काशी: एक संघर्ष - Chapter 2
ताई ने दोनों को जाते देखा और खुद से कहा, "काली चुड़ैल कहीं की! कुछ भी अच्छा नहीं बोलती! जब भी मुँह खोलती है, बस आग उगलती है। मेरे बेटे पर डोरे डालेगी बड़ी आई! दोनों को तो मैंने आज सबक नहीं सिखाया, तो मेरा नाम भी कमला नहीं!" इतना बोलकर उसने अपने हाथ में पकड़ी झाड़ू को जोर से आँगन में फेंका और अंदर चली गई।
अब आगे… * * * * *
वैदेही और काशी अपने कमरे में अपना सामान पैक कर रही थीं। तभी एक लड़का दरवाजे पर आया और दोनों को सामान पैक करते देख वहीं रुक गया।
काशी गुस्से में अपना सामान अपने बैग में डाल रही थी। गुस्से में उसका चेहरा एकदम लाल हो जाता था। उसके कमर से नीचे तक आते बाल, गोरा रंग, तिरछे नैन-नक्श, दिखने में एकदम मासूम, लेकिन है या नहीं, ये रब जाने।
वैदेही: काशी, शांत भी हो जाया कर बेटा! कितना गुस्सा करती है तू!
काशी: अपने कपड़े बैग में डालते हुए, "तो क्या करूँ? आपकी उस ताई का सुनूँ क्या? मुझसे नहीं सुना जाता। आपको सुनना है, तो आराम से जाओ और सुनो उनके भजन…" इतना बोल काशी ने जैसे ही बैग में सामान रखने के लिए हाथ बढ़ाया, कि तभी उसकी नज़र दरवाजे पर खड़े लड़के पर गई। तो काशी ने गुस्से से अपना सामान बैग में डाल लिया।
वैदेही ने काशी को दरवाज़े की ओर देखते हुए देखा। उन्होंने देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "अरे ज्ञान बेटा, आप आओ ना। बाहर क्यों खड़े हो?"
ज्ञान: मम्मी की बात का बुरा लगा क्या?
काशी: अपनी कमर पर हाथ रखकर ज्ञान को घूरते हुए, "नहीं-नहीं! हमें तो बहुत अच्छा लगा कि तुम्हारी माँ ने हमें भर-भर के ताने दिए हैं!"
ज्ञान: (मन में) "सच में ये लड़की मेरी जान ले लेगी। इतना मासूम और बच्चों जैसी हरकतें कौन करता है!"
काशी: काशी ने ज्ञान को देखा जो एकटक उसे देख रहा था। काशी ने उसके आगे हाथ हिलाया और कहा, "सपनों की दुनिया से बाहर आओ ज्ञान साहब! सपनों में कुछ नहीं रखा।"
काशी की बात सुनकर ज्ञान अपनी सोच से बाहर आया और वैदेही के हाथ को पकड़कर कहा, "मत जाइए ना आंटी! मम्मी को मैं समझा दूँगा। प्लीज़! उन्हें गलतफहमी हुई है। उन्होंने आपसे और काशी से जो भी कहा है, उसके लिए सॉरी! मैं उनसे बोलूँगा, वो आपसे माफ़ी माँग लेंगे।"
वैदेही: हमें माफ़ी नहीं मंगवानी बेटा, और अब यहाँ नहीं रहेंगे हम। बाकी तुम खुश रहो।
काशी ने बैग उठाया और वैदेही को पकड़ा दिया। वैदेही जी बैग लेकर बाहर निकल गई। काशी ने जैसे ही बैग उठाया, कि ज्ञान ने उसका हाथ पकड़ लिया। काशी को ज्ञान की यह हरकत बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसने ज्ञान को घूरा और कहा, "देखो ज्ञान, मैं कोई सीधी-साधी लड़की नहीं हूँ, जो ऐसे पकड़ने से कुछ नहीं बोलेगी। शुक्र मनाओ मैं तुम्हें थोड़ा-बहुत जानती हूँ। अगर अब तक कोई और होता ना, तो जान से मार देती।"
ज्ञान ने काशी का हाथ छोड़ दिया, लेकिन उसके बैग को पकड़कर कहा, "मम्मी की बात बुरी लगी…" ज्ञान ने काशी को देखते हुए उससे कहा। ज्ञान की बात सुनकर काशी ने अपने हाथ की मुट्ठी कसी और उसे घूरते हुए कहा, "इतना घटिया मैंने सिर्फ़ तुम्हारी वजह से सुना है, वरना कोई मेरे लिए कुछ बोले ना, तो जान से मार दूँ। लेकिन मैं इतनी भी बुरी नहीं हूँ। तुमने हमारी हेल्प की थी ना, उसके बदले मैंने तुम्हारी माँ के ताने सुन लिए। प्लीज़ अब जाने दो ज्ञान, और ध्यान रखना अपना! तुमने मेरी बहुत हेल्प की है, लेकिन तुम्हारी माँ ने मेरे कैरेक्टर पर उंगली उठा दी।"
