H0t Casanova Lover Ch. 3

H0t Casanova lover - Chapter 3 (आह्ह्हृ .. दबाते रहो)

Posted by Moon Star • Jul 13, 2025 11:11 PM

### **"सुबह का ठहराव… और वो अधूरी प्यास"**

**स्थान: होटल रूम – सुबह 6:40 AM**

खिड़की के पर्दे अब भी आधे खुले थे।

सूरज की हल्की किरणें कमरे की दीवारों को धीरे-धीरे छू रही थीं — जैसे रात के सारे राज़ अब उजाले में आ रहे हों।

बिस्तर की चादरें अब भी थोड़ी उलझी थीं।

और उन चादरों के बीच दो लोग… एक-दूसरे के इतने करीब, जैसे ****** की कोई अलग पहचान ही ना हो**।

नेहा अभी तक आरव की बाँहों में थी।

उसका सिर उसकी छाती पर टिका था, और उंगलियाँ हल्के-हल्के उसकी त्वचा पर कोई नाम लिख रही थीं…

शायद **वो नाम जो वो खुद नहीं रखना चाहती थी।**

आयूष जाग चुका था, लेकिन कुछ कह नहीं रहा था।

बस **नेहा की साँसों की गर्माहट**, और उसके स्पर्श की धीमी चाल को महसूस कर रहा था।

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**"तुम सो रहे हो या सोच रहे हो?"**

नेहा की आवाज़ उसकी छाती से उठती हुई लगी — धीमी, गहरी और भीगी-सी।

**"तुम जो कर रही हो, उसमें सोचने की जगह कहाँ है…"**

आयूष ने धीरे से कहा और अपनी उँगलियाँ उसकी पीठ पर फिराने लगा —

एक रेखा सीखी हुई… **कंधे से कमर तक**… और फिर वापस।

नेहा ने उसकी ओर मुँह किया, उसके बहुत पास…

उनकी आँखें अब भी उनींदी थीं, लेकिन उनमें जो चमक थी, वो सिर्फ रात की नहीं थी —

**वो चाहत थी, जो अभी पूरी नहीं हुई थी।**

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**"कल रात सिर्फ शुरुआत थी न?"**

नेहा ने धीमे से पूछा।

आयूष ने जवाब नहीं दिया…

बस उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में लिया और **एक गहरा चुम्बन** उसकी आँखों पर रखा।

फिर उसकी गर्दन पर, और फिर उसके होठों पर…

जहाँ से उसकी साँसें कुछ और तेज़ हो गईं।

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नेहा ने चादर को थोड़ा पीछे किया,

और खुद को उसकी बाँहों में खींचकर उसकी जांघ पर अपनी टाँग रख दी।

आयूष ने उसका चेहरा देखकर मुस्कराया —

**"तुम्हें कुछ नहीं कहना होता… तुम्हारी आँखें सब बोल देती हैं।"**

**"और तुम्हारे होंठ सब कर देते हैं…"**

उसने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा और उसे नीचे खींच लिया।

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अब दोनों के बीच कोई रुकावट नहीं थी।

ना कपड़े, ना सवाल, ना सोच।

**बस एक खामोशी थी जो हर हरकत में गूंज रही थी।**

आयूष ने धीरे से उसकी कमर के नीचे हाथ रखा, और खुद को उसके करीब खींचा।

**नेहा की आँखें बंद थीं**, लेकिन उसकी साँसों की लय बताती थी कि **हर छुअन उसे भीतर तक महसूस हो रही है।**

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**"आयूष…"**

उसने एक लंबी साँस लेकर कहा —

**"आज… मुझे खुद से अलग कर दो…"**

**"नहीं…"**

उसने फुसफुसाया —

**"आज… मैं तुम्हें अपने जैसा बना दूँगा…"**

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उसके होठ अब नेहा की गर्दन से नीचे उतरने लगे थे —

धीरे-धीरे, हर हिस्से को छूते हुए,

**जैसे कोई साज़ बज रहा हो**, और हर तार पर उसकी उँगलियाँ चल रही हों।

नेहा ने खुद को उसके ऊपर छोड़ा…

उसकी उँगलियाँ अब उसकी पीठ पर कसने लगीं,

और होंठों से **सिर्फ नाम नहीं, बल्कि वो आहें भी निकल रही थीं जो अब तक रोकी गई थीं।**

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**बेड अब साँसों के साथ-साथ हिल रहा था।**

चादरों की रेखाएँ अब सीधी नहीं थीं,

और उनके बीच एक गर्माहट थी —

**जो सिर्फ ****ों की नहीं, भीतर के तूफ़ानों की थी।**

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कुछ देर बाद…

सभी आवाज़ें धीमी होने लगीं,

साँसें एक जैसी हो गईं,

और शरीर फिर से एक-दूसरे में समा गए।

नेहा आयूष के सीने पर लेटी थी, पसीने से भीगी हुई,

लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून था —

**जैसे कोई भूख थी, जो अब शांत हुई थी…**

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**"अब क्या?"**

नेहा ने आँखें खोले बिना पूछा।

**"अब… हम उठेंगे, कॉफ़ी पिएँगे… और फिर शायद… सब भूल जाएँगे।"**

**"या फिर… हर बार याद करेंगे जब कुछ अधूरा लगेगा…"**

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आयूष ने उसकी हथेली पकड़ी, होंठों तक ले गया…

और बिना कुछ कहे, **बस उसकी हथेली को चूम लिया**।

कमरे में अब सिर्फ उजाला था,

लेकिन दिल में अभी भी वो **रात की नमी और सुबह की आँच** बाकी थी।

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### \*कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते…

बस एक सुबह की खामोश गर्माहट में सब कह जाते हैं।\*

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