Golden trap of billionaire Ch. 3

Golden trap of billionaire - Chapter 3

Posted by Jahnavi Sharma • Mar 18, 2025 01:42 PM

अगली सुबह दीवा बेड पर बैठकर रो रही थी। वो इस वक्त एक क्लब के वीआईपी रूम में थी और उसे समझ नहीं आया कि कल रात उसके साथ कौन था, जिसने उसके साथ रात बिताई।

दीवा के दिमाग में उसकी धुंधली तस्वीर के अलावा कुछ नहीं था। उसके बारे में सोचते हुए उसने वहां लगभग आधे घंटे तक आंसू बहाए। जब दीवा को लगा कि रोने का कोई फायदा नहीं है तब उसने जैसे-तैसे करके अपने कपड़े उठाए और उठकर जाने लगी। हालांकि ये सब करते हुए दीवा के शरीर और दिल दोनों में बहुत दर्द हो रहा था।

दीवा बाहर आई तो अभी भी बहुत तेज बारिश हो रही थी पर उसे कोई होश नहीं था। उसने सुबकते हुए अपने मन में कहा, “ऐसा लग रहा है जैसे कि आसमान भी मेरे साथ रो रहा है। कौन हो तुम, जिसने मेरे साथ इतना बुरा किया। एक बार तुम मुझे मिल जाओ, मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं।”

दीवा खोई हुई हालत में अपने घर की तरफ बढ़ रही थी।

वहीं दूसरी तरफ कपूर इंटरनेशनल के सीईओ के फ्लोर पर आर्यांश कपूर इस वक्त अपने केबिन में था और कुछ डाक्यूमेंट्स देख रहा था। उनके अंदर दीवा की सारी डिटेल्स थी।

दीवा की बाकी डिटेल्स देखते हुए आर्यांश की नजर एक पियानो कंपटीशन की फोटो पर पड़ी, जिसकी विनर दीवा थी। ये "मिडसमर नाइट्स ड्रीम" कंपीटिशन था, जो 5 साल में एक बार होता था और पिछली बार उसे दीवा ने हीं जीता था।

अचानक ही आर्यांश के चेहरे के भाव सर्द हो गए। उसने उस सर्टिफिकेट को देखते हुए कहा, “तो तुम वही हो। पूरे 4 साल लग गए मुझे तुम्हें ढूंढने में। अगर कल रात तुमने वो म्यूजिक नहीं बजाया होता तो शायद ही मैं तुम्हें कभी ढूंढ पाता दीवा गोयंका।”

आर्यांश ने उस फाइल को बंद किया और फिर बिना किसी भाव के कहा, “कोई भी इंसान अपनी किस्मत को बदल नहीं सकता और ना ही उससे भाग सकता है। ये तो कल रात तुम्हें पता चल ही गया होगा। तुम्हारी किस्मत में कल रात बर्बाद होना लिखा था। चिराग सिंह ना सही, तुम्हारे साथ बेड पर मैं था और तुम उसे नहीं बदल पाई। ऐसे ही आगे जो होगा, उसे तुम कभी नहीं बदल पाओगी।”

आर्यांश की गहरी काली आंखों में बहुत कुछ था और उसकी बातों से साफ जाहिर था कि दीवा से जुड़ी हुई उसकी यादें अच्छी तो बिल्कुल नहीं है।

वही खोई हुई हालत में दीवा अपने घर पहुंची। वो अभी भी कल रात जो भी हुआ, उससे निकाल नहीं पा रही थी। बार-बार दीवा यही सोच रही थी कि आखिर वो गहरी काली आंखों वाला शख्स कौन हो सकता है।

कपूर मेंशन का दरवाजा खुला था। दीवा अंदर जाने के बजाए, वहां खोई हुई हालत में खड़ी थी तभी उसे किसी की जानी पहचानी आवाज सुनाई दी और इसी के साथ दीवा का ध्यान टूट गया।

“बेबी तुम ठीक तो हो ना?” रक्षित ने कहा।

दीवा को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक रक्षित वहां कैसे आ गया। रक्षित ने दीवा का हाथ पकड़ा और उसे अंदर लिविंग रूम में लेकर गया। उसके मॉम डैड घर पर ही थे, लेकिन फिलहाल वो और रक्षित वहां अकेले थे।

अंदर आते ही दीवा पूरी तरह होश में आ गई थी। रक्षित ने उसकी तरफ देखा और प्यार से बोला, “बेबी कल रात तुम कहां चली गई थी? तुम्हें पता भी है कल मैंने तुम्हें कितना ढूंढा था, थक हारकर मुझे घर आना पड़ा।

दीवा ने तुरंत खुद को नॉर्मल किया और बोली, “वो मेरी एक फ्रेंड का कॉल आ गया था। उसे मेरी जरूरत थी तो मैं अचानक वहां चली गई और मुझे तुम्हें बताने का मौका नहीं मिला।” दीवा झूठ बोल रही थी, इस वजह से वो रक्षित की आंखों तक में नहीं देख पा रही थी।

रक्षित की सच्चाई से अनजान दीवा इस वक्त गिल्ट में थी। उसे ऐसे लग रहा था जैसे उसने रक्षित को धोखा दिया हो।

तभी रक्षित ने आगे पूछा, “कौन सी फ्रेंड के पास? और अगर उसे तुम्हारी जरूरत थी तो साथ में मुझे भी ले चलती। तुम्हें अकेले इतनी रात को वहां से नहीं जाना चाहिए था। रास्ते सेफ नहीं है, बेबी आजकल पता नहीं कैसी-कैसी न्यूज़ आती रहती है।”

