अनवांटेड सीइओ वाइफ Ch. 2

अनवांटेड सीइओ वाइफ - Chapter 2

Posted by Devika .. • Sep 29, 2025 08:13 AM

उस दिन आरव ऑफिस से जल्दी लौट आया।

रिया छत पर पौधों को पानी दे रही थी।

उसके गीले बाल हवा में उड़ रहे थे, और चेहरे पर मिट्टी की खुशबू के साथ एक मासूम मुस्कान थी।

आरव कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

वो पहली बार उसे यूँ खुलकर देख रहा था—बिना किसी नकली सजावट, बिना किसी दिखावे के।

सिर्फ़ रिया… सच्ची और साफ़।

उसने धीमे से कहा—

“तुम्हें ये सब करने में मज़ा आता है?”

रिया ने मुस्कराकर उसकी तरफ़ देखा—

“हाँ। पौधे और इंसान दोनों को सिर्फ़ देखभाल चाहिए… फिर वो खिलने लगते हैं।”

आरव उस पल कुछ बोल न सका, लेकिन उसके दिल में कुछ हल्का-सा हिल गया।

डाइनिंग टेबल पर उस रात का माहौल अलग था।

रिया ने अपनी पुरानी कॉलेज की मज़ेदार घटनाएँ सुनानी शुरू कीं।

कैसे उसने और उसकी दोस्त ने प्रोफ़ेसर की क्लास में मच्छरदानी लगाई थी, और कैसे पूरा क्लासरूम हँसी से गूँज उठा था।

आरव पहले तो बस चुपचाप सुनता रहा,

लेकिन जब रिया ने मिमिक्री करके प्रोफ़ेसर की आवाज़ निकाली, तो उसके होंठों पर अनजाने में मुस्कान आ गई।

रिया ठिठक गई—

“आप… हँसे?”

आरव ने नज़रें झुका लीं।

“शायद।”

रिया की आँखों में चमक आ गई।

“मतलब आप इंसान हैं, रोबोट नहीं।”

और दोनों के बीच पहली बार हल्की-सी हँसी गूँज उठी।

कुछ दिन बाद, किचन में गलती से रिया की कलाई जल गई।

जब आरव ने देखा तो उसका चेहरा सख़्त हो गया।

“रिया! तुम्हें ज़रा-सी भी सावधानी नहीं है क्या?”

उसने तुरंत फर्स्ट एड बॉक्स उठाया और खुद उसके हाथ पर मरहम लगाया।

रिया दर्द से मुँह सिकोड़ रही थी,

और आरव उसे सँभालते हुए बुदबुदाया—

“मैं नहीं चाहता तुम्हें चोट लगे…”

रिया उसकी आँखों में देखती रही।

वहाँ पहली बार चिंता नहीं, बल्कि प्यार की परछाई थी।

उस रात रिया ने डायरी में लिखा—

"शायद आरव उतने ठंडे नहीं, जितना दुनिया कहती है।

उसके दिल के पीछे कहीं गहराई में… एक धड़कन छिपी है।"

और उधर आरव अपने कमरे में अकेले बैठा सोच रहा था—

"क्यों मुझे उसकी मुस्कान इतनी सुकून देती है? क्यों मैं अब उसके आँसुओं से डरने लगा हूँ?"

दोनों के बीच अभी भी दूरी थी, लेकिन उस दूरी के बीच प्यार की पहली कोंपलें फूट चुकी थीं।

आरव की बेचैनी

गेस्ट हाउस वाली रात के बाद आरव के दिल में एक अजीब-सी हलचल थी।

वो ऑफिस में बैठा भी रिया की मुस्कान याद करता,

मीटिंग में होते हुए भी उसके मासूम चेहरे की छवि उसकी आँखों के सामने आ जाती।

कभी-कभी वो खुद से झुंझलाता—

"नहीं, मैं रिश्तों में नहीं पड़ सकता। प्यार… प्यार सिर्फ़ दर्द देता है।"

लेकिन सच ये था कि उसके दिल की दीवारें अब दरक रही थीं।

रिया ने अब आरव की खामोशियों को पढ़ना सीख लिया था।

वो जानती थी कि उसके भीतर बहुत दर्द है, जो वह किसी को बताना नहीं चाहता।

एक शाम जब आरव घर आया, थका और चिड़चिड़ा,

रिया उसके लिए कॉफ़ी लेकर आई और धीरे से बोली—

“कभी-कभी अपने बोझ किसी और के साथ बाँट लेना चाहिए। दिल हल्का हो जाता है।”

आरव ने उसकी तरफ़ देखा,

लेकिन उसकी आँखों में कोई सवाल नहीं था, बस अपनापन था।

उस अपनापन ने उसके सीने में दबे ज्वालामुखी को हिलाकर रख दिया।

कुछ दिन बाद, आरव और रिया एक चैरिटी इवेंट में गए।

वहाँ एक छोटी बच्ची रिया से लिपटकर कहने लगी—

“आप तो मेरी मम्मी जैसी हो…”

रिया ने बच्ची को प्यार से गले लगाया।

उसकी आँखों में मातृत्व की कोमलता देखकर आरव ठिठक गया।

उसके दिल से आवाज़ निकली—

"काश, रिया हमेशा मेरी ज़िंदगी में ऐसे ही रहे।"

उसी रात, जब दोनों बालकनी में खड़े चाँद देख रहे थे,

आरव ने धीमे स्वर में कहा—

“रिया… तुमने मेरी ज़िंदगी बदल दी है।”

रिया ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

“क्या मतलब?”

