My Five cruel dangerous hubbies - Chapter 2
अध्याय: INFERNO – पिघलती रात की परछाई
स्थान: अंडरवर्ल्ड क्लब – INFERNO,
समय: रात 12:00
INFERNO क्लब कोई आम जगह नहीं थी। यह अंडरवर्ल्ड की धड़कन थी — ज़मीन से 27 फीट नीचे बसा एक गुप्त महल, जहाँ सांसें महंगी नहीं थीं, सिर्फ़ ज़रूरी थीं। दीवारें चांदी की थीं, लेकिन रौशनी की जगह वहाँ आग की साँसे थीं — हल्की सी धुआँधार रोशनी, जो जले हुए परफ्यूम की तरह महकती थी।
कमरा – "क्रिमसन शेल्टर" – Inferno का सबसे गोपनीय और लैग्ज़ूरियस हिस्सा था। दीवारों पर काले मख़मल की रेखाएँ, गोल्डन फ्रेम्स में अजनबी चेहरों की तसवीरें – शायद वो जो लौटकर कभी नहीं गए। झूमर नीचे नहीं लटकता था, वह छत में धँसा था – जैसे कोई रोशनी भी यहाँ रेंगते हुए आती हो। कमरे का तापमान गुनगुना था, शराब से ज़्यादा गर्म और धड़कनों से धीमा।
एकमात्र आदमी जो वहाँ बैठा था – विशवा “द ब्रेन”।
चारकोल ग्रे सूट में उसकी मौजूदगी किसी जज की तरह नहीं, किसी निष्पक्ष जल्लाद की तरह थी। उसकी ब्लड-रेड टाई कमरे की इकलौती आवाज़ थी। आँखें? जमी हुई धार की तरह – ठंडी, लेकिन भीतर से सुलगती हुई।
वह अपनी व्हिस्की का गिलास घुमा रहा था – एक ही हाथ में, जैसे समय की गर्दन पकड़ रखी हो।
दरवाज़ा खुला।
उसने सिर नहीं घुमाया, लेकिन उसकी एक भौं हल्की सी उठी।
वह आई — लड़की, एक अजनबी। उम्र लगभग 22। काले सिल्क की ड्रेस, जो उसकी चाल के साथ लहराती थी, और एड़ियों से भी पतली कमर पर रुक जाती थी।
“नाम?” विशवा ने बिना देखे पूछा।
“नाम रखने वालों के लिए दुनिया बाहर है,” उसने जवाब दिया। आवाज़ में न हिचक थी, न अदब।
विशवा ने पहली बार सिर उठाया।
आँखों की रेखा सीधे उसके चेहरे तक पहुँची – जैसे स्कैन कर रही हो कि वो किस चीज़ की बनी है – हड्डियों की या हिम्मत की।
वह मुस्कराया नहीं। लेकिन इशारा किया – बैठो।
लड़की उसके सामने बैठ गई। उन्होंने गिलास उसकी ओर बढ़ाया।
“तुम्हें पता है यहाँ कोई दूसरी बार नहीं आता,” विशवा बोला।
“शायद इसलिए मैं पहली बार ही सब कुछ छोड़ देना चाहती हूँ,” उसने जवाब दिया।
कमरे में एक पल को सन्नाटा फैला। फिर विशवा उठा।
वह धीरे-धीरे उसके पास आया। एकदम पास — इतना कि लड़की की साँसों को उसने पढ़ लिया।
उसने उसकी ठुड्डी हल्के से ऊपर की — बिल्कुल वैसे जैसे कोई जज फ़ैसला सुनाता है।
“तुम्हें पता है मैं किसी के साथ वक्त नहीं बिताता... मैं वक्त को काटता हूँ।”
उसकी उंगलियाँ लड़की की गर्दन की पीछे की तरफ चली गईं — एकदम धीमी, लेकिन सटीक।
“और मैं किसी के साथ सोती नहीं... मैं अपनी नींद लूटने देती हूँ,” लड़की की आँखें अब उसकी आँखों में थीं।
विशवा की आँखों में पहली बार हल्की चिंगारी सी चमकी। उसने लड़की के बालों को पकड़ा, हल्के से झटका — कोई गुस्से से नहीं, किसी घोषणा की तरह।
“तो आज रात... कोई जीतने नहीं आएगा। बस हारने देगा।”
“मैं किसी को जीतने नहीं देती,” लड़की की आवाज़ अब सांसों से भारी थी।
