Jindagi (shrap ya vardan) Ch. 2

Jindagi (shrap ya vardan) - Chapter 2

Posted by Hinal Vaidya • Mar 11, 2025 01:44 PM

पुनम जी जान्हवी को इस तरह वो थैली खींच कर दूसरी तरफ जाते देख चौंक गईं। "कैसी लड़की हो तुम??? मेरे पति ने तुम्हारी इतनी मदद की!! तुम्हें घर लेकर आए... और तुम हो कि इस थैली में रखी चीज भी दिखाने के लिए नाटक कर रही हो!! हमने सही सोचा था तुम्हारे बारे में!! इतनी सी हो... लेकिन बहुत चालाक हो तुम लड़की!! अब तो मैं देखकर रहूंगी इस थैली में क्या है??? लाओ दिखाओ मुझे...!!"

पुनम जी वो थैली लेने उसके पास पहुंचीं तो जान्हवी ने थैली को अपने पीछे छुपा लिया। पुनम जी ने वह थैली फिर भी उसके पीछे से खींच कर नीचे जमीन पर उंडेल दी। उसमें एक लाल साड़ी, एक खत, और दो हरी चूड़ियों के अलावा कुछ नहीं था। पुनम जी ने जान्हवी की तरफ देखा, जो खड़ी रहकर आँसू बहा रही थी। वह वहाँ से भागते हुए आई और उसने वो सारा सामान वापस उस थैली में डाल दिया।

पुनम जी ने उसकी एक सूजी हुई आँख की तरफ देखकर पूछा, "यह आँख को क्या हुआ तुम्हारी??? किसी ने मारा था क्या???"

जान्हवी पीछे खिसक गई और अपनी आँख पर हाथ रख उसने उस आँख को छुपा लिया। पुनम जी बड़बड़ाते हुए बाहर चली गईं। "अजीब लड़की है...??? कुछ बोलती ही नहीं!! कुछ भी पूछो... बस मुँह ताकती रहती है!! आखिर हुआ क्या होगा उसके साथ???"

पुनम जी ने साथ वाली झोपड़ी में रहने वाली लाली को आवाज लगाई, "ए लाली... इधर आओ... बनिये की दुकान से पान ले आओ हमारे लिए!!"

लाली, जो छोटी स्कर्ट पहने हुए थी, बालों को खुला छोड़ रखा था जो कि झाड़ू की तरह इधर-उधर फैले हुए दिख रहे थे, और ऊपर की कमीज फटी होने के बावजूद पहन रखी थी, पुनम जी के सामने आकर खड़ी हो गई।

लाली: "पुनम मौसी... तुम्हारे घर पर मेहमान आई है ना... उसकी आँख को क्या हुआ??? उसके बाबा ने दारू पीकर मारा था क्या???"

पुनम जी: "तुमको क्या करना है जानकर लाली देवी!! जो काम दिए हैं वो करके आओ पहले!! उसके बाबा ने मारा हो या अम्मा ने... हमको कुछ लेना-देना नहीं है!!"

लाली चुपचाप डाँट खाकर पान लेने चली गई। दिया के पास अपनी थैली हाथ में कसकर पकड़कर जान्हवी सो गई। तीन दिन से एक जगह अकड़ कर सोने की वजह से उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी और भीख माँगने के लिए एक जगह पर बैठने की वजह से ज़्यादा सो भी नहीं पाई थी। दिया के पास चादर पर शरीर को पसारते ही उसे नींद आ गई। शरीर को गोलाकार में कर उसने पैरों को पेट के पास कर दिया था ताकि उसे कहीं लगे नहीं।

दोपहर को जब धीरज जी घर आए, तो उन्होंने चैन से सोती जान्हवी को देखा और उसके पास गरम तेल की कटोरी लेकर वो बैठ गए। उन्होंने उस कटोरी से गरम तेल अपने हाथ पर लिया और जान्हवी की सूजी हुई आँख पर हल्के से लगाने लगे। गरम तेल से मालिश करने पर जान्हवी को आराम मिल रहा था। फिर ज़्यादा दर्द होने पर वो अचानक से उठकर बैठ गई। उसे डरा हुआ देखकर धीरज जी ने कहा, "डरो मत बेटा... देखो तेल लगाने से तुम्हारी ये आँख जल्दी ठीक हो जाएगी!!"