आरव उसकी आँखों में देखते हुए बोला—

“मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि शादी… मुझे सुकून दे सकती है।

लेकिन तुम्हारे साथ रहकर मुझे लगता है जैसे… मैं अधूरा नहीं हूँ।”

रिया की साँसें थम गईं।

उसने धीमे से पूछा—

“तो… क्या ये सिर्फ़ डील वाली शादी नहीं रही?”

आरव ने एक कदम उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा—

“नहीं, रिया… अब ये मेरा सच है।

मुझे तुमसे… प्यार हो गया है।”

रिया की आँखों में आँसू भर आए।

जिस इज़हार का वो महीनों से इंतज़ार कर रही थी, आज उसके सामने सच बनकर खड़ा था।

उसने काँपती आवाज़ में कहा—

“तुम्हें पता भी है ये मेरे लिए कितना मायने रखता है?”

आरव ने उसका हाथ थामकर कहा—

“हाँ, और अब से मैं हर लम्हा तुम्हें वो देना चाहता हूँ… जिसकी तुम हक़दार हो।”

आरव ने उसे पहली बार चूमा। उसके होठों को चूमते हुए वेह उसमें खो गया था। उसने उसे दीवार से सटाते हुए उसके दोनों हाथों को ऊपर की तरफ करते हुए बांधा और उसके होठों को चूमने लगा। यह किस एक लोंग किस में बदल गई।

उसने उसकी आँखों में झाँकते हुए धीमे स्वर में कहा —

“आज मैं तुम्हारे साथ सभी हदें पार कर देना चाहता हूँ।”

यह शब्द मानो वातावरण में घुलते ही एक अनकहा जादू बुन गए। कमरे की खामोशी अब बोझिल नहीं रही, बल्कि एक मधुर संगीत-सा महसूस होने लगी। वह लरज गई, उसकी धड़कनें तेज़ हो उठीं। उसका हाथ उसके हाथ में सिमट गया, और उस स्पर्श से जैसे पूरे शरीर में एक मीठी सिहरन दौड़ गई।

धीरे-धीरे उसने उसे अपनी ओर खींच लिया। उनकी साँसें एक-दूसरे से टकराने लगीं। आँखों की खामोश भाषा ने शब्दों को पीछे छोड़ दिया था। उनके बीच अब केवल चाहत, अपनापन और एक गहरी तड़प बाकी थी।

उस रात समय जैसे ठहर गया था। दीये की हल्की रोशनी और खिड़की से आती चाँदनी दोनों को एक दिव्य आभा में नहला रही थी। वे एक-दूसरे में खोते चले गए—जैसे दो नदियाँ मिलकर सागर का रूप ले लेती हैं। हर पल एक नई अनुभूति, हर स्पर्श एक नई गहराई समेटे हुए था।

उसके होंठों पर मुस्कान थी और आँखों में भीनी नमी। जैसे सदियों की प्रतीक्षा आज पूरी हो रही हो।

वह रात केवल एक मिलन की रात नहीं थी—यह वह क्षण था जब प्रेम ने अपना असली रूप पाया। यह रात उनकी आत्माओं के मिलन की साक्षी बनी।

सुबह जब पहली किरण खिड़की से भीतर आई, तो दोनों एक-दूसरे की बाहों में सिमटे हुए थे। उस शांति और तृप्ति में मानो दुनिया की सारी अधूरी कहानियाँ पूरी हो गई थीं।

उस रात, पहली बार दोनों के बीच सच्चे रिश्ते की नींव रखी गई।

अब ये शादी किसी मजबूरी या सौदे की नहीं, बल्कि दिल की कबूलियत की शादी बन चुकी थी। एसी शादी जिसमें प्यार था, मंजूरी थी और वो सब कुछ था जो एक पति पत्नी के रिश्ते में होना चाहिए। आज शादी के बाद पहली बार उन्होनें एक साथ इतने करीब होते हुए रात गुजारी थी, जिसमें दोनों पूर्णता के साथ एक दूसरे के हो गए थे। रिया खुश थी कि उसकी अनचाही शादी अब चाहत की शादी में बादल चुकी थी।

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