लव इज लव (एक अनोखी शादी) - Chapter 1
पंचवटी सिर्फ बस्ती नहीं शहर में हो रहे गुनाहों की शुरुवात होती थी इस जगह से । यहाँ जितने भी घर बसे हुए थे उनमे से हर घर का एक शक्स तो अलग अलग छोटी मोटी गैंग का हिस्सा था ही । वो सब गैंग्स एक बड़ी गैंग के अंडर काम करती थी “देवा गैंग”
आर्म्स ट्रेफिकिंग , मनी माफिया , सैंड माफिया जैसे ग्रुप देवा गैंग के अंडर काम करते थे । फिर भी किसी की हिम्मत नहीं थे उनके खिलाफ सबूत जुटाकर कार्यवाही कर सके ।
देवा गैंग देवराज गायकवाड के नाम से शुरू हुई थी और आज उस गैंग को देवा का बेटा दत्ता संभाल रहा था । देवा ने अपने कदम राजनीती की तरफ घुमा लिए थे ।
देवा की तरह शांत नहीं था दत्ता । पावर का नशा काफी कम उम्र से लग चुका था उसे । ऊपर से उसका गुस्सा जिससे शहर ही नहीं उसका खुदका परिवार भी डरता था । बस एक शख्स को छोड़कर । हर कोई जानता था ये बात की वो अकेला इन्सान दत्ता के गुस्से से बचा हुआ है ।
अट्ठाईस साल का दत्ता नाशिक का नया डॉन कहलाता था । उसका नाम हर किसी की जबान पर होता था । लेकिन देखने वाले लोग काफी कम थे ।
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दोपहर का समय था जब बस्ती के अंदर खड़ी दो मंजिला ईमारत के सामने एक कालि गाड़ी आकर रुक गयी । गाड़ी का दरवाजा खुला और उन्नीस साल का एक लड़का बाहर उतर आया । पाच फुट पाच इंच की हाइट, गोरा रंग , माथे पर बिखरे हुए हलके सुनहरे बाल , सफ़ेद रंग की टीशर्ट पर उसने डेनिम की जेकेट पहनी हुई थी ।
उसने ईमारत के निचले हिस्से में बने बड़े से गेरेज को देखा और उसी दिशा में बढ़ गया । अंदर काफी सारी गाड़िया खड़ी थी । वहा चार से पाच लड़के एक जैसी यूनिफॉर्म पहने काम कर रहे थे । दिखने में तो काफी शरीफ लेकिन पुलिस की नजरो में वो सारे मुजरिम थे ।
इसी बीच एक लड़के ने दुसरे लड़के की पीठ पर अपना हाथ मार दिया तो दुसरे लड़के ने गुस्से में उसकी तरफ देखा । क्युकी पहले वाले लडके के हाथो पर ऑइल लगा हुआ था ।
दुसरे लड़के ने अपनी पीठ की तरफ झाकने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा “अरे मंदबुद्धि , एक काम तो सरळ किया कर ? अब इस शर्ट को तू ही धोकर देगा ।“
पहले वाले लड़के ने उसके कंधे पर दुबारा मार दिया “उधर देख ।“
दुसरे लड़के ने अपने गुस्से पर काबू किया और उस तरफ पलट गया जहा देखने के लिए पहले वाले लड़के ने कहा था ।
एकदम से उसके मुह से निकला “मानव ?”
मानव ने मुस्कुरा कर हाथ हिला दिया "गाइज मैने सबको इन्विटेशन दिया था ।"
मैक्स ने अपना गला खराश कर पास खड़े लड़के से धीमी आवाज में कहा “ मुह क्या देख रहा है मेरा ? जाकर बता उपर ।“
उस लड़के ने अपना सर हिलाया । जहा मैक्स मानव की तरफ बढा गया तो वही वो लड़का उपर जाने वाली सीडियों की तरफ भाग गया ।
वो लड़का सीडिया चढ़कर उपर गया जो बालकनी में पोहचती थी । बाहर ही कुर्सी डालकर बैठा हुआ वेधा उसे नजर आया । वेधा इस घर और गेरेज का मालिक होने के साथ साथ दत्ता का करीबी दोस्त भी था । सुबह की धुप में वो सुस्ता रहा था जब कदमो की तेज आवाज सुनकर उसने आंखे खोली ।
“क्या हुआ छोट्या ? कुत्ता पड गया क्या पीछे ?” वेधा ने कहा ।
वो लड़का हापते हुए बोला “वो साला ,,, आया है ।“
वेधा ने आंखे छोटी कर ली "कौन साला आ गया यहां? और खुद नही संभाल सकते जो बताने के लिए आ गए ?"
