"लाईफ इज़ नॉट अ फैरी टेल"...... सीज़न –3 Ch. 3

"लाईफ इज़ नॉट अ फैरी टेल"...... सीज़न –3 - Chapter 3

Posted by Farheen Rajput • Feb 02, 2025 06:06 AM

राहुल ने अभी-अभी वो इंजेक्शन अरु की बाजू से छुआ ही था कि एकाएक किसी ने उसके सिर पर जोरदार वार किया। वो इंजेक्शन उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया। अरु को छोड़ते हुए उसने अपने सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। अरु झट से उससे दूर हो गई। पहले ही पीछे से एक जोरदार लात पड़ने से राहुल नीचे ज़मीन पर जा गिरा। अरु ने उसके लिए मसीहा की तरह आई नैना को देखा तो वो भावुक होकर उसकी ओर दौड़ पड़ी और उसके गले लग गई। राहुल ने जैसे-तैसे खुद को संभाला और पीछे नैना को देखा तो उसने गुस्से से अपने दांत पीसते हुए नैना को देखा।

राहुल (गुस्से से अपने दांत पीसते हुए खड़े होकर): नैना तुम! तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई मुझ पर हाथ उठाने की!

नैना (गुस्से से राहुल को घूरते हुए): आस्तीन के सांप! शुक्र कर कि अभी मैंने सिर्फ हाथ उठाया है तुझ पर, तेरे हाथ-पांव तोड़े नहीं हैं। (एक पल रुककर) कमीने! तुझे शर्म नहीं आई ऐसी गिरी हुई नीच हरकत करते हुए? आखिर एक दोस्त होकर भी तूने ऐसी गिरी हुई हरकत करने का सोचा भी कैसे!

राहुल (खड़े होकर अपने कपड़े झाड़ते हुए): मैंने बहुत इंतज़ार किया है इस दिन का। अब मैं किसी को भी, किसी को भी अरु और अपने बीच नहीं आने दूँगा, फिर चाहे मुझे इसके लिए लाशों के ढेर से ही होकर क्यों ना गुज़रना पड़े!

इतना कहकर राहुल अरु और नैना की दिशा में बढ़ने लगा। अरु ने यह देखकर नैना की बाजू को कसकर थाम लिया। हालाँकि अगर अपने बच्चे की फ़िक्र और उसकी ज़िंदगी का सवाल नहीं होता, तो अरु खुद राहुल को उसकी किए का सिला देती। लेकिन इस वक्त अरु चाहकर भी उससे नहीं उलझना चाहती थी क्योंकि वो जानती थी कि उसका ऐसा करना सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके होने वाले बच्चे की ज़िंदगी के लिए घातक सिद्ध होगा। इसीलिए वो इस वक्त राहुल से डरी हुई थी।

नैना (हाथ में पकड़े डंडे पर मज़बूती कसते हुए): अरु… अरु तू जा यहाँ से बाहर! इस कुत्ते को तो मैं देखती हूँ!

अरु: लेकिन नैना तू…

नैना (तेज़ आवाज़ से बीच में ही): अरु! मैंने कहा ना, तू जा! इसे मैं संभाल लूँगी!

राहुल (तंज भरे लहजे से): ओह, रियली? तुम रोकोगी मुझे? (एक पल रुककर) मगर ये तो सरासर गलत बात है ना नैना, कि तुम हम दोनों की दोस्त होते हुए भी सिर्फ़ अरु का साथ दे रही हो!

नैना (नफ़रत और गुस्से भरे भाव से): तू और दोस्त! थू! तुझ जैसा घटिया इंसान दोस्ती जैसे पाक लफ़्ज़ की अहमियत कभी समझ ही नहीं सकता। (अरु की ओर देखकर) अरु तू जा यहाँ से! इसे तो आज मैं छठी का दूध याद दिलाती हूँ!

इस बार अरु ने कोई बहस नहीं की और वो नैना के कहे अनुसार जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई। जैसे ही राहुल उसके पीछे जाने के लिए आगे बढ़ने को हुआ, कि एकाएक नैना ने हाथ में पकड़े डंडे को कसकर राहुल की उल्टी टांग में दे मारा। जिससे राहुल दर्द से कराहकर वहीं ज़मीन पर बैठ गया।

राहुल (गुस्से से नैना को घूरकर): दिमाग ख़राब हो गया है तुम्हारा! और कैसी दोस्त हो तुम जो अपनी दोस्त की बसी हुई ज़िंदगी को उजाड़ने पर तुली हो!

