Jindagi (shrap ya vardan) - Chapter 3
दिया की आवाज़ सुनकर जान्हवी समझ गई कि दिया उसे ढूँढती हुई आई है। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी चाल तेज कर दी। धीरज जी समझ गए कि जान्हवी रुकने वाली नहीं है। इसलिए वे तेज दौड़ पड़े। उन्होंने तेज भागकर जान्हवी को पकड़ लिया। दिया भी भागकर उन दोनों के पास पहुँच गई। दोनों को हांफते देख जान्हवी को बुरा लगा।
"चाचा, मेरा यहाँ से जाना ही ठीक है, मैं अपनी वजह से चाची और आपके बीच झगड़े का कारण नहीं बनना चाहती। आप जाने दीजिये मुझे! कहीं न कहीं तो कोई जगह होगी जो मेरे रहने लायक होगी। अगर भगवान ने ज़िन्दगी दी है, तो मेरे लिए कुछ सोच भी रखा होगा ना!"
उसकी बात सुनकर धीरज जी उसकी तरफ़ हैरानी से देखने लगे। सिर पर छत नहीं थी, माँ-बाप का साया सिर से उठ चुका था। कहाँ जाएगी, क्या करेगी, यह तक पता नहीं था, फिर भी उसकी समझदारी दूसरे लोगों से कितनी अच्छी थी! कितनी जल्दी समझ गई थी वह कि उसकी वजह से उन पति-पत्नी के बीच झगड़ा हो रहा था!
धीरज जी: "मैं तुझे कुछ दिखाता हूँ, चल! दिया, मेरे पीछे ही रहना तुम!"
धीरज जी झोपड़पट्टी के बाहर कचरे के पास बैठे कुछ लोगों के पास उसे लेकर आ गए।
"जान्हवी, ये लोग कचरा उठाते हैं दिन भर और शाम को कचरे वाले को बेचकर जो भी मिलता है उसे खाकर इसी कचरे में आकर सो जाते हैं! क्या तुम ऐसी ज़िन्दगी जीना चाहती हो? मैं मानता हूँ तुम मुझ पर बोझ नहीं बनना चाहती, पर ये दुनिया किसी को सिर उठाकर जीने नहीं देती, किसी की परवाह नहीं करती। जीने के लिए, अपनी पहचान बनाने के लिए झगड़ना पड़ता है और मैं तुम्हें वो पहचान देना चाहता हूँ, बेटा! तुम जैसी प्यारी बच्ची, जो इतनी समझदार है, मैं उसके साथ कुछ ग़लत नहीं होने देना चाहता। पुनम जी मुँहफट हैं, ज़िद्दी हैं और थोड़ी गुस्सैल भी, पर मैं उन्हें भी आज तक छोड़ नहीं पाया, तो तुम्हें कैसे छोड़ दूँ? मैं तुम्हें यहाँ लेकर आया था, बेटा! तुम मेरी दिया की तरह ही मेरी बेटी हो! मत जाओ बच्चे! मुझे अच्छा नहीं लगेगा!"
जान्हवी उन कचरे में पड़े लोगों की तरफ़ देख अपने माँ-बाप को याद करने लगी, जिन्होंने कितने लाड़-प्यार से उसे पाला था! उसकी हर ख्वाहिश पूरी की थी! उनकी याद आते ही जान्हवी नीचे बैठकर रोने लगी। धीरज जी ने अपने दोनों हाथ उसके कंधे पर रखकर कहा,
"आज से मैं तुम्हारी माँ और बाबा दोनों हूँ, बेटा! ऐसे रोओ मत! मैं जानता हूँ उन दोनों की कमी मैं पूरी नहीं कर सकता, पर मैं तुम्हें वो हर खुशी देने की कोशिश करूँगा जो मैं अपनी बेटी दिया को दूँगा!"
