The Force Marriage Contract Ch. 2

The Force marriage contract - Chapter 2

Posted by S✨ Sood • Aug 24, 2025 03:30 PM

नागेन्द्र की उँगलियाँ यामी की कलाई पर और कस गईं।

उसकी आवाज़ भारी और ठंडी थी—

“चाहे जितना भी छटपटाओ, यामी… तुम मुझसे बच नहीं सकती।”

यामी काँप रही थी, होंठ काँप रहे थे, आँसू गालों पर बह रहे थे। उसने विरोध में खुद को छुड़ाने की कोशिश की, मगर नागेन्द्र ने उसे ज़बरदस्ती दीवार से दबा दिया।

अगले ही पल उसके होंठ जबरदस्ती यामी के होंठों पर उतर आए।

वह तड़प उठी, कराह निकली, मगर आवाज़ वहीं दब गई।

नागेन्द्र की आँखों में अजीब-सा पागलपन था।

यामी की आँखों में बेबसी और टूटन।

उसका विरोध, उसके आँसू, उसकी कराह… सब नागेन्द्र की ज़िद और दीवानगी के सामने बेअसर होते जा रहे थे।

जब उसने आखिरकार छोड़ा, यामी की साँसें टूटी-टूटी बाहर निकलीं।

मगर राहत का एक पल भी न देकर नागेन्द्र ने फिर उसे खींचकर अपने करीब कर लिया—

“याद रखो… जितना भी रो लो, जितना भी लड़ लो… मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा।”

यामी की आँखें बंद हो गईं। आँसुओं के पीछे से एक आवाज़ उसके भीतर गूँज रही थी—

एक दिन यही ज़ुल्म, यही दीवानगी उसका अंत बनेगी।

यामी की आँखें आँसुओं से भीगी थीं। वह हाँफ रही थी, टूटी हुई थी। लेकिन नागेन्द्र के चेहरे पर ठंडी सख़्ती थी। उसकी आँखों में वह चमक थी जो सिर्फ़ बदले से पैदा होती है।

उसने यामी का चेहरा अपनी ओर मोड़ा और कहा—

“जानती हो, तुम क्यों यहाँ हो? क्यों मैं तुम्हें ऐसे बाँधकर रखे हुए हूँ?”

यामी काँपती आवाज़ में बोली—

“मैंने… मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, नागेन्द्र? तुम ऐसा क्यों कर रहे हो मेरे साथ?”

नागेन्द्र की हँसी ठंडी और कड़वी थी।

“तुम्हारा कसूर सीधा है, यामी। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की ज़िंदगी तबाह की थी। और अब उसका हिसाब तुम दोगी।”

यामी की साँसें रुक-सी गईं। उसने अविश्वास से उसकी ओर देखा।

“भाई? क्या… क्या कह रहे हो तुम? कौन-सी बात कर रहे हो?”

नागेन्द्र की आँखें पल भर को अंधेरी हो गईं। उसकी आवाज़ और गहरी हो गई।

“तुम्हारे उस प्यारे भाई ने… मेरी बहन को प्यार के नाम पर धोखा दिया। उसने उसे सपने दिखाए, कसमे खाईं, और फिर छोड़ दिया। और जानते हो यामी, उस धोखे का नतीजा क्या हुआ?”

यामी की आँखों से आँसू और तेज़ बह निकले। वह काँपते हुए बोली—

“नहीं… यह सच नहीं हो सकता…”

नागेन्द्र ने उसकी बात बीच में ही काट दी—

“सच यही है। मेरी बहन ने उस धोखे को सहन नहीं किया। उसने ज़िंदगी खत्म करने की कोशिश की। और जब वह अस्पताल में तड़प रही थी, तब मेरी आँखों के सामने उसका सबकुछ टूट रहा था। मैं कुछ कर नहीं पाया। और उसी सदमे में मेरे पिता भी चले गए। उनका दिल टूट गया था। मेरी माँ ने भी जीने की वजह खो दी। पूरा घर उजड़ गया। और इस सबका गुनहगार कौन था? तुम्हारा भाई।”

यामी ने सिसकते हुए सिर झुका लिया।

“लेकिन… मैं? मैंने तो कुछ नहीं किया…”