छोट्या ने चिड़कड़ सर हिलाया "दत्ता भाऊ का साला आया है ।"
वेधा ने कुछ पल उसकी तरफ देखा । फिर अचानक ही सर हिला दिया । छोटया को जाने का इशारा कर वो रेलिंग पर हाथ रख निचे झाका । मानव और मैक्स साथ खड़े उसे साफ दिख रहे थे ।
वेधा पलट कर तुरंत ही घर में चला गया । एक बंद दरवाजे के बाहर आके वो रुका । जो घर के पिछले हिस्से में बना आखिरी कमरा था । वेधा ने जैसे ही दरवाजा खोला तो किसी की तेज चीख उसके कानो से टकरा गयी । अच्छा हुआ उसने इस कमरे को साउंड प्रूफ बना लिया वरना पड़ोसी रोज आकर उसे चार बाते सुना जाते ।
वेधा ने कान में ऊँगली डालकर कान को बंद किया “दत्ता !”
वेधा ने जोर से आवाज दी थी । जिसे सुनकर कमरे में एक बंधे हुए आदमी के अलावा मोजूद दो लड़के उसकी तरफ देखने लगे ।
वेधा ने कान से ऊँगली निकाल कर देखा बंधे हुए आदमी के ठीक सामने कुर्सी डाले बैठा था दत्ता । उसके हाथ में चिमटा था जिससे उस बंधे आदमी के दात उसने उखाड़ दिए थे । आदमी के मुह से खून निकल रहा था ।
दत्ता ने सर्द आवाज में कहा “क्या हुआ ?”
वेधा द्वारा रोके जाना उसे जरा भी पसंद नहीं आया था
वेधा ने कहा “ आज हल्दी है तेरी और तू यहां खून से होली खेल रहा है । उठ जा जल्दी । तेरा साला आया है नीचे । कहे तो भेज दू उसे तेरे पास यहाँ ?”
दत्ता ने ठंडी साँस छोड़ी । हाथ में पकड़ा हुआ चिमटा उसने पीछे खड़े लड़के की तरफ बढा दिया “अभी इसके सारे दांत और उसके बाद नाख़ून भी उखाड़ने है । “
वो दत्ता का खास आदमी एकलव्य था । उसने हा में सर हिलाया तो बंधा हुआ आदमी कसमसाने लगा । डर के कारन वो दत्ता के सामने गिडगिड़ा रहा था ।
दत्ता ने कुटिल मुस्कान के साथ उस आदमी का गाल थपथपा दिया “जब तू धोका देने का सोचकर मेरे दुश्मन के हाथों बिक गया तभी सोच लेना चाहिए था तुझे ये समय आयेगा ही आयेगा । जानता नहीं है क्या मुझे ?”
