बदचलन (Complete) Ch. 1

बदचलन - Chapter 1

Posted by Mamta Meena • Apr 08, 2026 10:43 AM

बदचलन एक ऐसा शब्द जिस औरत के साथ जुड़ जाए उसकी जिंदगी का अर्थ ही बदल जाता है,,,,,, लोगों की नजरें उसके प्रति पल भर में ही बदल जाती है,,,,,, उसकी बरसों की इज्जत उसकी मर्यादा उसकी अच्छाई, उसका अस्तित्व सब उस बदचलन नाम के शब्द की चिता में जल कर खाक हो जाती हैं,,,,,, और लोगों की नजरों में उनके मन में उसकी एक अलग ही छवि बन जाती है एक ऐसी छवि जिसे यह समाज यहां के लोग घृणा की नफरत की दृष्टि से देखते हैं

एक ऐसी ही कहानी बदचलन लेकर में आई हूं आपके सामने जो आपको जरूर पसंद आएगी,,,,,

हां मैं हूं बदचलन पापा सुना आपने,,, हां हूं मैं बदचलन भैया आप भी सुनो,,,,,,,,

अपनी आबरु अपनी मर्यादा अपनी अस्मिता अपने अस्तित्व के लिए लड़ना तुम जैसे शरीफो की नजरों में गलत हैं, अगर तुम्हें लगता है कि मैंने ऐसा करके गलत किया है तुम्हारी इज्जत पर कीचड़ उछाला है, और मैं बदचलन हूं तो हूं मैं बदचलन,,,,,

पग पग पग हवस के भूखे भेड़ियों को अपने आप से बचाना अपनी इज्जत की अपने अस्तित्व की रक्षा करना तुम जैसे शरीफो की नजर में गलत है,,,,,,,

अगर मैं ऐसा करके सबकी नजरों में गुनहगार बन गई हूं बदचलन बन गई हूं तो हूं मैं बदचलन मुझे बदचलन बनना भी मंजूर है लेकिन अपनी इज्जत  सबके सामने न्योछावर करना नहीं,,,,,,,

घिन आती है मुझे ऐसे दोगले समाज पर जहां एक तरफ तो नारी को देवी का स्थान दिया जाता है, नारी को देवी का दर्जा देकर उसकी दुर्गा लक्ष्मी काली चामुंडा के रूप में पूजा की जाती है,,,,,,,

वहीं दूसरी तरफ वही लोग वही समाज, औरत को एक उपभोग की वस्तु समझते हैं, उसी औरत को पैरों की जूती समझकर कुचला जाता है,,,,,,

पग पग पर उसके अस्तित्व को गाली दी जाती है उसे कुलटा मनहूस बदचलन जैसा नाम दिया जाता है,,,,,,,

अगर औरत इनके इशारों पर नाचे, अपने आप को पूरी तरह इनके आगे समर्पित कर दे, एक बंद पिंजरे में घुट घुट कर जीने को मजबूर हो लेकिन हर पल दूसरों की खुशियों का ध्यान रखें तो उस औरत को यह लोग देवी मानेंगे,,,,,,,

बही अगर उस औरत ने एक बार भी उस बंद पिंजरे में जरा सी भी फड़फड़ाने की कुछ कहने की कोशिश की तो उसे बदचलन का खिताब दे दिया जाता है, उसके हर त्याग हर समर्पण पर उसकी अच्छाई को इस बदचलन शब्द की चिता में जला दिया जाता है,,,,,,

मैंने भी हर कदम कदम पर जहर का घूंट पिया हर तरीके से रिश्ते को बचाने की कोशिश की एक पिंजरे में कैद पक्षी की तरह फड़फड़ा भी नहीं सकी,,,,,,,

हर जुल्म हर सितम सहा, एक बार अपनी इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश करने वाले दरिंदे पर हाथ क्या उठा दिया की मैं बदचलन बन गई और बह दरिंदा आप सब लोगों की नजरों में शरीफ बन गया,,,,,

