एक थी वोह - Chapter 1
ये उन दिनों की बात है जब ढूँढराब गढ़ के राजा सुमल राठौड़ ने अपनी नौवीं शादी की थी। उसके बाद वे अपनी नौवीं बहू को विदा कराकर अपने महल ला रहे थे।
अचानक उनके रथ के पास एक बूढ़ी किन्नर, जिसका शरीर मिट्टी और खून से सना हुआ था, दिखाई दी। उसे देखकर राजा सुमल ने अपने नौकरों से कहा, "इस किन्नर को नई रानी का बिछुआ उतारकर दे दो।"
जैसे ही किन्नर को बिछुआ दिया गया, उसके हाथ अचानक काले पड़ गए, और उसकी आँखों से काले आँसू बहने लगे। उस बूढ़ी किन्नर ने तीव्र स्वर में कहा, "तुम जो कर रहे हो, वह तुम्हारे लिए काल की कलंकनी है; वह तुम्हारे पुण्यों को पाप में बदल देगी और तुम्हारे पापों का अंत करेगी; वह तुम्हें जकड़ लेगी।"
इतने में राजा ने उसका धड़ अलग कर दिया और उसकी बात अधूरी रह गई।
राजा ने अपने दादा, पंजर राठौड़ से कहा, "काफी दिनों से किन्नर का रक्त नहीं पिया है और मांस भी नहीं खाया है। क्यों दादा जी? आज इच्छा पूरी की जाए।"
दादा ने कहा, "हमें उसकी जीभ का मांस खाना है; बाकी तुम्हें जो करना है, वह करो।"
राजा ने कहा, "तो आज रात यहीं रुकते हैं।"
जैसे ही उन्होंने स्थान तलाशकर वहाँ रुके, राजा ने अपनी नौकरानियों से कहा, "किन्नर को पकाया जाए।"
तभी अचानक काला धुआँ हुआ, जिससे सबकी आँखें कुछ देर के लिए कुछ देखने लायक नहीं रहीं। जब धुआँ साफ़ हुआ, तब सब हैरान रह गए क्योंकि वहाँ किन्नर की मात्र हड्डियाँ और उन हड्डियों पर कुछ मांस चिपका हुआ था। इसे देखकर राजा ने कहा, "अब हमें चलना चाहिए।" तभी राजा ने देखा कि दादा के पूरे वस्त्र खून से लथपथ थे। पर राजा ने कहा, "दादा, स्वाद कैसा था?"
दादा ने कहा, "अब हमें चलना चाहिए।"
जब राजा महल पहुँचने ही वाले थे, दादा ने कहा, "हमने किन्नर को नहीं खाया है।"
तब राजा ने कहा, "हमें सब पता है कि किन्नर को उसने खाया होगा।"
दादा ने कहा, "पर वह तो..."
तभी राजा ने कहा, "महल में हमारी रानियाँ नई बहू का इंतज़ार कर रही हैं।"
राजा और नई बहू के साथ महल पहुँचे। जैसे ही वे महल की दहलीज़ पर पहुँचे, वहाँ सभी आठ रानियाँ, राजा की माँ कुनरेवा देवी, राजा की तीन सौतली माँ और राजा की पाँच बहनें उनके स्वागत में खड़ी थीं। राजा की माँ जैसे ही नई बहू की आरती करने के लिए आगे आती हैं, तभी उसकी सास, यानी राजा की दादी मनका देवी और राजा के पिता सुखेर राठौड़ उसे रोककर कहते हैं, "तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी होगी। मन तो तुम्हारी हिम्मत को काटकर तुमसे अलग कर दे, और तो और, तुमने सोचा कैसे कि तुम आरती कर सकती हो?"
दादी मनका देवी कहती हैं, "इस घर में शुभ और अशुभ कार्य करने का केवल हक़ मेरा है, और किसी का नहीं।"
इतना कहते ही कुनरेवा कहती हैं, "रेवाला वो..."
वो इतने में राजा सुखेर, कुनरेवा से कहते हैं, "ज़्यादा जुबान मत चलाओ, वरना जुबान काटकर आपको ही जुबान खिलाएँगे।"
इतना कहते ही दादी ने कहा, "ठीक है। जब तक रेवाला नहीं आती, तब तक हम बहू का स्वागत करते हैं।"
दादी ने बहू की आरती की। जैसे ही दादी ने बहू से कहा, "इस चावल के कलश को अपने दाएँ पैर से गिराओ।"
तब अचानक उस कलश में से दीमक निकलने लगीं। तभी रेवाला वहाँ आती है और गुस्से में कहती है, "घोर अनर्थ हुआ! इस लड़की ने ना जाने कितने ही पाप किए होंगे। यह लड़की पूरे घर को दीमक की तरह नहीं खाएगी।"
यह बात कहकर रेवाला मुस्कराती है। तभी राजा साहब की पहली पत्नी, उरका देवी कहती हैं, "कि दीमक कैसे आईं?"
