Psycho Husband Innocent Wife Ch. 2

Psycho Husband innocent wife - Chapter 2

Posted by Moon Star • Apr 28, 2026 06:31 PM

पास ही बैठी दूसरी औरत ने तुरंत हामी भरी,

“हां जी, लड़की तो सच में बहुत सुंदर है… नज़र ही नहीं हट रही।”

पहली औरत ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया, जैसे उसे पहले से ही सब पता हो।

“ओए, सिर्फ सुंदर ही नहीं… बड़ी सुघड़ भी है। हर काम सलीके से करती है। तभी तां मैं अपने मुंडे की शादी इससे करवा रही हूं।”

दूसरी औरत थोड़ा चौंकी, फिर दिलचस्पी से बोली,

“अच्छा जी? मतलब बात पक्की हो गई?”

पहली औरत ने गर्व से कहा,

“हां जी, बिलकुल पक्की। नाम है इसका—जूही भल्ला… मेरी होने वाली बहू।”

उसकी आवाज़ में एक अलग ही संतोष था… जैसे उसने अपने घर के लिए कोई बहुत कीमती चीज़ चुन ली हो।

दूसरी औरत ने फिर स्टेज की तरफ देखा—जहां जूही अब भी बेफिक्र होकर नाच रही थी, उसे जरा भी अंदाज़ा नहीं था कि नीचे बैठी दो औरतें उसकी ज़िंदगी के फैसले कर रही हैं।

“किस्मत वाली है तुहाडी बहू…” उसने हल्के से कहा।

पहली औरत धीमे से हंसी,

“किस्मत वाली? ओ तां बाद में पता लगेगा… पर मेरे मुंडे की किस्मत जरूर अच्छी है।”

उसने ये बात पूरे यकीन के साथ कही।

उधर स्टेज पर जूही का डांस खत्म हुआ। तालियों की आवाज़ गूंज उठी।

जूही ने हल्का-सा सिर झुकाकर सबका धन्यवाद किया और नीचे उतरने लगी।

जैसे ही वो नीचे आई… उसकी नजर एक पल के लिए उन दोनों औरतों पर पड़ी।

दोनों उसी को देख रही थीं।

एक अजीब-सा एहसास हुआ उसे… जैसे कुछ तय हो चुका है, बिना उससे पूछे।

लेकिन अगले ही पल उसने उस ख्याल को नजरअंदाज़ किया… और अपनी सहेलियों के साथ मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई।

उसे क्या पता था…

कि ये छोटी-सी नजर… उसकी ज़िंदगी का पहला मोड़ बनने वाली है।

जूही अभी अपनी सहेलियों से बात ही कर रही थी कि वही दूसरी औरत उसके पास आकर रुक गई। चेहरे पर मीठी मुस्कान, आंखों में सीधी नज़र।

“बेटा, एक बात कहूं?” उसने धीरे से कहा।

जूही थोड़ी झिझकी, फिर हल्का-सा सिर हिलाया।

“तू बहुत अच्छी है… और देख, मेरा बेटा है—बहुत पढ़ा-लिखा, अच्छी कमाई करता है… अगर तू चाहे तो…”

जूही एक पल के लिए चुप रह गई। उसे समझ ही नहीं आया क्या जवाब दे। बात इतनी सीधी थी कि वो बस उसे देखती रह गई।

“मैं सीरियस बोल रही हूं,” औरत ने फिर कहा, “तू मेरे घर की बहू बनेगी तो बहुत खुश रहेगी।”

जूही कुछ कहती, उससे पहले ही पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—

“जूही।”

वो पलटी।

उसकी होने वाली सास वहां खड़ी थी—चेहरे पर वही सख्त शांति।

दूसरी औरत ने जैसे ही उसे देखा, उसकी मुस्कान हल्की पड़ गई। बिना कुछ कहे, वो तुरंत वहां से निकल गई।

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर होने वाली सास जूही के करीब आई और धीमी आवाज़ में बोली—

“इससे थोड़ा बचकर रहना।”

जूही ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

“ये औरत…” उन्होंने हल्की-सी नजर उस जाती हुई औरत पर डाली,

“तुझे अपनी बहू बनाने के चक्कर में है।”

जूही की आंखों में उलझन बढ़ गई।

जूही को देखते ही उसकी होने वाली सास, मिसेज भाटिया मुस्कुराते हुए बोली,

“देख पूतर, यहां शादी में सबकी नजरें तुझ पर हैं… पर तू किसी की बातों में मत आना। तेरे लिए तो सिर्फ मेरा बेटा ही बेस्ट है। तुम दोनों की जोड़ी… बस कमाल लगेगी। वो बिल्कुल तेरे जैसा है।”

जूही ने हल्का सा सिर झुका लिया—जैसे हमेशा करती थी।

उसकी आदत थी… बड़ों के सामने ज्यादा बोलना नहीं, बस सुनना और मान लेना।

“जी आंटी…” उसने धीमे से कहा।

उसकी आंखों में एक पल के लिए सवाल जरूर आया… लेकिन वो सवाल होंठों तक नहीं पहुंचा।

क्योंकि बचपन से उसे यही सिखाया गया था—

“माता-पिता जो तय करें, वही सही होता है।”

मिसेज भाटिया संतुष्ट होकर आगे बढ़ गईं।

उनके जाते ही उसकी सहेली पास आई और धीरे से बोली,

“यार जूही… ये तेरी होने वाली सास कुछ ज़्यादा ही पोजेसिव नहीं लग रही? मुझे तो थोड़ा अजीब वाइब आ रहा है।”

जूही ने एक पल के लिए आंखें बंद कीं… जैसे खुद को संभाल रही हो।

फिर हल्की सी मुस्कान लाकर बोली,

“शायद… पर उन्होंने मुझे अपनापन ही तो दिखाया है।”

सहेली ने भौंहें चढ़ाईं,

“अपनापन और कंट्रोल में फर्क होता है, समझी?”

