Psychopath lover - Chapter 1
सुबह का समय था, इंदौर में।
एक छोटे से घर की दूसरी मंज़िल के एक कमरे में, बिस्तर पर एक लड़की अपने टेडी बियर को सीने से चिपकाए सो रही थी। वह लड़की सोते हुए बेहद मासूम और निर्दोष लग रही थी। खिड़की पर लगे पर्दे से धूप की किरणें उसकी सूरत पर पड़ रही थीं। चेहरे पर धूप की किरण पड़ने से वह लड़की थोड़ी सी हलचल की और फिर चादर ओढ़कर सो गई।
उसी समय, उसी घर की पहली मंज़िल पर एक औरत इधर-उधर भागदौड़ करते हुए कुछ बड़बड़ा रही थी।
"हे भगवान! पता नहीं यह लड़की अभी तक क्या कर रही है... पता नहीं तैयार हुई भी है या नहीं।" (ऊपर की ओर देखते हुए)
उस औरत ने एक बैग में कुछ सामान रखते हुए खुद से ही कहा-
"सारी पैकिंग हो गई ना? कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? एक बार फिर से चेक कर लेती हूँ... वरना... एक अनजान शहर में वह कैसे मैनेज करेगी?... पता चले पहले ही दिन परेशान होती फिरे।"
फिर एक पल के लिए रुककर आह भरते हुए-
"पता नहीं इस लड़की को भी इतनी दूर ही क्यों जाना है। यहाँ रहकर भी तो उसका सपना पूरा हो ही सकता था।
...न जाने क्यों, लेकिन मेरा दिल बिल्कुल नहीं कर रहा उसे खुद से दूर भेजने को।"
यह कहते हुए उस औरत के चेहरे पर थोड़े परेशानी भरे भाव थे। वहीं, उस औरत को इस तरह परेशान होते देख, सोफे पर बैठे एक आदमी, जो काफी देर से उसे देख रहे थे और उसके हर भाव को नोटिस कर रहे थे, जोर-जोर से हँसने लगे।
अपने पति को यूँ हँसता हुआ देख, उस औरत का मुँह बन गया। तभी वह आदमी ना में सिर हिलाते हुए सोफे से खड़ा हुआ और उस औरत को कंधों से पकड़कर बोला-
"आशा, तुम क्यों इतनी परेशान हो रही हो? सारी पैकिंग हो चुकी है और अगर कुछ रह भी गया होगा तो भी उसे वहाँ किसी तरह की कोई समस्या नहीं होगी।... उसकी सुरक्षा के हिसाब से भी वह जगह बिल्कुल सही है।"
"जानती हूँ, पर फिर भी एक माँ होने के नाते मेरा दिल अपनी बच्ची की फिक्र करता ही है।... आपको तो पता ही है, वह आज तक कभी हमसे दूर नहीं रही है।
और सबसे ज़्यादा डर तो मुझे उसकी मासूमियत और निर्दोषता से लगता है।... वह खुद निर्दोष है, तो उसे लगता है कि बाकी सब भी उसकी तरह ही निर्दोष होंगे।... मुझे तो डर लगता है कि कहीं मेरी बच्ची अपनी इसी निर्दोषता की वजह से किसी मुसीबत में ना फंस जाए।"
अजय (अपने पति की तरफ देखते हुए)---
---"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह अपना सपना यहीं रहकर पूरा कर ले? हमारे कलेजे के नीचे रहेगी तो मुझे भी शांति रहेगी, नहीं तो मुझे उसकी फिक्र ही लगी रहेगी।" अजय ने आशा की बात सुनकर एक गहरी साँस भरी और आशा को अपने सामने करते हुए बोला -
"आशा, तुम जानती हो ना उसने अपने सपने के लिए कितनी मेहनत की है।"
"और काम तो वह यहाँ कर लेगी, पर मनाली उसका ड्रीम प्लेस है। जहाँ के हॉस्पिटल में अपनी ideal के अंडर काम करना हमेशा से उसका सपना रहा है।... और आज जब उसे अपना सपना पूरा करने का मौका मिला है, मनाली जाकर इंडिया के बेस्ट हॉस्पिटल में काम करने का मौका मिल रहा है, तो हमारा उसके सपने के बीच आना, वह भी सिर्फ एक डर की वजह से, यह उसके साथ गलत होगा। और अब वह बड़ी हो चुकी है। हाँ, वह निर्दोष है, उसकी निर्दोषता मुझे भी डराती है, पर मुझे यकीन है कि वह खुद को संभाल लेगी। इसलिए अब तुम परेशान होना बंद करो। नहीं तो तुम्हें देखकर वह भी परेशान होगी।"
आशा ने अजय की बात सुनकर खुद को शांत किया और अपना सिर हाँ में हिला दिया।
तभी बाहर से एक सत्रह-अठारह साल का लड़का अंदर आया। उसे बाहर से आता देख आशा उसे थोड़ा डाँटते हुए बोली-
"अभि, तू वहाँ कहाँ से आ रहा है? मैंने तुझे ज़ारा को उठाने के लिए कहा था ना? तूने उसे उठाया नहीं... वह लेट..."
