The Manali Trip Ch. 1

The Manali Trip - Chapter 1

Posted by Simran Ansari • Jan 25, 2025 03:05 PM

"हम जो चलने लगे हैं, तो चलने लगे हैं ये रास्ते,

मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते....."

आओ खो जाएँ हम

हो जाएँ हम यूँ लापता

आओ मिलकर चलें

जाना कहाँ न हो पता

बैठे-बैठे ऐसे कैसे कोई रास्ता नया सा मिले?

तू भी चले, मैं भी चलूँ,

होंगे कम ये तभी फासले

बैठे-बैठे ऐसे कैसे कोई रास्ता नया सा मिले?

तू भी चले, मैं भी चलूँ,

होंगे कम ये तभी फासले

आओ तेरा मेरा ना हो किसी से वास्ता

आओ मिलकर चलें

जाना कहाँ न हो पता

हम जो चलने लगे हैं, चलने लगे हैं ये रास्ते

हाँ हाँ...

मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते....

कार में फुल वॉल्यूम में बजता हुआ यह गाना, और उसी कार में बैठे पाँच दोस्त। कार अपनी पूरी रफ़्तार से चलती हुई, प्रदेश के सीमा क्षेत्र और सुनसान इलाकों को पार करती हुई, पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश करती है; रोड के बीच में बड़ा सा हरे रंग का बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है - "Welcome to Himachal Pradesh"।

"फ़ाइनली, अब हम हिमाचल प्रदेश में एंटर हो गए, अब यहाँ से और कितनी दूर है मनाली?" - कार की खिड़की से बाहर की तरफ़ झाँक कर देखते हुए श्रेया ने पूछा।

"हाँ, बस अब कुछ ही घंटों में पहुँच जाएँगे।" - ड्राइव करते हुए अमर ने श्रेया की बात का जवाब दिया।

"ओह गॉड! अभी भी कुछ घंटे, इतने घंटों से तो ट्रैवल कर रहे हैं; मुझे आदत नहीं है कार से इतनी देर ट्रैवल करने की..." - श्रेया परेशान होकर मुँह बनाती हुई बोली।

"यार श्रेया, तू तो ऐसे बोल रही है जैसे हम तो रोज़ ही घंटों ट्रैवल करते हैं कार से..." - शिवम ने कहा।

ऐसे ही सब आपस में बातें करते हुए और सफ़र का मज़ा लेते हुए, साथ ही मंज़िल तक पहुँचने का इंतज़ार भी कर रहे थे। सारे दोस्त पहली बार एक साथ किसी ट्रिप पर जा रहे थे, वह भी दिल्ली से इतनी दूर मनाली की ट्रिप पर; सभी एक्साइटेड थे, इसलिए कुछ ना कुछ बातें भी कर रहे थे एक-दूसरे से। लेकिन सब से अलग, आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर एक लड़का बिल्कुल चुपचाप बैठा था, जैसे इन सब बातों से कोई मतलब ही ना हो; बोलना तो दूर, शायद वह इन चारों की बातें सुन भी नहीं रहा था।

उस लड़के की तरफ़ देखकर, श्रेया के बगल में बैठा उसका बॉयफ़्रेंड विनय बोल पड़ा - "यार अबीर, तुझे क्या हुआ है? तू कुछ नहीं बोल रहा, एकदम शांत बैठा है।"

"हाँ, क्या हुआ? किसी ने मेरा नाम लिया?" - उसकी बात सुनकर अबीर इस तरह एकदम अचानक से बोला, जैसे कि किसी गहरी सोच से बाहर निकला हो। उसने शायद ठीक से सुना भी नहीं कि किसने क्या पूछा उससे।

"यार अबीर, जब तेरा मन नहीं था साथ आने का, तो तू मना कर देता, मेरा बर्थडे तो वैसे भी हर साल आता है।" - अबीर का ऐसा रिएक्शन सुनकर विनय मायूसी से बोलता है।

अबीर कुछ बोलता उससे पहले ही अमर बोल पड़ा - "अरे यार विनय, समझा कर, उसकी गर्लफ़्रेंड साथ नहीं आई है, इसलिए मजनू बना बैठा है ग़म में!"

शिवम (हँसते हुए) - "ओह! तो यह बात है।"

उन दोनों की बात सुनकर बाकी सारे भी हँसने लगे, सिर्फ़ अबीर को छोड़कर; वो बस हल्का सा मुस्कुरा दिया।

विनय - "अरे यार, अबीर मैंने तो राधिका को भी इनवाइट किया था, वह क्यों नहीं आई तेरे साथ?"