धीरज जी की बात सुनकर जान्हवी उठकर खड़ी हो गई और उनसे लिपटकर रोने लगी। दिया को समझ में कुछ नहीं आया था, पर जान्हवी को बाबा से लिपटते देख वो भी उनसे जाकर लिपट गई। दोनों बेटियों को अपने इर्द-गिर्द देख धीरज जी को तसल्ली हुई कि अब जान्हवी वहाँ से नहीं जाएगी।
पिछली गली से जीतू और उसके दोस्त चोरी करते हुए भाग रहे थे। वॉचमैन ने उनके पीछे दौड़ लगाई थी, तो वह भागते-भागते धीरज जी के पीछे से जाकर छुप गया। उसके सारे दोस्त तितर-बितर हो गए थे, सारे जाकर कहीं न कहीं छुप गए थे। बस जीतू ही अपने आपको धीरज जी को देखकर उनके पीछे छिपने की कोशिश करने लगा। लड़कियाँ डर गईं। वॉचमैन धीरज जी के पास आकर खड़ा हो गया।
"सुनो, तुमने यहाँ से किसी को भागते देखा क्या? किस तरफ़ गया वह?"
धीरज जी: "वो उस ओर गया है, लेकिन हुआ क्या?"
वॉचमैन: "कुछ लड़के चोरी कर के भागे हैं, पिछली बिल्डिंग के हिस्से से! पुलिस को फोन किया है, आती ही होगी! उस तरफ़ ना... मैं अभी देखकर आता हूँ!"
वॉचमैन अपना डंडा लेकर उस तरफ़ चला गया। तब धीरज जी जीतू की तरफ़ मुखातिब हुए।
"जीतू, कितनी बार कहा है ये चोरी-चकारी करना छोड़ दो! अच्छी शक्ल और परिवार है, उनका तो ख्याल करो! तुम्हें अगली बार बचा नहीं पाऊँगा मैं! इससे अच्छा पढ़ाई क्यों नहीं करते?"
"काका, रहने दीजिये ना? अब आप भी भाषण शुरू मत कीजिये! वैसे आपका फैमिली ड्रामा अच्छा था! आप लोग शुरू कीजिये, मैं चलता हूँ! और हाँ, मदद के लिए शुक्रिया! आपका ये एहसान उधार रहा मुझ पर!"
जीतू जल्दी से कचरे वाली दीवार से लगी काँटे की तार से उस तरफ़ कूद गया। अपनी जेब से सिगरेट निकालकर उसने जलाई और उसका कश भरकर जान्हवी की तरफ़ देखने लगा, जो पहली नज़र से ही कुछ अटक सी गई थी मन में। उसकी वो सूजी हुई आँख, उस पर तरस खाने के लिए मजबूर कर रही थी। वहीं दूसरी तरफ़ जान्हवी धीरज जी के सामने छुपी हुई थी। जीतू के दीवार के पीछे कूदते ही वो धीरज जी के पीछे छुप गई, जबकि दिया अपने दोनों हाथ कमर पर रखकर जीतू को घूर रही थी। दिया ने आखिर कह ही दिया,
"ऐसे क्यों देख रहे हो मेरी दीदी की तरफ़? मैं पुलिस को बता दूँगी तुम यहाँ छुपे हुए हो!"
जीतू ने मुस्कुराते हुए कहा,
"इतनी सी हो, पर ज़बान कैसे चलती है तुम्हारी! काका अपनी बेटी को भी कुछ अच्छी बातें सिखा दीजिये! उसके काम आएंगी!"
कहकर जीतू, पुलिस की सीटी की आवाज़ आते ही वहाँ से भाग गया। जान्हवी अब भी छुपकर उसे देख रही थी। धीरज जी ने दिया को डाँटा,
"दिया, ऐसी बातें नहीं करते हैं! वो बड़ा है तुमसे! तुम इस तरह उससे कैसे बात कर सकती हो?"
दिया: "लेकिन बाबा, वो दीदी को परेशान कर रहा था! दीदी डर रही थी उससे!"
धीरज जी: "अभी दीदी उसे जानती नहीं है ना! जब दीदी उसे जानने लगेगी तब नहीं डरेगी! ठीक है! चलो अब घर चलते हैं! बहुत देर हो गई है!"
