काशी: एक संघर्ष - Chapter 1
कुछ सिलसिलों का दौर ऐसा चल रहा था, कुछ दिल टूट रहे थे, तो कुछ जज्बातों का मेला लगा था।
कुछ कहानियां बीच से शुरू होकर, शुरुआत पर खत्म होती हैं।
"सार्थक… सार्थक…" एक लड़की बेड पर से चिल्लाते हुए उठी। उसका पूरा शरीर पसीने में भीग गया था। उसने अपने सीने पर हाथ रखा और गहरी साँस लेते हुए खुद से कहा, "जो गलती की ही नहीं, उसकी इतनी बड़ी सजा… दे दी तुमने मुझे… खुद से दूर कर दिया मुझे… मैं कैसे रहूँ तुम लोगों के बिना…"
"प्लीज सार्थक, लौट आओ ना… तुम्हारे बिना कितने रिश्ते टूट गए हैं… प्लीज!" इतना बोल वो लड़की रोने लगी। उसके हाथ और होठ दोनों उसका साथ नहीं दे रहे थे।
"क्या हुआ मम्मा? आप ठीक हैं ना…" एक लड़की उस औरत के बगल में उठकर बैठते हुए बोली। शायद इतनी तेज से चिल्लाने की आवाज सुनकर उस लड़की की नींद खुल चुकी थी।
औरत: ये हकीकत है, लेकिन फिर भी हर रोज़ सपना बनकर मेरी आँखों में फिरता रहता है। कुछ समझ नहीं आता काशी, इन सब से मेरा पीछा कब छूटेगा… कब… मैं परेशान हो गई हूँ!
काशी: मम्मा… प्लीज शांत होकर सो जाओ, प्लीज… सब ठीक हो जाएगा। हम हैं ना, मिलकर सब ठीक कर लेंगे। डोंट वरी मम्मा!
वैदेही: कैसे सो जाऊँ? ताई ने कहा है कि हम लोग सुबह यहाँ से चले जाएँ। बड़ी मुश्किल से हाथ-पैर जोड़कर हमने रात यहाँ रहने के लिए उन्हें मनाया है। कहाँ जाएँगे सुबह होते ही? कहाँ ठिकाना है हमारा?
काशी: बेड के पास से लैंप की लाइट जलाकर… "कुछ नहीं होगा, मैं जानती हूँ अब हम कहाँ जाएँगे…" इतना बोल काशी ने सामने देखा और वापस अपनी माँ की ओर देखकर उनके चेहरे को अपने घुटनों पर रख लिया।
वैदेही: मुझे नींद नहीं आ रही, वैसे भी सुबह होने वाली है। तुम सो जाओ।
काशी: नहीं, आप सो जाओ। जल्दी उठने की कोई ज़रूरत नहीं है। इतना बोल काशी ने उसकी माँ के सर पर हाथ फेरने लगी।
वैदेही (मन में): काश एक बार तुमने मेरी बात का यकीन किया होता नील, बस एक बार… तुमने खुद अपने हाथों से हमारे इस रिश्ते को खराब कर दिया… क्या तुम्हें सच में अपनी वेदु पर यकीन नहीं था, इतना सा भी नहीं?
"अब क्या मिस्टर रावत के बारे में सोचकर रात भी खराब करोगी… मॉम, आप अपना दिन तो उन्हीं के चक्कर में खराब करती हैं, कम से कम रात को तो चैन से सो जाया कीजिए!" काशी ने वैदेही के सर पर थपकियाँ देते हुए थोड़े अजीब तरह से कहा।
"तुम तो सब जानती हो ना, तुम कैसे चुप रह लेती हो ये सब सहकर? तुम्हें दुख नहीं होता?" वैदेही ने अपनी आँखें ऊँचा करके काशी को देखते हुए कहा।
"अच्छा चलो बताओ, दुख होने से क्या होगा? हमारी सारी प्रॉब्लम खत्म हो जाएँगी? हम खुश हो जाएँगी? हमने जो सहन किया है, सब सही हो जाएगा? मिस्टर रावत की नज़र में आप सही हो जाएँगी?" काशी ने वैदेही की ओर देखते हुए कहा।
"मैं ये तो नहीं बोल रही कि जो नील ने किया है वो सही नहीं है। उसने मुझे प्यार किया था, फिर भी उसको मुझ पर बिलकुल भरोसा नहीं रहा। क्या प्यार में भरोसा नहीं होता?"
