Jindagi (shrap ya vardan) - Chapter 1
यह जान्हवी अग्रवाल की कहानी है, जो मुंबई में मालाड की एक छोटी सी चॉल में रहती थी। जान्हवी बचपन से ही एक आँख से नहीं देख पाती थी। उसकी इस एक आँख से न देख पाने के पीछे भी एक कहानी है। जान्हवी अपने चाचा-चाची के साथ रहती थी। चाचा-चाची की एक बेटी थी, जिसका नाम दिया था। दिया, जान्हवी से उम्र में छोटी थी। जान्हवी की उम्र लगभग सोलह साल होगी। गाँव से जबरन उसे यहाँ लाया गया था, जब वह दस साल की थी। गाँव में वह अपने माँ-बाप के साथ रहती थी। पर एक हादसे ने उससे उसका परिवार छीन लिया। जान्हवी जब दस साल की थी, तब दो परिवारों में हुए घमासान के बीच उसका बचपन तबाह हो गया। उसके पिता की मृत्यु हो गई और उसकी माँ लापता हो गई। वह कहाँ है, उसे आज तक नहीं पता। दस साल की जान्हवी तब गाँव से अपनी जान बचाने के लिए भागी और प्लेटफ़ॉर्म पर लगी एक ट्रेन में बैठ गई। उसे नहीं पता था कि वह ट्रेन कहाँ जा रही है। उसे नहीं पता था कि आगे उसके साथ क्या होगा। उसे नहीं पता था कि ज़िन्दगी उसे कहाँ ले जाएगी। बस अपनी जान इस वक्त बचानी थी उसे, जिनसे वह भाग रही थी। उस वक्त उसने अपनी जान तो बचा ली, पर अपना परिवार उससे छूट गया। यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो जीने के लिए आज भी ज़िन्दगी से जुझ रही है।
जान्हवी अब स्कूल जाने लगी थी। दिया के साथ पढ़ने लगी थी। जिस चॉल में वह रहती थी, उसे झोपड़पट्टी कहा जाता था; स्लम एरिया, जो गरीबी रेखा के नीचे आते हैं; जिन्हें दो टाइम के खाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, ऐसे लोग। छह साल पहले जान्हवी के चाचा, जो उसे यहाँ लेकर आए थे, उसे प्लेटफ़ॉर्म पर मिले थे। वह प्लेटफ़ॉर्म पर अपनी गंदी सी फ़्राक को पैरों तक नीचे खींच कर ठंड से बचने की कोशिश में बैठी थी। आने-जाने वाले लोगों की तरफ़ बड़ी आस लेकर देख रही थी कि कोई उसकी भूख मिटाने के लिए उसे कुछ दे दे। पर जिसकी तरफ़ भी देखती, वह एक घृणा से भरी सरसराती नज़र उसके ऊपर डालकर निकल जाता। और बड़ी आस से उनकी तरफ़ देख रही जान्हवी की नज़रें, उन नज़रों को सह न पाने की वजह से अपने आप नीचे झुक जातीं। जान्हवी की हालत भिखारियों से भी बदतर थी, पर उसे जीना था, कुछ भी हो जाए; अपने खाली पेट को भरना था। इसलिए, साथ बैठे अपने जैसे ही मैले कपड़ों में बैठे लोगों की तरफ़ उसने देखा और हिचकिचाहट के साथ अपना दाहिना हाथ उसने आगे कर दिया।