“गलती हो गयी भाऊ । बस एक बार छोड़ दो । मै वादा करता हु फिर से ये नहीं होगा । “ वो आदमी दर्द से कराहते हुए बोला । उसकी आँखों में आंसू थे जिसकी वजह थी की उसे अपने सामने साक्षात मौत नजर आ रही थी ।
“जो कुछ नहीं करता वो गलती करता है और दत्ता की डिक्शनरी में धोखे की कोई माफ़ी नहीं । “ दत्ता ने कहकर उठते हुए एकलव्य को इशारा कर दिया ।
दत्ता और वेधा एक साथ उस कमरे से बाहर निकल कर लिविंग रूम में पोहचे । दत्ता का सफ़ेद कुरता खून से लाल हो चूका था । वो अपने अवतार को देख रहा था जब वेधा ने दुसरे कमरे की तरफ बढ़ते हुए कहा “तू नहा ले । मै कपडे निकाल कर रखता हु ।“
दत्ता बिना कुछ बोले नहाने चला गया । इस घर के कोने कोने से वो वाकिफ था । जब दत्ता फोन ना उठाए और घर पर भी ना हो तो इसी जगह मिल जाता था वो ।
कुछ ही देर बाद तैयार हुआ दत्ता अपने कुरते की बाजु समेटता हुआ सीडिया उतर कर गेरेज में आया । मानव वही एक कुर्सी पर बैठा था ।
दत्ता ने उसके पीछे जाकर कुर्सी पर हाथ रख झुकते हुए कहा “यहाँ क्यों आए माऊ ?”
सारे लड़के जो अबतक मानव के साथ बेठे थे वो जल्दी से उठ कर अपने अपने काम को देखने लगे । दत्ता की एक घूर ही काफी थी उनके लिए ।
मानव ने अपनी गर्दन पीछे घुमाई “आप भूल गए हो क्या ? आपकी हल्दी है आज । सब लोग ढूंढ ढूंढकर परेशान हो गए आपको । ऊपर से फोन भी बंद । ऐसा क्या जरूरी काम है डीजी जो शादी के बाद नही हो सकता ?"
दत्ता ने चुपचाप उसकी डाट सुन ली "मै भुला नहीं था । बस निकल रहा था यहां से ।"
"हा! बिलकुल सुबह से निकल रहा है वो यहां से ?" वेधा ने व्यंग से कहा ।
"गप रे!" दत्ता ने उसे घूर कर चुप करा दिया ।
वही मानव ने सामने हाथ दिखा कर उसे चलने का इशारा किया । दत्ता ठंडी सांस छोड़ते हुए गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए बोला "हल्दी है मेरी भूल मत जाना । सब लोग शाम तक सामने चाहिए मुझे ।"
मानव ने भी सहमति से सर हिलाकर वेधा की तरफ देखा । वेधा ने कहा वो आ जायेगा ।
शाम का समय था जब उस बड़े से मैरिज हॉल में हल्दी की रस्म शुरू थी । मेहमान फिलहाल सिर्फ दूल्हे और दुल्हन के करीबी रिश्तेदार थे ।
दत्ता का मुंह बना हुआ था क्युकी उसकी दादी चंद्रकला पास खड़ी होकर हर किसी को आकर हल्दी लगाने को बोल रही थी ताकि दत्ता उन्हे भगा ना दे ।
दूल्हे की बची हुई हल्दी दुल्हन के पास भेजने के चंद्रकला किसी को ढूंढने लगी । तभी दुल्हन की मां दर्शना सामने आ गई ।
हल्दी की थाली लेकर दर्शना जा ही रही थी की अचानक ही वो किसी से टकरा गई ।
"आह मम्मी! ये क्या किया आपने ?" मानव आपने खराब हो चुके कुर्ते को देख बोला ।
दर्शना ने कहा "कुछ नही होता । हल्दी ही तो है माऊं।"
"हा... हल्दी ही तो है । जो अब लग चुकी है इसलिए हमे इसका सही उपयोग कर लेना चाहिए ।" दर्शना के पीछे से निकल कर अथर्व सामने आया । वो मानव की बुआ का बेटा था ।
मानव ने उसकी तरफ देखा मानो कह रहा हो क्या उपयोग करना है ? कुर्ता निकाल कर एग्जिबिशन में लगा दे?
