Psychopath lover Ch. 2

Psychopath lover - Chapter 2

Posted by destiny ✨✨ • Apr 18, 2025 11:47 PM

ज़ारा मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और बारी-बारी से सबको गले लगाकर, "बाय" बोलकर ट्रेन में चढ़ गई। ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म से रवाना हुई। और इसी के साथ ज़ारा का मनाली का सफ़र शुरू हुआ और उसकी खुशियों का सफ़र ख़त्म।

ज़ारा के जाने के बाद आशा जी जाती हुई ट्रेन को देखती रहीं और अपने हाथ जोड़ते हुए बोलीं-

"हे भगवान, मेरी बच्ची की रक्षा करना।"

तभी अभि बोला- "डोंट वरी मॉम। अब दी बड़ी हो चुकी है।"

"हम्म। पर सिर्फ़ उम्र से... मासूमियत और इनोसेंस उसमें अब भी बच्चों जैसी है। जिसके चलते हर किसी पर भरोसा कर लेती है... बिना सोचे-समझे किसी की भी मदद के लिए तैयार हो जाती है।" आशा जी बोलीं और फिर वहाँ से सब अपने घर के लिए निकल गए।

वहीं ट्रेन में-

ज़ारा खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी थी। उसने अपना सिर सीट से टिका रखा था और बाहर की तरफ देख रही थी। उसके चेहरे पर एक बहुत प्यारी मुस्कान थी। बाहर मौसम बहुत सुहावना था, और इसी शांति के बीच पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ आ रही थी। ज़ारा ने अपना सिर खिड़की से बाहर निकाला और मुस्कुराते हुए बोली-

"अच्छा हुआ मैंने मॉम-डैड की बात नहीं मानी और फ़्लाइट से जाने के लिए मना कर दिया। और उन्होंने भी मेरी ज़िद के आगे हार मान ली और मुझे ट्रेन से आने की परमिशन दे दी।"

"अगर फ़्लाइट से आती तो ये सुकून भरी हवा और इतना ख़ूबसूरत नज़ारा कैसे देखने को मिलता।"

ज़ारा कह रही थी, तभी ठंडी हवा का झोंका ज़ारा के चेहरे को छू गया। उसे महसूस करते हुए ज़ारा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और फिर एक गहरी साँस भर उस सुकून को खुद में समेटते हुए बोली-

"इस हवा को देखो, कितनी फ़्रीली बहती है!... ये नदियों का पानी कितना साफ़ और प्योर है। और इस आसमान को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे ये पक्षियों से कह रहा हो कि- 'खोलो, फैलाओ अपने विंग्स और उड़ो जितना उड़ना है।' कितना सुकूनदायक है ना ये सब।"

फिर एक आह भरते हुए बोली- "फिर क्यों लोग कहते हैं कि इनोसेंस अच्छी नहीं है?... क्यों लोग किसी को कैद करना चाहते हैं जब आज़ाद रखकर सब कुछ इतना ख़ूबसूरत हो सकता है?... सच में पागल ही होंगे वो लोग जिनकी ख़्वाहिश किसी को कैद करने की होती है... थैंक गॉड जो आज तक मैं ऐसे किसी साइको से नहीं मिली।" हाँ, बोलकर ज़ारा ने अपना सिर फिर से सीट पर टिका लिया और हाथ बाहर निकालकर लहराने लगी।

शाम का वक़्त-

ज़ारा मनाली पहुँच चुकी थी। उसने अपना सूटकेस लिया और पर्स कंधे पर टांगते हुए प्लेटफ़ॉर्म से बाहर आई। और बाहें फैलाकर खुद से ही बोली-

"हैलो! वेलकम टू मनाली ज़ारा।" कहते हुए चारों ओर देखने लगी।

मनाली-

प्रकृति की आड़ में छिपा ख़ूबसूरत मनाली बर्फ से ढका एक हिल स्टेशन सिटी है जिसकी ख़ूबसूरती, रोमांचक दृश्य मन को एक अलग ही एक्साइटमेंट से भर देते हैं। व्यास नदी के किनारे बसा हुआ ये शहर स्कीइंग, पैराग्लाइडिंग, राफ़्टिंग, क्लाइम्बिंग के लिए और साथ ही घूमने के लिए बहुत फ़ेमस है। यूँ कहें कि यहाँ आकर हम एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं।

