एक उदास परी Ch. 1

एक उदास परी - Chapter 1

Posted by Shayna choudhary • Jan 27, 2025 11:15 AM

परीलोक, आसमान में खूबसूरत बादलों के बीच स्थित था। वहाँ एक बेहद खूबसूरत परी, तारा परी, अपनी माँ से नाराज़ होकर कहीं चली गई थी। रानी माँ चिंतित हो गईं। उन्होंने चारों ओर तारा परी को ढूँढा, पर उसका कहीं पता नहीं चला।

तब उन्होंने कुछ सहायकों को तारा परी को ढूँढने के लिए भेजा। सभी आदेश का पालन करते हुए तारा परी को ढूँढने लगे। काफी देर बाद, एक सहायक को परीलोक के बंद पड़े कक्ष का दरवाज़ा खुला हुआ दिखाई दिया। वह घबराकर रानी माँ के पास गया और तारा परी के उस कक्ष में होने का अंदेशा जाहिर किया।

रानी माँ कुछ घबरा गईं, क्योंकि वह कक्ष हमेशा बंद रहता था, क्योंकि वहाँ कोई प्रकाश नहीं था। उस अंधेरे कमरे में तारा परी क्या कर रही होगी?

यह सोचकर रानी माँ जल्दी से उठीं और तारा परी को लेने स्वयं गईं। उन्होंने सभी सहायकों को बाहर ही रुकने का आदेश दिया और खुद अंदर चली गईं।

अंदर जाकर सबसे पहले रानी माँ ने एक चुटकी बजाई। चुटकी बजते ही पूरा कक्ष रोशनी से भर गया।

उन्होंने देखा, तारा परी अपने घुटनों में सिर दिए बैठी थी। रानी माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और धीरे से कहा,

"क्या हुआ मेरी प्यारी परी को?"

तारा परी ने अपना सिर ऊपर उठाया। रानी माँ ने देखा, तारा परी की आँखों में मोटे-मोटे मोती थे।

"क्यों रो रही हो, बेटी? क्या बात है?" रानी माँ ने प्यार से पूछा।

तब तारा परी ने गुस्से से रानी माँ का हाथ झटक दिया और चिल्लाकर बोली,

"क्यों, रानी माँ? आपको नहीं पता हमें क्या हुआ है? वो राक्षस हर रात हमारे साथ क्या करता है, आपको नहीं पता? पूरे कक्ष में वो हमें निर्वस्त्र घुमाता है। हमारे शरीर के साथ-साथ हमारी आत्मा को भी तकलीफ़ पहुँचाता है। क्या आपको हमारा दर्द दिखाई नहीं देता? आप चली जाइए यहाँ से। हमें अकेले रहने दीजिए। हमें अभी किसी से कोई बात नहीं करनी है।"

रानी माँ की आँखों में भी मोटे-मोटे मोती आ गए। रानी माँ को रोते देखकर तारा परी तड़प गई।

"रानी माँ, कृपया करके आप मत रोइए। हम आपको रोते हुए नहीं देख सकते।"

"नहीं, बेटा। हम अच्छे से जानते हैं तुम्हारी इस हालत के हम ही ज़िम्मेदार हैं। तुम हमें माफ़ कर दो। हमने उस राक्षस से कहा था कि वो परीलोक की किसी भी परी के साथ रात गुज़ार सकता है, लेकिन उसकी नज़र हमेशा से तुम पर ही थी। परीलोक को बचाने के लिए मेरी प्यारी बेटी ने अपनी कुर्बानी दी थी। हम यह अच्छे से जानते हैं।"

रानी माँ सोचते हुए बीते दिनों को याद करने लगीं।

"वो भी क्या दिन थे जब मेरी बेटी पूरे परीलोक में हँसते-खेलते घूमती थी। उसके चहकने से पूरा परीलोक झूम उठता था। कितनी हँसी-खुशी हम सब साथ रहते थे!"

