एक बूंद मोहब्बत ! - Chapter 1
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शाम का वक्त था जब दो औरते गली में खड़ी आपस में बात कर रही थी या शायद यह कहना ज़्यादा सही था कि वह आस पड़ोस के लोगों की चुगलियां कर रही थी । तभी उनमें से एक औरत जिसका नाम कुमुद था , उसकी नज़र सामने से आ रही एक लड़की पर गई । आसमानी रंग की सूती साडी में लिपटी । गले में मंगलसूत्र और मांग में भरा सिंदूर उसके सुहागन होने का प्रमाण दे रहा था ।
" ऋत्विजा ! ज़रा इधर आना । " कुमुद ने उसे आवाज लगा कर अपने पास बुला लिया । वह लड़की यानी ऋत्विजा उनके पास खड़ी नहीं होना चाहती थी , लेकिन ! अब जब उन्होंने सामने से ही उसे बुला लिया था तो क्या करती वह ।
" कहिए क्या काम है । मुझे घर जाना है जल्दी । दादी अकेली है । " ऋत्विजा ज़्यादा देर उनके पास नहीं खड़ा होना चाहती थी इसलिए उसने बहाना बनाते हुए कहा । तो कुमुद सोचते हुए बोली - " आज तेरा पति आने वाला है ना शहर से .. ? "
" हां , क्यों .. क्या हुआ .. ? " ऋत्विजा की भौहें उठ गई।
तभी उनके पास खड़ी औरत बेचारा सा मुंह बना कर बोली - " सच्च कहूं तो मुझे बहुत बुरा लगता है तुम्हारे लिए । बुरा ना मानना बेटा ! लेकिन सच्चाई तो यही है कि तुम्हारा रंग तुम्हारे पति के मन पर चढ़ नहीं पाया है । क्योंकि शायद तुम उसकी दूसरी पत्नी हो ना । "
उस औरत ने अपनी बात पूरी की के तभी कुमुद उसकी बाजू पर हाथ रख नाक सिकोड़ कर बोली - " पहली पत्नी की अहमियत ही अलग होती है । दूसरी पत्नी तो फिर भी दूसरी ही होती है । "
ऋत्विजा ने घूर कर उन दोनो औरतों को देखा । उन दोनो की बाते ऋत्विजा को तानो से कम नहीं लग रही थी । और यही कारण था कि वह यहां से बचकर निकलना चाहती थी ।
ऋत्विजा के घूरने से कुमुद झेप गई - " अरे बेटा ! हम तो यूंही कह रहे है । लेकिन लगता है तुम्हारे दिल पर लग गई बात... "
" दिल .. ? आपकी बात तो मेरे फेफड़ों पर लग गई । खैर ! चलो आपके फेफड़ों की मजबूती चेक करती हूं , एक बात बता कर.. " ऋत्विजा गुस्से में भी मुस्कुराई - " मेरी तो शादी को फिर भी तीन महीने हुए है लेकिन आप कहती है कि आपकी शादी को 27 साल हो गए । और कल ही मैने अंकल जी को आपकी पड़ोसन सावित्री आंटी के साथ जाते हुए देखा । और जब सावित्री आंटी वापस आई तो उनके हाथों में बहुत सारे शॉपिंग बैग्स थे । बाकी समझदार के लिए इशारा काफी है... "
कहते हुए ऋत्विजा ने कुमुद के गुस्से में लाल हुए चहरे को नजरअंदाज किया और मुंह बना कर वहां से आगे बढ़ गई ।
" उस फरेबी औरत को तो मैं छोड़ूंगी नहीं.... " कुमुद गुस्से में पैर पटकते हुए अपने घर की तरफ बढ़ गई और जो उसके साथ औरत थी वह भी तमाशा देखने उसके पीछे चली गई ।
दरवाजा खोल ऋत्विजा गुस्से में अंदर आई । एक सामान्य सा घर जिसके बीच - ओ - बीच आंगन था और उसके चारों और कमरे बने हुए थे । आंगन में रखी कुर्सी पर एक उम्रदराज औरत बैठी हुई थी उन्होंने जैसे ही ऋत्विजा को देखा तो वह बोल उठी - " इतनी देर कहां लगा दी तुमने .. ? दूध लेने गई थी या भैंसों का दूध निकालने ही बैठ गई थी । "
ऋत्विजा ने झुंझला कर उन्हें देखा और मुंह बना कर बोली - " दादी!!!!!!!!! वो मोटी कुमुद बकवास कर रही थी बाहर... "
" अरे उसका तो काम ही है बकवास करने का । लेकिन तुम एक काम करने जाती हो और समय दो कामों जितना लगा कर आती हो .. ? " दादी ने नाराजगी से कहा । उसके होठों पर मुस्कान आ गई । वह वही फर्श पर बैठते हुए बोली - " दादी ! मै तो कुछ सोच रही थी । "
" तुम भी सोचती हो ऋत्वि .. ? " दादी की नाक सिकुड़ी ।