इतना बोल काशी ने ज्ञान को देखा और उसके हाथ से बैग उठाकर दरवाज़े तक ही आई थी कि तभी उसके कानों में ज्ञान की आवाज़ आई।
"मम्मी ने जो बोला उसके लिए सॉरी, लेकिन मैं सच में तुमसे प्यार करने लगा हूँ। पता नहीं कब और कैसे, लेकिन मुझे तुमसे प्यार हो गया। प्लीज़ काशी, मत जाओ ना…"
काशी ने जैसे ही ज्ञान की बात सुनी, तो उसके हाथ से अपना बैग नीचे गिर गया। उसके कदम एक पल को तो ठिठक गए। उसने पीछे मुड़कर ज्ञान को देखा, तो उसकी आँखों में हल्की नमी साफ़ दिखाई दे रही थी।
काशी ने ज्ञान को देखते हुए कहा, "ये क्या बकवास कर रहे हो? ज्ञान, तुम्हें अच्छे से मालूम है ना मुझे इन सब में कोई इंटरेस्ट नहीं है। अगर तुम्हारी जगह आज किसी और ने मुझे ये सब बोला होता ना, बता दे रही हूँ, चलने और बोलने लायक नहीं छोड़ते! इसलिए अपनी फ़ालतू की बातों को अपने पास रखो, और जो ये फ़ीलिंग मेरे लिए अपने मन में लेकर घूम रहे हो ना, इसे किसी कोने में दफ़न कर देना। तुम्हारे और तुम्हारी माँ दोनों के लिए अच्छा होगा। तुमने मेरी हेल्प हमेशा की है, मैं तो तुम्हें दोस्त से ज़्यादा कुछ नहीं मानती, इसलिए प्लीज़… हमारी दोस्ती तो रहने दो, वरना इस एकतरफ़ा तुम्हारी जो फ़ीलिंग है ना, उसके चक्कर में तुम दोस्ती भी खो दोगे।"
ज्ञान: तुम्हारे मन में कुछ नहीं है ये मैं जानता हूँ काशी, पर मैंने अपने दिल की बात बोल दी है। बस ये चाहूँगा, तुम्हारी लाइफ़ में जो भी आए, तुम्हें बेहद प्यार करे।
काशी: तुम इन सब की फ़िक्र मत करो।
ज्ञान: आगे आकर, "वैसे तुम उस बेचारे को भी पीट दोगी क्या?"
काशी: बिलकुल! पर मेरी लाइफ़ में कोई नहीं आएगा। डोंट वरी! मुझे इस प्यार और शादी दोनों शब्दों से चीड़ है।
ज्ञान: ऐसा जो लोग बोलते हैं ना, उन्हें सबसे पहले प्यार होता है! अब तुम आराम से सोच लो… इतना बोल ज्ञान ने बैग लिया और बाहर आ गया। उसने अपनी आँखों की नमी साफ़ की और बाहर आँगन में लाकर बैग को रख दिया। पास ही में वैदेही खड़ी हुई थी, उसकी आँखों में हल्की नमी थी।
ज्ञान: आंटी, आप मुझे बेटा नहीं मानती ना, तभी तो आप मेरे बोलने पर भी यहाँ नहीं रुकीं।
"हाँ, क्योंकि हमें हमारी इज़्ज़त का फ़ालतूदा नहीं करवाना, क्योंकि तुम्हारी…" काशी ने बाहर आँगन में आते हुए कहा, लेकिन ज्ञान ने उसकी बात को बीच में काटकर कहा।
ज्ञान: हाँ-हाँ! जानता हूँ, आप लोग यहाँ रहोगी तो मेरी माँ के ताने आप लोगों को सुनने पड़ेंगे।
काशी: बड़े समझदार हो… इतना बोल काशी ने अपने छोटे से बैग को कंधे पर रखा और कहा, "मैं ऑटो लेकर आती हूँ मॉम!" इतना बोल काशी जैसे ही जाने को हुई, कि उससे पहले ही ज्ञान ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, "तुम यहीं रुको, मैं लेकर आता हूँ।"
"अब क्या तू निठल्ला हो गया? तुझे कोई काम-धंधा नहीं है क्या? जो तू अब इन लोगों के लिए रिक्शा लेने जाओगे? वैसे भी ये माँ-बेटी बड़ी होशियार हैं, खुद ले आएंगी!"
