एक थी वोह - Chapter 3
सभी ने रेवाला को देखा तो परिवार वाले हैरान, भयभीत और आश्चर्यचकित हो गए। रेवाला खून से लथपथ थी, उसके केश खुले हुए थे और हाथ में खून से सनी तलवार थी। एक कंधे पर राजा सुमल खून से भीगे हुए थे।
यह देखकर राजा सुमल की माँ, रानी कुनरेवा देवी ने कहा, "तुमने मार दिया हमारे बेटे को..."
तब मनका देवी ने कहा, "सुमल जिंदा है।" रेवाला ने उसे बचाया है। रेवाला उन्हें चिकित्सक कक्ष में ले गई और महल के आंगन में बने मंदिर के सामने तुलसी के पौधे से पत्तियाँ तोड़कर सुमल की माँ कुनरेवा देवी को दीं। उसने अपने अंदर शक्ति का प्रवेश कराकर नृत्य किया। तभी रेवाला क्रुद्ध स्वर में बोली, "काल का पहरा था, अभी टला नहीं...वह रात, वह समय आने वाला है जब इन नौ बहुओं और इस महल की पाँच बेटियों में से वह एक होगी जो तुम्हारे पुण्यों को पाप में परिवर्तित कर देगी...वह शिव है तो वह शक्ति है, वह इस महल का अंत है तो आने वाले कल का आरंभ...वह एक-एक को सही को गलत करेगी और गलत का विनाश...वह इस महल में होकर भी नहीं है और इस महल में न होकर भी है...वह सबका काल है...अब सब पर काल का पहरा मंडराएगा, सब मरने वाले, तुम लोगों का अंत आएगा। जिस प्रकार यह तुलसी का पौधा सूखता जायेगा, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का नाम समाप्त हो जाएगा...इस महल में जो अदृश्य बनकर रहता है...सब का विनाश आएगा। वह एक होगी जो इस महल के गड़े मुर्दों को ज़िंदा करेगी और तुम्हारा विनाश करेगी। तुम इन सबको मारना चाहोगे, पंजर, तो खुद हड्डियों का ढाँचा बन जाओगे...सबका अंत आएगा, इसकी शुरुआत आज से होगी।" इतना कहते ही रेवाला बेहोश हो गई।
दादी मनका देवी गुस्से से लाल हो गईं और बोलीं, "नई बहु धरिता कहाँ है? कहाँ है?" उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया, "सब बहुओं और बेटियों को बंदी बनाकर तहखाने में बंद कर दो।" इतना सुनते ही महल में चीखों की आवाज गूंजने लगी। तभी राजा सुखेर राठौड़ की मझली बेटी अंगिका देवी कुएँ की ओर भागी और कुएँ में कूद गई।
(राजा सुखेर की बेटियों के नाम इस प्रकार हैं:
बड़ी बेटी रूपश्यामा देवी (रानी कुनरेवा की बेटी)
दूसरी बेटी धारवी देवी (रानी जता देवी की बेटी)
तीसरी बेटी अंगिका देवी (रानी सुकांता की बेटी)
चौथी बेटी पुलिता देवी (रानी कनिसेगा की बेटी)
पाँचवीं बेटी रूंगा देवी (रानी जता देवी की बेटी))
उसी समय रानी सुकांता बेहोश हो गईं।
तब रानी जता देवी ने दादी मनका देवी के गले पर तलवार रखकर कहा, "हमारी बेटियों को आजाद कर दो...वरना...वरना हम आपको मार देंगी..." तब रानी मनका देवी हँसकर बोलीं, "हमें पता था कोई तो ऐसी हरकत होगी, इसलिए हम केवल एक दिन के लिए तहखाना बंद कर रहे हैं।" इतने में दादा पंजर सिंह ने जता देवी के सिर पर पत्थर से वार कर उन्हें बेहोश कर दिया।