"अरे रिलैक्स, रिलैक्स, मेरी प्यारी मॉम रिलैक्स।।।। आप बात-बात पर क्यों इतना तनाव लेते हो।।। मैंने ज़ारा को आधे घंटे पहले ही उठा दिया था और अब तक तो वह उठकर तैयार भी हो चुकी होगी।" अभि अपनी माँ को गले लगाते हुए बोला।
"पता नहीं फिर अभी तक यह लड़की क्या कर रही है। मैं एक बार देखकर आती हूँ। पता चले कहीं गढ़े घोड़े बेचकर सो ही रही हो।"
यह बोलकर आशा वहाँ से ऊपर की ओर चली गई और उनके पीछे-पीछे अभि भी।
जैसे ही आशा कमरे में पहुँची, तो बिस्तर पर वह लड़की अभी भी चादर ओढ़कर सोई हुई थी। यह देख आशा की आँखें खुली की खुली रह गईं।
"यह लड़की अभी तक नहीं उठी! हे भगवान!" कहते हुए आशा ने उस लड़की का चादर पूरी तरह हटा दिया और – "ज़ारा, उठो! अभि तुम्हें आधे घंटे पहले उठाकर गया और तुम हो कि अभी तक नहीं उठीं। तुम्हें जाना है या नहीं?"... ज़ारा कसमसाती हुई अपनी अधखुली आँखों से देखती है और फिर से अपनी आँखें बंद कर लेती है।
तभी एक पल बाद ही उसके ऊपर कोई पूरा पानी से भरा जग उँडेल देता है। पानी पड़ते ही ज़ारा की सारी नींद गायब हो जाती है और वह हड़बड़ाते हुए झट से उठकर बिस्तर पर बैठती हुई कहती है-
"बाढ़ आ गई... बाढ़ आ गई!"
"हाँ-हाँ, बाढ़ आ गई। अब इससे पहले कि सुनामी आ जाए और आपको अपने साथ बहाकर ले जाए, उससे पहले जल्दी से उठो और जाकर तैयार हो जाओ। वरना कहीं ऐसा ना हो कि आप अपने सपने में ही डूबी रह जाओ और आपका खूबसूरत ख्वाब आपके हाथ से निकल जाए।"
अभि की बात सुन ज़ारा, जो अभी तक अपने हाथों से चेहरा मसल रही थी, अभि को घूरने लगी और साइड से एक तकिया लेकर उसे पर फेंकते हुए-
"अभि के बच्चे, यह सब तूने किया ना? तूने मेरे ऊपर पानी डाला, तुझे तो मैं छोड़ूँगी नहीं।"
"हाँ, तो मैं क्या करता? आप उठ ही नहीं रही थीं। मैंने कब आपको उठाकर गया था? आप पाँच मिनट का बोलकर वापस सो गईं और अभी भी उठने का नाम ही नहीं ले रही थीं, तो फिर मुझे आपको ऐसे पानी डालकर उठाना पड़ा... और देखो, आप उठ भी गईं।"
इतना बोल अभि हँसने लगा।
"अभि के बच्चे, तू मेरा मज़ाक उड़ा रहा है... रुक... तुझे तो मैं अभी बताती हूँ।" बोल ज़ारा अभि पर सारे तकिए उठाकर फेंकने लगी। अभि बचते हुए-
"यार दी, मार क्यों रही हो? मैंने तो यह आपके लिए ही किया, मतलब आपको उठाने के लिए, वरना जैसे आप सो रही थीं ना, उस हिसाब से तो आपकी ट्रेन का छूटना तय था... और फिर आपका अपने ड्रीम हॉस्पिटल में काम करने का सपना, सपना ही रह जाता, तो आपको तो मुझे थैंक्स बोलना चाहिए।" जैसे ही अभि यह बात बोलकर चुप हुआ, ज़ारा ने अपने सिर पर हाथ मार लिया-
"ओ शिट!"... यह मैं कैसे भूल गई? (समय देखते हुए) कहीं मैं लेट तो नहीं हो गई?
और अभि, तू इतनी देर से फालतू की बकवास किए जा रहा था, पहले नहीं बता सकता था?"
अभि कुछ बोलता, उससे पहले ही आशा (ज़ारा की माँ) डाँटते हुए- "बस, बस करो अब तुम दोनों। जब देखो बच्चों की तरह लड़ते रहते हो... और ज़ारा, अब अगर तुम्हें जाना है तो जल्दी से तैयार होकर आओ।" नहीं तो...
