Hate To Love Ch. 3

Hate To Love - Chapter 3

Posted by Kanchan Mehak Suthar • Feb 01, 2025 04:42 AM

साक्षी बेड पर जाकर बैठती हुई बोली, “सार्थक जानते हो ये माही को जब अच्छे से जान जाओगे तो तुम्हें भी उस पर नाज़ होगा….वो यूं ही नहीं भड़कता किसी पर।”

“हाँ ठीक है फिलहाल तुम्हारे गुस्से को ठंडा करने का एक इलाज मेरे पास” यह कहते के साथ सार्थक वहाँ से उठा और किचन से साक्षी के लिए पानी ले आया और उसकी तरफ पानी का ग्लास बढ़ते हुए बोला -"ठीक है मानता हूँ कि वो अपनी जगह सही है लेकिन तुम हम दोनों का मूड खराब ना करो, लो आराम से पानी पियो।"

साक्षी ने झट से पानी पी लिया तो सार्थक ने उसको छेड़ते हुए कहा, “हमारे यहां बेड पर सब चलता है खाना, पीना, सोना और...!”

साक्षी - "और क्या? आखिर तुम्हारा इरादा क्या है?"

सार्थक - "और रात को बताऊंगा!"

साक्षी - "कितने बेशर्म हो तुम!"

सार्थक - "इसमें क्या बेशर्मी, आखिरी बीवी हो मेरी।"

साक्षी - "बीवी हो तो क्या मतलब?"

सार्थक - "यही कि कुछ बातें बताईं नहीं जाती, सिर्फ कर के दिखाया जाता है।"

यह कहते के साथ ही सार्थक ने साक्षी को अपनी बाहों में भर लिया। 

 

उधर अयाना अपने कमरे से निकल पास के दूसरे कमरे में जाने लगी कि सविता जी ने उसे आवाज दी - "बिटिया रानी मां से बाद में मिल लेना, वो अभी सो रही हैं। जब वो जाग जाए उन्हें पहले चाय पिला देना।"

"जी मामी" यह कहकर अयाना ने एक नजर अपनी मां के कमरे को देखा और फिर वो वहां से किचन में चली आई और चाय बनाने लगी। चाय बनाते वक्त भी परेशान सी अयाना अपनी मां के बारे में सोच रही थी - "मां के लिए जल्द कुछ तो करना होगा। सोच अयाना सोच, मां का इलाज जल्द से जल्द करवाना जरूरी है।"

तभी उसके होठों पर मुस्कुराहट आ गयी और वो बुदबुदाई - "मिल गया रास्ता, अब ऐसे ही होगा पैसों का इंतजाम। लेकिन मुझे ध्यान देना होगा कि अगर मामा को यह बात पता चल गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे। अगर बताया तो पहली दफा ही मना कर देगें, ना कोई मानेगा और ना ही हां बोलेगें"

तभी सविता जी ने बाहर से उसे फिर आवाज दी - "चाय आज की तारीक में बन जाएगी क्या?"

"हां मामी बन गई अभी लेकर आई" अयाना ने कहा और जल्दी से चाय को कपों में डाल बाहर लेकर चली गई।

बीच आंगन में कुर्सी पर सविता जी चाय के इंतजार में बैठी थी, अयाना ने किचन से बाहर आते ही सबसे पहले उन्हें चाय दी - "मामी आपकी चाय।"

सविता जी चाय लेते हुए बोली, "दो लोगों की चाय बनाने में इतना वक्त लगता है क्या?"

अयाना - "आपकी पंसद की चाय बनाते है मामी, वक्त तो लगेगा ना!"

सविता जी - "मीठी मीठी बातें करवा लो!"

तभी मीठी सी आवाज आई - "मीठी मीठी चाय पीलो सविता फिर तुम भी मीठी मीठी ही बातें करोगी।"

ये सुन सविता जी और अयाना ने आवाज की दिशा में देखा, एक सज्जन शख्स ठीक उनके सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था, वो प्रकाश मिश्रा थे, सविता जी के पति, पिहू के पापा और अयाना के मामा जी।

सविता जी - "क्या कहा आपने?"

