श्रापित दुल्हन (Complete) Ch. 3

श्रापित दुल्हन - Chapter 3

Posted by Mamta Meena • Apr 07, 2026 08:57 PM

धीरे-धीरे वक्त गुजरने लगा प्रताप सिंह बड़े होने लगे लेकिन जब प्रताप सिंह 5 साल के थे तभी उनकी मां वीरवती की बीमारी की वजह से मौत हो गई रात को उन्हें तेज ज्वर आया था और सुबह जब तक उन्हें डॉक्टर के यहां ले जाया जाता तब तक उनकी मौत हो चुकी थी,,,,,,

उनकी मौत से पूरे राजमहल में पूरे रावतगढ़ में एक शोक की लहर दौड़ गई थी, उसे समय अपनी रानी सा वीरवती की इस तरह अचानक मौत होने से संग्राम सिंह को भी काफी तकलीफ हुई और वह उसके शौक में डूब गए लेकिन राज परिवार के कार्य भार को उसे संभालना था,,,,,,

तब अपने परिवार के साथ से और इसे अपनी नियति मानकर उसने राज परिवार के काम को संभालना शुरू किया लेकिन एक दिन संग्राम सिंह अपने महल की छत पर टहल रहे थे कि अचानक वह महल की छत की मुंडेर पर खड़े हो गए,,,,,,

तब नीचे महल के जो नौकर थे उन्होंने यह देखा तब किसी को भी कुछ समझ में नहीं आया कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही संग्राम सिंह ने छलांग लगा दी,,,,

तब यह देखकर सबके होश उड़ गए सब ने भागकर संग्राम सिंह को संभाला लेकिन तब तक उसकी मौके पर ही मौत हो चुकी थी,तब यह देखकर किसी के भी समझ में नहीं आया कि आखिर संग्राम सिंह ने ऐसा क्यों किया है,,,,,

वही संग्राम सिंह की इस तरह अचानक हुई मौत की वजह से पूरे राजमहल में और पूरे गांव में शौक की लहर दौड़ गई, हर किसी को यह लग रहा था कि संग्राम सिंह अपनी पत्नी के वियोग को सहन नहीं कर पाए थे इसलिए उसकी मौत के चार महीने बाद ही उन्होंने इस तरह अपनी जान दे दी,,,,,,

वहीं कोई इसे हादसा समझ रहा था लेकिन कोई नहीं जानता की यह एक हादसा था फिर या आत्महत्या क्योंकि हर कोई जानता था कि संग्राम सिंह काफी जिम्मेदार समझदार और बहादुर इंसान थे इस तरह आत्महत्या करना यह उनकी समझ के बाहर था लेकिन यह भी हर कोई जानता था कि संग्राम सिंह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे ऐसे में उसके वियोग को भी नहीं सहन कर पा रहे थे,,,,,,

तब संग्राम सिंह और वीरवती की मौत के बाद रानी मां राजमाता को काफी तकलीफ पर पहुंची थी लेकिन वह एक राजपूत नारी थी यह सब कुछ होते हुए देखकर भी अपने राजघराने के लिए और अपनी जनता के लिए उसने अपने आप को संभाला,,,,,

तब फूलवती और राज सिंह ने अपने बेटे देवी सिंह के साथ प्रताप सिंह का भी पालन पोषण किया,,,,,

धीरे-धीरे वक्त गुजरने लगा देवी सिंह और प्रताप सिंह दोनों ही बड़े होने लगे लेकिन दोनों भाइयों के बीच कभी भी इतना गहरा प्यार नहीं रहा क्योंकि प्रताप सिंह काफी समझदार और होनहार थे,,,,,

वही देवी सिंह उसके मन में बचपन से ही एक बात बैठी हुई थी कि इस राजमहल का बड़ा बेटा तो वह है ऐसे में इस हिसाब से तो उसे इस राजमहल का राणा सा बनना चाहिए था लेकिन वह अपने माता-पिता और अपनी दादी सा के सामने इस बात का विद्रोह नहीं कर सकते थे,,,,

