Hate To Love - Chapter 2
अयाना पिहू के पास बेड पर बैठी और उसके गाल पर हाथ रखते बोली - "शांत शांत बच्चा, इतना गुस्सा करना अच्छा नहीं होता। चिल मेरी पढ़ाकू क्यों अपना मूड ऑफ कर रही है और अब तो मामी की डांट की आदत हो गई है….मानो इसके बिना मेरी तो सुबह ही नहींं होती।"
पिहू - "हो गया आपका प्रवचन?"
"अच्छा सुन मेरी बात, जल्दी से अपना मूड ठीक करो मैं तुम्हारा फेवरेट नाश्ता बना के लाती हूं वो भी फटाफट। आज तुम्हारा एग्जाम है ना तो तुम उसकी तैयारी करो और हां रात को बताऊंगी तुझे मेरे सपनों के बारें में ओके।"
यह कहकर अयाना पिहू का माथा चूम कर उस कमरे से चली गयी। उसके जाते ही पिहू ने टेबल की ओर देखा और बुदबुदाई - “एक कप चाय भी मम्मी चैन से नहीं पीने देती अयू दी को। मैं जानती हूँ कि आपको भी बुरा लगता है दी….बस आप अपनी मुस्कुराहट के पीछे उसको छुपा लेती हो।”
पिहू मायूस हो कर स्टडी टेबल की तरफ बढ़ी और अपनी बुक समेटती हुई बुदबुदाई, “हे भगवान मेरी दी को ऐसा लाईफपार्टनर देना जो उन्हें बेड से तब तक उतरने ना दे जबतक मेरी दी के गले से सुबह की चाय न उतर जाए और वो खुद ही चाय भी बना के लाए।”
वहीं दूसरी तरफ गाड़ी के होर्न की आवाज सुन गार्ड्स ने फट से बड़ा सा गेट खोला और चमचमाती एक ब्लेक गाड़ी लॉन में आकर रूकी। गाड़ी से तकरीबन 30 साल का शख्स बाहर निकला। आकर्षक व्यक्तित्व जिसे देखते ही आंखे जम सी जाए, अचानक वो तेजी से चलता हुआ अंदर एक कमरे के दरवाजे तक जा पहुंचा और उसने पुकारा - "साक्षी!"
इतना सुनते ही एक दूसरी आवाज आई, “सार्थक तुम आ गये?” यह कहते एक प्यारी सी लड़की उसके सामने आ खड़ी हुई।
"हां साक्षी मैं आ गया।"
यह सुनते ही साक्षी उसके सीने से लग जाती है और सार्थक भी उसे कसकर अपनी बाहों में भर लेता है।
"लगता है बहुत मिस किया मेरी जान ने मुझे।"
"नहीं किया बिलकुल भी नहीं" यह कहते साक्षी उससे अलग हो गयी।
"अच्छा सच में?"
"हां सच में!" साक्षी ने सार्थक को घूरते हुऐ कहा कि तभी सार्थक उसे अपने करीब खींच लेता है और उसके होठों पर अपने होंठ रख देता है…. पर तभी किसी शख्स के चिल्लाने की आवाज आई और साक्षी सार्थक से दूर हुई।
"ओह ये माही" सार्थक दुखी मन से बोला, "सच कहता हूं साक्षी हमारे प्यार का दुश्मन है तुम्हारा भाई।"
"शटअप सार्थक! माही हमारे प्यार का दुश्मन होता ना तो तुम यहां नहीं होते" यह बोलते ही साक्षी बाहर की ओर चल दी।
सार्थक उसके पीछे जाते हुए - "साथ है क्योंकि हमारा प्यार सच्चा था, तुम्हारे भाई ने देखा मैं उसकी बहन से कितना प्यार करता हूं।"
"सार्थक पता है माही ने प्यार नहीं, बल्कि मेरी खुशी देखी। तुम अच्छे से जानते हो प्यार व्यार माही को समझ नहीं आता।"
“आएगा भी कैसे साले साहब को? प्यार दिल का काम है दिमाग का नहीं और तुम्हारा भाई तो सिर्फ दिमाग से ही काम लेता है क्योंकि दिल पर तो ताले लगे है। सच कहता हूं, जिस दिन माही को प्यार हुआ ना उस दिन समझ आएगा उसे प्यार से दूर रहना कैसा होता है, जब देखो मुझे तुमसे दूर भेज देता है।”
“अच्छा तो बहुत तड़पते हो मेरे लिए?”
तड़प... क्या ही कहूँ जब मैं वापस आता हूं और मैं प्यार के कुछ पल अपनी बीवी के साथ बिताना चाहता हूं तो फिर मेरे सेल साहब कबाब में हड्डी बन जाते हैं। सारे रोमांस का कचरा कर देता है!"
"ओह हों इतनी शिकायतें वो भी आते के साथ ही?"
"मैडम जिस पर बीते उसी को पता होता है!"
