नमक का कर्ज - Chapter 2
एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था।
एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए।
लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा।
अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।
दुर्भाग्य देखिए कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया।
डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा।
डाकू सेठ से उसका धन आदि छीनने लगे।
तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे।
उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या?
अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा। उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया।
उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है।
उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं।
यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया।
दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा।
सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई।
नेक्स्ट
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जीवन का कीमत
मगध सम्राट चन्द्रगुप्त ने एक बार अपनी सभा मे पूछा : देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?
मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल,गेहूं,ज्वार,बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !
तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा : राजन, सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है, इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया,लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।
तब सम्राट ने उनसे पूछा : आपका इस बारे में क्या मत है ?
चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।
प्रधानमंत्री ने कहा:शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें । यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।
प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं ।
सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है ?
तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ? जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपना जान बचाने मे असमर्थ है।और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि । पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं । तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।
शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार ?
नेक्स्ट कहानी
*एक महात्मा नित्य भिक्षा के लिए जाते। सब लोग अपना सौभाग्य मानते हैं संत को भिक्षा देकर, पर एक बुढ़िया गालियाँ देती और कुछ न देती। संत भी बड़े अद्भुत, उसके यहाँ रोज जाते। कोई कहता -- बाबा! वह तो गालियाँ देती है, काहे को जाते हो? बोले -- जो कोई नहीं देता, सो वह देती है।*
*बुढ़िया खीझी हुई थी। उसके घर बेटे का विवाह तो हो गया था, पर पौत्र का जन्म नहीं हुआ था। हमेशा की भाँति एक दिन महात्मा गये। कपड़े का पोता बनाकर पुताई का काम कर रही थी। तब तक बाबा ने कहा -- भवति भिक्षां देहि। ••••बड़ी नाराज हुई। फिर आ गया तू? सो कपड़े का पोता, जिससे पुताई कर रही थी, वह फेंक कर मारा। महात्मा की छाती में लगा। अब घबड़ा गई कि गलती तो कर बैठी, और महात्मा ने क्या किया? जैसे ही छाती में वस्त्र लगा, नीचे गिरा। महात्मा ने पोता ही हाथ में उठा लिया। बोले -- चल मैया, तूने आज दिया तो कुछ, लेकिन हम भी बिना दिये नहीं जायेंगे।*
*अब सोचने लगी, श्राप देंगे पता नहीं क्या करेंगे। पर महात्मा बोले --*
*संत माधव दास भी उत्तर इसी का देगा। और*
*पोता अगर दिया है तो, जा पोता तुझे मिलेगा।।*
*घर में पोते का जन्म हुआ, संत की वाणी। बुढ़िया रोती थी।*
*पोता दियो न प्रेम सों,*
*रिस बस दीन्हों मार।*
*ऐसे पुण्यन सों सखी*
*मेरे पोता खेलत द्वार।।*
*जो मैं ऐसे संत को*
*देती प्रेम प्रसाद।*
*तौ घर में सुत उपजते*
*जैसे ध्रुव प्रह्लाद।।*
*महात्मा पोते को लेकर गये।कींचड़ में सना हुआ था, पानी में डालकर धोया। साफ किया, घी में डाल दिया। बत्ती बनाई, दिया जलाया। पोता कह रहा था --*
*धन्य है सत्पुरुषों का संग*
*बदल देते जीवन का रंग।*
*पोता मैं रोता था पड़ा*
*जहाँ रक्त अरु पीव।।*
*चौके में फेरा जाता*
*मरते थे लाखों जीव।*
*आ गया था जीवन से तंग*
*धन्य है सत्पुरुषों का संग।।*
*जल में डाल के साफ किया*
*फिर दीन्हा घृत में डाल।*
*इसी तरह हरि मंदिर पहुँचा*
*देखा ठाकुर द्वार।।*
*बन गया पूजा का अरधंग*
*धन्य है सत्पुरुषों का संग।।*
*झूला करूँ आरती ऊपर*
*गरुण करें गुन गाथ।*
*देते हैं मेरे प्रकाश में*
*दर्शन दीनानाथ ।।*
*असीसें अन्धे और अपंग*
*धन्य है सत्पुरुषों का संग।*
*बदल देते जीवन का रंग।
plz follow me.....
priyanka Bagani.....