अथर्व बड़ी सी मुस्कान के साथ उसके करीब आया । कुर्ते पर फैली हल्दी को उसने दोनो हाथो से पोछ लिया । मानव ये देख कर खुश हुआ । लेकिन अगले ही पल अथर्व ने अपने हाथो पर हल्दी को मलकर उसे मानव के पूरे चेहरे पर लगा दिया ।
"देवा ... ये लड़के ।" एक कदम पीछे होकर दर्शना ने कहा और उनकी बगल से निकल कर चली गई । सबकी नजरे उनकी तरफ आ चुकी थी क्यूकी मानव चिल्लाया था ।
खाने के बाद दूल्हा दुल्हन का एक तरफ फोटो सेशन चल रहा था । मानव की बहन मृदुला वाकई खूबसूरत थी । इसी बीच वेधा अपने हाथ में कुछ पेपर्स पकड़ कर किसी को ढूंढते हुए मानव के सामने आया ।
"क्या हुआ भाई ?" मानव ने पूछा ।
"अरे वो वेडिंग ऑर्गेनाइजर्स ने कुछ पेपर्स भेजे है । इस पर साइन चाहिए । तुम करोगे या फिर तुम्हारे पप्पा को ढूंढ लू ?" वेधा ने भौंहे उचका दी ।
मानव ने आसपास देखा । उसके पिता अंकुश जाधव इस समय कही नजर नहीं आ रहे थे । मानव ने सर हिलाकर पेपर्स लिए तो वेधा ने फौरन आखिरी पन्ना निकाल कर उसकी तरफ पेन बढ़ा दिया । मानव ने साइन कर दिए ।
वेधा ने पेपर्स लेकर कहा "मै लौटा कर आया ये उन्हे ।"
इतना बोलकर वो चला गया ।
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अगले दिन , शाम ढल चुकी थी और हल्के अंधेरे में वो मैरिज हॉल काफी खूबसूरत लग रहा था । मेहमान आना शुरू हो चुके थे । इसी बीच मैक्स मानव को पकड़ कर एक कमरे के बाहर ले आया ।
दत्ता के सारे दोस्त वहा खड़े थे । तभी वेधा ने कहा "जाओ , उसे किसी की मदत चाहिए ।"
"तो आप लोग क्यू नही गए ?" मानव हैरान होकर बोला । उसकी बहन की शादी थी । उसे बाकी चीजे भी देखनी थी ।
वेधा ने अफसोस के साथ कहा "उसे सिर्फ तुम्हारी मदत चाहिए ।"
मानव ने आगे कुछ नहीं कहा । दरवाजा खोलकर वो अंदर चला गया । मरून कलर की शेरवानी पहने दत्ता आइने के सामने खड़ा था जब मानव ने कहा "क्या हुआ जीजू ?"
दत्ता पलट गया "कभी जीजू ? कभी डीजी? एक बारी डिसाइड करलो जरा ।"
"मम्मी इतनी बार डाट चुकी है कल से की अब याद रखना पड़ेगा... जीजू !", मानव हल्की मुस्कान के साथ बोलकर दत्ता के करीब खड़ा हुआ "अच्छे लग रहे हो ।"
जो तस्वीर खींचते समय भी ना आ सकी ऐसी मुस्कान दत्ता के चेहरे पर आ गई । फिर उसने अपनी गर्दन ऊपर उठाकर कहा "ये बटन लग नही रहा ।"
मानव ने सर हिला दिया और उसे लगाना चाहा लेकिन उससे भी नही हो पा रहा था । उसने एकदम से कहा "लगाना जरूरी है क्या ? रहने दो ना खुला । हवा लगती रहेगी ।"
"पूरा निकाल देता हु फिर ।" दत्ता ने कहा तो मानव का मुंह बन गया । चुपचाप वो बटन लगाने की कोशिश करने लगा । लगभग पाच मिनट का समय गया लेकिन वो सफल रहा ।
"इसे खोलोगे कैसे ?" मानव ने कहा ।
"तुम्हे साथ ले जाऊंगा ।" कहते हुए दत्ता आइने की तरफ पलट गया ।
मानव ने कहा "तो फिर मैं जाऊ?"