नैना: उसकी ज़िंदगी तुम्हारे साथ रहकर बसेगी नहीं, बल्कि बर्बाद हो जाएगी। और मिस्टर अग्निहोत्री ने उसके साथ जो भी किया हो, लेकिन हकीकत यही है कि उसने उस रिश्ते को अपने पूरे दिल और जान से निभाया है और उसके दिल में तुम वो जगह अब तो हरगिज़ नहीं हासिल कर सकते जो उसने उस भस्मासुर को दी थी। और मानो या मत मानो, उसने प्यार सिर्फ़ रिदा…

नैना अपनी बात पूरी भी नहीं कह पाई थी कि राहुल ने अचानक फुर्ती से खड़े होते हुए नैना की बात सुनकर गुस्से से तिलमिलाकर उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ मार दिया। जो इतना जोरदार था कि नैना साइड में ड्रेसिंग टेबल से जा टकराई और कुछ पल के लिए उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसके माथे से ख़ून बह निकला। मगर अभी भी नैना के ज़हन में अरु और उसकी सेफ़्टी ही चल रही थी। जैसे ही राहुल वहाँ से बाहर निकलने को हुआ, नैना ने गिरे हुए ही उसकी टांग को कसकर अपने हाथों से पकड़ लिया ताकि वो बाहर ना जा पाए। राहुल ने उसे धकेलने की कोशिश की, लेकिन जब वो नाकाम रहा तो उसने झुंझलाकर नैना के पेट में दूसरी टांग के सहारे जूते पहने हुए ही एक जोरदार लात मारी। जिसका इम्पैक्ट इतना था कि नैना की एक दर्द भरी चीख वहाँ गूंज उठी, जो घर के अंदर वाले मेन डोर तक, अरु के कानों तक भी पहुँची। जिसकी आवाज़ सुनकर अरु के क़दम वहीं के वहीं रुक गए और अरु झट से पीछे मुड़ी।

अरु (घबराते हुए): नै… नैना…

अरु एक पल को असमंजस में आ गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। एक तरफ़ उसका अजन्मा बच्चा था, तो दूसरी तरफ़ उसकी जान से प्यारी दोस्त। वो किसी एक को नहीं चुन सकती थी। उसके लिए उसका बच्चा उसकी ज़िंदगी से भी बढ़कर था, लेकिन नैना को यूँ ख़तरे में छोड़कर भी वो नहीं जा सकती थी। अरु अभी ये सब सोच ही रही थी कि सीढ़ियों की ओर फुर्ती से आता राहुल उसे देखकर एक तीखी मुस्कान मुस्कुराते हुए धीमे क़दमों से उसकी ओर बढ़ने लगा।

अरु (राहुल की ओर देखकर): नै… नैना कहाँ है? क्या किया तुमने उसके साथ?

राहुल (ज़हरीली मुस्कान के साथ): अभी फ़िलहाल तो ज़िंदा है, लेकिन कब तक कह नहीं सकते। शायद आख़िरी साँसें गिन रही है अपनी। अब अगर तुम अपनी प्यारी दोस्त को यूँ अकेले मरता हुआ छोड़कर जाना चाहती हो तो बेहिचक जा सकती हो, मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं!

अरु ने राहुल की बात सुनी तो उसका दिल नैना की चिंता में धक सा रह गया और वो बिना कुछ सोचे फुर्ती से वापस ऊपर जाने के लिए दौड़ पड़ी। मगर इससे पहले कि वह सीढ़ियाँ चढ़ पाती, सीढ़ियों से उतरे राहुल ने बीच में ही अरु को पकड़कर अपनी बाहों में कैद कर लिया। अरु छटपटाती रही, लेकिन राहुल ने उसे अपनी मज़बूत कैद से छोड़ा ही नहीं और उसे पकड़कर सीढ़ियों के पास से काउच के पास ले आया। एक पल बाद उसने अपने एक हाथ से अरु को पकड़ते हुए दूसरे हाथ से अपनी जेब से वो इंजेक्शन निकाला। अरु ने ख़ुद को बचाने के लिए राहुल के हाथ पर काट लिया जिसकी वजह से कुछ पल के लिए अरु पर राहुल की पकड़ थोड़ी ढीली हो गई। जिसका मौक़ा पाकर अरु ने राहुल के हाथों से वो इंजेक्शन छीनने की कोशिश की और इसी छीना-झपटी में इंजेक्शन का आगे वाला सिरा अचानक टूट गया। जिसे देखकर राहुल ने झुंझलाकर अरु को पीछे की ओर धक्का दे दिया और अरु ख़ुद को संभाल नहीं पाई और सीधा अपने पीछे काउच पर जा गिरी।

