Qaid-e-ishq Ch. 3

Qaid-e-Ishq - Chapter 3

Posted by S✨ Sood • Apr 17, 2025 06:02 PM

आर्या की माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा, “और भई, इतना बड़ा प्लान बना लिया… हमें बताया तक नहीं?”

मयंक ने हँसते हुए जवाब दिया, “बताया होता तो सरप्राइज़ कैसे रहता, आंटी! देखिए न, हवेली है, खुला आँगन है, पास ही जंगल के ट्रेल्स हैं, और ऊपर से सम्राट का साथ है – दो दिन सिर्फ रिलैक्स करने के लिए।”

वह सम्राट की ओर पलटा—“है न, सम्राट?”

सम्राट ने हल्के से सिर हिलाया। “बिलकुल… कभी-कभी पुरानी हवेलियाँ सबसे अच्छा ब्रेक देती हैं। खासकर जब बाहर की दुनिया थोड़ा शोर मचा रही हो।”

आर्या ने उसकी मुस्कान पर नज़र डाली—ठंडी, चमकदार, जैसे बर्फ़ की परत हो जो अभी पिघलनी बाकी हो।

मयंक ने उत्साह से जोड़ा, “कल सुबह लेट उठेंगे, नाश्ता लॉन में होगा, फिर ट्रेकिंग और रात को बोनफायर। और किसी को भी मोबाइल या काम की बात नहीं करनी है—सिर्फ शांति और मस्ती।”

सब हँस पड़े, माहौल हल्का हुआ, पर कमरे की ठंडक जस की तस रही। शायद वजह सम्राट था… या फिर उसके पीछे कोई अदृश्य साया।

कर्मचारियों ने बैग उठा लिए। आर्या की माँ ने पूछा, “कमरे तय हो गए हैं न?”

“हाँ आंटी,” मयंक बोला, “सम्राट को ऊपर लाइब्रेरी वाले कमरे में रखा है।”

सम्राट के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। “पुरानी जगहों के पास… पुरानी कहानियाँ होती हैं।”

आर्या को उसकी बात में अजीब-सा संकेत लगा। वह चुप रही।

धीरे-धीरे सब अपने-अपने कमरों में चले गए। हवेली में सन्नाटा उतर आया। आर्या ने माँ को बिस्तर पर सुलाया और खुद गलियारे से गुज़रने लगी। उसके कदम लकड़ी के फर्श पर गूँजते थे। तभी उसने देखा—सीढ़ियों की ओट में सम्राट खड़ा था, हाथ में अब भी कॉफी का कप, नज़रें उसी पर टिकाए।

आर्या ने ध्यान नहीं दिया, बस आगे बढ़ गई। सम्राट ने चुपचाप उसे जाते देखा। उसका चेहरा, उसकी चाल… उसमें कुछ ऐसा था जो सम्राट की सांसों को बेचैन कर रहा था। वह चाहता था, आर्या बस एक बार पलटकर उसे देख ले। पर वह नहीं मुड़ी। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई और सम्राट की आँखों में अजीब-सा खालीपन भर गया।

अपने कमरे में पहुँचकर आर्या ने दरवाज़ा बंद किया, तभी उसकी नज़र खिड़की पर पड़ी। वहाँ मयंक खड़ा था। आधे अंधेरे में, आधी रौशनी में।

“मयंक?” आर्या ने चौंकते हुए कहा।

“पता है, तुम्हें अजीब लग रहा होगा… पर मैं बिना कुछ कहे जा नहीं सकता था।”

आर्या थोड़ी झिझकी, लेकिन फिर बैठ गई। मयंक उसके सामने कुर्सी पर आ गया। उसकी आँखों में हल्की थकान थी, पर एक शरारती चमक भी।

“आज सब कह रहे थे कि हमारी जोड़ी कितनी ख़ास है… तुम्हें कैसा लगता है?”

आर्या मुस्कुराई। “क्या कहूँ… बस इतना कि तुम जैसा इंसान कोई और नहीं।”

मयंक ने उसका हाथ थाम लिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श गहरा था, जैसे कोई वादा। उसने हल्के से उसकी हथेलियों पर किस किया। आर्या ने हाथ खींच लिए और लजा गई।

“अभी सिर्फ सगाई हुई है, मयंक। शादी तक इंतज़ार करो,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

मयंक मुस्कुराया और उसकी जुल्फें कान के पीछे कीं। “लेकिन बातें तो कर सकते हैं न?”

आर्या ने उसकी ओर देखा, “हाँ, बातें हो सकती हैं।”

मयंक ने चुटकी ली, “मतलब देख सकता हूँ, बातें कर सकता हूँ, तारीफ़ कर सकता हूँ… बस छू नहीं सकता?”

आर्या हँस दी। “हाँ… छूने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा।”

“ये तो ज़ुल्म है,” मयंक बोला।

आर्या ने उसकी बाँह पकड़कर कहा, “प्यार में इंतज़ार का स्वाद ही तो ख़ास है।”

“और शायद इसी वजह से मैं हर दिन तुम्हें और चाहता हूँ,” मयंक ने कहा।

आर्या ने उसका हाथ थामा। “कभी-कभी लगता है, तुम मेरे पिछले जन्म का अधूरा हिस्सा हो।”

मयंक ने उत्तर दिया, “तो हर जन्म में तुम्हें ढूँढूँगा।”

उनकी आँखों में गहरी खामोशी उतर आई।

मयंक अचानक बोला, “चलो थोड़ा डांस करते हैं।”

“मैं थक गई हूँ,” आर्या ने कहा।

“बस एक पल।” उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

धीमे-धीमे वे झूमने लगे। आर्या का सिर उसके कंधे पर टिक गया। दोनों की सांसें एक-दूसरे से मिल रही थीं। थकान कहीं गायब हो गई थी।

मयंक ने उसका हाथ अपने दिल पर रखा। “यहाँ सुनो… ये धड़कन सिर्फ तुम्हारे लिए है।”

आर्या की आँखें भीग उठीं। उसने उसका आलिंगन स्वीकार कर लिया।

उसने फुसफुसाकर कहा, “तुम्हारे साथ हो तो सब कुछ सही लगता है।”

आर्या ने सिर उसके सीने पर रख दिया। उनके बीच अब शब्द नहीं, बस धड़कनों की ताल थी।

मयंक ने उसे हल्के से घुमाया। उसकी हँसी और मुस्कान चाँदनी में और भी निखर गई।

“हर रात ऐसी हो,” मयंक ने कहा।

“हर रात… और हर सुबह भी,” आर्या ने उत्तर दिया।

खिड़की से आई हवा ने परदे उड़ाए। चाँद की रोशनी में दोनों के चेहरे चमक उठे। मयंक ने धीमी आवाज़ में पूछा—

“क्या मैं तुम्हें और गहराई से महसूस कर सकता हूँ?”

आर्या ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ चाह थी, भरोसा था, और एक अधूरा वादा भी। उसने जवाब नहीं दिया—बस उसकी उँगलियाँ थाम लीं।

उस पल दोनों ने शब्दों से परे एक रिश्ता महसूस किया—जो सगाई या शादी से बड़ा था, और शायद किसी पिछले जन्म से भी लंबा।

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