धीरज जी दोनों बच्चियों को लेकर घर आ गए। पुनम जी अब भी झोपड़ी के बाहर पत्थर पर अपनी सूटकेस के साथ बैठी हुई थीं। धीरज जी के साथ जान्हवी को वापस आता देख उन्हें अच्छा नहीं लगा, पर अब घर के अंदर जाने के लिए उन्हें धीरज जी की ये बात माननी ही थी। धीरज जी ने अंदर जाते वक़्त उन्हें बुला लिया,
"पुनम जी, अंदर आ जाइए! आप चाहें तो अंदर आकर मुझ पर गुस्सा निकाल सकती हैं!"
पुनम जी जानती थीं कि धीरज जी उन्हें घर के अंदर ज़रूर बुलाएँगे, इसलिए वे वहाँ से गई नहीं थीं। वहीं खड़ी रहकर इंतज़ार कर रही थीं। जैसे ही उन्होंने आवाज़ लगाई, वह सूटकेस के साथ अंदर आ गई और घर में रखे स्टोव्ह पर उन्होंने चावल के लिए पानी चढ़ा दिया। जान्हवी एक कोने में बैठी टुकुर-टुकुर सब देख रही थी। दिया अपनी किताबें लेकर उसके पास बैठ गई और किताब के अक्षर उसे पढ़कर सुनाने लगी। धीरज जी हाथ-पैर धोकर उन दोनों के पास बैठ गए। फिर उन्हें याद आया कि जान्हवी की आँख के लिए उन्हें अस्पताल जाना था, जो आज की भागदौड़ में रह गया। वो उठकर हल्दी का लेप गर्म कर ले आए। उन्होंने अपने हाथ पर वो थोड़ी सी गर्म हल्दी लेकर जान्हवी को लेटने को कहा और धीरे-धीरे उसकी आँख को सेंकने लगे। उनके इस मालिश से जान्हवी को बहुत राहत मिल रही थी, पर उस आँख से अब भी कुछ देख नहीं पा रही थी। पुनम जी ने दाल-चावल सबके लिए थाली में परोस दिया। खा-पीकर सब सो गए और धीरज जी अस्पताल के लिए पैसों की जुगाड़ के बारे में सोचने लगे। उन्होंने जान्हवी को दिल से अपनाया था, अपनी बेटी की तरह उसकी भी अब फ़िक्र होने लगी थी उन्हें। थके होने के कारण अब उन्हें नींद आ गई, उन्हें पता भी नहीं चला।
दूसरे दिन धीरज जी फिर सब्ज़ी लेने चले गए। जान्हवी और दिया उठकर खेलने लगीं और पुनम जी घर के कामों में बिजी हो गईं। पुनम जी अब अपना लिया था कि जान्हवी को भी उन्हें साथ ही लेकर चलना है। अभी वो छोटी थी तो धीरे-धीरे वो उसे घर के सारे काम सिखाने लगी। जान्हवी ने भी सारे काम करना सीख लिया। जब धीरज जी उसे अस्पताल ले गए तब पता चला आँख की पुतली नष्ट होने के कारण वह कभी देख नहीं पाएगी। डॉक्टर ने दूसरी नकली आँख लगवाने के लिए कहा, पर जान्हवी ने मना कर दिया। उसे उस हिस्से को और तकलीफ़ नहीं देनी थी, जो पहले ही बहुत दर्द सह चुका था। जान्हवी की आँख अब ठीक होने लगी थी, आस-पास की सूजन चली गई थी, भले ही वह देख नहीं सकती थी, फिर भी उसकी आँख की तरफ़ देख कोई कह नहीं सकता था कि वह उस आँख से देख नहीं सकती। उसने इसी को अपना नसीब मान लिया था अब। धीरज जी ने उसे दूसरी आँख के लिए मनाने की बहुत कोशिश की, पर एक तो पैसे, और दूसरा वह दर्द झेलने को तैयार ना होने के कारण उसकी आँख वैसे ही रही। धीरज जी ने दिया के साथ उसका भी दाखिला स्कूल में करवा दिया। जान्हवी पढ़ने-लिखने लगी। पुनम जी आश्रित जैसा व्यवहार करती, उसे वह बुरा नहीं मानती थी, उनके स्वभाव की अब आदत सी हो गई थी उसे, पर धीरज जी से बहुत स्नेह था, एक सगे पिता की तरह वह उसकी देखभाल करते और दिया की तरह ही उसे प्रेम करते।