"देख ताई, मेरी माँ को बीच में मत ला, वरना…" काशी ने उंगली दिखाते हुए कहा।
कमला: वरना क्या? जैसे तू लोगों को पीटती है, मुझे भी पीटेगी क्या?
ज्ञान: (मन में) "ओह गॉड! ये मम्मी थोड़ी देर बाद आ जाती तो क्या गंगा बह जाती! शांत कराओ ना भगवान! और ये लड़की तो पूरे दिन गुस्से में होती है, हर छोटी बात पर गुस्सा! हाए! चुप कराओ इसे कोई! दोनों की दोनों एक जैसी हैं!"
काशी: बिलकुल नहीं! उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, पर हाँ, आपकी सारी बातों का अचार बनाकर आपको खिला दूँगी। इसलिए मेरी माँ के बारे में एक और शब्द मत बोलना, वरना बोलने लायक ही नहीं छोड़ूँगी। बदला तो कहीं भी लिया जा सकता है। तुम मार्केट जाती हो ना सब्ज़ी लेने… इतना बोल काशी टेढ़ा मुस्कुराई, तो ज्ञान और वैदेही को भी हँसी आ गई।
"मैं ऑटो लेकर आता हूँ।" इतना बोल ज्ञान ने काशी को कुछ इशारा किया, तो काशी आँगन में लगी चेयर पर बैठ गई। वैदेही ने बहुत प्यारी पिंक प्लेन साड़ी पहनी हुई थी। उसके खुले बाल उस पर बहुत जच रहे थे। तो वहीं काशी ने ग्रीन शॉर्ट कुर्ता एंड जींस पहना हुआ था, और कुर्ते पर एक जैकेट डाला हुआ था। बालों को खुला किया हुआ था, जो कि उसके कमर से नीचे तक आ रहे थे।
कुछ ही देर में ज्ञान एक ऑटो को लेकर आ गया था। वैदेही ने ज्ञान को देखा और काशी के कंधे पर हाथ रखा, तो काशी भी उठ गई। उसने बैग उठाया और ऑटो में रख लिया। गली में काफ़ी लोग थे, जो दोनों के जाने से खुश थे, तो कुछ दुखी भी थे। एक लड़की जो कि जल्दी-जल्दी भागकर आई और काशी के गले लगते हुए कहा, "तू जा रही है काशी? तूने मुझे बताया क्यों नहीं यार? तू मुझे दोस्त नहीं मानती क्या? तूने एक बार भी बताना ज़रूरी नहीं समझा!"
काशी: पूजा यार, सॉरी! फ़ोन है ना, कॉल कर लेना। मैं हमेशा तुझसे मिलने आऊँगी।
पूजा: झूठी! अभी तो बिना बताए चली जाती। वो तो शुक्र है मुझे ज्ञान भैया मिल गए, तो उन्होंने बता दिया, वरना तू तो चली जाती, और जब मैं फ़ोन करती, तो वहाँ से कहीं से एक सॉरी बोल देती और बोलती, 'यार मैं भूल गई!' मुझे तो तुझसे बात ही नहीं करनी! तू ना दोस्त है ही नहीं… ये सब बोलते हुए, पूजा की आँखों में आँसू आ गए। उसने काशी को देखा और उसके गले लग गई।
To be continue…
कॉमेंट में ज़रूर बताएँ स्टोरी कैसी है… प्लीज़ सपोर्ट भी कर दीजिएगा!
रिया पाराशर