रेवाला कहती है, "वह तो तुम अपनी सौतली सास, सुकांता देवी से पूछो।"
तभी दादा कहते हैं, "नई बहू का गृहप्रवेश होगा कि नहीं?"
राजा सुमल के पिता, राजा सुखेर राठौड़ की पत्नियों के नाम: राजा सुमल की सगी माँ का नाम रानी कुनरेवा देवी, राजा सुखेर राठौड़ की दूसरी पत्नी रानी सुकांता देवी, तीसरी पत्नी रानी जता देवी, चौथी पत्नी रानी कनिसेगा देवी।
तभी रेवाला बहू का गृहप्रवेश करवाती है और कहती है, "अब बहू की बहु परीक्षा होगी। इससे पहले आप बहू की मुँह-दिखाई कर लीजिए।"
रेवाला के इतना कहने पर कुनरेवा देवी ताना मारते हुए कहती हैं, "तो आप ही कर लीजिए मुँह-दिखाई।"
तो रेवाला सभी से कहती है, "मुँह-दिखाई हो या रसोई में भोजन पकवाना हो, हमें उससे कोई मतलब नहीं है। हमें मतलब है बहू परीक्षा से, इसलिए मुँह-दिखाई जल्दी करो।"
मुँह-दिखाई के लिए जैसे ही दादी ने घूँघट उठाया और नई बहू को देखा, बोली, "सुंदर होना कोई गुणवान होने का प्रतीक नहीं होता, असली सुंदरता उसके मन और कर्म से होती है।"
और दादी ने उसे एक सोने का चमगादड़ दिया और कहा, "जिस प्रकार चमगादड़ खून चूसता है, उसी प्रकार यह तुम्हारे मन की कायरता को चूसेगा।"
तभी रेवाला कहती है, "मुँह-दिखाई हो गई, सभी ने चेहरा देख लिया। अब सभी अपने उपहार बाद में देंगे। बहू परीक्षा का समय हो गया।"
रेवाला नई बहू से उसका नाम पूछती है, तो वह कहती है, "मेरा नाम धरिता है।"
रेवाला कहती है, "तुम्हारी पहली परीक्षा है: इस महल के पंचमुखी कुंड में से एक हज़ार इक्कीस स्वर्ण कलश से जल भरकर इस कुएँ में करना है।"
रेवाला कहती है, "तुम इस परीक्षा में असफल हुईं तो तुम्हें एक सौ एक चमगादड़ पकड़कर उनके रक्त से मेरा अभिषेक करना होगा।"
इतना कहकर रेवाला जाती है। तभी दादा व्यंग्य कसते हुए कहते हैं, "तुम चमगादड़ के रक्त से अभिषेक कराने की बजाय उसे पी लेतीं तो बेहतर होता, चमगादड़ का खून व्यर्थ न जाता।"
और दादा मुस्कराते रहते हैं। तब रेवाला कहती है, "कौआ अगर अपने आप को गिद्ध समझे, तो कौआ के लिए यह एक पहेली है, जैसे आपके लिए।"
नई बहू धरिता अपनी परीक्षा शुरू करने से डरती नहीं है और मन में कहती है, "जो होना होगा, हो जाएगा।"
वह परीक्षा शुरू करती है और मात्र एक स्वर्ण कलश भरकर कुएँ में डालती है। तभी कोई उसे कुएँ में धक्का देता है और वह कुएँ में गिर जाती है। वह कुएँ से काफी आवाज़ देती है, पर कोई उसकी आवाज़ नहीं सुनता है और वह डूब जाती है। पर कोई कुएँ के ऊपर से उसे देखता रहता है। जब वह डूब जाती है, तो वह वहाँ एक सर्प को मारकर उस कुएँ के पास छोड़ जाता है।
वह किन्नर क्या कहना चाहती थी, जिसे राजा सुमल ने मार दिया? धरिता का पति क्या नरभक्षी है और उस किन्नर को किसने खाया? रेवाला कौन है? धरिता को कुएँ में धक्का किसने दिया?