Qaid-e-ishq Ch. 2

Qaid-e-Ishq - Chapter 2

Posted by S✨ Sood • Apr 17, 2025 05:58 PM

हवेली के बाहर हल्की-सी ठंडी हवा बह रही थी। पेड़ों की शाखें आपस में टकराकर सरसराहट पैदा कर रही थीं—जैसे कोई अनकहा राज़ कानों में फुसफुसा रहा हो। आसमान में बादल छाए थे, चाँद उनकी ओट में छिपकर कभी झाँकता तो कभी गुम हो जाता।

अंदर हवेली में रोशनी फैली थी, लेकिन अब उसका रंग बदल चुका था। कुछ देर पहले की चहल-पहल और हँसी अब धीरे-धीरे थम रही थी। मेहमानों की भीड़ विदा ले चुकी थी। बड़े हॉल में अब बस अपने लोग ही बचे थे—आर्या के माता-पिता, मयंक के माँ-पापा, कुछ करीबी रिश्तेदार और हवेली के नौकर।

आर्या अपनी माँ के पास बैठी थी। गुलाबी लहंगे की थकान अब उसके चेहरे पर उतर आई थी, लेकिन आँखों में एक अलग-सी चमक थी—नई ज़िंदगी की शुरुआत की। उसके माथे पर हल्की पसीने की बूंदें थीं, जिन्हें वह बार-बार दुपट्टे से पोंछ रही थी।

सम्राट उस समय कमरे के कोने में खड़ा था। दीवार से पीठ टिकाए, हाथ में शराब का गिलास थामे, और चेहरे पर वही उसकी स्थायी मुस्कान—नर्म, विनम्र, पर कहीं गहरी। उसकी आँखें भीड़ पर नहीं थीं, बस कभी-कभी आर्या की ओर उठ जातीं और फिर तुरंत झुक जातीं।

हॉल की हल्की पीली रोशनी में सबके चेहरे साफ़ दिख रहे थे। मयंक अपने पापा से कुछ मज़ाक कर रहा था, और सब हँस रहे थे। लेकिन उस हँसी में सम्राट को अजीब-सी कड़वाहट महसूस हो रही थी।

तभी मयंक अचानक कमरे में सबके बीच आया। उसने दोनों हाथ एकदम हल्के-फुल्के अंदाज़ में बजाए और बोला—

"तो दोस्तों, आज का यह दिन यहीं खत्म नहीं होता! अब अगले दो दिन हम सब यहीं इस हवेली में रहेंगे… पूरे राजसी स्टाइल में।"

उसकी आवाज़ में उत्साह था। सबकी नज़रें उसकी तरफ़ घूम गईं।

आर्या ने चौंककर पूछा, "क्या मतलब? यहाँ… हवेली में?"

मयंक हँसा। "हाँ! सब इंतज़ाम हो चुका है। कल सुबह से मेहमान भी कम होंगे, और हम सब मिलकर यहाँ रिलैक्स करेंगे। पुरानी हवेली का असली मज़ा इसी में है कि अपने लोग साथ हों, और ढेर सारी बातें, हँसी-ठिठोली चले।"

मयंक की माँ ने गर्व से कहा, "हाँ, बेटा सही कह रहा है। हवेली सालों से खाली पड़ी थी। अब पहली बार इसमें रौनक आई है।"

सबने हामी भरी। माहौल में फिर से हल्की गर्माहट आ गई।

लेकिन सम्राट का चेहरा उसी तरह स्थिर रहा। उसकी आँखों के पीछे जो तूफ़ान छिपा था, कोई नहीं देख पा रहा था। वह बस एक झटके में शराब का पुरा गिलास घटक लेता है।

कमरे में हल्की-हल्की बातें चल रही थीं। आर्या की माँ उसे देख रही थीं। उन्होंने धीरे से उसकी हथेली दबाई और मुस्कुराकर कहा, "बहुत सुंदर लग रही थी तू आज।"

आर्या शरमा गई। "मम्मा…"

बगल में बैठे उसके पापा ने भी कहा, "मयंक और तू सच में बहुत अच्छे लग रहे थे।"

आर्या ने झिझककर मयंक की ओर देखा। मयंक भी उसे देख रहा था और उसकी आँखों में वही अपनापन था। आर्या ने सिर झुका लिया।

सम्राट यह सब देख रहा था। उसके होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों के कोनों में एक अजीब-सा साया उतर आया था।

कुछ देर बाद रिश्तेदारों ने उठना शुरू किया। नौकर चाय और मिठाई की ट्रे समेटने लगे। हल्की-हल्की थकान सबके चेहरों पर दिख रही थी।

"चलो अब कल सुबह की तैयारी करनी है।" मयंक के पापा ने कहा।

सब उठने लगे। आर्या की माँ ने उसे अपने कमरे में चलने का इशारा किया।

आर्या उठी और जाते-जाते उसकी नज़र सम्राट पर पड़ी। वह अब भी वहीं खड़ा था, गिलास खाली हो चुका था, लेकिन हाथ अब भी उसी गिलास को थामे थे।

आर्या ने धीमे स्वर में पूछा, "सब ठीक है, सम्राट?"

उसने एक लम्बी साँस ली और होंठों पर मुस्कान ले आया। "हाँ… अब सब बहुत ठीक है।"

आर्या को उसकी मुस्कान में कुछ अजीब लगा। जैसे वह कुछ छुपा रहा हो। वह कुछ पूछना चाहती थी, लेकिन तभी उसकी माँ ने उसे पुकारा और वह चली गई।

सम्राट वहीं खड़ा रहा। उसने खिड़की की ओर देखा—बाहर अंधेरा और हवा का शोर। फिर उसने आईने में अपनी परछाईं देखी। उसके चेहरे पर वही नर्म मुस्कान थी, जिसे सब 'सच्ची' समझते थे।

लेकिन उस मुस्कान के पीछे… कुछ और था।

एक धार… ठंडी और खामोश।

जैसे किसी के हँसते चेहरे के नीचे दर्द छुपा हो।

या फिर… कोई गहरा राज़।

हवेली की रात अब बस शुरू हुई थी।

और उसकी दीवारों में गूंजने वाली कहानियाँ—अभी बाकी थीं।

100%