Contract Marriage with My Boss Ch. 3

Contract Marriage with My Boss - Chapter 3

Posted by Simran Ansari • Mar 15, 2025 05:26 PM

सुहानी को इतनी उत्साहित देखकर निकिता ने उसे सच याद दिलाते हुए कहा, "अच्छा, तो तुझे क्या लगता है? तेरी लाइफ बहुत आसान होने वाली है उस DSR के घर में जाने के बाद..."

निकिता की यह बात सुनकर सुहानी सोफे पर टेक लगाकर बैठ गई। उसने अपना सिर हल्के से पीछे किया और एक गहरी सांस लेते हुए बोली, "देख यार! आसान तो मेरी लाइफ कभी भी नहीं रही, मम्मा-पापा की डेथ के बाद से। लेकिन मुझे अब डर नहीं लगता मुश्किलों से। बस मैंने सोचा, अब जब सामने से ऑफर मिल रहा है, तो क्यों मना करना? कम से कम कुछ टाइम के लिए ही सही, थोड़ा सा माहौल बदल जाएगा। बाकी, देखेंगे जो होगा!"

उसकी बातें निकिता के इतना समझ में नहीं आ रही थीं। इसलिए निकिता उठकर खड़ी हुई और बोली, "अच्छा, ठीक है। चल, अब चलते हैं। वैसे भी, ऑफिस टाइम पर पहुँच चुका है। मुझे भी घर जाना है। लेकिन मैं तेरा सामान लाने की कोशिश कर देती हूँ। वैसे, सामान तो लाने देगी ना तेरी चाची...?"

सुहानी थोड़ा आगे होकर बैठते हुए बोली, "नहीं लाने देगी तो क्या? अचार डालेगी बैठकर मेरे सामान पर? और वैसे भी, उसे पता चलेगा मैं वहाँ से निकल रही हूँ, तो खुशी-खुशी खुद ही सब कुछ यहाँ पर रख जाएगी। यह सोचकर कि उसके सर से तो बला टली।"

इतना बोलते हुए सुहानी बहुत ही अजीब तरह से हँसी। उसकी हँसी में दर्द भी साफ झलक रहा था, और उस दर्द को छुपाने के लिए ही वह इस तरह की बातें करती हुई हँस रही थी।

निकिता ने उसकी बात सुनकर बेबसी से अपना सिर हिलाया। फिर वे दोनों उस होटल रूम से बाहर निकल गईं।

होटल रूम से बाहर निकलने से पहले ही सुहानी ने ऑनलाइन कैब बुक कर दी थी। वह कैब उनके गेट तक आने से पहले ही होटल के एंट्रेंस पर आकर खड़ी हो गई थी।

वे दोनों उस कैब में बैठ गईं। सुहानी ने पहले ही अपने मोबाइल फ़ोन में जाने का लोकेशन एंटर कर दिया था, जिससे कैब वाला उन्हें उनकी बताई हुई डेस्टिनेशन पर ले जाने लगा।

कैब में बैठते ही निकिता ने अपना फोन निकालते हुए सुहानी की तरफ देखकर कहा, "ऑफिस का टाइम पहले ही ओवर हो गया है, और मुझे घर पहुँचने में लेट हो जाएगा। तो मैं घर पर फ़ोन करके बता देती हूँ इस बारे में, नहीं तो सब परेशान होंगे।"

सुहानी ने उसकी तरफ देखकर हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ, ठीक है। अच्छा है यार, कोई तुम्हारे लिए परेशान तो होता है।"

निकिता ने अपना मोबाइल फ़ोन निकालकर एक नंबर डायल किया और फ़ोन अपने कान से लगाकर कॉल रिसीव होने का इंतज़ार करने लगी। कुछ देर बाद, जब वह फ़ोन पर बात कर रही थी, तो सुहानी खिड़की से बाहर की तरफ देखने लगी।

लेकिन कुछ देर बाद वह वापस अपनी सीट पर पीछे होकर बैठ गई। उसने अपना सिर सीट से टिका लिया और अपनी आँखें बंद करके काफी सारी चीजों के बारे में सोचने लगी; कि आखिर कहाँ से शुरू हुआ यह सब... कब उसकी ज़िंदगी बदली? आज से छह महीने पहले, जब वह पहली बार इस ऑफिस में इंटरव्यू के लिए आई थी।