फिर वो मनहूस दिन आ गया, जिस दिन मेरी प्यारी परी अपनी सहेलियों के साथ फूलों के बगीचों में खेल रही थी, उसी दिन उस राक्षस की नज़र मेरी फूल सी परी पर पड़ी। और वो परीलोक में आ धमका। उसने परीलोक पर आक्रमण कर दिया और पूरे लोक को अपने कब्ज़े में कर लिया। हमारी असीमित शक्तियाँ भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाईं, क्योंकि उसके पास देवताओं के दिए हुए अनगिनत वरदान थे, जो उसने कड़ी तपस्या करके हासिल किए थे। उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था। उसने कहा था, अगर उसकी बात नहीं मानी तो वो पूरे परीलोक को नष्ट कर देगा।

जब हमने पूछा, "तुम्हें क्या चाहिए?" उसने कहा था, उसे केवल तारा परी चाहिए, हर रात के लिए। हमने उससे कहा था, वो तारा परी को छोड़कर किसी भी परी के साथ रात गुज़ार सकता है, लेकिन उसने साफ़ इंकार कर दिया। उसने कहा, उसे उसकी बेटी तारा परी के साथ ही हर रात बितानी है। हमारे पास उसकी बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। हम क्या करते अगर उसकी बात नहीं मानते? तो वो दुष्ट पूरे परीलोक को नष्ट कर देता और सबकी जान ले लेता।

रानी माँ की बेबसी उनकी आवाज़ से साफ़ झलक रही थी। तारा परी सब याद करके तड़प उठी और रानी माँ के गले लग गई, और दोनों एक-दूसरे के गले लगकर बहुत देर तक रोती रहीं।

तभी एक सेवक ने आकर कहा,

"रानी माँ, वो राक्षस आ गया है और वो तारा परी को बुला रहा है।"

यह सुनकर तारा परी तड़प गई और तेज़-तेज़ रोने लगी। फिर उसने रानी माँ से कहा,

"मुझे जाना होगा, माँ। अगर देर हो गई तो वो सबको मार देगा।"

ऐसा कहकर वो तैयार होने चली गई। उसे हर रात को दुल्हन की तरह सजाया जाता था। उसे दूध और गुलाब की पंखुड़ियों से स्नान कराकर बेहद खूबसूरत वस्त्र पहनाए जाते थे। उस राक्षस की शर्त के अनुसार, हर रात उसे सज-सँवर कर ही उसके सामने आना होगा।

तारा परी तैयार हो गई थी। फिर वो धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई राक्षस के कक्ष की ओर चल दी थी। उसकी आँखों से मोती निकलते जा रहे थे, पर वो जानती थी उसका रोना उस बेरहम जिन्न को नहीं पिघला सकता है। वो अंदर चली गई। उसे देखते ही वो राक्षस उसके करीब जा पहुँचा। सबसे पहले वो उसे बुरी तरह से सूँघने लगा और जोर-जोर से हँसने लगा।

और फिर उसने एक-एक करके उसके वस्त्र खींचना शुरू कर दिया और उसे बिल्कुल निर्वस्त्र कर दिया, और ऊपर से लेकर नीचे तक उसे फिर से सूँघने लगा और उसे नृत्य करने को कहा।

वो हर रात उसे निर्वस्त्र कर उससे नृत्य करवाता था। तारा परी नृत्य करती हुई इतना रोती थी कि पूरा कक्ष मोतियों से भर जाता था। तारा परी के पैरों से निकला हुआ खून भी खूबसूरत फूलों में बदल जाता था। यह सब देखकर उस राक्षस को बहुत ही मज़ा आता था। वो जोर-जोर से हँसता था। उसकी भयानक हँसी से पूरा परीलोक काँप उठता था।