"मैडम को कहने की जगह माही को बोला करो ना?"
"कौन दीवार में सर फोड़े!"
“ओह दीवार! खबरदार जो मेरे भाई को कुछ बोला भी तो।"
“किसी ने सच ही कहा है की सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ। मैं दुआ करता हूं माहिर खन्ना को भी जल्द ही प्यार हो!"
"अरे तुम्हारी नहीं सुनी जाएगी इसलिए जो पॉसिबल ही नहीं वो दुआ करने का क्या फायदा?"
"यहां कुछ भी नामुमकिन नहीं!"
"सार्थक… वो माहिर खन्ना है माहिर खन्ना, प्यार उसके सामने खड़ा हो ना तो वो नजरें फेर लेता है।"
"माहिर खन्ना की जिंदगी में उस लड़की को आने तो दो फिर देखना उसकी जिंदगी ही नहीं उसे भी बदल कर रख देगी। देखना फिर प्यार नाम से नफरत करने वाला शख्स प्यार में कैसे दीवाना होता है।"
"देखते है बट फिलहाल चलकर वो देखते है की माही क्यों गुस्सा कर रहा है!"
“हां तो जा रहे है ना वैसे माही का गुस्सा करना कोई बड़ी बात नहीं है, तुम्हें इतना परेशान नहीं होना चाहिए।”
"मैं माही के लिए नहीं उसके लिए परेशान हो रही हूं जिसकी शामत आई है। पता नहीं किस पर और क्यों कहर बरसा रहा है माही, वो भी सुबह सुबह?"
दोनों अपने रूम से निकल हॉल से गुजर सिढियों से होते ऊपर पहुंचे तो देखा माहिर खन्ना अपने रूम के बाहर टॉवल में खड़ा एक सर्वेंट को डांट रहा था। उस पर गुस्से से चिल्ला रहा था जो उसके सामने नजरें झुकाए खड़ा था और वहीं पास में जमीन पर ट्रे और कॉफी मग टूटा हुआ पड़ा था। साक्षी और सार्थक माहिर के पास चले आए। साक्षी ने सर्वेंट की ओर देखते माहिर से पूछा - "क्या हुआ माही?"
"आज के बाद मेरे बेड पर खाने पीने की कोई भी चीज रखी तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। वो सोने की जगह है खाने पीने की नहीं इडियट!"
माहिर एक बार फिर सर्वेट पर गुर्राया और उसे घूरते अपने रूम में चला गया और अंदर से दरवाजा भी बंद कर दिया। उसके जाते ही सार्थक सर्वेंट से बोला - "क्या किया?"
सर्वेट नजरें झुकाए झुकाए ही - "वो मैं माहिर सर के लिए कॉफी लेकर गया था। सर ने टॉवल मांगा तो गलती से मैनैं कॉफी टेबल की जगह बेड पर रख दी, उठा पाता बोड से कॉफी उससे पहले सर ने देख लिया। वो बहुत गुस्सा हो गये फिर मुझ को और कॉफी दोनों को रूम से बाहर फेंक दिया।"
साक्षी माहिर के रूम के बंद दरवाजे को देखकर सर्वेट से बोली - "जानते हो ना माही को बिल्कुल नहीं पंसद बेड पर कोई भी खाने पीने की चीज। पता होते हुए भी ऐसी लापरवाही? वो कभी पानी का गिलास भी अपने बेड पर नहीं लेता है और तुमने वहां कॉफी रख दी।"
सर्वेट - "एम सॉरी मैम, बट मैनैं जानबूझकर नहीं किया।"
सार्थक - "वो माहिर खन्ना है माहिर खन्ना, इसलिए ये बात भूलनी नहीं है जानबूझकर तो क्या आज जो हुआ वो अनजाने में भी फिर ना हो। आगे से ध्यान रखना नहीं तो अगली बार माहिर खन्ना के हाथों सिर्फ रूम से नहीं इस घर से भी बाहर फेंक दिये जाओगे।"
सर्वेट - "जी सर, आगे से गलती नहीं होगी।"
सार्थक - "अच्छा अब जल्दी से ये साफ करवाओ वो भी माही के बाहर आने से पहले।" यह बोल सार्थक ने साक्षी का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ रूम में ले आया।
"छोटी सी बात पर साले साहब कितना गुस्सा करते है।"
“सार्थक हमारे लिए छोटी सी बात होगी लेकिन माही के लिए ये बहुत बड़ी बात है। आज तक ना तो खुद अपने बेड पर उसने कुछ खाया पिया है, ना ही किसी और को खाने पीने दिया। ऐसा करते दूसरों को भी देखता है तो मुंह बनाता है इस बात पर माही हमेशा से चिढ़ता आया है।”
"भगवान करे उसे एक ऐसी लड़की मिले जो उसके सारे नियम कानून तोड़ के उसे उसकी नानी याद दिल दे।"
क्रमशः