राहुल अरु के उठने से पहले ही उस पर पूरी तरह से हावी हो गया। उसने अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों कलाइयों को कसकर पकड़ते हुए उसे अपनी कैद में ले लिया था। इंजेक्शन टूटने की झुंझलाहट और अरु की लगातार ख़ुद को राहुल से छुड़ाने और ख़ुद को उससे दूर करने की जद्दोजहद को देखकर राहुल की झुंझलाहट बढ़ गई और उसने अपनी खीज और झुंझलाहट को उतारने के लिए, अरु के अपने चेहरे को फेरा देख उसका चेहरा अपनी तरफ़ करने के लिए उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर, जो कि ठीक उसके चेहरे के सामने था, राहुल ने अपनी पूरी ताक़त के साथ अपने दाँतों से अरु की गर्दन के पिछले हिस्से पर काट लिया। और इसी के साथ अरु की रोते हुए एक दिल चीरने वाली चीख निकल पड़ी थी और अरु बेहिसाब दर्द से बिलख उठी थी। उसकी आँखों से बिना रुके लगातार आँसू ऐसे बह रहे थे, उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी ने उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर तेज़ाब डाल दिया हो। उसे अपनी गर्दन से बहता ख़ून भी साफ़ महसूस हो रहा था। लेकिन इस वक़्त जैसे राहुल एक वहाँशी दरिंदा बन चुका था, ना तो उसे यह होश था कि वह क्या कर रहा है और ना ही उसे यह समझ थी कि इसका अंजाम क्या होगा। लेकिन जब उसने अरु को इस क़दर दर्द से रोते बिलखते देखा तो उसने अरु को शांत करने के लिए उसके दोनों हाथों को अपने एक हाथ में पकड़कर उसके सर के ऊपर रख लिया और उसकी चीखों और सुबकियों को रोकने के लिए उसने उसके मुँह पर अपनी हथेली से दबाव बना लिया। जिसकी वजह से अरु को अपना दम घुटता सा महसूस होने लगा था और वह बड़ी मुश्किल से लंबी-लंबी साँसें लेते हुए ख़ुद को संतुलित रखने की कोशिश कर रही थी।

मगर राहुल का ख़ुद पर इस क़दर हावी होना उसे चाहकर भी सामान्य नहीं कर पा रहा था और इन सबसे अलग अरु को अपने अजन्मे बच्चे की फ़िक्र लगी हुई थी क्योंकि इस वक़्त जिस तरह से राहुल जानवरों की तरह उसे ट्रीट कर रहा था, उसके बाद अरु के दिल में कहीं ना कहीं ये डर समा चुका था कि शायद आज वह एक माँ के रूप में असफल हो जाएगी और अपने अजन्मे बच्चे को नहीं बचा पाएगी। इससे पहले कि राहुल पूरी तरह एक दरिंदा बन जाता और अपनी सारी हदें पार करता, कि एकाएक एक जोरदार मुक्का राहुल के मुँह पर आकर पड़ा और राहुल एक झटके में ही अरु से दूर जा गिरा। राहुल के दूर गिरते ही अरु डर और दहशत से वहीं ख़ुद में ही सिमटकर बैठ गई और बहुत ही बुरी तरह सुबकने लगी। इस वक़्त वो इतनी सहमी हुई थी कि उसने अपनी नज़रें उठाकर यह देखने की भी जहमत नहीं की थी कि आखिर इस वक़्त उसके सामने कौन था और किसने उसे बचाया। लेकिन जब नीचे गिरे हुए राहुल को उठाने के लिए दक्ष नीचे की ओर झुका तो अरु की नज़रें दक्ष पर पड़ीं और उसकी सिसकियाँ और रोना और भी ज़्यादा भयानक और दिल चीरने वाला हो गया।