ज़ारा चारों तरफ़ देखती हुई बाहर आई और कैब देखने लगी। ज़ारा इधर-उधर देखती हुई चल रही थी कि तभी वह किसी से टकरा गई। उस शख्स के हाथ में एक माला थी जो ज़ारा के टकराने से नीचे गिर गई थी।

ज़ारा ने झुककर उस माला को उठाया और बोली-

"आई एम सॉरी। वो गलती से हो गया, मेरा ध्यान नहीं था। ये लीजिये अपनी..." कहते हुए उस शख्स को जैसे ही वो माला देने लगी तो ज़ारा ने देखा कि उसके सामने एक फ़कीर खड़ा हुआ उसे ही गौर से देख रहा था।

ज़ारा को कुछ समझ नहीं आया। तभी वो फ़कीर बोला-

"गलती ही तो कर रही हो तुम बच्ची जो यहाँ चली आई।"

"क्या?" ज़ारा ने कन्फ़्यूजिंग नज़रों से उसे देखते हुए पूछा।

"सफ़र कैसा बीता तुम्हारा?" उस फ़कीर ने गहरी आवाज़ में पूछा।

"बहुत अच्छा। बहुत मज़ा आया मुझे। ये जगह कितनी ख़ूबसूरत है।" ज़ारा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। "वैसे आपको कैसे पता कि मैं कहीं से आई हूँ?"

"ओह, अब समझी। मैं भी ना। ऑफ़कोर्स रेलवे स्टेशन के पास खड़े हुए और हाथ में लगेज देखकर तो कोई भी समझ जाएगा कि मैं सफ़र से आई हूँ।" खुद ही जवाब दे ज़ारा हँसने लगी।

"अक्सर ख़ूबसूरत गुलाबों में ही काँटे होते हैं बच्ची। तेरा सफ़र ख़ूबसूरत था इसका मतलब ये नहीं कि मंज़िल भी ख़ूबसूरत होगी... अभी भी वक़्त है, बदल ले अपना फ़ैसला और लौट जा वापस..."

"अरे ऐसे कैसे! मैं तो यहाँ अपना सपना पूरा करने आई हूँ, अभी तो कितना कुछ अचीव करना है मुझे, अभी कैसे चली जाऊँ।" ज़ारा बोली। ज़ारा को लग रहा था कि ये फ़कीर है इसलिए शायद हर किसी से ऐसे ही अजीब बातें करता होगा।

"कुछ नहीं मिलेगा तुझे यहाँ, पाने नहीं बल्कि सब कुछ खोने आई है तू यहाँ।" उस फ़कीर ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा और एक नज़र ज़ारा को देख आगे बढ़ गया।

वहीं ज़ारा कुछ पल तो उसकी बातों के बारे में सोचती रही, फिर अपना सिर झटकते हुए बोली-

"अजीब ही था। एनीवे मुझे क्या करना। लेट्स फ़ाइंड द कैब ज़ारा।" बोल ज़ारा आगे बढ़ गई।

वहीं वो फ़कीर ज़ारा को जाते हुए देख पीछे मुड़ता है और खुद से ही कहता है-

"बहुत मासूम हो तुम और तुम्हारी यही मासूमियत कहीं तुम्हें बर्बाद ना कर दे... ख़ूबसूरत ख़्वाब कहीं भयानक हक़ीक़त ना बन जाए... रक्षा करना इस बच्ची की भगवान।" इतना बोल वो फ़कीर भी वहाँ से चला गया।

थोड़ी देर बाद-

ज़ारा एक घर, जो ना ही ज़्यादा छोटा, ना ही ज़्यादा बड़ा था, के दरवाज़े के सामने खड़ी हुई और डोरबेल बजा रही थी। तभी एक 25-26 साल की लड़की दरवाज़ा खोलती है और कहती है-