धीरज जी की बात सुनकर दिया उठ गई। अपने सामने एक दूसरी लड़की को बैठा देखकर वो भागते हुए अपने बाबा के पास चली गई। "बाबा यह कौन है??? और हमारे घर में क्या कर रही है???"

धीरज जी: "दिया बेटा, उठ गई तुम!! देखो ये दीदी है!! अभी मुझे इसका नाम नहीं पता... तुम पूछकर देखो... शायद तुम्हें बता दें!!"

दिया धीरे से जान्हवी के पास आकर बैठ गई। "दीदी... तुम्हारा नाम क्या है??? बाबा तुम्हें यहाँ क्यों लेकर आए हैं??? क्या तुम हमारे साथ रहोगी???"

जान्हवी दिया की बातें सुनकर हँस दी। उसने पहली बार अपने मुँह से शब्द निकाला। "मेरा नाम जान्हवी है!! मैं यहाँ खो गई हूँ!! मैं गाँव से यहाँ आई थी... उन लोगों से बचने के लिए!!"

धीरज जी जल्दी से उठकर उसके पास आ गए। "कौन से लोग??? क्या किसी ने तुम्हें मारा??? क्या तुम अकेली आई हो यहाँ???"

जान्हवी: "हाँ!!! अकेली आई हूँ!! उन्होंने बाबा के सीने में चाकू मारा था!! और माँ को कहीं लेकर जा रहे थे... फिर माँ जब वहाँ से भागी... उन्होंने मुझे पकड़कर पीटा!! और मेरी आँख पर लोहे के डंडे से मारा!! मैं वहाँ से भागी किसी तरह और फिर ट्रेन में छुपकर बैठ गई!! जब उतरी तो लोग ही लोग थे!! कहाँ जाना है... मुझे पता नहीं था इसलिए स्टेशन पर ही बैठ गई!! भूख लगी थी तो लोगों से खाने के लिए माँगने के लिए मैंने अपने हाथ आगे कर दिए!! क्योंकि जो पास वाले बाबा थे!! उन्हें इसी तरह खाना मिल जाता था!!"

धीरज जी उस बेसहारा बच्ची की बात सुनकर दुखी हो गए। कैसे लोग होंगे वह... जिन्होंने इतनी छोटी सी बच्ची पर हाथ उठाया!! लोहे के डंडे से उसकी नाज़ुक आँख पर वार किया!! "क्या तुम्हें अभी भी दर्द हो रहा है आँख पर?? तुम देख पा रही हो इस आँख से???"

जान्हवी ने कहा, "नहीं चाचा... मैं इस आँख से उसी दिन से देख नहीं पा रही हूँ!!"

धीरज जी: "दिया... आज से जान्हवी दीदी हमारे साथ रहेंगी!! तुम इसका ख्याल रखोगी ना??? और जान्हवी... अच्छा हुआ तुमने मुझे सब बताया!! वरना मैं परेशान हो गया था तुम्हारे साथ क्या हुआ है सोचकर!! अब तुम आराम करो!! जब मैं शाम को लौटूँगा... यहाँ पास वाले सरकारी अस्पताल में ले चलूँगा!! तुम्हारी आँख का इलाज कर देंगे वह लोग!!"

पुनम जी: "आज तक मुझे ले गए हो कभी अस्पताल...? यह लड़की आई नहीं कि इसकी सेवा में लग गए!! सुन लिया मैंने सब!! जब इसे मार रहे थे गाँव के लोग... तो ज़रूर इन्होंने बहुत बड़ा पाप किया होगा!! जिसकी वजह से इसकी अम्मा भाग गई!! देखिए... हमें किसी झमेले में नहीं पड़ना!! आप इस लड़की को पुलिस के हवाले करके आओ!! वह लोग देख लेंगे!! इसके साथ क्या करना है!!"

जान्हवी जोर से अपनी गर्दन ना में हिलाने लगी। "चाचा मुझे पुलिस के पास मत लेकर जाओ!! मुझे नहीं जाना!! वह लोग मुझे ढूँढ रहे होंगे!! वह मुझे मार डालेंगे!! मुझे वहाँ नहीं जाना!! पुलिस के पास नहीं जाना!!"