एक भयानक जिन्न तारा परी के पास आ पहुँचा था। उसने आते ही तारा परी को निर्वस्त्र करके नाचना शुरू करवा दिया था। उसके बाद उसने तारा परी को उठाकर कक्ष में बीचों-बीच पड़े बिस्तर पर लेटा दिया और पूरे सात घंटे तक तारा परी के खूबसूरत जिस्म से खिलवाड़ करने लगा। हमेशा की तरह, अपना कार्य समाप्त करने के कुछ समय पश्चात्, उस जिन्न ने एक भयंकर हँसी हँसी और वहाँ से चला गया था। तभी रानी माँ अंदर आईं और देखा कि तारा परी मूर्छित अवस्था में थी। तारा परी को देखकर वो बेहद दुखी हुईं। फिर प्रतिदिन की भाँति उन्होंने वैद्य को बुलाया। तारा परी को देखकर वैद्य जी की आँखों से भी मोती बहते हैं, और वो रानी माँ से कहते हैं,

"रानी माँ, वो जिन्न कितनी बुरी दशा करता है तारा परी की! इनकी यह पीड़ा अब देखी नहीं जाती।"

फिर थोड़ी देर के बाद तारा परी को होश आ गया। वो अपनी माँ के गले लगकर बहुत रोई। तारा परी रोते-रोते रानी माँ से कहती है,

"माँ, मैं मर भी नहीं सकती हूँ... और ना ही मैं जी पा रही हूँ। मुझे यह वरदान अभिशाप लग रहा है। अब क्यों मिला मुझे यह वरदान?"

तारा परी को एक वरदान प्राप्त था कि किसी के भी साथ एक रात बिताने के बाद तारा परी फिर से कुँवारी हो जाएगी। इसीलिए प्रतिदिन जिन्न द्वारा किए गए दुष्कर्म के बाद तारा परी फिर से कुँवारी हो जाती थी। इसीलिए राक्षस को तारा परी ही पसंद थी। कितने वर्षों से यही सब चल रहा था! तारा परी अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।

कुछ समय पश्चात्, रानी माँ परियों के देवता की प्रतिमा के पास गईं और वहाँ जाकर उन्होंने बिनती की और कहा,

"आखिर कब तक मेरी बेटी यह सब बर्दाश्त करती रहेगी? कब बंद होगा यह सब? अब सुन लो आप! मैं अपनी बेटी को और पीड़ा में नहीं देख सकती।"

ऐसा कहकर उन्होंने पास में रखी हुई तलवार से अपना सिर काट दिया और अपनी कटी हुई गर्दन को हाथ में पकड़कर अपने देवता की प्रतिमा का खून से अभिषेक करने लगीं। जिसके परिणामस्वरूप उनके देवता क्रोधित हो गए और उनके सामने प्रकट हुए और बोले,

"रानी परी! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारा खूनी अभिषेक करने की? तुम अच्छे से जानती हो हम घृणा करते हैं रक्त से, और तुम्हें यह भी पता है चाहे तुम अपने शरीर का एक-एक अंग काट दो, फिर भी तुम मर नहीं सकती। तुम अच्छे से जानती हो हम तुम्हें इसकी कड़ी सजा दे सकते हैं, और एक ही पल में तुम्हारा पूरा परीलोक बर्बाद कर सकते हैं।"

रानी माँ क्रोधित होकर बोलीं,

"हाँ, हमें पता है आप क्या कर सकते हैं, पर क्या आपको नहीं पता हमारी बेटी के साथ वो जिन्न कितना दुर्व्यवहार करता है? उसको कितनी पीड़ा देता है? उसके शरीर के साथ-साथ उसकी आत्मा को भी चोट पहुँचाता है।"

रानी माँ ने कहा,

"या तो आप हम सबको मार दीजिए या मेरी बेटी को उस राक्षस से बचा लीजिए। निर्णय आपको लेना है।"

