कॉन्ट्रैक्ट मैरिज 143.......... Ch. 2

: दो दुनिया, दो रफ्तार… एक शुरुआत Chapter 2

Posted by Priyanka Amit Bagani • Dec 02, 2025 07:11 PM

मुंबई | एस.के. एंटरप्राइजेज हेड ऑफिस

मुंबई के बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट में खड़ा एस.के. एम्पायर्स टॉवर—

75 मंज़िला इमारत, काँच से ढका पूरा स्ट्रक्चर, मानो आसमान से बात कर रहा हो।

इसी के 32वें फ्लोर पर था वो आदमी…

जिससे पूरा बिज़नेस वर्ल्ड डरता भी था और प्रभावित भी।

शिव कपूर।

जिसे सब एस.के. कहते हैं।

सीईओ, एस.के. एंटरप्राइजेज।

एशिया का तीसरा सबसे सफल बिजनेसमैन।

उसका केबिन—

ब्लैक, व्हाइट और गोल्ड थीम में इतना क्लासी कि कोई भी अंदर जाते ही खुद को छोटा समझने लगे।

अभी, उसी केबिन में शिव की गरजती आवाज़ गूंज रही थी।

“क्या एक परफेक्ट मॉडल भी नहीं ढूँढ सकते तुम लोग?

ये कैसी टीम है?

ये कौन-सा काम है?

मैं पहली बार क्लोदिंग इंडस्ट्री के प्रोजेक्ट में हाथ डाल रहा हूँ… और यहाँ एक मॉडल तक नहीं मिल रही?

यू ऑल आर गुड फॉर नथिंग!”

उसकी ब्राउन-चॉकलेटी आँखों में चमकता गुस्सा…

तेज़ चाल, चौड़े कंधे, 6.3 फीट की ऊँचाई…

और व्हाइट कोट–व्हाइट पैंट के साथ ब्लैक शर्ट में उसकी पर्सनालिटी बिजली सी कौंध रही थी।

उसके होंठ थोड़े दबे हुए…

जॉलाइन सख़्त…

और चेहरे पर वो गुस्सा जो किसी को भी काँपने पर मजबूर कर दे। लड़की का ड्रीम बॉय, पर उसके गुस्से को देखकर हर कोई लड़की डर जाए, लड़की क्या, लड़का भी डर जाए, उफ़्फ़! यह स्मार्टनेस और ऊपर से गुस्सा!

शिव कपूर = गुस्सा + पावर + परफेक्शन।

“शिव, जस्ट रिलैक्स…”

उसका बेस्ट फ्रेंड आदित्य सामने खड़ा था, घबराया हुआ।

(आदित्य 6 फीट हाइट, दिखने में डॉल हैंडसम डैशिंग, बस हमारे हीरो से थोड़ा सा कम। ब्लू शर्ट, ब्लैक जींस, ऊपर से ब्लैक ब्लेजर। यह भी बैचलर है, थोड़ा सा फ्लर्ट करता है और मजाकिया भी है, पर काम के टाइम एकदम सीरियस। इन्हें गुस्सा ज़्यादा आता नहीं है, पर जब गुस्सा आता है तो क्या ही कहना।)

“तुम जानता है आदित्य…” शिव ने टेबल पर हाथ मारा,

“लॉन्च में सिर्फ़ 15 दिन बचे हैं।

मैंने करोड़ों का दांव लगाया है।

और अभी तक—कुछ भी तैयार नहीं!”

आदित्य शांत स्वर में बोला,

“हम ढूँढ लेंगे शिव…

तू टेंशन मत ले, हम सब लग पड़े हैं।”

“कब आदित्य? कब?

ये सब निकम्मे हैं!

मैं खुद करूँ सब?”

शिव झटके से मुड़ा और तेज़ कदमों से अपने केबिन की ओर चला गया।

उसके पीछे-पीछे उसका मैनेजर गोविंद भागता हुआ आया—

“सर… सर… आपकी नेक्स्ट मीटिंग का टाइम हो गया है।”

शिव ने उसे झट से देखा—

गुस्से और तेज़ी से भरी नज़र—

“चलो।”

गोविंद फाइलें पकड़ता हुआ उसके पीछे दौड़ा।

आदित्य ने गहरी साँस छोड़ी…

“ये लड़का नहीं… पूरा तूफ़ान है!”

