श्रापित दुल्हन (Complete) Ch. 2

श्रापित दुल्हन - Chapter 2

Posted by Mamta Meena • Apr 07, 2026 08:51 PM

अब राजगुरु की बातें सुनकर राजमाता बोली हम जानते हैं राजगुरु लेकिन चाहे जैसे भी हो चाहे कितनी भी रूपए पैसे की कीमत पर या किसी भी कीमत पर हमें ऐसी कन्या चाहिए जो युवराज प्रताप सिंह की पहले दुल्हन बन सके साथ में ही जो भी परिवार अपनी कन्या का विवाह युवराज प्रताप सिंह कैसे करेगा हम जीवन भर उसे परिवार के देखभाल की जिम्मेदारी लेंगे और उसे कभी कोई तकलीफ नहीं आने देंगे,,,,,

ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि आप जल्दी ही ऐसी कन्या हमारे युवराज के लिए खोज लेंगे और हां हम नहीं चाहते कि कोई भी मां-बाप हमारे डर की वजह से यह फैसला ले इसलिए किसी को समझा बुझाकर इस फैसले के लिए राजी करना है कि वह हमारे युवराज का विवाह अपनी बेटी से कर सके किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए,,,,,

तब यह सुनकर राजगुरु देवकी नंदन कुछ सोते हुए गंभीर स्वर में बोले ठीक है राजमाता मैं कोशिश करूंगा की जल्दी ही ऐसी कन्या मिल जाए फिर राज्याभिषेक के बाद विवाह हो जाए वैसे अब मुझे आज्ञा दीजिए मैं चलता हूं यह कहते हुए हाथ जोड़कर खड़े हुए और राजमाता से विदा लेकर वहां से चले गए,,,

अब जानते हैं हम सब लोग रावतगढ़ के महल में रहने वाले सदस्यों के बारे में,,, रावतगढ़ की राजमाता तेजस्विनी देवी उसके दो बेटे थे ठाकुर संग्राम सिंह और छोटे बेटे ठाकुर राज सिंह,,,,

तब अपने कुल की मान मर्यादा के अनुसार ठाकुर संग्राम सिंह रावतगढ़ के महाराणा बने थे, जो रावतगढ़ के महाराणा बनने के योग्य थे, वह बड़े ही सज्जन ईमानदार और बहादुर महाराणा थे,,,,,

वहीं इसके साथ ही भैरव सिंह उसे राज्य दरबार के एक वफादार बुजुर्ग व्यक्ति थे जो महाराणा संग्राम सिंह के खास सलाहकार थे राज्य में उसकी सहमति से ही हर फैसले को लिया जाता था और वह एक परिवार की तरह राज्य दरबार के खास व्यक्ति थे,,,,

वही राज गुरु देवकी नंदन भी एक राजपुरोहित राजगुरु थे हर शुभ काम विवाह सब उसकी सहमति से और उनकी उपस्थिति में ही होते थे उसके पूर्वजों ने इस राज्य दरबार के बरसों बरसों से सेवा की थी साथ में ही उनके पूर्वजों ने काफी कोशिश की इस श्राप से छुटकारा पाने की लेकिन का नहीं सके,,,,,

वही अहिल्या देवी जो राज दरबार में सबके साथ रहने वाली दायमा थी जो वैसे तो एक नौकरानी थी लेकिन उसने संग्राम सिंह राज सिंह सब का पालन पोषण अपने बेटे की तरह किया था उसका खुद का एक बेटा भी था कुबेर सिंह वह विधवा थी और अपने पति के जाने के बाद उसे राज्य दरबार में रहकर राज्य दरबार की सेवा करती थी,,,,,

ऐसे में राज दरबार में राजमाता उसके दोनों बेटे संग्राम सिंह, राज सिंह और भैरव सिंह, दायमा अहिल्यादेवी राजगुरु देवकीनंदन उसे राज दरबार से संबंधित महत्वपूर्ण व्यक्ति थे,,,,,