उसे एक दूसरी कंपनी ने यहाँ पर रेफ़र किया था, क्योंकि उनकी कंपनी में सारी वैकेंसीज़ फुल हो गई थीं। नहीं तो खुद से तो वह शायद कभी भी राठौर इंडस्ट्रीज़ नहीं आती।

सुहानी अपनी सहेली निकिता के साथ कैब में बैठकर अपने चाचा-चाची के घर जाती हुई, रास्ते में वह सब कुछ और इस बारे में सोच रही थी जहाँ से यह सब कुछ शुरू हुआ...

******

फ्लैशबैक;

छह महीने पहले...

राठौर बिल्डिंग इंडस्ट्रीज़ ऑफिस;

देवांश सिंह राठौर, शहर का बहुत ही बड़ा, अमीर और सक्सेसफुल सीईओ था। अपने पापा की डेथ के बाद, सिर्फ़ 24 साल की उम्र में ही उसने यह पोजीशन संभाली थी। भले ही वह कभी भी अपने लिए यह पोजीशन नहीं चाहता था, लेकिन अपने ऊपर ज़िम्मेदारी आने के बाद उसने पूरा काम ईमानदारी और मेहनत से संभाला था।

उसके परिवार में उसकी सौतेली माँ और सौतेला भाई था; दोनों ही उसे इतना ज़्यादा पसंद नहीं करते थे, लेकिन मुँह पर उसे पसंद करने का दिखावा करते थे, क्योंकि पूरी कंपनी और प्रॉपर्टी, सब कुछ, टेंपरेरी ही सही, लेकिन देवांश के नाम पर ही थी।

ऑफिस में वह काम को लेकर बहुत ही ज़्यादा सीरियस और स्ट्रिक्ट रहता था। उसे काम में लापरवाही करने वाले लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। इसीलिए ऑफिस में उसका खौफ़ बहुत ज़्यादा फैला हुआ था। उसके रहते कोई भी अपने काम में लापरवाही करना, तो दूर, आपस में दो मिनट बात भी नहीं कर सकते थे।

रोज़ की ही तरह, आज भी देवांश काफी सीरियस होकर अपने केबिन में अकेला बैठा हुआ अपना काम कर रहा था। लेकिन तभी उसे एकदम से कुछ याद आया, और उसने अपने मैनेजर का नाम लेते हुए गुस्से से चिल्लाया, "विनीत! विनीत! कहाँ हो तुम? एक काम दिया था, वह भी अब तक नहीं हुआ..."

देव के केबिन का दरवाज़ा खुला हुआ था, इसलिए बाहर उसकी आवाज़ पहुँच रही थी। उसकी आवाज़ सुनते ही अपनी जगह पर बैठा हुआ विनीत एकदम हड़बड़ा गया, और उधर की वजह से उसका गला भी सूख गया। उसके नाम की आवाज़ सुनकर बाकी सारे एम्पलाइज़ ने बेबसी से अपना सिर हिलाते हुए उसकी तरफ़ देखा। विनीत जल्दी से अपना सारा काम छोड़कर उसके केबिन की तरफ़ भागा।

"मे आई कम इन, सर!"

आधा पैर दरवाज़े के अंदर और आधा दरवाज़े के बाहर रखते हुए विनीत ने उसकी तरफ़ देखकर जैसे-तैसे पूछा।

नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देखते हुए देव ने बहुत ही ज़्यादा गुस्से में कहा, "मैं खुद ही तुम्हें बुला रहा हूँ, इडियट! इस तरह दरवाज़े पर रुककर परमिशन लेने की ज़रूरत नहीं है, और अंदर बाद में आना। तुम पहले यह बताओ कि अब तक तुम लोगों ने मेरे लिए कोई पर्सनल असिस्टेंट क्यों नहीं रखा है? मिस तानिया को जॉब से रिजाइन किए हुए एक महीना हो गया है, और तब ही मैंने बोल दिया था। लेकिन तुम लोग हो कि अब तक लापरवाही... तुम्हें पता है ना, मुझे लापरवाह लोग बिल्कुल भी पसंद..."