जूही ने उसकी तरफ देखा…

उसकी आंखों में हल्की चिंता तैर गई… लेकिन अगले ही पल उसने उसे दबा दिया।

“ये रिश्ता चाचा जी लेकर आए हैं…” उसने शांत आवाज़ में कहा,

“मम्मी-पापा उनकी बात कभी नहीं टालते… और मैं… मैं मम्मी-पापा की बात कैसे टाल सकती हूं?”

उसकी आवाज़ में ना शिकायत थी… ना जिद…

बस एक सीधी-सी सच्चाई थी—

वो अपने माता-पिता की परवरिश और भरोसे का मान रखती थी।

सहेली कुछ कहना चाहती थी, लेकिन जूही ने ही बात खत्म कर दी—

“उन्होंने हमेशा मेरे लिए सही सोचा है…

तो इस बार भी गलत नहीं होंगे।”

वो हल्का सा मुस्कुराई…

पर इस बार उसकी मुस्कान थोड़ी मजबूर थी।

उसने दूर खड़े अपने माता-पिता को देखा—

उनके चेहरे पर खुशी थी… संतोष था…

और बस वही उसके लिए काफी था।

उसने मन ही मन खुद से कहा—

“अगर उनकी खुशी में मेरी खुशी है… तो शायद यही सही है।”

उधर...

एक मल्टीनेशनल कंपनी के गेट पर सन्नाटा सा छा गया।

एक लिमिटेड एडिशन कार आकर रुकी—जिसकी कीमत में आधा शहर खरीदा जा सकता था।

गार्ड तुरंत सीधा खड़ा हो गया, बिना पूछे ही दरवाज़ा खोल दिया।

अंदर से जो पैर बाहर आया—ब्लैक शू, जिसकी कीमत में आम आदमी की साल भर की सैलरी निकल जाए।

फिर एक हाथ बाहर आया—कलाई पर पहनी घड़ी हल्की सी चमकी… वही घड़ी जो सिर्फ चुनिंदा अरबपतियों के पास होती है।

वो शख्स धीरे-धीरे बाहर उतरा।

पूरा स्टाफ अपने-आप रास्ते से हट गया—जैसे ये सब रोज़ का हो।

उसने बिना किसी की तरफ देखे बस हल्का सा कदम आगे बढ़ाया—

और गार्ड झुककर बोला,

“गुड मॉर्निंग, सर।”

उसने कोई जवाब नहीं दिया… बस अंदर की तरफ चल पड़ा—

जैसे ये पूरी बिल्डिंग उसी की हो।

जैसे ही वो अंदर बढ़ रहा था, अचानक एक पीयून जल्दी-जल्दी फाइलें लेकर मुड़ा—और सीधे उससे टकरा गया।

फाइलें नीचे बिखर गईं।

एक पल के लिए पूरा माहौल जम सा गया।

पीयून घबराकर तुरंत झुक गया,

“सॉरी सर… गलती हो गई…”

वो शख्स वहीं रुक गया। धीरे से अपनी जैकेट पर पड़ी हल्की-सी धूल को उंगलियों से झाड़ा… जैसे किसी ने बहुत बड़ी गुस्ताखी कर दी हो।

उसकी नजर नीचे झुके पीयून पर टिकी रही।

“गलती?” उसकी आवाज़ ठंडी थी, लेकिन अंदर छुपा गुस्सा साफ महसूस हो रहा था।

पीयून के हाथ कांपने लगे,

“जी… ध्यान नहीं रहा…”

वो थोड़ा झुका, और जमीन पर पड़ी फाइलों की तरफ देखा, फिर उसकी आंखों में सीधा घूरते हुए बोला,

“ये जो तुम्हारी लापरवाही है ना… यही फर्क है तुममें और मुझमें।”

उसने अपनी कलाई की महंगी घड़ी पर हल्की नजर डाली,

“मैं करोड़ों की डील संभालता हूं… और तुम एक फाइल तक नहीं संभाल सकते।”

पीयून चुप रहा… सिर और झुक गया।

“इस बिल्डिंग में काम करना है तो सिर्फ काम नहीं… स्टैंडर्ड भी सीखो।”

वो सीधा खड़ा हुआ,

“क्योंकि यहां हर चीज़… क्लास से चलती है।”

पीयून अभी भी झुका हुआ था… लेकिन उसकी आंखें बार-बार ऊपर उठकर अगस्त्य को देख रही थीं।

अगस्त्य ने वो नजर पकड़ ली।

उसके चेहरे की नसें तन गईं।

“इतनी हिम्मत?” उसकी आवाज़ और ठंडी हो गई।

अगले ही पल—

ठाक!

उसका हाथ सीधा पीयून के गाल पर पड़ा।

पूरा लॉबी सन्न रह गया।

पीयून लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा… आंखों से आंसू निकल पड़े।

“आज के बाद…” अगस्त्य ने झुककर उसकी कॉलर पकड़ ली, “इस बिल्डिंग में दिखाई मत देना।”

पीयून तुरंत उसके पैरों में गिर पड़ा,

“सर प्लीज… एक मौका दे दीजिए… घर चलाना है… आप जो कहो मैं वो करूंगा”

लेकिन अगस्त्य के चेहरे पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

उसने अपने जूते की नोक से उसे हल्का-सा धक्का दिया—जैसे कोई बेकार चीज़ हो।

फिर शैतानी मुस्कान में बोला,

“जो कहूंगा… ओके—कम टू माय केबिन।”

अगला भाग शुक्रवार को दोपहर 2:30 तक,

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