"ज़ारा... आओ, मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी... मुझे मैडम ने फ़ोन कर दिया था।" कहते हुए खुद साइड होकर ज़ारा को अंदर आने के लिए कहती है।

"लता दीदी कैसे हो आप?" ज़ारा कहते हुए अपना सूटकेस एक तरह से पटकती है और सोफ़े पर पसरकर बैठ जाती है।

"मैं ठीक हूँ, आप बताओ।" लता जवाब देती है। ये घर ज़ारा के डैड अजय जी का ही था जो उन्होंने एक साल पहले लिया था। और लता उस घर की केयरटेकर थी। ज़ारा लता को पहले से जानती थी क्योंकि लता के डैड ज़ारा के घर पर काम करते थे, लेकिन उनकी डेथ हो चुकी थी जिसके बाद लता अपनी नानी के पास यहाँ रहती थी।

रात का वक़्त-

ज़ारा अपने रूम की बालकनी में खड़ी अपने मॉम-डैड से बात कर रही थी। वहीं आशा जी उससे सवाल करती जा रही थीं।

"ज़ारा, तुम्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं हुई ना... आराम से पहुँच गई ना?"

"हाँ मॉम! मैं बिल्कुल आराम से पहुँची हूँ।" ऐसे ही कुछ देर सब से बात करने के बाद ज़ारा "टेक केयर" बोलकर फ़ोन रखती है और कुछ देर ऐसे ही बालकनी में खड़ी रहती है।

थोड़ी देर बाद जब वो अंदर आती है तो अपना फ़ोन बेड पर पटककर एकदम से गोल-गोल घूमने लग जाती है और खुशी से उछलते हुए कहती है-

"ये ये, फ़ाइनली कल मेरा सपना पूरा होगा। आई एम सो हैप्पी, सो सो... सो हैप्पी।" खुशी से कहते हुए ज़ारा बेड पर औंधे मुँह गिरती है और अपने टेडी बियर को गले लगाकर अपनी आँखें बंद कर लेती है। थोड़ी देर बाद ज़ारा को नींद आ जाती है।

अगली सुबह-

आज की सुबह सबके लिए वैसी ही थी, पर ज़ारा के लिए बहुत अलग होने वाली थी। आख़िर आज अपना सपना पूरा करने जा रही थी वो। काफ़ी खुश थी ज़ारा। लेकिन उसे कहाँ पता था कि उसकी ये सुबह, जिसे वो अपनी ज़िंदगी की बेस्ट सुबह समझ रही है, वो उसकी ज़िंदगी की सबसे अंधेरी रात साबित होने वाली थी।

ज़ारा इस वक़्त आईने के सामने खड़ी थी। उसने एक व्हाइट कलर का हाई नेक टॉप, ब्लू जीन्स, व्हाइट बूट और टॉप के ऊपर फ़ुल स्लीव्स रेड कलर का जैकेट डाला हुआ था और गले में ब्लू कलर का स्कार्फ़ डाला हुआ था।

ज़ारा बेबी पिंक लिप ग्लॉस लगाते हुए बोली-

"ज़ारा, योर ड्रीम हैव कम ट्रू। फ़ाइनली तू आज इंडिया के बेस्ट हॉस्पिटल में एज़ अ डॉक्टर अपॉइंट होने जा रही है। आर यू रेडी फ़ॉर इट ज़ारा?"