धीरज जी जान्हवी को डरता देख समझ गए। ज़रूर उसने जो कुछ भी हुआ उसे अपनी आँखों से देखा है। जान्हवी की ओर देख उन्होंने कहा, "बेटी तुम दिया के साथ बाहर जाओ!! मुझे पुनम जी से कुछ बात करनी है!!"

दिया अपने बाबा की बात समझ गई। उसने जान्हवी का हाथ खींचना शुरू कर दिया। "चलो दीदी... हमें बाहर जाना चाहिए!! जल्दी चलो!!"

दिया जान्हवी का हाथ खींचकर उसे बाहर ले गई। दिया आठ साल की प्यारी बच्ची थी, बहुत ही समझदार। उसे पता था बाबा और माँ के बीच जब भी झगड़ा शुरू होता बाबा उसे बाहर जाकर खेलने के लिए बोल देते थे और वो अक्सर इस झगड़े को बाहर से सुनती थी। दिया ने जान्हवी का हाथ पकड़कर खींचा क्योंकि वो जानती थी अब भी वैसा ही कुछ होने वाला है। दोनों बाहर आ गईं। एक पेड़ के पास दोनों बैठ गईं। इस पेड़ से लगकर ही दोनों की झोपड़ी थी। झोपड़ी की दूसरी ओर जीतू और उसकी गैंग बैठी थी। दिया ने जान्हवी से कहा, "दीदी उधर उनकी तरफ मत देखो!! वह अच्छे लड़के नहीं हैं!! माँ कहती हैं वो सब के सब गुंडे हैं..!! और लोगों के यहाँ चोरी करते हैं!!"

जान्हवी फिर डर गई। उसने अपनी नज़रें फेर लीं और वो दूसरी तरफ देखने लगी।

जीतू के दोस्तों की नज़र दिया के पास खड़ी जान्हवी पर गई। उनमें से एक लड़के ने दिया से पूछा, "दिया तुम्हारे यहाँ मेहमान आई हैं... तुमने हमें बताया नहीं???"

दिया ने गुस्से से कहा, "मेरी मौसेरी बहन है, गाँव से आई है!! और कुछ जानना है तुम्हें भैय्या???"

दिया के "भैय्या" बोलते ही साथ खड़े लड़के हँसने लगे, जिनमें जीतू भी था। दिया जान्हवी को लेकर मंदिर की तरफ चली गई। जीतू इस वक़्त जान्हवी की उस आँख को देख रहा था जो सूजन की वजह से लाल दिख रही थी। जब जान्हवी उन सबकी बगल से गुज़री, जीतू ने पहचान लिया... उसकी आँख पर मार का निशान है। तेरह साल का जीतू उम्र में बस तेरह साल का था, लेकिन जन्म से बहुत होशियार था। पिता के गुज़रने के बाद स्कूल को हमेशा के लिए राम-राम ठोककर गुंडागर्दी करने लगा था। ग़लत संगत में ग़लत काम करने लगा था और इस बात का उसे कोई खेद नहीं था। वह और उसके आवारा दोस्त दिन भर यहाँ-वहाँ घूमते और शाम होने पर चोरी-चकारी करने निकल पड़ते। चुराया हुआ सामान चोर बाज़ार में बेचकर दोगुनी कीमत वसूलते। जीतू का ख़ास दोस्त था बिहारी। बिहार से था तो सब बचपन से उसे बिहारी बुलाते, उसका नाम यही पड़ गया उसके बाद। आज तक उसका असली नाम जीतू के अलावा कोई नहीं जानता था। जीतू ने जैसे ही गौर किया कि जान्हवी की आँख पर मार का निशान है, वह समझ गया दिया उनसे झूठ बोल रही है, पर उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। किसी दूसरे के फटे में टांग अड़ाने वालों में से नहीं था वह।

जान्हवी और दिया मंदिर की सीढ़ियों पर आकर बैठ गईं। दिया ने जान्हवी की आँख की तरफ देखकर कहा, "दीदी तुम्हें दर्द नहीं हो रहा!! मुझे तो देखकर ही रोंगटे आ रहे हैं!!"