एक सीट पर अपने सब्जियों से भरे थैले के साथ बैठे, धीरज अग्रवाल जी बोरिवली की ट्रेन के आने का इंतज़ार कर रहे थे। इस वक्त दादर स्टेशन पर बहुत बड़ी भीड़ थी। सुबह का वक्त इस स्टेशन पर ऐसा ही रहा करता था। छोटे-मोटे व्यापारी यहाँ से सस्ते में माल उठाकर उसे अपने यहाँ बाज़ार में ले जाकर बेचते थे। इसलिए धीरज जी भी सब्जियों के बड़े से थैले को अब अपने बाज़ार, जहाँ वो रहते थे, ले जाना चाहते थे। बोरिवली जाने वाली ट्रेन जैसे ही प्लेटफ़ॉर्म पर लगी, धीरज जी थैले के साथ चढ़ने की कोशिश करने लगे। इतने में जान्हवी को किसी आदमी के सामने हाथ फैलाए देखकर उनका थैला नीचे गिर गया और थैले को उठाने के चक्कर में ट्रेन का डिब्बा खचाखच भर गया और वह चाहकर भी उसमें चढ़ नहीं पाए, क्योंकि ट्रेन निकल चुकी थी। धीरज जी थैले को घसीटते हुए जान्हवी जहाँ बैठी थी, वहाँ लेकर आ गए। जान्हवी ने जिसके सामने हाथ फैलाए थे, वह आदमी ट्रेन पकड़ने के चक्कर में बिना पैसे दिए भागते हुए चला गया था और उसके पैर के धक्के से जान्हवी बैठे-बैठे नीचे गिर गई थी। धीरज जी ने हाथ बढ़ाकर उसे बिठाया, तो अनजाने स्पर्श की वजह से जान्हवी पीछे खिसक गई।
"बेटी, डरो मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगा!"
किसी अनजान के मुँह से 'बेटी' शब्द सुनकर जान्हवी की आँख में आँसू भर आए। वह अपनी पनीली आँखों से धीरज जी की तरफ़ देखने लगी। गोरी-चीट्ठी जान्हवी इस वक्त मैले कपड़ों में भी अच्छी दिख रही थी। एक आँख बुरी तरह सूज गई थी, किसी ने बुरी तरह मारा हो जैसे आँख पर। उसे वहाँ दर्द हो रहा था, क्योंकि बार-बार उस आँख पर अपना छोटा सा हाथ रखकर कुछ और न लगे, इसलिए वह उसे बचा रही थी। धीरज जी उसे डरा हुआ देख, पास वाली दुकान से एक वड़ा पाव ले आए। एक पानी की बोतल और वड़ा पाव उसके हाथ में देकर उन्होंने कहा, "कब से बैठी हो यहाँ?"
जान्हवी ने वड़ा पाव को देखकर खाने की चीज़ का अंदाज़ा लगाया और हाथ में पकड़कर खाना शुरू कर दिया। धीरज जी समझने की कोशिश करने लगे कि इस दस साल की बच्ची के साथ ऐसा क्या हुआ होगा जो ऐसे रास्ते पर भीख माँगने के लिए मजबूर हो गई है। पानी पीकर जब जान्हवी को अच्छा लगा, तब उसके सिर पर ममता वाला हाथ फेरकर धीरज जी थैला संभाले जाने के लिए आगे बढ़े। जान्हवी अपनी मायूसी से छोटी हुई आँखें और छोटी कर धीरज जी को जाता हुआ देखने लगी। धीरज जी ने एक बार उसे पलटकर देखा और इस बार खाली डिब्बा होकर भी वह उस लड़की को वहाँ छोड़कर जाने के लिए अपने मन को राज़ी नहीं कर पाए। वापस आकर वह जान्हवी के पास बैठ गए। जान्हवी के पास सिर्फ़ एक थैली थी जिसमें उसने अपने कुछ कपड़े और कुछ सामान रखा था। "बेटी, क्या गाँव से यहाँ आई हो?"
