे वाली सीट पर पैर रखते हुए नयन की सीट तक पहुँच गया। नयन करवट लेकर गहरी नींद में सोया हुआ था। राज एकदम से उसके कान के पास आकर जोर से चिल्ला दिया। चन्द्र ने भी अपने कानों पर हाथ रख लिए और नयन तो "मम्मा मम्मा" चिल्लाते हुए एकदम से उठकर बैठ गया।
नयन के इस तरह "मम्मा" कहकर चिल्लाने पर राज और चन्द्र को हँसी आ गई। चन्द्र ने तो हँसते हुए फिर भी मुँह फेर लिया, लेकिन राज तो नयन के सामने ही हँसते हुए बोला, "और अब कहाँ तक जाओगे ब्रो, ये लास्ट स्टेशन है दिल्ली।"
"क्या? दिल्ली आ गया!" ये कहते हुए नयन जल्दी से उतरा और अपना बैग लेकर वहाँ से जाने लगा, तो सामने चन्द्र पर नज़र पड़ी। उसे देखकर वो अचानक से रुक गया। रात के सीन उसके दिमाग में चलने लगे। उस बारे में सोचते हुए वो घबराकर जल्दी से उसके साइड में से निकलकर भाग गया। उसे इस तरह भागते देख चन्द्र गहरी साँस लेते हुए ना में गर्दन हिलाने लगा।
"व्हाट अ स्ट्रेंज पर्सन? एक थैंक यू तक बोलकर नहीं गया।" राज ने उसे देखते हुए चन्द्र से कहा, "भाई! ये तो ऐसे भागा जैसे हम खा जाएँगे इसे।" राज ने जब चन्द्र से ये कहा, तो चन्द्र की आँखें एकदम से बड़ी हो गईं और उसने दूसरी ओर मुँह कर लिया और मन ही मन सोचने लगा, "अब इसे क्या पता कि वो सचमुच यही सोचकर तो भागा है।"
"चल अब हम भी चलते हैं।" चन्द्र ने राज से कहा।
"हाँ चलो भाई।" ये कहते हुए राज ने अपना बैग वापस लिया और वो दोनों भी ट्रेन से उतर गए।
जारी है......