"दर्द हो रहा है दिया, पर मैं उसे सहने की कोशिश कर रही हूँ!! तुम्हारे बाबा बहुत अच्छे हैं..!! जो मुझे... जिनसे उनका कोई नाता नहीं... यहाँ ले आए!! मुझे अपने घर में पनाह दी!! आजकल तो लोग बिना मतलब के किसी को भीख भी नहीं देते... कुछ दिनों में ही पता चल गया मुझे!! पता नहीं... अब मेरी किस्मत मुझे कहाँ ले जाए???"

"दीदी यहीं रहो ना हमारे साथ!! मुझे बहुत अच्छा लगेगा!! वैसे भी हम दोनों बहनें दिखती हैं... देखो!!"

दिया ने उसके चेहरे के पास अपना चेहरा ले जाकर कहा। जान्हवी उसकी नादानी पर हँस पड़ी। पर वह जानती थी... दिया के माँ-बाबा उसे घर में रखने की बात पर लड़ रहे थे अंदर!! जिसकी आवाज़ें उसे यहाँ आने से पहले सुनाई दी थीं। वह परेशान थी अब यहाँ से कहाँ और कैसे जाए???

कुछ देर बाद जब दिया ने उससे कहा, "दीदी घर चलो!!", तो उसने यह कहकर मना कर दिया वो मंदिर में और कुछ देर बैठना चाहती है।

"दिया तुम घर जाकर देखकर आओ!! सब ठीक है या नहीं!! तब तक मैं यहाँ रुकती हूँ!! और तुम मुझे लेने आना उसके बाद हम घर चलेंगे!!"

"दीदी यहाँ से कहीं मत जाना... मैं अभी वापस आती हूँ, ठीक है!!"

दिया दौड़ते हुए अपनी झोपड़ी की ओर निकल गई। जान्हवी ने अपनी थैली की ओर देखा जिसमें उसकी माँ की यादें थीं। वो आते वक़्त भी थैली को उठा लाई थी। उसने उठकर भगवान की मूर्त को प्रणाम किया और दिया जिस ओर गई थी उसकी उल्टी दिशा में चलने लगी।

धीरज जी पुनम जी को घर से बाहर निकाल चुके थे, उनकी ज़िद के कारण। जब दिया घर पहुँची अपनी माँ को अटैची के साथ बाहर खड़ा देख उसने बाबा से पूछा, "क्या हुआ बाबा... माँ इस तरह सामान के साथ बाहर क्यों खड़ी है???"

धीरज जी ने देखा दिया अकेली थी, उसके साथ जान्हवी को ना पाकर वो घबरा गए। "जान्हवी कहाँ है बेटा???"

"दीदी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी है, उसने मुझे घर जाकर देखने को कहा था... इसलिए मैं यहाँ आ गई!!"

धीरज जी सुनते ही मंदिर की तरफ दौड़ पड़े। उन्हें लगा जान्हवी पुनम जी के तीखे रवैये से परेशान होकर चली गई। वह जब मंदिर के पास पहुँचे, जान्हवी वहाँ नहीं थी। उन्होंने वहाँ एक भिखारी से पूछा, "भैय्या आपको एक लड़की दिखी यहाँ??? अभी इस बच्ची के साथ यहाँ बैठी थी???"

"हाँ... एक लड़की बैठी थी इस लड़की के साथ, फिर इस छोटी बच्ची के जाने के बाद वह इस तरफ चली गई!!"

उस भिखारी बाबा की बात सुनकर धीरज जी उस तरफ दौड़ पड़े। उन्होंने देखा जान्हवी अंधेरे से डरते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। सामने रास्ता था, पर उसके लिए तो अब सारे रास्ते एक समान थे। जाना कहाँ है यह तक उसे पता नहीं था। फिर भी किसी और को अपने वजह से असुविधा ना हो, इसलिए वो आगे निकल गई थी। धीरज जी ने उसे देखा तो उन्हें तसल्ली हुई और उनके पीछे आई दिया ने जोर से आवाज लगाई, "जान्हवी दी... रुक जाओ!!"

जारी!!!

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