जान्हवी ने कुछ नहीं कहा, पर उसके पास बैठे एक लंगड़े भिखारी ने कहा, "तीन दिन से यहाँ बैठी है। कुछ नहीं बोलती। कहाँ से आई है नहीं बताती। पता नहीं क्या है उसके मन में। बस आने वाले लोगों को देखती रहती है। कल एक लाल साड़ी पहने हुए औरत के पीछे भागी थी। जब उसका चेहरा देखा तो वापस आकर यहाँ बैठ गई। किसी ट्रेन से उतरी थी, पर बात नहीं कर रही। लगता है किसी बात का सदमा लगा हो जैसे।"
"शुक्रिया भाईसाहब! ये कुछ पैसे रख लीजिए! कुछ खा लीजिए आप! इस लड़की को मैं अपने साथ लेकर जाता हूँ। यहाँ इस बच्ची का इस हालत में रहना अच्छा नहीं है। वैसे भी यह बम्बई है! यहाँ लोग आत्मा बेचकर खा जाते हैं, तो इस छोटी बच्ची के साथ क्या होगा!"
जान्हवी ने धीरज जी की तरफ़ देखा तो उन्होंने कहा, "चलो मेरे साथ! मेरी भी एक बेटी है!" जान्हवी अब तक उस आदमी को अच्छा नहीं समझ रही थी, पर 'बेटी' का नाम लेते ही वह उठकर खड़ी हो गई। उसे चलने के लिए राज़ी देख धीरज जी के चेहरे पर राहत के भाव आ गए। अपनी थैली संभाले वह धीरज जी के पीछे-पीछे चलने लगी। उसे ट्रेन में चढ़ाकर धीरज जी अपने थैले को लेकर अंदर आ गए। जान्हवी नीचे बैठ गई, तो धीरज जी ने उसे अपने पास बेंच पर बिठाया। जान्हवी आस-पास के लोगों की तेज नज़रें अपने ऊपर महसूस कर रही थी। धीरज जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, "कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा, मैं हूँ ना तुम्हारे साथ!" जान्हवी अब रिलैक्स होकर बैठ गई, पर सबकी नज़रों का अभी भी सामना नहीं कर पा रही थी।
मालाड स्टेशन पर उतरकर धीरज जी ने थैले को अपने कंधे पर उठा लिया। रिक्शा वाले को देने वाले पैसे वह पहले ही जान्हवी और उस भिखारी पर खर्च कर चुके थे। अब जेब में बस दस रुपये का नोट पड़ा था, जो उन्हें धंधा शुरू करने के वक्त बरकत के लिए अपने पास रखना था। इसलिए उस दस रुपये के नोट को उन्होंने खर्च नहीं किया। थैले को अपने सब्ज़ी बेचने की जगह पर रखकर और रामू काका, जो उनके साथ ही बाज़ार बैठते थे, थैले का ख्याल रखने के लिए बोल, वह जान्हवी को लेकर पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। पुनम जी अपने झोपड़े के बाहर एक पत्थर पर बैठकर चावल बीन रही थीं। धीरज जी को किसी बच्ची के साथ आता देख उन्होंने चावल की थाली नीचे रख दी और धीरज जी को घूरने लगीं। दोनों हाथ कमर पर रखकर पास बह रही नाली में उन्होंने मुँह में चबाया पान थूक दिया। धीरज जी अभी थोड़ी दूरी पर ही थे कि उनकी ज़ुबान तलवार से तेज़ धार की बनकर चलने लगी। "ये दिया के पिताजी, ये किसे उठा लाए हो आप? हमारा घर तुम्हें अनाथ आश्रम दिख रहा है क्या?"
"पुनम जी, धीरे बात कीजिए, बिटिया डरी हुई है और भूखी भी!"
"तो मेरे सिर पर काहे लेकर आए हो नचाने? पता नहीं किसका गन्दा खून है! एक मेरे ही मर्द को राम जी का भूत काटा था क्या, दयावान होने का? हम कह दे रहे हैं, इस भिखारिन को अपने घर में नहीं रखेंगे, मतलब नहीं रखेंगे!"
"जाओ पहले पानी तो पिलाओ! बाकी का झगड़ा बाद में कर लेना हमसे! दुकान बिना खोले आए हैं, वापस भी जाना है हमको!"