दिन गुज़रते गए। जान्हवी अब सोलह साल की हो गई। वह दिया के साथ ही स्कूल जाती। यह उसका दसवीं का साल था। यहाँ तक आने के लिए बहुत पढ़ाई की थी उसने और अब दसवीं कक्षा में भी उसे पास होना था। स्कूल से किताबें मिल चुकी थीं और पुराना यूनिफ़ॉर्म अब भी चल सकता था। वो पढ़ाई में इतनी भी अच्छी नहीं थी, पर धीरज जी का विश्वास टूटने नहीं देना चाहती थी। उसे चाचा की नज़रों में पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी करते दिखना था, इसलिए वह खूब मेहनत कर रही थी। पर आज तक जो हमने सोचा है, वैसा कभी हुआ है? यह ज़िन्दगी है, जो हर दिन नए इम्तिहान लेती है। जान्हवी की ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह बदलने वाली थी और किस्मत उसे कहाँ ले जाएगी, ये किसी को पता नहीं था।
स्कूल में हर दिन जाना, फिर अपनी सहेली किर्ती के साथ लाइब्रेरी में पढ़ाई करना और फिर दिया और किर्ती के साथ घर आना, जान्हवी इन सब में बहुत बिजी हो गई थी। एक दिन ऐसे ही वो स्कूल के लिए निकली थी कि जीतू के पीछे कुछ लोगों को दौड़ते देख उसके कदम रुक गए। जीतू के पीछे दौड़ने वाले लोगों में से एक के हाथों में बड़ा छूरा देख उसके पैर काँपने लगे। किताबें नीचे गिर गईं। उसने पीछे मुड़ना चाहा, पर वो पैर ही नहीं उठा रही थी डर के मारे। उसने आँखें बंद कर लीं। जीतू उसी की तरफ़ दौड़ते हुए चला आया था! दो चोटियों में खड़ी काँपती जान्हवी को देख उसके पास पहले पहुँचे हुए आदमी को उसने पेट में बिना मुड़े ही घूँसा मार दिया। वो धीरे-धीरे नीचे बैठकर ज़मीन पर ढेर हो गया। जीतू अब भी जान्हवी को देख रहा था, जो आँखें बंद कर उन सबके पास से गुज़रने का इंतज़ार कर रही थी। जान्हवी ने उस आदमी के कराहने की आवाज़ सुनकर आँखें खोलीं और जीतू को अपने सामने खड़े देखकर उसकी बोलती बंद हो गई। उसकी आँखें भर आईं और आँसू बिना किसी शोर के बहने लगे। जीतू ने मुड़कर सारे लड़कों की ताबड़तोड़ पिटाई कर दी। छुरे वाले लड़के के हाथ को ज़ोर से पकड़कर उसने उसका हाथ मरोड़ दिया। वो आदमी दर्द से कराहने लगा तो जान्हवी ने अपने कानों पर हाथ रख लिए। जीतू ने जान्हवी की किताबें उठाकर उसका हाथ पकड़ा और उसे स्कूल के पास खींचकर ले गया। जान्हवी उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगी। उसे एक पेड़ के पास खड़ा कर जीतू चिल्लाया,
"तुम्हें समझ नहीं आता जब कोई झगड़ा चल रहा हो तो वहाँ खड़े नहीं रहते! तुम अभी भी बच्ची हो क्या? वहाँ रोने से अच्छा होता तुम यहाँ भागकर आ जाती!"
जान्हवी ने काँपते हुए हाथों से किताबें उठाईं, तो वे फिर गिर गईं। जीतू ने अपने आपको शांत कर उसकी किताबें उठाईं और उसके हाथ में रख वह वहाँ से बिना कुछ बोले चला गया। सिसकती जान्हवी उसे जाता हुआ देखने लगी।
जारी!!!