"हा ! जाइए , आपके बिना सारे काम रुके पड़े होंगे ।" दत्ता ने परफ्यूम उठाकर खुद पर छिड़क दिया । मानव ने गहरी सांस भरी । दत्ता के करीब हमेशा वो खुशबू उसे मिल जाती थी ।
आइने में देख दत्ता दुबारा मुस्कुराया और एकदम से मानव की तरफ पलट कर उस पर भी परफ्यूम छिड़का । मानव ने खुदको सूंघना शुरू किया और ऐसा करते हुए ही वो कमरे से चला गया ।
शादी का मुहूर्त निकल रहा था । सब लोग घड़ी की तरफ देख कर आपस में बाते कर रहे थे । कबसे दर्शना मृदुला को लाने गई थी लेकिन अब तक उसका कोई पता नहीं था ।
दत्ता मंडप में बैठा हुआ था । उसने दूसरी तरफ देखा जहा उसके चाचा की बेटी युतिका खड़ी थी । दत्ता ने उसे जाने का इशारा किया तो यूतिका फौरन सर हिलाकर दुल्हन के कमरे की तरफ निकल गई ।
कुछ देर बाद ही हर तरफ हल्ला मच गया की दुल्हन भाग चुकी है । मानव के कदम लड़खड़ा गए । वो जल्दी से अपनी मां के पास पहुंचा जो थकी हुई सी चाल चलकर आ रही थी । दर्शना के हाथ में चिट्ठी देख मानव ने फौरन उसे लिया और पढ़ने लगा । अंकुश भी उसके साथ आकर खड़े हुए । उन्होंने जब चिट्ठी देखी तो अपना सर ही पकड़ लिया ।
"मम्मी पापा , मुझे माफ कर दीजिए । लेकिन मैं ये समझौते की शादी नही कर सकती । दत्ता मेरी पसंद नही है और ना ही कभी हो सकता है ।
जिसे मैं पसंद करती हु उसके साथ यहां से दूर जा रही हु । मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना ।
मृदुला !"
तभी दत्ता की बड़ी बहन अस्मिता ने वो चिट्ठी छीन ली । उसे एक बार पढ़ने के बाद अस्मिता ने मोड़कर गुस्से में दूसरी तरफ फेका और अपना पेट पकड़ कर दत्ता के सामने चली आई । वो गर्भवती थी । उसने सभी के सामने तेज आवाज में कहा "अरे भाग गई वो बेशरम । शादी नही करनी थी तो पहले ही ना बोल देती । इतना ताम झाम करवाने की क्या जरूरत थी ? अक्खे शहर के सामने हमारे मुंह पर कालिख पोथ दी । बैठा क्या है दत्ता , उठ जा वहा से ।"
दत्ता की नजरे सामने जल रहे अग्नि कुंड पर थी ।
इसी बीच वेधा ने आकर उसके कान में कुछ कहा । शायद उसे कोई खबर मिली थी ।
सभी मेहमानों के बीच से निकल कर दत्ता गुस्से में बाहर चल पड़ा । उसकी आंखे दहक रही थी । शेरवानी के ऊपरी बटन को उसने खोलना चाहा लेकिन जब वो नही खुला तो दत्ता ने उसे तोड़ दिया । वो गाड़ी में बैठने ही वाला था की किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया ।
दत्ता गुस्से में उसकी तरफ पलटा। उसके सामने मानव खड़ा था ।
"जीजू !" इससे आगे वो कुछ कहता उससे पहले ही दत्ता ने दात पीसकर कहा "अगर तुम्हारी बहन ना मिली तो शादी के लिए मंडप में तुम बैठोगे मेरे साथ । शहर के सामने वो दत्ता गायकवाड की नाक कटा कर भाग गई । उसकी सजा तुम्हारे पूरे परिवार को मिलेगी ।"
जब से बोलना भी शुरू नही किया था तब से मानव दत्ता को जानता था । लेकिन आज तक कभी उसने गुस्से में तो क्या उसके सामने तेज आवाज में बात भी नही की थी ।
मानव उसे देख कर डर गया और अपने कदम पीछे लेकर कहा "दीदी को ,,, कुछ मत करना ।"
दत्ता ने ऊपर देखना शुरू किया । उसके कदम एक जगह रुक नही रहे थे । वेधा ने तुरंत ही मानव को पीछे खींच लिया "कुछ मत बोलो । वो अभी गुस्से में है ।"
मानव की आंखो से टपटप आंसू गिरने लगे । उसने फौरन अपना सर झुका लिया । वही दत्ता गाड़ी में बैठा और तेज आवाज में उसने दरवाजा बंद कर लिया । पल भर में उसकी गाड़ी मानव को नजरो से ओझल हो गई ।
एक सुनसान सड़क पर एक गाड़ी पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी । ड्राइविंग सीट पर एक लड़का था तो वही पैसेंजर सीट पर मृदुला बैठी थी । बार बार ना चाहते हुए भी उसकी नजरे गाड़ी के शीशे पर रुक पीछे खाली सड़क को देखने लगती ।
अचानक ही सामने से एक गाड़ी की रोशनी उन पर पड़ी । मृदुला ने लड़के के हाथ पर अपना हाथ रखा "नक्ष !"