कमरे की हवा बदलने लगी थी।
लाइट डिम हो गई।
विशवा ने उसका हाथ पकड़ा — अपनी मर्ज़ी से नहीं, जैसे नियम की तरह।
उसने लड़की को धीरे से बेड की ओर ले जाना शुरू किया। कदमों की आवाज़ लकड़ी पर ऐसे गूँज रही थी जैसे दो प्यासों के बीच की रेत।
बेडरूम – एक और गुप्त कक्ष। वहाँ कोई घड़ी नहीं थी, कोई आईना नहीं। बस दीवारों पर फैली लाल और काली रोशनी – और एक विशाल सिल्क से ढका बेड।
उसने लड़की को उस बेड की ओर घुमाया।
“तुम्हें पता है, मैं किसी को इजाज़त नहीं देता कि वो मेरी दुनिया में अपनी मर्ज़ी लाए।”
“और मैं किसी की मर्ज़ी से नहीं चलती,” लड़की ने उसकी गर्दन को छूते हुए कहा।
विशवा अब पास आया। उसने उसकी ड्रेस की ज़िप को खींचा – धीरे, बिना किसी जल्दबाज़ी के। उसके हर मूव में कोई उत्तेजना नहीं थी, बस नियंत्रण था। जैसे वो किसी हथियार को खोल रहा हो।
लड़की ने उसकी टाई को खींचा — एक ही झटके में। टाई ज़मीन पर गिर गई।
“तुम मेरे जैसे आदमी के साथ क्यों हो?” विशवा ने पूछा।
“क्योंकि मैं अपनी हदें खुद बनाती हूँ – और तोड़ती भी हूँ।”
वो उसके कान के पास झुका।
“मैं प्यार नहीं करता।”
“मैंने माँगा भी नहीं,” उसने धीमे से कहा।
बेड की चादरें सिल्क की थीं — लेकिन उस वक्त उनके मूव्स, उनकी साँसें, और उनकी नज़दीकियाँ कहीं ज़्यादा गर्म थीं। वहाँ न तो मोहब्बत थी, न फरेब। बस एक तीखी, सीधी और काली रात – जिसमें दो लोग अपनी-अपनी सीमाओं से बाहर आकर एक दुसरे को “समझने नहीं, भोगने” आए थे।
कमरे का दरवाज़ा अब बंद हो चुका था।
लाइट एकदम मंद।
"शब्दों से पहले जो आग उठे"
स्थान: INFERNO – सेक्टर IV, ब्लैक चेंबर
समय: रात के 12:13
कमरे की हवा गरम थी, लेकिन उसमें पसीने की नहीं — शिकारी की गंध थी।
दीवारों पर लटकते लोहे के मास्क, चमड़े की स्ट्रैप्स, और कोनों में लगी रौशनी की ब्लड रेड टोन किसी सज़ा-घर से कम नहीं थी।
यह सेक्टर सिर्फ उनके लिए था जो खेल के रूल्स खुद बनाते हैं।
और तभी...
वो लड़की अंदर आई।
21 साल, लेकिन चाल में मासूमियत नहीं — चेतावनी थी।
जैसे वो कदम नहीं रख रही थी, बल्कि ज़मीन से करार कर रही थी।
उसने साइड स्लिट ब्लैक लेदर ड्रेस पहनी थी, जिसमें उसकी जांघों की मुवमेंट हर नज़र को चुनौती देती।
बैकलेस था, सिर्फ गर्दन से एक पतली चेन को थामे हुए — जैसे उसे ढँकने का कोई इरादा ही न हो।
उसके बाल गीले थे — शायद जानबूझकर, ताकि ड्रॉप्स गर्दन से होते हुए कमर तक बहें।
हाई हील्स की टक टक ने उस कमरे की गहराई में अपनी मौत की धुन बिखेर दी।
कबीर, जो पहले से ही लाउंज की आखिरी बेंच पर बैठा था —
ब्लैक सूट, उठा हुआ कॉलर, टाई नहीं, और शर्ट के ऊपरी बटन खुले —
उसे एक नज़र से देखता रहा।
उसकी उंगलियों में अटका ग्लास हिल रहा था — लेकिन उसकी नज़र ठहर चुकी थी।
लड़की ने कोई लाइन नहीं मारी।
बस सीधे उसकी टेबल पर बैठ गई — बिना इजाज़त के।
"तुम यहाँ का मालिक नहीं, फिर भी सब तुम्हारे आगे झुकते हैं। क्यों?"