दक्ष ने जब राहुल को अरु के साथ ऐसी घटिया हरकत करते देखा, उसे उस पर हावी देखा तो दक्ष का गुस्सा अपनी सारी हदें भूल गया और दक्ष ने वहीं राहुल के सीने पर चढ़कर उसे नॉनस्टॉप मारते हुए उस पर नॉनस्टॉप घूसों से वार किया और वो उसे बेहिसाब मारता रहा और तब तक लगातार उसे मारता ही रहा जब तक वह लहूलुहान होकर पूरी तरह बेहोश नहीं हो गया और जब तक राहुल के शरीर ने बिल्कुल दम नहीं छोड़ दिया था। आख़िर में जब राहुल का चेहरा पूरी तरह ख़ून से लहूलुहान हो गया और दक्ष को महसूस हुआ कि वो बेहोश हो चुका है तब आख़िर में उसने उसे छोड़ा और वह अरु की दिशा में बढ़ गया। अरु ने उसे देखा तो उसने अपनी बाहों को उसकी कमर से लपेटते हुए एक छोटे बच्चे की तरह उसके सीने पर अपना सर रख लिया और एक छोटे बच्चे की तरह बेशुमार सुबककर रोने लगी और दक्ष भी उसका सर सहलाते हुए उसे काँम डाउन करने की कोशिश करने लगा।

हालाँकि दक्ष यहाँ अरु से बात करने के लिए, उस पर नाराज़ होने के लिए आया था क्योंकि अपने बच्चे को खोने की ख़बर जानकर जो कुछ रिदांश की हालत हुई थी उसके बाद दक्ष का गुस्सा अरु पर और भी ज़्यादा बढ़ गया था और वह उसी गुस्से को उतारने के लिए और उससे सवाल करने के लिए आया था। लेकिन जब उसने अरु को इस हालत में देखा तो उसका दिल जैसे छलनी हो गया था कि तभी नैना भी घायल रूप में लड़खड़ाती हुई बड़ी मुश्किल से अरु के पास आती है और अरु और राहुल की हालत देखकर उसे समझने में देर नहीं लगी कि असल में यहाँ क्या हुआ होगा। कुछ ही देर में दक्ष ने पुलिस को फ़ोन किया और पुलिस राहुल को वहाँ से उठाकर हॉस्पिटल ले गई और साथ ही एक अच्छे डॉक्टर ने अरु और नैना का ट्रीटमेंट भी किया।

(लगभग दो घंटे बाद……)

दक्ष (अरु का हाथ थामकर): सब ठीक है अरु, कुछ नहीं हुआ है। जस्ट रिलैक्स एंड काँम डाउन!

अरु (भावुकता के साथ बेहद दुख भरे भाव के साथ): दक्ष क्या मैं इतनी बुरी हूँ? इतनी बुरी कि सिर्फ़ मुझे लोगों से धोखा और दर्द ही मिलते हैं और क्या ईश्वर ने मेरी किस्मत में हमेशा ऐसे ही दर्द लिखे हैं? (दक्ष के सीने पर सर रखते हुए) इससे अच्छा तो वो मुझे मौत ही दे दे क्योंकि अब मुझसे ये बोझ भरी ज़िंदगी और नहीं जी जाती!

दक्ष (अरु का सर चूमते हुए): ईश्वर भी हमेशा सिर्फ़ अच्छे लोगों का ही इम्तिहान लेते हैं और तुम फ़िक्र मत करो, सब ठीक हो जाएगा। मैं बात करूँगा रिदु से, तुम और वो…

अरु (अपना सर दक्ष के सीने से हटाते हुए): मैं कभी उस इंसान के साथ वापस नहीं आ सकती, चाहे फिर मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी दर-दर की ठोकर खाकर ही क्यों ना गुज़ारनी पड़े, मगर उस घर में मैं हरगिज़ वापस नहीं जाऊँगी!

दक्ष (अरु की ओर देखकर): मैं मानता हूँ अरु, रिदू गलत है, लेकिन जो कुछ भी तुमने किया वो भी सही नहीं है। इनफ़ैक्ट तुम उससे कहीं ज़्यादा गलत हो। तुमने ऐसा क़दम उठाया जिसका मैं ख़्वाबों में भी तसव्वुर नहीं कर सकता था!