ऋत्विजा के होठों की मुस्कान सिमट गई । चाय का कप साइड में रखते हुए दादी ने उसके कंधे पर मारा - " अब बताओ भी... क्या सोच रहीं तुम .. ? "
" निर्वाण जी आज आयेंगे तो थोड़ी एक्टिंग कर लेना बीमार होने की । क्या पता शायद वह एक दो दिन यही ठहर जाएं .. ? " ऋत्विजा ने आंखों में चमक लिए कहा तो दादी ने अपना सिर पीट लिया - " हे भगवान ! मेरा पोता डॉक्टर है , और तू मुझे उसके सामने बीमार होने का नाटक करने को कह रहीं है .. ? वह तभी चोरी पकड़ लेगा । "
ऋत्विजा का चहरा लटक गया । वह समझ गई यह प्लान काम नहीं करेगा । इसलिए वह उठी और चुप चाप रसोई में चली गई , रात का खाना बनाने । दादी ने एक गहरी सांस ली और ऊपर आसमान की तरफ देख बोली - " पता नहीं निर्वाण को कब अक्ल आयेगी । लेकिन ! मुझे कुछ तो करना पड़ेगा वरना वह ऐसे तो नहीं लेकर जायेगा इसे... "
रात के करीब सात का समय रहा होंगा जब बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई थी । ऋत्विजा जो दादी के पास बैठी हुई उन्हें अब कुछ और प्लांस बता रही थी । गाड़ी की आवाज पर वह उठ , दरवाजे की तरफ लगभग दौड़ पड़ी थी ।
" आराम से , गिर जाओगी लड़की । " दादी ने पीछे से कहा । लेकिन वह उनकी बात सुने तब ना । उसने जाकर दरवाजा खोला तो सामने एक जाना पहचाना सा चहरा देख उसका चहरा खिल उठा । निर्वाण का ध्यान फ़ोन में था । और वह अपने फोन में देखते हुए ही आगे बढ़ गया । ख़ुद को निर्वाण द्वारा यूं नजरअंदाज होता देख ऋत्विजा का खिला हुआ चहरा एक क्षण में मुरझा गया ।
वह दरवाजा बंद कर अंदर आई तो निर्वाण अपनी दादी के साथ अंदर कमरे में चला गया था । ऋत्विजा ने पानी का ग्लास उठाया और कमरे में दाखिल हो गई । निर्वाण , दादी का बल्ड प्रेशर चेक कर रहा था ।
" न.. निर्वाण जी पानी । "
" नहीं चाहिए । " निर्वाण ने बगैर उसकी ओर देखे कहा । उसके लहजे में एक सख्ती थी । जिसे ऋत्विजा ओर दादी दोनो ने महसूस की । दादी ने उसके लटके हुए चहरे को देखा । उन्हें बहुत बुरा लगा उसके लिए...
" ऋत्वि ! जाओ बेटा खाना लगाओ । हम बाहर ही आ रहे है । "
" जी दादी ! " कहकर वह उन्हें कुछ इशारा कर वहां से चली गई । उसके जाते ही दादी का चहरा गंभीर हो गया , निर्वाण का हाथ पकड़ उन्होंने उसे अपने पास बैठाया तो निर्वाण उलझ कर उन्हें देखता हुआ बोला - " क्या हुआ दादी .. ? "
" कब लेकर जाओगे इसे यहां से .. ? "
" दादी ! अभी सही समय नहीं है । "
" तीन महीने काफी नहीं थे निर्वाण .. ? "
" दादी ! मैं लेकर चला जाऊंगा । लेकिन तारा का सोचा है आपने .. ? क्या वह बर्दाश्त करेगी ऋत्विजा को .. ? नहीं करेगी ! , क्योंकि उसे मेरी दूसरी पत्नी बर्दाश्त नहीं होगी... " निर्वाण ने सर्द लहजे में कहा ।
" तो तुम तारा की वजह से... ऋत्विजा से उसका हक छीन रहे हो .. ? तारा अगर हमारे खानदान की बहू है तो ऋत्विजा का भी उतना ही हक है , वह भी हमारी बहू है । तारा को समझना पड़ेगा । " दादी ने कहा । उनके लहजे में एक नाराजगी थी । निर्वाण ने एक गहरी सांस ली और लाचारी से बोला - " दादी , तारा जिद्दी है । वह कभी नहीं मानेगी । "
बाहर दरवाजे से कान लगा कर खड़ी ऋत्विजा ने जब उनकी बाते सुनी तो उसकी आंखे छलक पड़ी ।
" तुमने उसे हद से ज़्यादा ही सिर पर चढ़ा रखा है । लेकिन मै भी कह देती हूं निर्वाण । इस बार जाने दे रहीं हूं । लेकिन अगली बार आओगे तो साथ में ऋत्वी को यहां से लेकर जाओगे... बस बात खत्म । " दादी ने निर्वाण को जैसे ऑर्डर दिया था ।
क्रमशः
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