अबीर - "अरे यार, तुम लोग जानते हो, उसकी फ़ैमिली उसे कभी परमिशन नहीं देगी, ऐसे ट्रिप पर जाने की।"

श्रेया - "ओह, इसीलिए तुम इतना सैड हो; थैंक गॉड मेरी फ़ैमिली ऐसी नहीं है।"

इसी बीच अचानक से कार रुक जाती है, सभी लोग अमर से पूछते हैं - "क्या हुआ अमर? तूने कार क्यों रोक दी?"

शिवम - "प्लीज, अब यह मत बोलना कि कार ख़राब हो गई और अपने आप रुक गई!"

अमर - "अरे नहीं, ख़राब नहीं हुई, मैंने खुद रोकी है।"

श्रेया - "लेकिन क्यों?"

अमर - "क्योंकि मैं यहाँ रोज़ तो आता नहीं हूँ, इसलिए इसके आगे का रास्ता नहीं पता मुझे; विनय बताओ अब कहाँ जाना है?"

विनय - "मनाली पहुँच गए हैं हम, अब बस फ़ॉर्म हाउस भी पहुँचने ही वाले हैं, यहाँ से बस 10-15 मिनट की दूरी पर है। एक काम कर अमर, तू पीछे आजा, यहाँ से आगे मैं ड्राइव करता हूँ।"

श्रेया - "बेबी, मैं भी तुम्हारे साथ आगे बैठूँगी।"

अबीर - "ठीक है श्रेया, तुम यहाँ मेरी सीट पर बैठ जाओ, मैं पीछे बैठ जाऊँगा अमर और शिवम के साथ।"

इतना बोल कर उन सभी ने सीट एक्सचेंज की और विनय को ड्राइव करते हुए अभी 10 मिनट ही हुए थे कि विनय का फ़ॉर्म हाउस आ गया। कार का हॉर्न सुनते ही गार्ड ने मेन गेट खोला और विनय कार ड्राइव कर के अंदर तक ले गया।

उसके बाद एक-एक करके सभी लड़के कार से उतरे और श्रेया भी अंगड़ाई लेती हुई कार से बाहर आई; सभी लोग कार से अपना-अपना सामान निकालने लगे कि तभी फ़ार्महाउस के केयरटेकर दीनू काका भी गार्ड के साथ वहाँ पर आ गए और सभी की सामान उठाने में मदद करने लगे।

और फिर सभी एक साथ फ़ॉर्म हाउस के अंदर आ गए। सामान हॉल में रखवाते हुए दीनू काका ने कहा - "विनय बाबा, जैसा कि आपने कहा था, सभी कमरों की साफ़-सफ़ाई करवा दी है। अब यह बता दीजिए, कितने दिनों तक रुकेंगे आप सभी यहाँ? उसी हिसाब से मैं आप सबका खाने-पीने का इंतज़ाम भी करवा दूँगा।"

विनय - "वैसे तो हम लोग 4-5 दिनों तक रुकेंगे, लेकिन धन्यवाद काका, इतना बहुत है। बाकी सब हम लोग देख लेंगे, आप अपने घर जाएँ, रात होने वाली है।"

दीनू काका - "मेरा घर तो यही पास में, बंगले के पीछे ही है। अच्छा, ठीक है, जैसा आप कहें, मैं चलता हूँ। कोई ज़रूरत लगी तो मुझे बुला लीजिएगा।"

इतना बोल कर दीनू काका वहाँ से चले गए और गार्ड भी वापस मेन गेट पर आ गया। और उनके जाने के बाद बाकी सभी लोग वहीँ हॉल में पड़े सोफ़े पर ही, जहाँ जगह मिली, बैठ गए; श्रेया तो सोफ़े पर लेट ही गई। उसे ऐसे लेटे देख कर विनय भी उसके सिर के पास ही बैठ गया।

सभी अपने इतनी देर के सफ़र की थकान को कम करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अबीर उन सबसे दूर, अलग खिड़कियों के पास जाकर वहाँ से बाहर का नज़ारा देखने लगा।

अबीर के लिए यह सब नया था; यह पहली बार था जब वह दिल्ली से किसी पहाड़ी इलाके में आया था। इतने ख़ूबसूरत और बर्फ़ से ढके ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ी पेड़-पौधे और बाहर पड़ती हल्की बर्फ़ और ठंड का मौसम, उसने पहली बार ही देखा था। बाहर गिरती हुई बर्फ़ का नज़ारा और हल्की ठंड का मौसम, इन सब को और भी सुहावना बना रहा था।