क्योंकि जानते थे कि इसका विद्रोह करने का क्या अंजाम हो सकता है उसे देश निकाला दिया जा सकता है, साथ में ही रावतगढ़ की जनता और पूरे परिवार के सदस्य प्रताप सिंह को ही इस राज्य परिवार का महाराणा बनाना चाहते हैं,,,,

ऐसे में देवी सिंह चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते थे लेकिन अपने छोटे भाई प्रताप सिंह से बहुत नफरत करते थे जबकि प्रताप सिंह के मन में हमेशा से ही देवी सिंह के प्रति अपार प्रेम था वह उसका बहुत सम्मान करते थे,,,,,

धीरे-धीरे वक्त गुजरने के साथ देवी सिंह ने तो अपनी पढ़ाई पास के शहर में ही अपने राजपरिवार के बंगले पर रहकर पूरी कर ली थी लेकिन प्रताप सिंह वह शुरू से ही काफी होनहार थे और फिर अपनी आगामी पढ़ाई के लिए  विदेश चले गए और ऐसे में 5 साल बाद वह अपने गांव अपने देश वापस लौट रहे थे,,,,,

वैसे इन पांच सालों में देवी सिंह का विवाह एक राज परिवार की कन्या सुलोचना से हो चुका था सुलोचना और देवी सिंह के विवाह को पूरे 4 साल हो चुके थे, इस विवाह में ठाकुर प्रताप सिंह किसी कारणवश से सम्मिलित नहीं हो पाए थे,,,,

वही सुलोचना अपने पति देवी सिंहकी तरह ही यही चाहती थी कि उनके पति देवी सिंह को  ही इस राजघराने का महाराणा बनना चाहिए था लेकिन जब उसे इस श्राप के बारे में पता चला तो उसके मन में से यह बात निकल गई क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उसकी मौत निश्चित है लेकिन देवी सिंह वह तो हमेशा से ही इस राजघराने की गद्दी को पाना चाहते थे,,,,,

वही सुलोचना भी इतनी आसानी से इस राज परिवार की धन दौलत और सबकुछ प्रताप सिंह का होते हुए नहीं देख सकते थे इसलिए सुलोचना अपनी छोटी बहन मेनका को अपने साथ रखती थी, क्योंकि उसकी चाल थी कि अगर मेनका का विवाह प्रताप सिंह से हो जाए तो धीरे-धीरे सब कुछ पर उनका ही अधिकार हो जाएगा और वह दोनों बहने ही इस राजमहल में राज करेगी,,,,,

वैसे मेनका और सुलोचना दोनों के पिता भी यही चाहते थे वह एक राज परिवार से संबंधित थे और मेनका और सुलोचना के ताऊ सा उसे राज परिवार के महाराणा थे,,,,,

ऐसे में सुलोचना और मेनका के पिता खुद तो महाराणा बन नहीं सके लेकिन उसकी इच्छा थी कि मेनका का विवाह अगर ठाकुर प्रताप सिंह के साथ हो जाए तो उनकी बेटी रावतगढ़ की रानी सा बन जाए लेकिन उससे पहले ठाकुर प्रताप सिंह का विवाह किसी और से होना जरूरी है जिससे उस पहली दुल्हन की मौत होने के बाद उस श्रापित दुल्हन से छुटकारा पाने के बाद उनकी बेटी का विवाह हो,,,,,

ऐसे में मेंनका अपनी बड़ी बहन सुलोचना के साथ उसके ही ससुराल में रहती थी और हमेशा ठाकुर प्रताप सिंह के बारे में सुनकर उसके बारे में ही सपने सजाती रहती थी, उसने युवराज प्रताप सिंह को फोटो में देखा था और फोटो में उसे देखकर ही वह उसकी सुन्दरता की भी दीवानी हो गई थी,,,,,

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