एक उदास परी - Chapter 3
तारा परी पृथ्वी लोक पहुँच चुकी थी और उसने अपने आपको फूलों के खूबसूरत बगीचे में पाया। यहाँ उसकी मुलाक़ात बगीचे के माली से हुई। तारा परी ने अपना सारा सच माली को बता दिया था।
माली ने तारा परी की मदद करने का फ़ैसला किया और उसके कपड़े-गहने बदलवाकर उसी बगीचे के एक मज़बूत और बहुत बड़े बरगद के पेड़ के नीचे छिपा दिए।
और सादे कपड़े पहनाकर उसे अपने साथ अपने घर की ओर चल पड़ा।
रात के अंधेरे में माली तारा परी को अपने घर ले गया। जब वह घर पहुँचा, उसने देखा उसका सारा परिवार सो चुका था।
माली ने तारा परी को अच्छे से समझा दिया था कि वह अब अपनी पहचान किसी को नहीं बताएगी।
उसके बाद एक मामूली से कमरे में वह तारा परी को ले गया और बोला, "बेटी, तुम यहाँ रुको, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लेकर आता हूँ।"
ऐसा कहकर वह पास ही बने रसोई घर में गया और कुछ खाने के लिए खोजने लगा, लेकिन हर रोज़ की तरह उसकी बहू ने आज भी माली काका के लिए खाना नहीं बनाया था।
वह निराश होकर तारा परी के पास गया और हाथ जोड़ते हुए बोला,
"बेटी, मैं माफ़ी चाहता हूँ, खाने को कुछ भी नहीं है।"
तारा परी ने माली काका के दोनों हाथों को थाम लिया और उनकी सारी दुःख-तकलीफ़ समझ गई।
तारा परी किसी का भी हाथ पकड़कर उसका पूरा अतीत और उसके मन में क्या चल रहा है या क्या होने वाला है, सब देख सकती थी। यह अनोखी शक्ति तारा परी को वरदान स्वरूप एक देवता से मिली थी।
उसके बाद तारा परी ने माली काका को बिठाया और कमरे का दरवाज़ा बंद किया। फिर कुछ पढ़कर फूँका तो देखते ही देखते ढेर सारा खाना आ गया,
जो किसी राज-भोज से कम नहीं था!
ढेरों फल, तरह-तरह की सब्ज़ी, पुड़ी, रायता, सलाद, मीठा...
सब कुछ था! पर माली हैरान होकर सब देख रहा था।
तभी तारा परी ने माली काका को अपने हाथों से खाना खिलाना शुरू कर दिया।
माली की आँखों से खुशी के आँसू लगातार बह रहे थे, क्योंकि आज बरसों बाद उसने रात में खाना खाया था; वरना हर रोज उसे भूखा ही सोना पड़ता था।
खाने के बाद माली कमरे के बाहर ही एक कपड़ा डालकर सो गया।
सुबह जब उसका परिवार उठा, तो उसके बड़े बेटे ने अपने पिता को उठाया और बोला, "पिताजी, आप बाहर क्यों सो रहे थे? अपने कमरे में क्यों नहीं सोये?" तभी धीरे-धीरे सारा परिवार वहाँ जमा हो चुका था और सबकी आँखों में यही सवाल था। इससे पहले कि माली काका कुछ बोलते, कमरे का दरवाज़ा खुला और तारा परी बाहर आई। सबका ध्यान एक साथ तारा परी पर गया।
और सभी इतनी खूबसूरत लड़की को देखकर अचरज में पड़ गए और एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
माली काका की दोनों बहुओं को तारा परी की खूबसूरती देख जलन के मारे बुरा हाल था!
तभी माली काका बोले, "ये मेरी बेटी है, आज से यही रहेगी। इसका नाम तारा है।" सभी यह सुनकर एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
तभी एक बहू बोली, "वाह! देख लो, अपने पिता को! एक तो राह चलती जवान लड़की को घर ले आए और आराम से कह रहे हैं, 'ये यही रहेगी'!"
तभी एक रोबदार आवाज़ में माली काका बोले, "खबरदार! किसी ने कुछ कहा तो! ये मेरा घर है! अगर किसी को मेरे फैसले से कोई ऐतराज़ है, वो जा सकता है!"
अपने पिता का ऐसा रूप देखकर सभी हैरत में पड़ गए। बरसों बाद माली काका ने आवाज़ उठाई थी। वरना बेटे-बहू के सारे जुल्म, पत्नी के मरने के बाद से, वह बर्दाश्त करते आये थे। सभी चुप होकर एक-दूसरे को देखने लगे।
तभी उनके पोते-पोतियाँ तारा परी के पास गए और कहने लगे, "आप यहीं रहेंगी? आप कौन हैं? आप बहुत सुन्दर हैं! आप कहाँ से आई हैं?"