अबीर का तो जैसे मनाली आने का यह ट्रिप ही सफल हो गया हो; वह इन सब की ख़ूबसूरती में खो सा गया और टकटकी लगाए खिड़की के बाहर ही काफ़ी देर तक नज़ारे का आनंद लेता रहा। उसे तो ख़्याल भी नहीं आता अपने बाकी दोस्तों का, जब तक कि उनमें कोई एक उसे खाना खाने के लिए आवाज़ नहीं लगाता।

"यार अबीर! तुझे भूख नहीं लगी क्या? इधर आकर डिनर तो कर ले हम सब के साथ..." - शिवम ने अबीर को आवाज़ दी।

"हाँ, बस पाँच मिनट में फ़्रेश होकर आया!" - बोल कर अबीर वॉशरूम में चला जाता है और फिर कुछ देर बाद बाहर आकर सब के साथ बैठकर डिनर करने लगा।

अबीर अभी खाना खाकर उठा ही था कि उसका फ़ोन रिंग हुआ, लेकिन रिसीव करने से पहले ही कॉल डिस्कनेक्ट हो गया; उसकी गर्लफ़्रेंड राधिका का कॉल था।

राधिका का कॉल देखकर अबीर थोड़ा परेशान हो गया, क्योंकि राधिका को पता था अबीर सब के साथ मनाली आया हुआ है; इसलिए राधिका ऐसे इतनी रात को कॉल नहीं करती, ज़रूर कोई बात होगी। यह सोचकर ही अबीर ने राधिका को कॉल बैक किया। लेकिन राधिका ने कॉल रिसीव नहीं किया, तो अबीर ने दोबारा से कॉल किया और इस बार कॉल रिसीव हो गया।

"हेलो! राधिका, क्या हुआ? इस वक़्त कॉल किया तुमने, सब ठीक तो है ना?" - राधिका जल्दी खुद से कॉल नहीं करती थी, इसीलिए उसकी मिसकॉल देखकर अबीर ने पहले कॉल बैक नहीं किया था।

"नहीं, कुछ नहीं, बस ऐसे ही कॉल किया था, यह पूछने के लिए कि तुम सब पहुँच गए ना ठीक से?" - राधिका अबीर की बात सुनकर उसे सीधा ही सवाल करती है।

"हाँ, पहुँच गए, एक घंटा हो गया यहाँ आए हुए। सॉरी, मैं तुम्हें कॉल करना ही भूल गया!" - राधिका की बात का जवाब देते हुए अबीर उसे कॉल पर बताता है।

"लगता है, बहुत ज़्यादा अच्छा लग रहा है वहाँ पर; इसीलिए तुम इतनी जल्दी भूल गए!" - अबीर के भूल जाने वाली बात सुनकर राधिका उसे ताना मारते हुए कहती है।

"अरे यार राधिका, कैसी बातें कर रही हो? सिर्फ़ कॉल करना भूल गया था तुम्हें, नहीं, वैसे तुम भी यहाँ होती तो ज़्यादा अच्छा होता।" - अबीर उसकी बात पर कवर-अप करते हुए काफ़ी प्यार से बोलता है।

"मैं भला कैसे आ सकती थी? यार अबीर, तुम तो जानते हो ना सब कुछ!" - राधिका जैसे अभी कुछ याद दिलाते हुए थोड़ी मायूसी से बोलती है।

"हाँ, पता है, इसीलिए तो ज़्यादा फ़ोर्स नहीं किया तुम्हें साथ आने के लिए।" - अबीर भी उसकी बात समझते हुए बोलता है।

"क्या.... क्या कह रहे हो अबीर! ठीक से आवाज़ नहीं आ रही तुम्हारी?" - राधिका की आवाज़ काफ़ी कट कर आने लगती है।

"हाँ, शायद यहाँ पर नेटवर्क इशू भी है; टेक्स्ट मैसेज कर देना तुम राधिका, अगर कोई बात हो तो, बाकी जब नेटवर्क होगा तो मैं खुद कॉल कर लूँगा, बाय!" - अबीर कॉल डिस्कनेक्ट करते हुए बोलता है।

"ओके बाय! टेक केयर एंड एन्जॉय योरसेल्फ़...." - राधिका की एकदम धीमी सी आवाज़ अबीर के कानों में पड़ती है और कॉल डिस्कनेक्ट हो जाता है।

क्रमशः

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