His Revenge's Mistress Ch. 1

His Revenge's Mistress - Chapter 1

Posted by Akanksha Rajput • Mar 30, 2026 06:50 PM

Writer’s Note

Dear Readers

यह एक डार्क रोमांस कहानी है। इस कहानी में आगे चलकर कई इंटेंस और रोमांटिक सीन, टॉर्चर, दर्द भरे सीन आयेंगे। इसलिए अगर आप इस तरह की कहानी पढ़ने में कंफर्टेबल हैं, तभी आगे पढ़ें। अगर ऐसे सीन आपको असहज करते हैं, तो आप यहीं से इस कहानी को स्किप कर सकते हैं। इस तरह के कंटेंट को लेकर नेगेटिव कमेंट या रिपोर्ट न करें।

All characters and events in this story belong to the world of the story.

साथ ही, यह कहानी लेखक की मूल रचना है। कृपया इसे कॉपी, रिपोस्ट या अपने नाम से प्रकाशित करने की कोशिश न करें। ऐसा करने पर आपके खिलाफ़ उचित कार्रवाई (action) की जा सकती है।

आपके प्यार और सपोर्ट के लिए धन्यवाद।

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अध्याय 1

दिल्ली के सबसे पॉश बिज़नेस ज़ोन में आसमान को छूती काँच की ऊँची इमारत धूप में चमक रही थी। उसके फ्रंट पर बड़े स्टील के अक्षरों में लिखा था — Raichand Urban Empire। वो सिर्फ़ एक कंपनी नहीं, एक साम्राज्य का ऐलान था।

उसी इमारत के टॉप फ्लोर पर बना विशाल केबिन शहर के आधे स्काईलाइन को अपने शीशे की दीवारों में समेटे हुए था। अंदर महंगे इंटीरियर की सादगी में भी रुतबा झलकता था। और उस रुतबे के केंद्र में बैठा था — समर रायचंद।

गोरा रंग, तीखी हेज़ल आँखें, चौड़े कंधे, सधे हुए मस्कुलर बदन पर सफ़ेद शर्ट, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले थे, और अंदर से झलकती उसकी मजबूत छाती जैसे उसके आत्मविश्वास का हिस्सा हो। उम्र 29 साल थी, मगर चेहरे की सख़्ती और आँखों की ठंडक बताती थी कि उसने दुनिया को बहुत करीब से देखा है। वो अपनी ब्लैक लेदर चेयर पर पीछे की तरफ पीठ टिकाए बैठा था, एक पैर दूसरे पर चढ़ाए, उँगलियाँ सामने रखी टेबल पर धीमे-धीमे लय में टेप हो रही थीं। हर टेप जैसे सामने खड़ी लड़की की धड़कनों से ताल मिला रही हो।

उसके सामने एक गुलाबी कुर्ती और नीली जींस पहने सादगी में लिपटी एक मासूम सी लड़की खड़ी थी। गोरा रंग, लंबे बाल, उसका चेहरा झुका हुआ, पलकों पर नमी ठहरी हुई। वो अपने सामने बैठे इंसान की तरफ देखने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रही थी।

केबिन में सन्नाटा था। सिर्फ़ एसी की हल्की आवाज़ और टेबल पर पड़ती उँगलियों की ठक - ठक। तभी अचानक वो ठक ठक की आवाज़ थम गई।

समर की उँगलियाँ टेबल पर टेप करती हुई रुक गईं।

वो अपनी चेयर से उठा, कुर्सी से उठते वक्त उसकी मौजूदगी और भी भारी हो गई। उसके कदम नापे - तुले थे, मगर हर कदम में ऐसा दबाव था जैसे फर्श भी उसकी आहट महसूस कर रहा हो।

जैसे - जैसे वो मंसी के करीब आता गया, उसकी साँसें उलझती चली गईं। उसने बिना ऊपर देखे एक कदम पीछे लिया … फिर दूसरा। दिल की धड़कनें कानों में गूंजने लगीं। उसे महसूस हो रहा था कि वो बच नहीं पाएगी।

लेकिन पीछे हटने की जगह खत्म होने से पहले ही समर उसके बिल्कुल सामने था।

एक झटके में उसका हाथ बढ़ा और उसने मानसी की कमर को कसकर थाम लिया। पकड़ मजबूत थी। उसने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

मानसी के पूरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उसकी साँस अटक गई। और अगले ही पल वो सीधे समर के सीने से आ लगी।

