In the shadows of moonlight - Chapter 1
अध्याय 1: दो अजनबी, एक अधूरा रिश्ता
पटना की सर्द रात अपनी चुप्पियों में कई राज़ समेटे थी। चाँद बादलों से झाँक रहा था, जैसे किसी अधूरी कहानी को देख रहा हो। मुख्यमंत्री ज़ाय्यान अल-मुतकाबिर, 32 वर्षीय युवा नेता, अपनी काली गाड़ी में बैठा शांत नजर आ रहा था—पर अंदर से टूट-सा रहा था। उसकी गहरी नीली आँखें अक्सर एक ही नाम पर ठहर जाती थीं… लियाना नूर।
वो लड़की जिससे वह कभी मिला नहीं, जिसकी तस्वीर भी उसने कभी नहीं देखी। लेकिन बचपन से ही उसके हर खर्च, हर ज़रूरत की ज़िम्मेदारी ज़ाय्यान ने निभाई थी।
क्यों? क्योंकि यासीन अख्तर कुरैशी, जो ज़ाय्यान के पिता के समय से उनके वफादार ड्राइवर रहे थे, ने एक दिन बस इतना कहा था:
"साहब, मेरी बेटी मां के बिना है। अगर मैं कभी न रहूं, तो उसका ख्याल रखिएगा।"
ज़ाय्यान ने वादा किया, और वो निभाया—चुपचाप।
हर महीने पैसे भेजे, स्कूल की फ़ीस भरी, किताबें, कपड़े—पर कभी उससे मिला नहीं।
बस... उसके नाम से उसे सुकून मिलता था।
उधर, पटना की एक गली में लियाना नूर अपने छोटे-से घर में सुबह की चाय बना रही थी। आंगन में तुलसी, दीवारों पर पापा की मरम्मत की हुई घड़ी, और रसोई में पुराने रेडियो की आवाज़—यही थी उसकी दुनिया।
लियाना बेहद मासूम, शांत और गहराई से भरी लड़की थी। उसकी मां बचपन में ही गुजर गई थी। तब से पापा ही उसका सबकुछ थे—उसकी दुनिया, उसकी खुशियाँ, उसका सहारा।
उस दिन, जैसे ही उसके पापा यासीन अपनी ड्रेस पहनकर निकलने लगे, लियाना दौड़ती हुई दरवाज़े तक आई।
"पापा, आज मत जाइए ना… मेरा दिल बहुत घबरा रहा है। कुछ अच्छा नहीं लग रहा।"
यासीन मुस्कराए, उसका सिर सहलाया और बोले:
"पगली… तेरा पापा हर रोज़ जाता है और हर शाम तेरे लिए लौटकर आता है। आज मिठाई भी लाऊंगा तेरे लिए। डर मत।"
लियाना ने उनका हाथ पकड़ा… और बस देखा… जैसे अलविदा कहना नहीं चाहती थी।
उधर मुख्यमंत्री का काफ़िला निकला। ज़ाय्यान पीछे बैठा था, चुप, गंभीर। रास्ता सुनसान था, तभी अचानक नकाबपोश हमलावरों ने गाड़ी को घेर लिया।
गोलियों की आवाज़ें गूंज उठीं।
यासीन ने बिना एक पल गंवाए गाड़ी मोड़ी और खुद को ज़ाय्यान के सामने ढाल दिया।
तीन गोलियां। एक जीवन।
जमीन पर गिरते हुए बस इतना कहा:
"साहब को कुछ नहीं होना चाहिए… लियाना को बता दीजिए… मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ…"
ज़ाय्यान का दिल बैठ गया। वो इंसान, जिसने उसे ज़िंदगी भर वफादारी दी… उसकी बेटी का नाम, अब एक अधूरी जिम्मेदारी नहीं—एक ज़िंदा एहसास बन चुका था।
अगली सुबह, मुख्यमंत्री हाउस से गाड़ी भेजी गई। सिपाही ने कहा,
"मुख्यमंत्री साहब ने आपको हवेली बुलाया है।"
लियाना चुप रही। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे, अब गुस्सा था।
"अब क्यों? जब मेरा सब कुछ चला गया? वो हवेली? नहीं जाऊंगी। मेरी दुनिया तो पापा के साथ चली गई।"
उसने गाड़ी की ओर पीठ की और वापस घर के अंदर चली गई।
एक अधूरी कहानी यहीं से शुरू होती है…
क्या कभी ये रिश्ता मुकम्मल होगा?
जानिए अगले अध्याय में…