रक्षित ऐसे जता रहा था जैसे उसे दीवा की कितनी ही फिक्र हो रही हो, जबकि सच तो ये था कि कल रात दीवा जब मिस्टर सिंह के कमरे में नहीं पहुंची थी तो मिस्टर सिंह का मूड खराब हो गया था और उन्होंने रक्षित को काफी सुनाया था।

अचानक बात करते हुए रक्षित की नजर दीवा की गर्दन पर गई। जहां पर एक लव बाइट का निशान नजर आ रहा था। उसे देखते ही उसकी आंखें छोटी हो गई। जहां तक उसे पता था, दीवा ने आज तक इतना करीब तो उसे भी नहीं आने दिया और वो कल रात मिस्टर सिंह के पास भी नहीं पहुंची थी, फिर अचानक ये निशान दीवा के गले पर कैसे आ सकता था।

दीवा के बाल उसकी गर्दन से चिपके हुए थे क्योंकि वो बारिश से भीग कर आई थी। रक्षित ने अपने दोनों हाथों से दीवा के बालों को पीछे की तरफ किया तो उसकी सफेद गर्दन पर काफी सारे लाल लव बाइट के निशान बने हुए थे।

वो सब देखकर रक्षित के चेहरे के भाव सख्त हो गए। वो गुस्से में बोला, “बेबी मुझे झूठ नहीं सुनना है, सच-सच बताओ कल रात तुम कहां गई थी?”

दीवा समझ गई थी कि उसका झूठ पकड़ा गया है, वो इतनी जल्दबाजी में बाहर निकली थी कि उसने अपने चेहरे तक को आईने में नहीं देखा था।

दीवा ने जल्दी से अपने बालों को गर्दन पर किया और रक्षित से बोली, “मैने कहा ना अपनी फ्रेंड के घर पर गई थी।”

“ठीक है, नाम बता दो कौन सा फ्रेंड।” रक्षित ने सख्ती से पूछा।

रक्षित अच्छे से जानता था कि दीवा को मुंबई आए हुए ज्यादा टाइम नहीं हुआ था। वो लाइफ केयर हॉस्पिटल में काम करती थी, जहां उसके ज्यादा दोस्त नहीं थे। दीवा का ऐसा नेचर ही नहीं था कि उसका आसानी से कोई दोस्त बन जाए। फिर वो कैसे किसी को अपना दोस्त बनाकर उसके साथ रात बिता सकती थी।

दीवा ने नजर उठाकर रक्षित की तरफ देखा तो वो उसे गुस्से में घूर रहा था। ये गुस्सा दीवा पर नहीं बल्कि मिस्टर सिंह की वजह से था। कल रात उसे मिस्टर सिंह के साथ होना चाहिए था और वो अचानक गायब हो गई। उसकी वजह से रक्षित की डील भी कैंसिल हो गई थी।

रक्षित इस तरह से सवाल जवाब कर रहा था। गुस्से में रक्षित की आवाज तेज हो गई थी। उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर दीवा के मॉम डैड नवीन और प्रार्थना गोयंका उसके पास आए।

दीवा की नज़रें झुकी हुई थी और रक्षित जो भी बोल रहा था, वह सब वे पहले ही सुन चुके थे।

नवीन ने कुछ नहीं कहा लेकिन प्रार्थना गुस्से में दीवा पर तेज़ आवाज़ में बोली, “दीवा तुम जवाब क्यों नहीं दे रही हो, रक्षित कुछ पूछ रहा है तुमसे, कल रात तुम कहां थी?”

गीले कपड़ों में दीवा को अब ठंड लगने लगी थी। ऊपर से उन सब के सवाल जवाब उसे उसके दर्द का और भी एहसास करा रहे थे। दीवा की आंखों में आंसू आ गए और उसने सुबकते हुए रक्षित की तरफ देखकर कहा, “रक्षित हम अलग हो जाते हैं‌। मैं तुम्हारे लायक नहीं रही।”

दीवा रोए जा रही थी और उसकी नज़रें झुकी हुई थी, तभी रक्षित उसके पास आया और उसे दोनों कंधों से पकड़ते हुए गुस्से में बोला, “मुझे जवाब दो दीवा।‌ कौन था वो, जिसने तुम्हारे साथ ये सब किया। वन मोर थिंग मुझे कोई झूठ नहीं सुनना है।”

“मुझे...मुझे कुछ भी याद नहीं है, बस इतना पता है कि किसी ने कल रात मेरे साथ अच्छा नहीं किया। मै...मैने जानबूझकर नहीं किया।” दीवा रोते हुए काउच पर बैठ गई। वो बहुत लाचार महसूस कर रही थी।

“झूठ मत बोलो दीवा, तुमने मुझे धोखा दिया है और अपने धोखे को मासूमियत से छुपाने की कोशिश कर रही हो।” रक्षित गुस्से में जोर से चिल्लाया।

दीवा ने एक नजर रक्षित की तरफ देखा और फिर रोते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गई थी। उसकी कोई गलती नही थी फिर भी उसे गुनहगार समझा जा रहा था। ये दीवा की किस्मत में था, या आर्यांश कपूर ने ये सब उसकी किस्मत में जानबूझकर लिखा था।

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