प्रकाश जी - "कुछ नहीं!"

सविता जी - "कुछ नहीं, सब समझ आता है हमें"

तभी "मामा जी" कहते अयाना मुस्कुराते प्रकाश जी के पास चली आई और धीरे से फुसफुसाते हुए बोली - "क्या मामा जी सुबह-सुबह महाभारत करने का इरादा है?"

प्रकाश जी मंद मंद हंसे - "बेटा यहां तो बिना इरादे के ही महाभारत हो जाती है!"

अयाना उन्हें चाय देती है - "सच कहती है मां, आप ना आ बैल मुझे मार वाले काम करते है।"

प्रकाश - "बेटा मामी को बैल नहीं कहते, गाय कहो गाय वो भी बड़ें बड़े सींगों वाली, जिसके सींग भी दिखाई नहीं देते।"

ये सुन और प्रकाश जी को हंसता देख अयाना ने माथा पीट लिया - "आप नहीं सुधरने वाले, पक्का पिटेगें मामी जी से"

प्रकाश जी - "शुभ शुभ बोलो बेटा, अच्छा लगेगा क्या मामा मामी से पिटते हुए?"

अयाना हंस दी - "बिल्कुल नहीं, अच्छा अब जल्दी से चाय पीकर बताईऐ कैसी बनी है?"

प्रकाश जी चाय का घूंट भरते है - "थैंक्स बेटा!"

अयाना- "थैंक्स क्यों?"

“दिन की शुरूआत जब मेरे खरगोश के हाथ की अच्छी सी चाय से होती है, इसके चलते मेरा पूरा दिन बहुत अच्छा जाता है, थैंक्स तो बनता है ना” बोलते प्रकाश जी ने अयाना के सिर पर हाथ रख दिया।

अयाना कुछ कहती कि सविता जी बोल पड़ी - "बातों के अलावा और भी काम होते है अयाना, जो जरूरी होते है।"

अयाना - "जी मामी, अभी नाश्ता बनाने जा रही हूं, मामा जी आप मामी जी के साथ चाय पिजिए।"

प्रकाश जी - "हम्म!"

अयाना - "मैं आती हूं!"

प्रकाश जी - "खरगोश?"

अयाना - "हां!"

प्रकाश जी - "जीजी ठीक है?"

अयाना - "जी, मां ठीक है और अभी सो रहे है, पिहू के लिए ब्रेकफास्ट बना दूं फिर मां को देखूंगी"

प्रकाश जी - "पहले देख लो?"

"मामा जी पिहू का एग्जाम है आज, पहले नाश्ता बना दूं, फिर देख लूंगी, तब तक मां उठ भी जाएगें' बोल अयाना वहां से चली गयी।

 

उसके जाते ही प्रकाश जी सविता जी से - "ये तुम ठीक नहीं करती हो सविता"

सविता जी - "मैनैं क्या किया जी?"

प्रकाश जी सविता जी के पास चले आये - "क्या किया? एक बच्ची को सुबह सुबह उसकी मां का चेहरा तो देख लेने दिया करो, जानती हो ना तुम राजश्री जीजी को सुबह सुबह देखना खरगोश को कितना पंसद है।"

"हां तो देख लेगी, सुबह हुई ही है अभी कौन सी रात हो गयी, और जीजी कहां जाने वाली है जो बाद में चेहरा देख ना पाएगी, वैसे भी जीजी सो रही है, अयाना पास जाती तो वो उठ जाती, उन्हें आराम की जरूरत है ना, बस यही सोच अयाना से कहा मैनैं बाद में देख लेना जीजी को, मैं कुछ अच्छा करूं ना तब भी पिहू के पापा आप ऐसा ही कहेगें ठीक नहीं करती हो तुम सविता (कुर्सी से उठते) मैं कहां कुछ ठीक करती हूं, मैं तो सब गलत ही करती हूं सबके साथ गलत करती हूं।"

प्रकाश जी - "सविता मैनैं ऐसे तो नहीं बोला"

क्रमशः

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