उसे इस तरह से गुस्से में देखकर मैनेजर का तो जैसे गला ही सूख गया डर की वजह से, और उसके मुँह से शब्द भी नहीं निकल रहे थे। वह देव के सवालों का जवाब देना चाहता था, लेकिन पता नहीं क्यों कुछ बोल नहीं पा रहा था।

तभी जैसे-तैसे अंदर आते हुए उसने दबी हुई आवाज़ में बोला, "सर! सर, वह हम... हमने कई सारे लोगों का इंटरव्यू लिया है, लेकिन... लेकिन उनमें से कोई भी..."

विनीत चाहकर भी अपनी बात पूरी नहीं कर पाया, और देव फिर से उसी तरह उस पर चिल्लाते हुए बोला, "कितने कैंडिडेट के इंटरव्यू ले चुके हो, और अभी कितने लोगों के और लोगे? यह बताओ! एक असिस्टेंट चुनने में कितने साल का वक़्त चाहिए तुम्हें? एक महीना तो ऑलमोस्ट होने वाले हैं, और तुम लोग हो कि एकदम बेकार, किसी काम के नहीं हो।"

देव को इस तरह से गुस्से में देखकर विनीत आगे बोलना नहीं चाहता था, लेकिन उसके पास अपनी बात पूरी बताने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था। इसलिए उसने जैसे-तैसे अपनी बात पूरी करते हुए कहा, "सर! सर, सबसे पहली बात, आपका नाम सुनकर आधे से ज़्यादा लोग इस पोजीशन के लिए अप्लाई ही नहीं करते हैं। और जो आते हैं, उनमें से कोई भी वैसे नहीं है जैसा असिस्टेंट आपको चाहिए; हार्ड वर्किंग और जो आपकी सारी बातें चुपचाप माने। हमें कोई भी ऐसा नहीं मिला जिसमें वह सारी क्वालिटीज़ हों जो आपको चाहिए।"

देव ने काफी ज़्यादा फ्रस्ट्रेशन से कहा, "पता नहीं, क्या ढूँढ रहे हो तुम लोग? इतनी सारी डिमांड तो मैंने कभी रखी ही नहीं, जितनी तुम गिना रहे हो। मुझे और खुद असिस्टेंट ना ढूँढ पाने की अपनी नाकामी का बिल भी मुझ पर ही फाड़ रहे हो।"

देव के चिल्लाने पर विनीत ने जल्दी से सिर झुकाकर माफ़ी माँगते हुए कहा, "सॉरी... आई एम रियली सॉरी सर! बट मैं जल्दी ही किसी न किसी को सेलेक्ट कर लूँगा, डेफिनेटली। आज भी इंटरव्यू के लिए तीन लोग आए हुए हैं, और उनमें से एक मिहिर सर..."

मिहिर का नाम आते ही देव ने उसकी तरफ़ घूरकर देखा, तो फिर विनीत अपनी बात पूरी नहीं कर पाया और एकदम चुप हो गया, और अपना सिर झुकाकर खड़ा हो गया।

देव ने जैसे ऑर्डर देते हुए कहा, "तीन कैंडिडेट आए हैं, ठीक है। तुम एक-एक करके उन्हें मेरे केबिन में भेजो। आज का इंटरव्यू मैं खुद ही दूँगा। तुम लोगों पर कोई काम नहीं छोड़ना चाहिए मुझे, इतना तो समझ आ गया है।"

बिना किसी बहस के विनीत बोला, "ओके सर, मैं भेजता हूँ।"

To Be Continued....

क्या लगता है आपको? सुहानी बीती बातों के बारे में क्यों सोच रही है? और क्या वजह है जो वह यहाँ पर इस कंपनी में आना नहीं चाहती थी? और क्यों है देवांश ऐसा, जिसकी वजह से सब उससे डरते और घबराते हैं? और क्या वह सच में ऐसा ही है, या सिर्फ़ सबके सामने स्ट्रिक्ट बनने का दिखावा करता है? जानने के लिए मेरे साथ पढ़िए यह स्टोरी, और कमेंट में बताइए अपना ओपिनियन...

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