उसकी हथेलियाँ अनजाने में समर के सीने पर टिक गईं। मानसी की गर्म सांसे समर के खुले बटनों के बीच से दिखते उसके सीने को छू रही थीं। वो उससे हाइट में छोटी थी। वही समर की उँगलियाँ उसकी कमर पर जकड़ी थीं — इतनी कसी हुई कि वो चाहकर भी खुद को छुड़ा नहीं सकती थी।

समर ने हल्का-सा झुककर उसकी ठुड्डी के पास ठहराव लिया, मगर उसे ऊपर देखने पर मजबूर नहीं किया। उसकी ठंडी हेज़ल आँखें उसके झुके चेहरे पर टिकी थीं।

केबिन की काँच की दीवारों के पार पूरी दिल्ली फैली थी… मगर उस पल उस कमरे में सिर्फ़ दो लोग थे — एक जिसकी पकड़ में ताक़त थी, और एक जिसकी धड़कनें उसके सीने से टकराकर बिखर रही थीं। समर की साँसें उसके चेहरे के बेहद करीब थीं।

“ क्या हुआ, mistress… ” समर की आवाज़ धीमी थी, मगर उसमें ठंडी चुभन थी, “ अभी से काँपने लगी?”

समर एक पल को रुका… उसकी आँखों में हल्की-सी टेढ़ी मुस्कान उभरी। “ अभी तो मैंने ढंग से छुआ भी नहीं है… ”

इतना कहते हुए उसकी पकड़ और कस गई। मानसी के होंठों से हल्की-सी दबी साँस निकल गई।

“ Mistress… ”

जैसे ही वो शब्द उसके कानों में पड़ा, उसके भीतर कुछ टूट गया। वो शब्द उसके लिए अपमान था… एक ऐसी चोट जो बाहर से नहीं, भीतर से लगती है।

उसने धीरे - धीरे अपनी आँसू भरी आँखें उठाईं। पलकों के किनारों पर नमी चमक रही थी। उन आँखों में डर था… बेइज़्ज़ती थी… और दर्द भी।

समर ने जैसे ही वो आँसू देखे, उसकी मुस्कान थोड़ी और गहरी हो गई। वो और झुक गया। अब उनके चेहरों के बीच बस साँसों की दूरी थी।

उसकी उँगलियाँ उसकी कमर पर अब भी कसी थीं, मगर उसका दूसरा हाथ धीरे से उसके चेहरे के पास आया। उसने उसकी ठुड्डी को हल्का - सा ऊपर उठाया।

“ इन आँसुओं को आज रात के लिए बचा कर रखो ” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई,

उसकी नज़रें उसके चेहरे पर टिकी रहीं — जैसे वो उसके डर को पढ़ रहा हो, उसे महसूस कर रहा हो … और उसे अपने खेल का हिस्सा बना रहा हो।

मानसी की साँसें तेज़ थीं, सीना हल्के - हल्के ऊपर - नीचे हो रहा था। समर की पकड़ अब भी उसकी कमर पर वैसी ही कसी हुई थी।

समर कुछ पल तक उसे देखता रहा… फिर बिना कुछ कहे उसकी कमर से अपनी पकड़ ढीली कर दी। उसकी पकड़ ढीली होते ही मानसी एकदम पीछे हट गई, साँसें अब भी बेतरतीब थीं।

समर उससे नजरें हटाकर मुड़ा और नपे-तुले कदमों से अपनी चेयर की तरफ बढ़ गया। उसके कदम शांत थे, मगर उनमें वही भारी रुतबा था। वो अपनी ब्लैक लेदर चेयर के पास पहुँचा और

चेयर पर बैठ गया।

“ जाओ यहाँ से। ”

समर के शब्द जैसे ही उसके कान में पड़े उसके लिए वो शब्द ऐसे थे… जैसे किसी बंद पिंजरे का दरवाज़ा अचानक खुल गया हो। एक पल भी रुके बिना वो मुड़ी और लगभग जल्दी - जल्दी कदमों से केबिन के दरवाज़े की तरफ बढ़ गई। अगले ही पल उसने दरवाज़ा खोला और जल्दी से केबिन के बाहर निकल गई।

मानसी केबिन से बाहर तो आ गई थी … मगर उसके कदम अब भी काँप रहे थे। उसके कानों में अब भी समर की आवाज़ गूंज रही थी — “ इन आँसुओं को आज रात के लिए बचा कर रखो… ”

उसने अपनी पलकों को कसकर बंद कर लिया, जैसे उन शब्दों को अपने दिमाग से निकाल देना चाहती हो… मगर वो आवाज़ बार - बार लौट आती थी। उसकी आँखें फिर से नम हो गईं।

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