ऐसा कहकर रानी माँ वापस से अपनी गर्दन अपने धड़ से जोड़ लेती हैं।

परियों के देवता रानी परी की बात अच्छे से समझ जाते हैं और कहते हैं,

"रानी परी, मेरे पास उस जिन्न से लड़ने की शक्ति नहीं है। वो बेहद ताकतवर है। उसे शिव जी का वरदान भी प्राप्त है। उससे कोई नहीं जीत सकता... किन्तु हाँ, एक रास्ता है तारा परी को बचाने का। आपको कुछ समय के लिए तारा परी को परीलोक से दूर, धरती लोक भेजना होगा। वहाँ जाकर तारा परी को एक नेक दिल इंसान से विवाह करना होगा। और तारा परी और उस नेक दिल इंसान के मिलन से जो पहली संतान पैदा होगी, केवल वही संतान उस राक्षस का वध कर सकती है। जब तक तारा परी की संतान पैदा नहीं होती, तब तक धरती लोक पर उनको छुपकर रहना होगा। बोलो, क्या है तुम्हारी बेटी में इतनी हिम्मत? क्या वो यह सब कर सकती है? क्या वो साधारण जीवन जी सकती है एक इंसान की भाँति?"

रानी माँ ने कहा,

"पर तारा परी धरती लोक कैसे जाएगी? और वो जिन्न तारा परी को ना पाकर वो तो पूरा परीलोक नष्ट कर देगा।"

रानी माँ की बात सुनकर परियों के देवता ने कहा,

"तुम चिंता मत करो। वो सब हम संभाल लेंगे। बस तुम जाओ और जाकर तारा परी से पूछो क्या वो यह सब कर पाएगी? धरती लोक जाकर नेक दिल इंसान से विवाह कर संतान पैदा कर पाएगी?"

तारा परी वहाँ आकर बोली,

"हाँ, मैं सब कर सकती हूँ। उस जिन्न से पीछा छुड़ाने के लिए मुझे जो भी करना पड़ेगा, मैं करूँगी।"

वो रानी माँ और परियों के देवता की सारी बातें ना जाने कब से खड़ी सुन रही थीं।

तारा परी को ऐसे बोलता देख दोनों चौंक गए। रानी माँ बोलीं,

"लेकिन तारा परी को परीलोक में ना पाकर वो राक्षस तो पूरा परीलोक नष्ट कर देगा।"

परियों के देवता:

"हमें कोई रास्ता बताइए। हम क्या करें? कैसे होगा यह सब? उस राक्षस को तो हर रात तारा परी चाहिए। रात होते ही वो आ जाता है और कभी ना भरने वाले घाव मेरी बेटी को देता है।"

रानी माँ ने चिंतित स्वर में कहा।

परियों के देवता:

"हम सब जानते हैं, इसीलिए इसका निवारण भी हमने निकाल लिया है।"

ऐसा कहकर वो कुछ देर तक कुछ मंत्रों का जाप करते हैं, और देखते ही देखते रंग-बिरंगी रोशनी चारों ओर फैल जाती है। और हूबहू तारा परी जैसी एक खूबसूरत परी वहाँ प्रकट हो जाती है। वो दोनों चौंक जाती हैं। तभी रानी माँ चिंतित होकर बोलीं,

"यह सब क्या है? वो राक्षस तारा परी को कुछ ही क्षण में पहचान लेगा। आपको तो पता है हर परी के पास इतनी शक्ति होती है, वो किसी का भी रूप बदल सकती हैं। एक बार हमने किसी और परी को तारा परी का रूप धारण करके भेजा था, लेकिन केवल एक ही रात उस परी के साथ बिताने के बाद उसे पता चल गया था। तभी उसने उस परी के प्राण ले लिए थे, और हमें चेतावनी दी थी कि अगर आगे से हमने कुछ ऐसा किया तो वो क्षण भर में पूरा परीलोक नष्ट कर देगा। और आप एक बार फिर से वही सब करने जा रहे हैं।"

