The Force marriage contract - Chapter 3
नागेन्द्र ने यामी की ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई।
उसकी उँगलियों की पकड़ इतनी मज़बूत थी कि यामी के होंठ काँप रहे थे।
नागेन्द्र धीमे मगर सख़्त लहजे में बोला—
“अब और मत छटपटाओ… जितना भागोगी, उतना ही मैं तुम्हें अपने क़रीब खींचूँगा।”
यामी ने काँपते हुए सिर झटक दिया।
“नहीं… मुझे छोड़ दो, नागेन्द्र। तुम्हारा हक़ नहीं है मुझ पर।”
नागेन्द्र की आँखों में अजीब-सा पागलपन था।
“हक़? मैं हक़ नहीं ढूँढ रहा, यामी। मैं हिसाब ले रहा हूँ। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन से जो छीना, अब मैं तुमसे छीनूँगा।”
यामी की आँखें फैल गईं।
“ये पागलपन है! अगर भाई ने ग़लती की भी थी, तो उसकी सज़ा मैं क्यों दूँ? मैं उसका गुनाह नहीं हूँ!”
नागेन्द्र झुककर उसके बेहद क़रीब आ गया।
उसकी साँसें यामी की साँसों से टकरा रही थीं।
“तुम गुनाह नहीं हो… लेकिन गुनाह की याद हो। और मैं चाहता हूँ कि हर बार जब तुम टूटो, हर बार जब तुम कराहो… मुझे मेरी बहन की चीख़ सुनाई दे। तभी मेरा बदला पूरा होगा।”
यामी ने ज़ोर से उसे धक्का दिया, मगर नागेन्द्र ने उसकी कलाई कसकर पकड़ ली और दीवार से दबा दिया।
“मुझे मत छुओ!” उसकी आवाज़ टूटी और काँपती हुई थी।
नागेन्द्र के होंठ उसके कान के पास झुके।
“तुम्हारा ‘मत छुओ’ कहना ही मुझे और छूने पर मजबूर करता है। तुम्हारे आँसू मुझे रोकते नहीं… उकसाते हैं।”
यामी रोते हुए बोली—
“तुम्हें इंसानियत का ज़रा भी एहसास नहीं है?”
नागेन्द्र हँस पड़ा।
“इंसानियत? मेरी इंसानियत उस दिन मर गई थी, जब मेरी बहन अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी और तुम्हारा भाई हँसता हुआ कहीं और नई ज़िंदगी बसा रहा था।”
यामी ने काँपते हुए सिर हिलाया।
“झूठ! सब झूठ! मेरा भाई ऐसा नहीं कर सकता। उसने धोखा नहीं दिया होगा।”
नागेन्द्र का चेहरा कस गया।
“मेरे सामने अपनी सफ़ाई मत दो। मुझे सच्चाई पता है। और सच्चाई ये है कि तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की ज़िंदगी तबाह की। अब वही तबाही तुम्हारे हिस्से आएगी।”
उसने यामी का चेहरा पकड़कर अपने करीब खींचा।
यामी तड़प उठी।
“छोड़ो! पागल हो तुम… राक्षस हो!”
नागेन्द्र की पकड़ और मज़बूत हो गई।
“हाँ, राक्षस ही सही। अगर राक्षस बनकर मुझे सुकून मिलेगा, तो मैं वही बनूँगा।”
यामी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“तुम्हें सुकून कभी नहीं मिलेगा। चाहे जितना भी ज़ोर लगा लो, चाहे जितना भी मुझे तोड़ लो… तुम्हारी आत्मा हमेशा जलती रहेगी।”
नागेन्द्र एक पल को ठिठक गया, फिर ज़ोर से हँसा।
“तुम्हारी आत्मा? उसे भी मैं रौंद दूँगा। तुम्हारे आँसू, तुम्हारे विरोध, तुम्हारी कराह… सब मेरी जीत होगी।”
यामी काँपते हुए बोली—
“नहीं! मैं तुम्हें जीतने नहीं दूँगी। मेरे आँसू तुम्हारी जीत नहीं, मेरी ताक़त होंगे। और याद रखना, नागेन्द्र… यही आँसू एक दिन तुम्हें डुबो देंगे।”
नागेन्द्र ने उसकी कलाई छोड़कर उसके चेहरे को कसकर पकड़ लिया।
“तुम्हें डर है न? डर ही तुम्हारी सज़ा है। तुम जितना कहोगी ‘नहीं’, मैं उतना ही ‘हाँ’ करूँगा। यही मेरा बदला है।”
यामी ने ज़ोर से कहा—
“अगर यही तुम्हारा बदला है, तो सुन लो… मैं टूटूँगी नहीं। चाहे तुम हज़ार बार कोशिश करो, मैं अपने भीतर की आग बुझने नहीं दूँगी।”
नागेन्द्र की आँखों में एक अजीब चमक उभरी।
“तो फिर मैं उस आग को ही राख बना दूँगा।”
उसने यामी को और करीब खींच लिया।
यामी ने पूरी ताक़त से उसे धक्का देने की कोशिश की।
“मुझे मत छुओ, नागेन्द्र! यह तुम्हारा बदला नहीं, तुम्हारा पाप है!”
नागेन्द्र की साँसें भारी हो गईं।
“पाप? अगर ये पाप है, तो मैं हर दिन करूँगा। क्योंकि तुम्हारे आँसू देखकर मुझे मेरी बहन की याद आती है। और मैं चाहता हूँ कि तुम उसी तरह तड़पो, जैसे वो तड़पी थी।”
यामी ने आँसुओं से भीगी आवाज़ में कहा—
“तुम्हारी बहन निर्दोष थी, मैं भी निर्दोष हूँ। लेकिन तुम निर्दोषों को ही कुचल रहे हो। तुम कभी चैन नहीं पा सकोगे।”
नागेन्द्र कुछ पल चुप रहा।
उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई, लेकिन आँखों में एक परछाईं-सी झलकी।
फिर वह बोला—
“चैन मेरे लिए मर चुका है। अब बस बदला है। और बदला तुम हो।”
यामी ने गहरी साँस ली। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर शब्दों में हिम्मत थी।
“तो सुन लो, नागेन्द्र… मैं तुम्हें बदला लेने नहीं दूँगी। तुम मुझे कैद कर सकते हो, दबा सकते हो, ज़बरदस्ती कर सकते हो… लेकिन मेरे भीतर की सच्चाई और आत्मा कभी तुम्हारे सामने झुकेगी नहीं।”
नागेन्द्र ने ठंडी मुस्कान दी।
“देखते हैं, यामी। तुम्हारी ज़िद बड़ी प्यारी है। जितनी तुम लड़ोगी… उतना ही मज़ा आएगा तुम्हें तोड़ने में।”
यामी ने काँपते हुए मगर दृढ़ आवाज़ में कहा—
“और मैं जितना टूटूँगी… उतना ही मज़बूत होकर उठूँगी।”
नागेन्द्र उसकी आँखों में देखता रह गया।
पल भर के लिए उसके चेहरे पर सख़्ती और पागलपन के बीच एक झिझक-सी आई, मगर अगले ही पल उसने फिर यामी को अपने क़रीब खींच लिया।
उसकी आवाज़ भारी थी—
“तुम्हें तोड़ना ही मेरी ज़िंदगी का मक़सद है। और जब तक मैं तुम्हें पूरी तरह से रौंद न दूँ… मैं रुकूँगा नहीं।”
यामी ने आँखें बंद कर लीं।
“रौंद लो… लेकिन याद रखना, तुम्हारी जीत भी एक दिन तुम्हारा सबसे बड़ा हार बनेगी।”