आईने में देखते हुए- "येस! आई एम रेडी।"

बोल ज़ारा बेड से अपना बैग उठाती है और खुद को एक नज़र आईने में देखकर कहती है-

"लुकिंग ब्यूटीफ़ुल, जस्ट लाइक अ वाउ।" कहते हुए ज़ारा खुद को एक फ़्लाइंग किस देती है और रूम से बाहर निकल जाती है।

लता दीदी- "लो ज़ारा, दही-शक्कर खाओ।" ज़ारा का मुँह मीठा करवाती है और फिर कटोरी टेबल पर रखकर कहती है-

"एक मिनट ज़ारा, मैं आपको काजल लगा दूँ।"

"अरे लता दीदी, ये रहने दो। अभी टाइम नहीं है। आई एम गेटिंग लेट।" बोल ज़ारा घर से निकल जाती है।

वहीं लता दीदी- "अरे पर काजल तो..." पर ज़ारा नहीं सुनती है।

"लो, काला टीका लगाना तो रह ही गया। काफ़ी जल्दी में थी।" बोल लता दीदी भी अपने काम में लग जाती है।

कुछ देर बाद- ज़ारा की कैब एक बड़ी सी बिल्डिंग के बाहर आकर रुकती है।

ज़ारा कैब से बाहर निकलकर ड्राइवर को पैसे देती है और सामने उस बड़ी सी बिल्डिंग की तरफ़ देखती है जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था-

"रेगल साइकियाट्रिक हॉस्पिटल।"

ज़ारा इस नाम को देखते हुए एक गहरी साँस लेकर कहती है-

"द वेट इज़ ओवर ज़ारा... पहुँच गई तू अपने सपने के करीब। आज से तेरी ज़िंदगी बदलने वाली है।" चल बढ़ा अपने क़दम...

ज़ारा अपने क़दम धीरे-धीरे बढ़ाने लगती है, पर उसे कहाँ मालूम था कि वो अपने सपने के नहीं बल्कि अपने सबसे बुरे नाइटमेयर के करीब जा रही है।

ज़ारा रिसेप्शनिस्ट के पास जाती है और स्मूथली कहती है-

"आ... एक्स्कीज़ मी..."

"येस, मे आई हेल्प यू?" रिसेप्शन पर बैठी उस लड़की ने कहा।

"येस। एक्चुअली मुझे मिसेज़ सिद्धि मेहरा से मिलना है। तो कैन यू प्लीज़ टेल मी कि वो मुझे कहाँ मिलेंगी।"

"डू यू हैव एनी अपॉइंटमेंट?"

ज़ारा ने मासूमियत से ना में सिर हिला दिया तो वो लड़की बोली-

"सॉरी, बट बिना अपॉइंटमेंट आप उनसे नहीं मिल सकती हैं।"

"उम्म... मेरे पास अपॉइंटमेंट तो नहीं है, बट आप ये देखिये। मुझे इस हॉस्पिटल की तरफ़ से ई-मेल आया है। और मुझे आज यहाँ जॉइन करना है, बट उससे पहले मुझे मिसेज़ मेहरा से मिलना है।" ज़ारा ने अपना फ़ोन दिखाते हुए कहा।

"ओह! तो आप ज़ारा बिरला हैं जिन्हें यहाँ न्यू अपॉइंट किया गया है। एज़ अ साइकोलॉजिस्ट ।"

रिसेप्शनिस्ट की बात सुन ज़ारा ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया।

तभी उस रिसेप्शनिस्ट ने ज़ारा से कुछ डॉक्यूमेंट्स लिए और उसे एक आईडी कार्ड देते हुए बोली-

"ओके देन। बेस्ट ऑफ़ लक ज़ारा: द साइकोलॉजिस्ट । और हाँ, मिसेज़ मेहरा का कैबिन लेफ़्ट साइड में है, आप वहाँ चली जाइये।"

ज़ारा ने "थैंक्स" कहते हुए आईडी कार्ड लिया और अपने क़दम मिसेज़ मेहरा की तरफ़ बढ़ा दिए। वहीं वो रिसेप्शनिस्ट कंप्यूटर में देखते हुए बोली-

"सुनिये ज़ारा। अभी डॉ. मेहरा एक पेशेंट के साथ हैं, तो आप वेट..." बोलते हुए रिसेप्शनिस्ट नज़र उठाकर देखती है तो ज़ारा तो जा चुकी थी।

डन।

क्यों कहा उस फ़कीर ने ज़ारा को वापस जाने के लिए?

और क्या होने वाला है अब ज़ारा के साथ? जानने के लिए पढ़िये "साइकोपैथ लवर।"

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