और अब तुम लोगों को लगता है कि यह सब देखकर सुनकर भी मैं चुप रहूं, एक देवी की तरह महान बन जाऊं, और तुम लोगों की इज्जत के खातिर फिर से अपने आपको उस नर्क में झोंक दू और एक अच्छी बेटी अच्छी पत्नी और एक अच्छी बहू इस समाज को दिखाने के खातिर बनी रहू जबकि उस नर्क में तिल तिल कर जलती रहा हूं क्योंकि तभी तुम सब लोगों की नजरों में मैं एक देवी रहूंगी ना तो नहीं बनना मुझे ऐसी देवी जहां कदम कदम पर मेरे अस्तित्व को धिक्कारा जाता है,,,,,,,

जहां कदम कदम पर मुझे अपनी पवित्रता अपनी सच्चाई साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, जहां अपना हक मांगने पर, गाली गलौज मारपीट की जाती है, किसी से मदद मांगने पर बदचलन का दर्जा दिया जाता है,,,,,,,,

नहीं चाहिए मुझे ऐसे दोगले समाज की झूठी इज्जत, जहां एक अबला और बेसहारा नारी की मदद करने की वजाह उसका दर्द समझने की वजाह उसे, झूठी इज्जत के लिए घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर कर दिया जाता है चाहे वह जीवन पर एक जिंदा लाश बन कर ही क्यों ना रह जाऐ,,,,,,

क्या अपना हक मांगना क्या अपनी इज्जत की रक्षा कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ना, अपनी इज्जत पर हाथ डालने वाले दरिंदें के गाल पर तमाचा जड़ना,,,,,,

अपनी आबरू अपने अस्तित्व के लिए घर छोड़ना इस समाज आप सबकी नजरों में गलत है इस समाज के नजरों में अगर यह सब करके मैं एक बदचलन हूं तो मैं हूं बदचलन,,,,,,

मैं गर्व से कहती हूं हूं मैं एक बदचलन ,,,,,, यह कहते हुएउर्वशी गहरी नींद से चीखते हुए उठ गई हां हूं मैं बदचलन,,,,,,

उसके चीख कर उठने की आवाज सुनकर उसकी बेटी बामीका दौड़ कर कमरे में आई और बोली क्या हुआ मां आपने फिर से वही बुरा सपना देख लिया ना मां,,,,,

यह सुनकर उर्वशी कही खोई हुई गुस्से में बोली नहीं बेटी सपना नहीं यह मेरी जिंदगी की हकीकत है मेरी नहीं मेरे जैसी न जाने कितनी औरतों की जिंदगी की हकीकत है,,,,,,,

यह सुनकर वामिका बोली मां बरसो गुजर गए उस बात को लेकिन अभी भी वह बातें,बह शब्द आपके जैहन से नहीं निकलते,,,,,,

यह कहते हुए वामिका ने अपनी मां का हाथ अपने हाथों में ले लिया और बोली मां, मैं नहीं जानती कि आपने कितना दर्द कितनी तकलीफ है सहन की है मैं आपके उस दर्द का अंदाजा भी नहीं लगा सकती,,,,,,

लेकिन आपकी आंखें को देखकर चेहरे को देखकर उस दर्द को थोड़ा बहुत महसूस तो कर सकती हूं ना, मां यह समाज ऐसा ही है मां आखिर कब तक आप उन बातों को याद कर अपने आपको यूं तड़पाती रहोगी,,,,,,,

यह कहते हुए वामिका ने अपनी मां उर्वशी के चेहरे की तरफ देखा जो कही गहरी सोच में डूबी हुई थी,,,,,,

यह देखकर बामीका बोली मां बाप बेठो मैं अभी आपके लिए चाय लेकर आती हूं,,,,,,,,

यह कहकर वामिका वहां से उठ कर रसोई में चली गई, उसके जाते ही एक बार फिर उर्वशी ना चाहते हुए भी अपने अतीत में खो गई,,,,,

बदचलन मेरी यह एक नई रचना है जो समाज की ना जाने कितनी औरतों की जिंदगी की सच्चाई आप सबके सामने लाएगी,,,,,,

आपको मेरी यह रचना कैसी लगी समीक्षा देकर जरूर बताएं,,,,

अगर कुछ कमी लगी हो तो मुझे जरूर बताएं जिससे मैं आगे अपनी रचना में सुधार कर सकूं,,,,,,,

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