मजबूरन नक्ष को गाड़ी रोकनी पड़ी । क्युकी सामने तीन गाड़िया पूरा रास्ता रोक खड़ी थी बीच वाली गाड़ी के बोनेट पर कोई बैठा हुआ था ।
मृदुला का गला सुख गया जब उनकी गाड़ी के हैडलाइट की रोशनी उस शख्स पर पड़ी ।
हाथ में गन लेकर बैठा हुआ था दत्ता । मृदुला ने नक्ष के हाथ पर मारना शुरू कर दिया "गाड़ी घुमाओ, जल्दी गाड़ी घुमाओ ।"
"श्श ...! कुछ नही होगा ।" नक्ष ने कहा और मृदुला के रोकने के बावजूद वो गाड़ी से उतर गया ।
मजबूरन मृदुला को भी बाहर आना पड़ गया । जैसे ही वो बाहर आए दत्ता के लोगो ने उन्हें घेर लिया ।
दत्ता ने सीधे नक्ष की तरफ देखा "दोस्त बनकर आते है और पीठ में छुरा घोप चले जाते है । एक बार के लिए धोखा दे देता । दोस्ती के नाम पर माफ कर देता मै । लेकिन शादी के मंडप से तूने उस लड़की को भगाया जिससे मेरी शादी हो रही थी ?"
दत्ता की आवाज मौत सी ठंडी थी । नक्ष को अपनी रीड की हड्डी में सिहरन महसूस होने लगी ।
दत्ता एकदम नीचे उतर गया तो नक्ष और मृदुला दोनो ही एक एक कदम पीछे हट गए । दत्ता ने नक्ष को निशाना बनाया "पहले कौन जायेगा ?"
"दत्ता सुनो !" मृदुला ने कहना चाहा ।
"मुंह बंद !" दत्ता ने उसे घूर कर चुप करा दिया ।
फिर उसने कहा "वो दोस्त ही क्या जो दूसरे दोस्त के लिए जान की बाजी ना लगा दे ? एक काम करते है । तुझे मार कर इससे शादी करूंगा । आखिर मेरी भी कुछ इज्जत है ना ? कल सुबह पेपर की हेडलाइन नही बनना मुझे ।"
नक्ष में माथे पर ठंडा पसीना उभर आया । इसी बीच वेधा ने दत्ता के कंधे पर हाथ रखा "इतना आगे बढ़ने की जरूरत नहीं है दत्ता । दोस्त है अपना ।"
"तुझे भी उसके आगे खड़ा कर दू?" दत्ता ने कहा तो वेधा चुप हो गया ।
मृदुला एकदम से नक्ष के सामने आकर खड़ी हो गई "अगर किसी को मरना चाहिए तो वो मै हु । नक्ष को जाने दो ।"
"तेरी मर्जी ।" दत्ता ने हल्की सी गर्दन टेढ़ी की और अगले ही पल गोली चला दी । उस शांत जगह पर दो चीखे गुंजकर शांत पड़ गई ।
कहानी पसंद आए तो फॉलो करना ना भूले। आगे जानने के लिए कहानी के साथ जुड़े रहे । समीक्षा के साथ साथ स्टीकर देना और फॉलो करना बिलकुल भी ना भूले ।