तारा परी मुस्कुराकर बच्चों से मिली और जल्दी ही बच्चों से उसकी दोस्ती हो गई।
सब बच्चे तारा परी का साथ पाकर काफी खुश थे। वे जल्दी ही तारा परी से घुल-मिल गए थे।
माली काका के बेटों को कोई ऐतराज़ नहीं था तारा परी के वहाँ रहने से, लेकिन उनकी दोनों पत्नियाँ तो जैसे जल-भुनकर राख हो गई थीं, पर कुछ कर नहीं पाई थीं।
माली काका ने तारा परी को शहर की हर छोटी-बड़ी बात बताई और समझाई कि यह दुनिया कितनी मतलबी है; तुम्हें किसी पर भी विश्वास नहीं करना है।
तारा परी ने कहा, "मैं आपकी हर बात समझ गई हूँ, पर काका, मुझे बाहर जाना होगा क्योंकि मुझे उस नेकदिल इंसान को ढूँढना है और जल्द से जल्द अपने लोक वापस जाना है।"
माली काका ने हाँ में सर हिलाया और तारा परी को लेकर शहर दिखाने चल पड़े और सोचा शायद वह भला इंसान भी मिल जाए।
माली काका ने रोज़ की तरह एक रिक्शा बुक किया और बोला कि वह पूरा शहर घुमाए। रिक्शा वाला हैरानी से सोच रहा था, "आज इस बूढ़े को क्या हो गया है? रोज़ तो केवल अपने गार्डन तक ही जाता था, आज पूरा शहर घूमने की बात कर रहा है!"
"खैर, मुझे तो अपने पैसों से मतलब है," यह सोचकर वह चल पड़ा मुंबई की सड़कों पर।
बड़ी-बड़ी बिल्डिंग, ढेर सारी गाड़ियाँ, खूबसूरत घर, गार्डन, दुकानें... ये सब वह ज़िन्दगी में पहली बार देख रही थी।
वह तो जैसे खो सी गई थी इन सब में। तभी उसे उस भयानक राक्षस का ख्याल आता है तो मानो उसकी रूह काँप जाती है।
तभी अचानक रिक्शा वाला अपना बैलेंस खो बैठता है और उसका रिक्शा लड़खड़ा जाता है और सामने खड़ी ब्लैक मर्सिडीज़ से टकरा जाता है।
रिक्शा वाले की तो जैसे जान हलक में आ गई थी। वह डर के मारे काँपने लगा था।
तारा परी को कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। माली काका भी घबरा गए थे।
तभी अचानक पास खड़े, ब्लैक सूट-बूट और बड़ी सी गन कैरी किए हुए दो गार्ड्स रिक्शा वाले के पास आये।
उनमें से एक ने रिक्शा वाले का गिरेबान पकड़ लिया जिससे वह बेचारा काँपने लगा। माली काका भी काफी डर गए। गरीब रिक्शा वाला लगातार उनसे माफ़ी मांगता रहा, लेकिन उनमें से किसी ने भी उसकी एक भी बात नहीं सुनी। उनमें से एक ने आगे बढ़कर एक घूँसा बेचारे रिक्शा वाले के मुँह पर दे मारा। तुरंत ही वह ज़मीन पर गिर पड़ा और उसके मुँह से खून आने लगा।
इस पर तारा परी को बेहद गुस्सा आया और जैसे ही दूसरा गार्ड रिक्शा वाले को मारने के लिए आगे बढ़ा, तभी अचानक तारा परी ने उसका हाथ पकड़ लिया और एक जोरदार चांटा उस गार्ड के ज़ोर से मारा।
चांटे की आवाज़ इतनी ज़ोर से थी मानो आस-पास कहीं ब्लास्ट हो गया हो।
और उस गार्ड के कानों से खून आना शुरू हो गया।
तब तक वहाँ अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई थी, और एक नाजुक सी लड़की का इतने हट्टे-कट्टे गार्ड्स को इस तरह मारना सभी के लिए चर्चा का विषय बन गया था।
माली काका बेहद डर गए और जल्दी से तारा परी का हाथ पकड़कर उसे ले जाने लगे।
तभी अचानक उस गार्ड के दूसरे साथी ने गन निकालकर तारा परी पर तान दी और अपने बॉस के पास चलने के लिए कहा।