नागेन्द्र ने ज़ोर से कहा—

“हाँ, तुमने सीधे तौर पर कुछ नहीं किया। लेकिन उस धोखे की सज़ा मैं तुम्हें दूँगा। क्योंकि जिस दर्द से मेरी बहन और मेरे पिता गुज़रे हैं, वही दर्द अब तुम महसूस करोगी। तुम्हारे भाई ने हमें जीते जी मार दिया… और अब तुमसे मैं हिसाब लूँगा।”

यामी ने काँपते हुए कहा—

“ये… ये न्याय नहीं है, नागेन्द्र। यह तो और अन्याय है। अगर भाई ने गलती की, तो उसकी सज़ा मैं क्यों भुगतूँ? मैं तो उसकी बहन हूँ… उसकी परछाई नहीं।”

नागेन्द्र की आँखों में पागलपन की चमक थी।

“परछाई ही सही, मगर दर्द वही से आएगा। तुम्हें देखकर मुझे तुम्हारे भाई की याद आती है। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी मासूमियत… सब मुझे उस आदमी के धोखे की याद दिलाता है। तुम्हारे भाई ने मेरी बहन की आँखों से आख़िरी आँसू गिराए थे। अब वही आँसू मैं तुम्हारी आँखों से देखना चाहता हूँ, बार-बार। जब तक तुम टूट न जाओ।”

यामी ने गहरी साँस ली। उसकी आवाज़ काँप रही थी, मगर भीतर से एक दृढ़ता भी निकल रही थी।

“तुम जितना चाहे मुझे तोड़ लो, नागेन्द्र। आँसू बहवा लो। मुझे कैद कर लो। लेकिन सुन लो… मैं तुम्हें माफ़ नहीं करूँगी। और एक दिन… एक दिन मैं तुम्हें वही दर्द दूँगी जिसकी तुम हक़दार हो।”

नागेन्द्र ने ठंडी मुस्कान दी।

“माफ़ी? माफ़ी की बात मत करो, यामी। अब तो मुझे सिर्फ़ बदला चाहिए। तुम्हारा भाई मेरे हाथ नहीं आया। वरना आज उसकी साँसें मैं अपने पैरों तले रौंद चुका होता। लेकिन किस्मत ने तुम्हें मेरे सामने ला दिया। और अब… तुम्हीं मेरी सज़ा हो। तुम्हारी हर धड़कन मेरे गुस्से का बोझ उठाएगी।”

यामी की आँखों से आँसू बहते रहे। उसने धीरे से कहा—

“तुम्हारे भीतर का यह गुस्सा, यह पागलपन… यह तुम्हें भी जला देगा, नागेन्द्र। मेरी आत्मा टूटेगी, लेकिन तुम्हारा मन भी कभी चैन नहीं पाएगा।”

नागेन्द्र पल भर के लिए खामोश हो गया। उसकी साँसें भारी थीं। फिर उसने धीरे से कहा—

“चैन? मेरे लिए चैन नाम की चीज़ कब की मर चुकी है, यामी। जिस दिन मेरी बहन की आँखें बंद हुई थीं, उसी दिन मेरा चैन, मेरा सुकून, सब चला गया। अब बस बदला बचा है। और बदला तुम हो।”

यामी ने गुस्से और दर्द से भरी आवाज़ में कहा—

“तो फिर सुन लो नागेन्द्र… मैं तुम्हारे भाई की गुनहगार नहीं हूँ। अगर तुम समझते हो कि मुझे तोड़कर तुम्हें सुकून मिलेगा, तो ये तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है। तुम मुझे तोड़ सकते हो, मगर मेरे भीतर की सच्चाई को नहीं। और एक दिन वही सच्चाई तुम्हें गिरा देगी।”

नागेन्द्र की आँखों में एक अजीब-सी चमक आई।

“तुम्हारा विरोध… तुम्हारे आँसू… यही तो मैं चाहता हूँ, यामी। यही मेरी जीत है। जितना तुम लड़ोगी, उतना ही मैं तुम्हें और दबाऊँगा। क्योंकि हर आँसू मुझे मेरी बहन की याद दिलाता है… और हर चीख़ मुझे मेरे पिता की आख़िरी साँस।”

यामी ने सिर झुका लिया। उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था। मगर भीतर से उसने खुद से कहा—

“हाँ, आज मैं टूटी हूँ। आज मैं कैद हूँ। लेकिन मैं सिर्फ़ शिकार नहीं बनूँगी। एक दिन यही आँसू मेरी ताक़त बनेंगे। और उस दिन नागेन्द्र को मेरी खामोशी से डर लगेगा।”

100%