तभी परियों के देवता बीच में रोकते हुए बोले,

"रानी परी, हम सारी बातें जानते हैं। आप लोग धीरज रखिए। यह कोई आम परी नहीं है। यह एक मायावी परी है। जैसे ही मायावी परी उस राक्षस के साथ रात बिताएगी, तो वो राक्षस अगली सुबह पूरे तीन वर्ष के लिए सो जाएगा, लेकिन तारा परी को तब तक धरती लोक जाकर संतान पैदा करके लौटना होगा क्योंकि ठीक तीन वर्ष के पश्चात् उसे होश आ जाएगा और होश में आते ही वो पूरा परीलोक नष्ट कर देगा। उस समय हम भी कुछ नहीं कर पाएँगे। क्या आप दोनों तैयार हैं?"

इतने में रानी माँ बीच में बोलती हैं,

"लेकिन प्रभु, मेरी बेटी धरती लोक कैसे जाएगी? और वो कैसे उस नेक दिल इंसान को खोजेगी?"

तभी परियों के देवता एक बार फिर मंत्र जाप करते हैं। इस बार उनके हाथ में एक लॉकेट था, जिसमें बीचों-बीच एक लाल पत्थर था, और साथ ही एक फल दिया और कहा,

"तुम यह लॉकेट पहन लो, और याद रहे जब भी वो नेक दिल इंसान तुम्हारे सामने आएगा, यह लाल पत्थर जगमगाने लगेगा। और यह फल खाकर तुम सीधा धरती लोक पहुँच जाओगी। और ध्यान रहे पृथ्वी लोक पर तुम केवल दूसरों की भलाई के लिए ही अपनी शक्तियाँ प्रयोग कर सकती हो, और जीवन निर्वाह हेतु तुम्हारे समक्ष आने वाली कठिनाइयों के लिए तुम अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकती। और तुम्हें खुद मेहनत करके अपना पेट भरना होगा, स्वयं के लिए रहने का स्थान खोजना होगा। जो भी जीवन निर्वाह हेतु परेशानी आएगी उनका सामना अपनी शक्तियों के बिना एक सामान्य इंसान की भाँति ही करना होगा।"

तारा परी क्रोधित स्वर में बोली,

"उस दुष्ट राक्षस जिन्न का जीवन समाप्त करने के लिए मैं सब कार्य करूँगी। एक सामान्य इंसान की भाँति जीवन निर्वाह करूँगी।"

जिन्न के आने का समय हो गया था। परियों के देवता सब कुछ तारा परी को समझाकर अंतर्ध्यान हो गए।

मायावी परी तारा परी के रूप में जिन्न के पास गई। जिन्न उसे तारा परी की भाँति ही पीड़ा देता है और उसके साथ दुष्कर्म करता है, लेकिन दुष्कर्म करते समय उसे ज्ञात हो जाता है कि यह तारा परी नहीं है, कोई छलावा है, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राक्षस का शरीर उस मायावी परी से मिल चुका था, और अब वो राक्षस बेहोश हो चुका था, और वो मायावी परी गायब हो चुकी थी क्योंकि उसको जिस काम के लिए बनाया गया था वो हो चुका था।

तारा परी, राक्षस जिन्न बेहोश होने के पश्चात् रानी माँ से कहती है,

"मुझे आप लोग आज्ञा दीजिए। मैं अब पृथ्वी लोक जाना चाहूँगी और अपना कार्य जल्द से जल्द समाप्त कर वापस लौट आऊँगी।"

रानी माँ अपनी बेटी को विजय का आशीर्वाद देती हैं और इसी के साथ वो देवता के द्वारा दिया गया फल खा लेती है और सीधा पृथ्वी लोक जाती हैं।

क्या होगा अब तारा परी का? क्या वो उस इंसान को खोज पाएगी? क्या धरती पर बिना शक्तियों का प्रयोग किए रह पाएगी?

क्या होगा तारा परी का? क्या वो यह सब सहती रहेगी? क्या कोई उसे बचा पाएगा?

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