भोपाल, गौरी का छोटा-सा घर

भोपाल की एक छोटी-सी गली में…

एक शांत, साधारण-सा घर।

अंदर के कमरे में एक लड़की अपना सामान पैक कर रही है।

गौरी शर्मा।

20 साल।

सादगी की मिसाल।

नीली गहरी आँखें…

कमर तक लहराते लंबे बाल…

एक सिंपल रेड कॉटन कुर्ती-पैंट सेट,

चेहरे पर हल्की-सी मासूम मुस्कान।

उसके पास खड़ी थी उसकी बुआ—

शारदा देवी,

जो नीले रंग की साड़ी पहने चिंता में डूबी हुई थीं।

“गौरी, यह भी रख ले… कुछ खाने का सामान, डेट के साथ रख ले…”

बुआ जल्दी-जल्दी चीजें बैग में डाल रही थीं।

गौरी मुस्कुरा कर बोली—

“बुआ जी… आप तो जानती ही हैं…

जो भी हो, मुझे मुंबई जाना ही पड़ेगा।

मुझे… उसे उसका हक़ दिलाना है। बात उसने बिस्तर पर देखते हुए कही थी, जहाँ पर कोई सोया हुआ था।”

शारदा देवी की आँखें भर आईं—

“गौरी… जाना ज़रूरी है क्या बेटा?”

गौरी पलटी और उनके पास आई।

उसकी आँखों में दृढ़ता थी, पर आवाज़ बहुत शांत।

“बुआ जी…

अगर आप नहीं चलना चाहतीं तो कोई बात नहीं…

पर मुझे जाना ही होगा।

अगर मैं नहीं गई…

तो शायद बहुत कुछ बिखर जाएगा।”

शारदा देवी का गला भर गया—

“ऐसे कैसे छोड़ दूँ तुझे?

मैं तुझे अकेला कैसे जाने दूँ? मैं हूँ तेरे साथ। भाई-भाभी के जाने के बाद और अपना परिवार खो देने के बाद मुझे हिम्मत नहीं है तुझे या उसे खोने की।”

गौरी ने उन्हें गले लगा लिया—

“बुआ जी… परेशान मत हो।

सब अच्छा होगा।

मुंबई में मेरी एक फ्रेंड है…

उसने रहने का इंतज़ाम कर दिया है।

और… मैं अकेली नहीं हूँ।

आप मेरे साथ हैं।”

दोनों की आँखें नम थीं।

भावनाओं का भारी पल…

जिसमें सिर्फ प्यार और चिंता तैर रही थी।

तभी बाहर से हॉर्न की आवाज़ आई।

गौरी ने बैग उठाया।

“बुआ जी… कैब आ गई। चलिए।”

बिस्तर के पास गई और आहिस्ता से उसने किसी को अपनी गोद में उठा लिया और उसे कंबल से ढक दिया और उसके सर को चूमते हुए कहा, “तुम फिक्र मत कर, देखना मैं तुम्हें तुम्हारा हक़ दिलाकर ही रहूँगी… चाहे कुछ भी हो जाए, जो मैंने झेला है, उसका एक लफ्ज़ भी तुम्हारे ऊपर नहीं आने दूँगी…।”

दोनों घर से बाहर निकलीं।

स्टेशन पहुँचीं।

ट्रेन आई।

गौरी खिड़की वाली सीट पर बैठी…

अपना सिर रेलिंग पर टिका दिया।

हवा उसके बालों को उड़ाने लगी।

उसकी निगाहें भोपाल की गलियों को आखिरी बार देख रही थीं।

धीरे से फुसफुसाई—

“माफ़ कर देना भोपाल…

मैं जाना नहीं चाहती थी…

बहुत सी यादें जुड़ी हैं। माँ-पापा और आप भी तो यहीं थे ना, पर क्या ज़रूरत थी आपको छोड़कर जाने की? आपने अच्छा नहीं किया, मैं आपको कभी माफ़ नहीं करूँगी। जाना तो नहीं चाहती…

पर जाना ज़रूरी है।

अगर आज मैं नहीं गई…

तो बहुत कुछ टूट जाएगा।

मैं किसी और को वो सब नहीं झेलने दूँगी

जो मैंने झेला है… अब एक हक़ की लड़ाई लड़नी है और न मंजिल का पता है, न रास्ते का पता है, बस चलना है और एक ही नाम है, उस नाम के सहारे ही मैं मुंबई आ रही हूँ। तो शरद, तुम जहाँ भी हो, तुम्हें मैं ढूँढ कर रहूँगी। तुम्हें मेरे सारे सवालों के जवाब देने ही होंगे!”

ट्रेन चल पड़ी।

गौरी की आँखें भीग गईं…

पर उसके होंठों पर एक छोटी-सी सख़्त मुस्कान थी।

“मुंबई…

मैं आ रही हूँ।”

कौन है गौरी और कौन है शरद? किसे ढूँढना है गौरी को और किसे किसका हक़ दिलाना है? क्या गौरी को मिलेगा शरद या कोई और? कौन है जो बिस्तर पर सोया हुआ है? सभी सवालों के जवाब के लिए पढ़ते रहिए…

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