एक उदास परी Ch. 2

एक उदास परी - Chapter 2

Posted by Shayna choudhary • Jan 28, 2025 06:04 AM

तारा परी को राक्षस जिन्न द्वारा दिया गया दर्द असहनीय हो गया था। अतः उसकी माँ ने अपनी बलि देकर कुल देवता को आवाहन किया। देवता ने तारा परी को राक्षस से बचने का उपाय बताया और एक फल दिया।

फल खाने के बाद तारा परी सीधे पृथ्वी लोक चली गई। वह एक विशाल फूलों के बगीचे में पहुँची जहाँ रंग-बिरंगे, खूबसूरत फूल लगे हुए थे। तारा परी बेहोश थी। फूलों की खुशबू से उसे धीरे-धीरे होश आने लगा।

तारा परी आश्चर्य से चारों ओर देखने लगी। सब कुछ बेहद खूबसूरत लग रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ है। वह बगीचे के रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती में खो सी गई थी।

बगीचे में सभी फूलों के बीच एक बड़ा तालाब बना हुआ था जिसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ तैर रही थीं। तारा परी रंग-बिरंगी मछलियों और फूलों पर बैठी रंग-बिरंगी तितलियों को देखकर खुशी से चिल्ला पड़ी।

बगीचे का माली, एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, उसे बगीचे में किसी के होने का एहसास हुआ। वह संगीतमय हँसी और क्रीड़ा का पीछा करते हुए वहाँ आ गया। वहाँ तितलियों और मछलियों से खेलती तारा परी को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया।

तारा परी खेलने में इतनी व्यस्त थी कि उसे एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उसे देख रहा है। काफी देर परी को देखने के बाद माली थोड़ी तेज आवाज़ में बोला, "हे लड़की, कौन हो तुम और अंदर कैसे आ गई? मैं तो कब से बाहर ही बैठा था, फिर तुम अंदर कैसे आई? और तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अंदर आने की?"

अचानक माली की आवाज़ सुनकर तारा परी डर गई और घबराकर माली की ओर देखने लगी। उसने अपने हाथों में पकड़ी हुई मछलियों को वापस तालाब में छोड़ दिया।

वह माली को जल्दी से कोई जवाब नहीं दे पाई और एक बार फिर मुड़कर माली को देखने लगी। कुछ जवाब न पाकर माली ने फिर पूछा, "हे लड़की, क्या तुम्हें सुनाई नहीं दे रहा है? बताओ, कौन हो तुम?" ऐसा कहकर माली ने तारा परी को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा।

बेहद खूबसूरत कपड़ों में, हीरे-मोतियों के आभूषण पहने, इतनी खूबसूरत लड़की उसने कभी नहीं देखी थी। माली को एहसास हुआ कि शायद तेज चिल्लाने की वजह से यह लड़की डर गई है।

उसने एक बार फिर पूछा, इस बार थोड़ा प्यार से, "बेटी, कौन हो तुम?"

तारा परी ने कुछ बोलने के लिए अपना मुँह खोला और थोड़ा हिचकिचाकर बोली, "वो... मैं... वो..." पर ही अटक कर रह गई।

तब माली बीच में ही बोला, "ओह, अच्छा! तो तुम कोई कलाकार हो। ज़रूर तुम किसी नाटक या पिक्चर में अभिनय कर रही हो।" माली ने अपना अनुमान लगाया।

तारा परी ने भी हाँ में हाँ मिलाई। "अरे बेटी, तो तुम अपने अभिनय के कपड़े पहनकर यहाँ क्या कर रही हो?" माली ने फिर पूछा।

तारा परी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। तभी तारा परी बोली, "नहीं, वो... मैं... मैं यहाँ से गुज़र रही थी और बगीचे का दरवाज़ा खुला था, तो मैं फूलों का बगीचा देखने अंदर आ गई।"

"ओह, अच्छा!" माली ने समझते हुए सर हिलाया।

तारा परी ने पूछा, "काका, आपसे एक बात पूछूँ, अगर आपको बुरा न लगे तो?"

माली ने कहा, "हाँ हाँ, बेटी, बोलो।"

"वो काका, ये कौन सी जगह है?"

माली ने कहा, "बेटी, ये मुंबई शहर है। और कमाल है, तुम तो यहाँ अभिनय करती हो, तो तुम क्यों पूछ रही हो?"

तारा परी बात पलटते हुए बोली, "अरे नहीं काका, वो मैं तो ये जाँच कर रही थी कि क्या इस उम्र में भी आपकी बुद्धि काम कर रही है या नहीं।" ऐसा कहकर तारा परी खिलखिलाकर हँस पड़ी।

तभी माली ने अपने चारों ओर देखा तो पाया कि पूरे बगीचे का एक-एक फूल खिल उठा था। सब कुछ बेहद खूबसूरत हो गया था। माली ये सब देखकर बेहद अचरज में पड़ गया और कुछ सोचते हुए बोला, "बेटी, सच-सच बताओ, कौन हो तुम? तुम कोई साधारण लड़की नहीं लग रही हो मुझे।"

तभी तारा परी को अपने ईश्वर का आभास हुआ। ईश्वर ने कहा, "तारा परी, यह एक नेकदिल बुज़ुर्ग है। तुम अपना सच इन्हें कह सकती हो। ये मरते-मर जाएँगे पर तुम्हारा सच कभी किसी से नहीं कहेंगे।"

तारा परी को यह सुनकर काफी राहत हुई और माली के पूछने पर अपना सारा सच उसे बता दिया। उसने अपना पृथ्वी लोक पर आने का कारण भी सच-सच बता दिया और माली से वादा लिया कि वह कभी उसका सच किसी को नहीं बताएँगे।

तभी तारा परी ने देखा कि माली की आँखों में आँसू थे। माली की आँखों से लगातार बहते आँसुओं को देखकर तारा परी ने आश्चर्य से पूछा, "क्या हुआ काका? आप क्यों रो रहे हैं?"

"बेटी, मेरी आँखों में आँसू क्यों हैं, मैं यह तुम्हें समय आने पर बताऊँगा। अभी रात होने वाली है, तुम्हारा यहाँ ज़्यादा देर तक रहना सुरक्षित नहीं है। तुम मेरे साथ चलो, मेरे घर। और हाँ, उससे पहले अपने कपड़े-जेवर सब बदल लो और आओ मेरे साथ।"

माली तारा परी को बगीचे में बने एक कमरे में ले गया। वहाँ एक महिला कर्मचारी के कुछ कपड़े उसने तारा परी को दिए। तारा परी ने वे कपड़े पहने और अपने सारे कपड़े-जेवर उतारकर माली काका के दिए हुए थैले में रख दिए और वह थैला माली काका को दे दिया।

माली ने वह थैला वहीं बगीचे में एक बरगद के पेड़ के नीचे गहरा गड्ढा खोदकर गाड़ दिया और तारा परी को लेकर अपने घर की ओर चल दिया।

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