पुनम जी बड़बड़ाते हुए अंदर चली गईं और पीने का पानी लाकर उन्होंने लोटा धीरज जी के हाथ में थमाया। बहुत देर से पुनम जी की तरफ़ देख रही जान्हवी धीरज जी के पास छिपकर बैठ गई, ताकि पुनम जी उसे देख न सकें। धीरज जी पानी पीकर अंदर चले गए। दिया अभी सो रही थी। धीरज जी ने चूल्हे पर चढ़ाया गरम पानी अपने दुपट्टे से उतारा और पर्दा लगाकर रखे एक छोटे बाथरूम में रखे बाल्टी में वह पानी डाल दिया। बाहर आकर जान्हवी का हाथ पकड़कर वह अंदर ले गए। अपने हाथों से उसे नहलाकर उन्होंने उसके शरीर पर लगा मैल धो दिया। नहाने के बाद दिया के कपड़े उन्होंने जान्हवी को पहनने के लिए दे दिए। जान्हवी जब बाहर आई, तब तक पुनम जी दूसरा पान मुँह में डाल चुकी थीं। पुनम जी ने जब गोरी-चीट्ठी जान्हवी को देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने धीरज जी के पास खिसकते हुए कहा, "कहाँ से लेकर आए हो इस लड़की को आप? कहीं से उठाकर तो नहीं लेकर आए! लड़की अच्छे घर से लगती है! हमें पुलिस का कोई चक्कर नहीं चाहिए, बता दें रहे हैं?"
"अरे बच्ची दादर स्टेशन पर भीख माँग रही थी! भूखी थी! हमें दया आ गई इसलिए यहाँ उठाकर लेकर आ गए! आप भी ना हमेशा करेले की तरह ज़हर उगलती रहती हो!"
"हम्म... अभी के लिए रहने दें रहे हैं इसे! बाद में इसे किसी आश्रम में छोड़ आइएगा, हम इस लड़की को अपने साथ नहीं रख सकते!"
"बच्ची को हम पालने वाले हैं! आपको क्या दिक्कत होने वाली है! आप बस अपनी बेटी पर ध्यान दीजिए!"
धीरज जी ने बड़े प्यार से जान्हवी की तरफ़ देखा। "यहाँ आओ बेटी! देखो ये पुनम चाची हैं! आज से तुम हमारे साथ रहोगी! ये जो अंदर सो रही है, वो दिया है, हमारी बेटी! आज से तुम भी हमारी बेटी हो! तुम मुझे चाचा बुलाना, ठीक है? तुम्हें भूख लगी है ना?" धीरज जी ने कढ़ाई के पास जाकर उसमें रात का रखा हुआ चावल मिलाया और उसे गरम करके जान्हवी को परोस दिया। "तुम ये खाकर यहीं सो जाना! मैं दोपहर को खाना खाने आऊँगा! फिर तुम मुझे अपने बारे में बताना, ठीक है!" धीरज जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा और बाहर चले गए। जाते वक्त उन्होंने पुनम जी की अच्छे से क्लास ले ली। "अगर उस बच्ची को डराया-धमकाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा पुनम जी! इसलिए, कुछ भी कहने से पहले दस बार सोच लीजिएगा!" कहकर वह दुकान पर चले गए। धीरज जी के जाते ही पुनम जी अंदर आ गईं। उस लड़की की एक आँख पर लगी चोट देखकर उनका दिल पसीज गया। उसे जानवरों की तरह खाता देख उन्होंने टोका। "ऐसे लालचीयों की तरह खाता है क्या कोई? अच्छे से बैठकर और अपनी उंगलियों का इस्तेमाल करके खाओ! इस थैली में क्या है?" पुनम जी ने थैली खोलकर देखनी चाही, पर जान्हवी उनके हाथ से थैली खींचकर कोने में जाकर बैठ गई। उसने दूसरी ओर मुँह कर लिया था। पुनम जी उसे देखती रह गईं।
जारी!