"नहीं होता मॉम, तभी तो मिस्टर रावत ने एक बार भी आपके बारे में नहीं सोचा और तो और उस अधूरी से शादी कर ली…" काशी ने मुँह बनाते हुए कहा।
"पापा बोल लिया करो काशी। डैड हैं तुम्हारे वो चाहे कैसे भी हों!" वैदेही ने काशी की ओर देखकर कहा।
"डैड ऐसे नहीं होते मम्मा। सात्वी, आर्यन, किंशा सब के डैड देखे हैं ना आपने? कितने अच्छे हैं, और एक मिस्टर रावत है जो मुझे तो प्यार दूर, उस इंसान से भी नहीं करते जिनसे उन्होंने प्यार किया और सात जन्मों का रिश्ता बाँधा है। मुझे उनका नाम भी नहीं सुनना… तो सो प्लीज वेदू मॉम… आज के बाद आप उन्हें मुझे डैड बोलने के लिए न बोलें!" वैसे भी मैं आपकी बहुत बातें सुनती हूँ उस इंसान की वजह से। इतना बोल काशी ने वैदेही को सही से लिटाया और उठकर रूम से बाहर चली गई।
काशी के जाते ही वैदेही उठी और टेबल से लैंप जलाकर खुद बेड से उतरकर खड़ी हो गई। दूध सा गोरा रंग, कंधे से नीचे तक आते बाल, मोटी-मोटी आँखें, गुलाबी होंठ… वैदेही को देखकर कोई बता भी नहीं सकता था कि उसकी एक बेटी भी है।
वैदेही ने रूम को सही किया और खुद से ही कहा, "बाप रे बाप! इसका गुस्सा… अब तो सोने से रहा। इसे नींद आती क्यों नहीं है?" इतना बोल वैदेही रूम से बाहर चली गई। उसने रूम से निकलते ही आस-पास देखा और अपनी नज़रें आँगन में की, जहाँ एक कुर्सी लगी हुई थी जिस पर काशी बैठी हुई तारों को देख रही थी।
वैदेही ने काशी को देखा और उसके बगल में बैठते हुए कहा, "अब से नाम नहीं लूँगी। प्लीज चलकर सो जा थोड़ा…"
काशी: आप सो जाओ, मुझे नींद नहीं आ रही। वैसे भी पाँच बज गए हैं, अभी वो आपकी ताई आएंगी और भजन शुरू कर देंगी… ये लो, तुम दोनों यहाँ बैठकर सुबह-सुबह बातें शुरू कर दीं। थोड़ा काम कर लो तो घिस नहीं जाओगी… रोज़ बोलना पड़ता है, माँ-बेटी को कोई काम-धंधा नहीं है! काशी ने मुँह बनाते हुए ताई की नकल करते हुए कहा।
काशी को यूँ नकल करता देख वैदेही को भी हँसी आ गई। उसने काशी की ओर देखा और उसके कंधे पर हाथ रखकर जोर से हँसने लगी। काशी ने वैदेही को हँसते हुए देखा तो उसके भी चेहरे पर स्माइल आ गई। वो भी वैदेही के साथ-साथ जोर-जोर से हँसने लगी। काशी बहुत कम वैदेही को हँसते हुए देखती थी।
"भगवान भला करे… इन दोनों का सुबह-सुबह… माँ-बेटी दोनों हँसने लग जाती हो, कोई काम-धंधा नहीं है क्या… ये नहीं थोड़ा-बहुत काम कर लूँ, लेकिन नहीं मजाल है जो थोड़ा काम कर लें, बस बातें करवा लो दोनों महारानियों से…"
काशी ने सुना और मुँह बनाते हुए चेयर से खड़ी हुई और ताई की ओर देखकर कहा, "क्या ताई, आज और काम करवा लो? कल से तो तुम ही करोगी ना… फिर किससे करवाओगी? हम तो आज चले जाएँगे।" इतना बोल काशी के चेहरे पर स्माइल आ गई। वैसे भी अब हम जा रहे हैं तो आपको ही ये सब काम करने होंगे ना… तो तैयार है ना आप झाड़ू-पोछा, बर्तन के लिए? इतना बोल काशी ने अपनी माँ का हाथ पकड़ा और अंदर ले आई।
ताई ने दोनों को जाते देखा और खुद से कहा, "काली चुड़ैल कहीं की, कुछ भी अच्छा नहीं बोलती… बस मुँह चलवा लो… जब भी मुँह खोलती है बस आग उगलती है। मेरे बेटे पर डोरे डालेगी बड़ी आई…" दोनों को तो मैंने आज सबक नहीं सिखाया तो मेरा नाम भी कमला नहीं… कमला ने इतना बोला और झाड़ू को जोर से आँगन में फेंककर अंदर चली गई।
To be continue…
एक नई कहानी के साथ में आप सब के साथ फिर से आ गई हूँ। प्लीज सपोर्ट कीजिए… एंड कमेंट करके बता दीजिए!
रिया पाराशर