तब संग्राम सिंह जैसे ही महाराणा बनने के योग्य हुए तो उसे रावतगढ़ का महाराणा घोषित किया गया और पूरे विधि विधान के साथ उसका राज्याभिषेक किया गया फिर अपने कुल की परंपरा का मान रखते हुए ही संग्राम सिंह ने विवाह किया और उनकी पहली दुल्हन की मौत इस श्राप के कारण हो गई थी जो कि इस राज्य के एक गरीब किसान की बेटी थी,,,,,

उनकी दुल्हन की मौत की खबर सुनकर पूरे गांव में और महल में शोक फैल गया था लेकिन हर कोई इस श्राप के बारे में जानता था, जिस वजह से कोई चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता था,,,,,

फिर ठाकुर संग्राम सिंह और उसके छोटे भाई राज सिंह दोनों का विवाह हुआ एक राज परिवार की दो सगी बहनों से संग्राम सिंह का विवाह हुआ वीरवती से और राज सिंह का विवाह हुआ फूलवती से, दोनों सगी बहनें थी,,,,,,

वही ठाकुर संग्राम सिंह की पहली दुल्हन के साथ जो हादसा हुआ उसे लोग धीरे-धीरे भूलने की कोशिश करने लगे थे जब भी कोई उसे हादसे के बारे में याद करता तो हर किसी की रुह कांप जाती लेकिन समय के साथ आखिर जीना भी पड़ता है,,,,

ऐसे में ठाकुर संग्राम सिंह ने भी इसे नियति का लेख मान लिया क्योंकि सबको पता था कि यह तो होना ही था और फिर ठाकुर संग्राम सिंह ने अपने आप को समझाते हुए अपनी प्रजा की खुशी के लिए और अपनी मासा के कहने पर दूसरा विवाह करने को तैयार हो गए, वैसे भी उन्होंने अपनी पहली दुल्हन को ठीक तरह से देखा तक नहीं था जिससे उनके प्रति उन्हें लगाव तो था लेकिन इतना ज्यादा प्रेम नहीं था और फिर दूसरा विवाह कर लिया,,,

अब विवाह के बाद अब हर किसी को यह उम्मीद थी कि इस खानदान का वारिस जन्म ले लेकिन उससे पहले ही राज सिंह और फूलवती के यहां पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रखा देवी सिंह,,,,,

लेकिन राजकुल की परंपरा के हिसाब से तो महाराणा का पुत्र ही उसे खानदान का वारिस बन सकता था ऐसे में देवी सिंह के जन्म के 3 साल बाद जन्म हुआ प्रताप सिंह का, जो परंपरा अनुसार राजमहल का वारिस और पूरे गांव का शासक था,,,,,,

वैसे राज सिंह अपने बड़े भाई संग्राम सिंह से बहुत प्रेम करते थे और राज सिंह की धर्मपत्नी फूलवती अपनी बहन वीरवती से, उन लोगों में एक दूसरे के प्रति सम्मान और लगाव था ऐसे में उनके बीच कभी इस बात को लेकर जरा सा भी बहस या मनमुटाव नहीं हुआ कि उनका बेटा बड़ा है तो वह इस राजघराने का वारिस यहां का शासक बनना चाहिए क्योंकि उन्हें पता था कि उनके राजघराने की परंपरा यही है कि जो राजघराने का महाराणा होता है उनका बेटा ही कुल का वारिस राजमहल का शासक बन सकता है,,,,,

वैसे दोनों भाइयों के बीच बड़ा प्रेम था और दोनों बहनों के बीच बहुत प्रेम था, तब यह देखकर राजमाता बहुत खुश होती थी, क्योंकि अब उनका हंसता खेलता परिवार था वैसे राज दरबार के लोग गांव वालों के प्रति भी काफी लगाव रखते थे ऐसे में रावत गढ़ की जनता भी बहुत खुश थी क्योंकि हमेशा इस राज परिवार ने उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई थी, उनके हर सुख दुख में साथ दिया था प्रजा की जरा सी तकलीफ राजमहल में रहने वालों की तकलीफ थी,,,,,

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