इधर रानी सुकांता को होश आया और अपनी बेटी के लिए बिलखती हुईं उनकी आँखें लाल हो गईं। गुस्से में उन्होंने दादी मनका देवी से कहा, "जिस प्रकार हमारी बेटी के भय के कारण उसकी मृत्यु हुई, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भय के कारण होगी...ये मेरी हाय है..." सब बर्बाद हो गया, सब के सब खूनपिपासु हैं। इतना सुनकर सुखेर राठौड़ ने सुकांता को कुएँ में फेंक दिया और कहा, "अब वही होगा जो हम चाहेंगे।" इतना कहकर राजा सुखेर वहाँ से चले गए।
रानी मनका देवी बोलीं, "नई बहु भी मर चुकी है, इसलिए आज 'कुएँ की मौत' होगी..." तभी अचानक कुएँ से भयानक आवाजें आने लगीं।
कनिसेगा देवी बोलीं, "काल के कुएँ का मुँह खुल गया है, अब बस सबको निगलना बाकी है।"
अचानक कुएँ के पानी का स्तर बढ़ गया और कुएँ का पानी बाहर आने लगा, पर वह पानी खून था। इसे देखकर दादा पंजर सिंह बोले, "यह तो रक्त है...यहाँ से सब चले जाओ...सब चले जाओ, वह आ जाएँगे, भागो..." दादा पंजर सिंह बहुत भयभीत थे। दादा पंजर सिंह सबको भगाने लगे, तभी रेवाला को होश आया। रेवाला बोली, "अब कुएँ की मौत होगी और छह माह में यह कुण्ड भी सूख जाएगा।" और...सबका अंत होगा...
अब कुएँ से गरम खून निकलने लगा। राजा पंजर सिंह सभी घरवालों को बाहर ले आए। महल के बाहर एक सुरंग थी जिससे होकर राजा पंजर बाकी सब जंगल के बीचों-बीच एक कच्ची मिट्टी के बने महल में आ गए। राजा सुखेर राठौड़ ने कहा, "महल में रेवाला है तो सब ठीक है।"
कुछ समय बाद पंजर सिंह ने कहा, "आज रात यहीं गुजारनी होगी।" तभी जता देवी को होश आया और अपनी बेटियों को सही-सलामत देखकर वह खुश हुईं। फिर कच्ची मिट्टी के बने घर को देखकर बोलीं, "हम कहाँ हैं और आप सब?" तब कुनरेगा देवी ने सारा वृतांत विस्तारपूर्वक बताया। तब जता देवी ने दादी मनका से कहा, "फूटी किस्मत आपकी..." और हँसीं। इतने में सुखेर ने जता देवी के कान मरोड़ दिए और कहा, "रोटी पर अगर घी न मिले तो रोटी को फेंका नहीं जाता।"
इधर रेवाला महल से निकलकर महल के पीछे बने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गई।
उधर राजा सुमल के जख्मों पर रानी गुमान देवी (दूसरी पत्नी) मिट्टी और नीलकमल के पुष्प से बना लेप लगा रही थीं।
तभी अचानक सभी को भूकंप के झटके लगे। तब पंजर सिंह ने कहा, "हमें इस कच्चे महल से बाहर निकलना चाहिए।" और सभी बाहर आ गए। तब राजा सुमल की सातवीं पत्नी रूधारा देवी ने कहा, "अब हम कहाँ जाएँगे? क्या अब महल जाना चाहिए...?"
तब दादा पंजर राठौड़ ने कहा कि यहाँ पास में नदी है, हमें वहाँ चलना चाहिए।
जब वे सब नदी के किनारे पहुँचे तो वे सब आश्चर्यचकित हो गए। आखिर उन्होंने क्या देखा...?
आखिर कौन है वह जो इस महल के श्राप का अंत करेगी? क्या सच में नई बहु धरिता मर चुकी है? और रानी सुकांता और उनकी बेटी अंगिका देवी सच में मर चुकी हैं? और जहाँ रेवाला को महल की सुरक्षा करनी थी, वह महल के पीछे क्यों गई? और उसने राजा सुमल की जान कैसे बचाई...?