"नहीं-नहीं, मैं जाती हूँ।" बोल ज़ारा जल्दी से वाशरूम में भाग गई।
थोड़ी देर बाद ज़ारा वाशरूम से आती है और आईने के सामने खड़े होकर अपने बाल बनाने लग जाती है।
ज़ारा ने एक ए-लाइन, एंकल लेंथ, क्रीम कलर की ड्रेस पहनी थी, ऊपर व्हाइट कलर की डेनिम जैकेट और पैरों में व्हाइट शूज़।
अब ज़ारा के बारे में जान लेते हैं- ज़ारा बिरला, उम्र 22 साल के करीब..! हेज़ल आँखें, हल्के भूरे बाल, छोटा सा चेहरा और गोरा रंग। बिल्कुल निर्दोष और गुड़िया जैसी। ज़ारा अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी है और एक intern डॉक्टर के तौर पर अपना पेशा शुरू करने वाली है। अब डॉक्टर किस क्षेत्र की है, यह तो अगले अध्याय में पता चलेगा।
वापस कहानी पर...
ज़ारा तैयार होकर सीढ़ियों से नीचे आती है, उसके हाथ में एक सूटकेस था और कंधे पर एक पर्स लिया हुआ था जो साइड से कमर तक लटक रहा था। अजय जी (ज़ारा के पिता)- "आओ बेटा, पहले नाश्ता कर लो। फिर निकलना भी है, तुम्हारी ट्रेन का समय हो रहा है।"
ज़ारा हाँ में सिर हिलाकर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाती है। बाकी सब भी बैठते हैं और नाश्ता करने लगते हैं। आशा थोड़ी परेशान होती है तो अजय आशा के हाथ पर हाथ रखकर उसे शांत होने का इशारा करते हैं।
तभी ज़ारा अभि से-
"अभि, वैसे तेरे प्रोजेक्ट का क्या हुआ? सबमिट कर दिया क्या तूने?"
अभि फ़ोन में देखते हुए- "नहीं दी। वह मुझे दोबारा से बनाना पड़ेगा।"
ज़ारा कन्फ़्यूज़न से- "क्यों? इतना तो अच्छा था।"
"हम्म... पर कल रोहित ने जानबूझकर उस पर पानी गिरा दिया था, जिससे वह खराब हो गया, सो..."
"कम ऑन अभि... उससे गलती से गिर गया होगा... जानबूझकर वह यह क्यों करेगा?" ज़ारा की बात सुन आशा और अजय एक-दूसरे की तरफ देखते हैं।
"पर दी..." तभी अजय उसे बीच में ही रोकता है... "अभि, तुम यह फ़ोन में क्या घुसे हुए हो? नाश्ता करो।"
"वह मैं न्यूज़ देख रहा हूँ, डैड।" अभि उनकी बात का जवाब देते हुए बोला।
"न्यूज़... तुझे न्यूज़ में कब से इंटरेस्ट आने लगा?" ज़ारा हँसते हुए बोली।
"अभी मुँह बनाते हुए- "तब से जब से मैंने बिज़नेस कोर्स में एडमिशन लिया है।"... एंड यू नो व्हाट डैड... टुडेज़ ग्रेट न्यूज़ इज़ - इस बार फिर से राइज़ादा कंपनी को इंडियाज़ टॉप कंपनी का अवार्ड मिला है।... इस कंपनी की प्रेसिडेंट एक लेडी हैं और इस पूरे एम्पायर को उनका बेटा संभालता है... पर आज तक किसी ने भी उन्हें देखा नहीं है... स्ट्रेंज ना!"
"तभी ज़ारा तपाक से- "स्ट्रेंज क्या है इसमें? मे बी उन्हें लाइमलाइट में रहने का शौक ही ना हो... वैसे भी आजकल ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं।"
यह सुन फिर से सब चुप हो जाते हैं।
***
थोड़ी देर बाद-
ज़ारा अपने माता-पिता और भाई के साथ रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी थी। वहीं आशा उसे निर्देश दे रही थीं-
"ज़ारा, वहाँ अगर कोई भी परेशानी हो तो सबसे पहले हमें कॉल करना। और जल्दी से किसी पर भरोसा मत करना... हम्म... बस एक महीने की बात है, फिर जैसे ही तुम्हारे पापा का ट्रांसफ़र वहाँ हो जाएगा, हम सब भी वहीं आ जाएँगे... तब तक अपना ख्याल रखना।"
ज़ारा मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाती है और बारी-बारी से सबको गले लगाते हुए बाय बोलकर ट्रेन में चढ़ जाती है। ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म से रवाना होती है और इसी के साथ ज़ारा का मनाली का सफ़र शुरू होता है और उसकी खुशियों का सफ़र ख़त्म।
ज़ारा के जाने के बाद आशा जी जाती हुई ट्रेन को देखती है और अपने हाथ जोड़ते हुए-
"हे भगवान, मेरी बच्ची की रक्षा करना।"
तभी अभि- "डोंट वरी मॉम... अब दी बड़ी हो चुकी है।"
"हम्म... पर सिर्फ़ उम्र से... मासूमियत और निर्दोषता उसमें अब भी बच्चों जैसी है। जिसके चलते हर किसी पर भरोसा कर लेती है... बिना सोचे-समझे किसी की भी मदद के लिए तैयार हो जाती है।" आशा जी बोलीं और फिर वहाँ से सब अपने घर के लिए निकल जाते हैं।
done... ये कोई लव स्टोरी नहीं है तो इसे कांसेप्ट समझकर ही पढ़े..!