अरु: कौन गलत है, कौन सही नहीं जानती मैं, लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ इस बोझिल और बेमाने रिश्ते का बोझ उठाने की ना तो हिम्मत है मुझमें और ना ही चाह। तो बेहतर होगा तुम भी ख़ुद को किसी भी झूठी उम्मीद से ना बाँधकर रखो!

इतना कहकर अरु वहाँ से अपने कमरे की ओर चली गई और दक्ष भी कुछ पल बाद वहाँ से चुपचाप चला गया। उसने सोचा था कि इस वक़्त अरु ठीक नहीं है, मगर वह अगले दिन अरु से इस बारे में ज़रूर बात करेगा और जब अरु का गुस्सा ठंडा होगा तो वह यक़ीनन उसकी बात समझेगी भी और मानेगी भी। फिर भले ही रिदांश और अरु के बीच में जो कुछ भी हुआ था, बेशक वो कोई छोटी बात नहीं थी, लेकिन दक्ष को यक़ीन था कि जब ये दोनों अपने गुस्से से बाहर आएंगे तो इनकी मोहब्बत इन्हें करीब ले ही आएगी। लेकिन अगले दिन जब दुबारा अरु से मिलने आया तब उसे पता चला कि अरु हमेशा-हमेशा के लिए यहाँ से जा चुकी थी। कहाँ? किसी को नहीं पता था, मगर इतना ज़रूर पता था कि वह कभी भी ना लौटने के लिए यहाँ से हमेशा-हमेशा के लिए जा चुकी थी!

(फ़्लैशबैक एंड)

गाड़ी रेड लाइट पर रुकी तो अरु अपने ख़्यालों से बाहर आई और उसने अपनी नम आँखों को बड़ी ही सफ़ाई से साफ़ किया।

अरु (मन में आसमान की ओर देखकर): आपने हमेशा मेरा इम्तिहान लिया है, हमेशा मुझसे मेरे रिश्ते और अपनों को छीना है और हमेशा मेरे साथ वो सब किया है जो शायद मैं कभी डिज़र्व ही नहीं करती थी। लेकिन फिर भी मैंने अपनी किस्मत के लिखे को एक्सेप्ट किया और उन सारी बुरी यादों और अतीत को भूल गई, सिर्फ़ आपकी दी एक नेमत की वजह से, मेरी आरांशी, मेरी बेटी की वजह से। उसने मेरे सारे ज़ख़्मों को भर दिया और अपनी मासूम मुस्कान से उसने मेरी ज़िंदगी में खुशियाँ ही खुशियाँ भर दी और उन सारे ज़ख़्मों और बुरी यादों को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया जो मुझे अतीत से मिली थीं। बस मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि मेरी बच्ची को कभी मुझसे दूर मत कीजिएगा, उसे हमेशा, हमेशा बस मेरे साथ रखिएगा क्योंकि ये आप भी अच्छे से जानते हैं कि मैंने अपनी बच्ची को पाने के लिए और उसे ज़िंदगी देने के लिए कितनी मुश्किलों और आफ़तों का सामना किया है। (एक पल को अपनी आँखें बंद करते हुए) बस अब मुझे और इम्तिहानों और अग्नि परीक्षाओं में मत डालिएगा, अब बस मुझे मेरी बेटी के साथ एक सुकून भरी ज़िंदगी चाहिए और कुछ नहीं। (एक पल रुककर गहरी साँस लेते हुए) मैं वापस अतीत की उन्हीं गलियों में आ गई हूँ जिन्हें मैं एक अरसे पहले छोड़ जा चुकी हूँ। बस अब मुझे इतनी हिम्मत दीजिएगा कि मैं अपने अतीत का डटकर सामना कर सकूँ, बिना किसी डर के, बिना कमज़ोर पड़े, बस इतना साथ दीजिएगा!

इसी के साथ ड्राइवर ने अरु की गाड़ी बड़े से होटल के सामने रोकी और अरु ने एक बार फिर अपने उसी कॉन्फ़िडेंस के साथ गाड़ी से बाहर क़दम निकाला जो हमेशा अब उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आता था और शायद यहीं से एक बार फिर अरु की ज़िंदगी एक नई करवट लेने की शुरुआत करने वाली थी!

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