उसने पूछा नहीं, फेंका।
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
बस अपना ग्लास घुमाया — और उस पर गिरी लाइट से उसकी आँखों में जलती चमक को देखा।
"तुम्हारे पास शब्द कम हैं?"
"शब्द... ज़्यादा बोलने वाले, ज़्यादा बिकते हैं," उसने धीरे से कहा।
लड़की ने अपने होंठों पर ज़ुबान फिराई।
फिर बिना पूछे उसका ग्लास लिया और एक सिप ले लिया।
"तुम्हारे स्वाद से डर नहीं लगता,"
उसने कबीर की ओर झुकते हुए कहा,
"लेकिन उसमें डूबने का मन करता है।"
कबीर अब भी नहीं मुस्कराया।
बस उसकी उंगलियाँ टेबल के नीचे उसकी जांघ पर चली गईं।
"तुम्हें डर नहीं लगता, तो मैं तुम्हारा हिम्मत का इम्तिहान लूँगा।"
"लू," उसने चैलेंज दिया।
कबीर ने उसकी जांघ से ऊपर जाता हाथ वहीं रोक दिया —
उसे देखा, जैसे कोई शिकारी शिकार को देखकर नहीं,
खुद को रोकने के लिए देखता है।
"डर एक प्रोटोकॉल है, जिसे मैं फॉलो नहीं करता," लड़की ने कहा।
कबीर खड़ा हुआ — धीरे।
उसने उसकी कलाई थामी, और नर्मी से खींचा — बिना ज़ोर, लेकिन पूरी हुकूमत के साथ।
दोनों गार्ड्स ने खुद-ब-खुद रास्ता खाली कर दिया।
कमरे का दूसरा छोर – ब्लैक लेदर बेड।
उसके ऊपर लोहे की चेनें और दीवारों पर हार्नेस टंगी हुई थीं।
कबीर ने उसे बेड की ओर धकेला —
लेकिन इतनी सधी हुई ताक़त से, जैसे वो उसके अंदर के रॉइट को जगा रहा हो।
लड़की ने एक ही मूव में अपनी ड्रेस की चेन खोल दी —
पीठ नग्न हो गई, और बाल आगे लहराए।
"तेरे जैसे लोग कहते हैं – 'मैं तुझे तोड़ दूँगा',"
उसने कहा,
"लेकिन मैं चाहती हूँ — कोई मुझे बिखेरे नहीं, मुझे फिर से गढ़े।"
कबीर ने उसकी बात को न तो सराहा, न नकारा।
बस उसकी दोनों कलाई उठाईं, और अपने बेल्ट से बांध दीं — बिलकुल ठंडे चेहरें के साथ।
"नाम क्या है?"
"तेरे लिए? फ़ालतू चीज़।"
कबीर झुका — लेकिन चूमा नहीं।
उसने उसके होंठों को अपनी सांस से भरा — गरम, भारी और क़ैद कर देने वाला।
"तू जिस आग से बनी है... मैं उसी का जन्मदाता हूँ।"
बेड पर उसकी बॉडी तनी हुई थी — लेकिन कांपी नहीं।
लड़की ने कहा,
"अगर तुम सिर्फ छूकर हावी होना चाहते हो, तो बहुत साधारण है।"
कबीर ने गर्दन झुकाई,
उसके कान के पास फुसफुसाया,
"मैं शरीर को नहीं... दिमाग को सबमिट करवाता हूँ।"
और उसने उंगलियों से उसकी जांघ पर वो नक़्श खींचा, जो सिर्फ वो जानता था।
कमरे की रौशनी धीमी हो गई।
अब सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ थी — और चादरों की सरसराहट।
उसने उसकी आँखों में देखा, और धीरे से बालों में हाथ डाला —
खींचा नहीं, थामा... जैसे एक बम के तार को पकड़ता है।
"Don’t go soft," उसने दोहराया।
"That word never existed for me," कबीर ने कहा।
लड़की बंधी हुई थी — लेकिन चेहरा खुला था।
उसमें डर नहीं था, बल्कि वो वो इंतज़ार था — जो पहली बार किसी ने उसे उसकी ही भाषा में जवाब दिया।
कबीर ने नीचे झुकते हुए कहा,
"मैं तेरे जिस्म से नहीं खेलूँगा…
मैं तेरी सोच को रिवर्स कर दूँगा।"
और फिर जैसे रौशनी ने खुद को कमरे से बाहर कर लिया।
दोनों के बीच जो आग थी — वो अब शब्दों से परे जा चुकी थी।