एक बूंद मोहब्बत ! Ch. 2

एक बूंद मोहब्बत ! - Chapter 2

Posted by Neha Sayyed • May 02, 2026 08:59 PM

बढ़ते है कहानी की ओर---

खाना खाते हुए निर्वाण के जेहन में दादी की कहीं बाते चल रही थी जब उसकी थाली में गरमा गर्म रोटी रखते हुए ऋत्विजा बोली - " और कुछ लेकर आऊं आपके लिए .. ? "

ऋत्विजा की आवाज से वह अपने होश में लौटा । उसने बगैर उसकी ओर देखे बस अपना सिर ना में हिला दिया । एक फीकी सी मुस्कान के साथ प्लेट को अपने सीने से लगाते हुए उसने एक क्षण रुक कर उसे देखा और अगले ही लम्हा उसे खयाल आया कि तवे के नीचे गैस चल रही थी । वह जल्दी से रसोई में भाग गई ।

दादी ने निवाला बना अपने मुंह में रखते हुए निर्वाण को नाराजगी से देखा - " यह क्या तरीका है निर्वाण .. ?

दादी की बात पर निर्वाण ने उलझ कर उन्हें देखा । तो दादी आगे बोली - " अच्छे से बात नहीं कर सकता है तू उससे .. ?

" किससे .. ? " वह अभी भी उलझन में उन्हें देख रहा था । तो दादी ने अपना माथा पीट लिया और अफसोस करती हुई बोली - " हे भगवान...

" क्या हुआ दादी .. ? "

" तेरे और मेरे अलावा यहां कौन है .. ? "

" ऋत्विजा ! "

" तो कमअक्ल , बैल बुद्धि मैं उसी की बात कर रहीं होंगी ना । जब से आया है क्या तूने उसका हाल - चाल भी पूछा है । " दादी ने उसे झिड़का था । निर्वाण के चहरे पर एक नाखुशी उभर आई । मगर उसने एक शब्द भी अपने मुंह से नहीं निकाला ।

खाना खा कर वो अपने हाथ धोने आंगन में लगी सिंक के पास आया । मगर उसे गिले हाथ पोछने के लिए वहां कुछ नजर नहीं आया । यह देख ऋत्विजा ने फ़िलहाल पहनी हुईं साड़ी का पल्लू आगे बढ़ा दिया । निर्वाण ने ठिठक कर उसे देखा और फिर बगैर कुछ कहे उसका पल्लू थाम लिया ।

ऋत्विजा का चहरा खिल सा गया । थैंक्यू कहते हुए उसने उसके पल्लू को छोड़ा तो वह आहिस्ते से बोली - "  आज रुक जाइए यही । "

निर्वाण ने उसकी बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया और दादी की तरफ बढ़ता हुआ बोला - " दादी मैं निकलता हूं , वरना शहर पहुंचते देर..... "

निर्वाण की बात अधूरी रह गई थी जब अचानक आसमान में तेज बिजली कड़की थी । मौसम का रुख बदल गया था । यह देख ऋत्विजा को एक उम्मीद मिली कि शायद अब वह रुक जाए । मगर उसकी वह छोटी सी उम्मीद को तोड़ते हुए निर्माण ने दादी के पैर छुए और उन्हें अपना ख्याल रखने का कहकर निकल गया ।

दादी उठ कर अपने कमरे में जाती हुई बोली - " एक हफ्ता और इंतज़ार कर ले । इस दफा तुझे इसके साथ ही भेजूंगी । "

उनके कमरे में जाते ही ऋत्विजा ने बेजान कदमों के साथ जाकर दरवाजा बंद किया और रसोई में आकर अपना बचा हुआ काम समेटने लगी । लेकिन बाहर बारिश शुरू हो गई थी । अपने लिए खाना प्लेट में रख , वह अपने कमरे के बाहर रखी कुर्सी पर बैठी और आंगन में नाचती बारिश की बूंदों को देख , आहिस्ते - आहिस्ते खाना खाने लगी ।

मगर अब उसकी आंखे भी बरसने लगी थी । खाना के निवाले उसके गले से नीचे बड़ी मुश्किल से उतर रहे थे । हफ्ते भर वो खुद को समेटती थी और वह जालिम शख्स उसे एक झटके में बिखरे कर चला जाता था ।

वह हर किसी से बात करता था सिवाए उसके की यही बात शिद्दत की गहराई से उसे चुभती थी । ऋत्विजा का दिल मानो सीने में धड़कने के बजाय दर्द की तरह धक - धक कर रहा था । बारिश उसके आंसुओं के साथ जैसे सही तालमेल बिठा रही थी । उसने प्लेट एक तरफ रख दी और दोनों हाथों से चेहरा ढककर सिसकने लगी ।

उसी पल दादी का कमरा खुला । वह आहिस्ते - आहिस्ते चलते हुए बाहर आईं । उनकी नज़र ऋत्विजा पर पड़ी तो वह थोड़ी हैरानगी के साथ बोली - " यहां क्यों बैठी है । "

ऋत्विजा ने सुर्ख आंखो से उन्हें देखा तो वह जैसे सब समझ गई । उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा - " पगली !  आँसू बहाने से कोई अपना नहीं रुकता । जो उसे रोकता है वो अपनापन होता है , मोहब्बत होती है और मोहब्बत से पत्थर दिल भी पिघल जाता है । "

ऋत्विजा के होंठ काँप रहे थे - " दादी... मैंने क्या गुनाह किया है ।  क्यों वो मुझसे ऐसे बेरुख़ी से पेश आते है .. ?"

दादी ने गहरी साँस भरी और बारिश की बूंदों को जमीन पर उछालते देख बोली - " निर्वाण ने अपने अंदर बहुत कुछ दबा रखा है । ग़ुस्सा... तकलीफ़... और शायद कुछ अधूरे सपने । तू धैर्य रख । जिस दिन उसका दिल तेरे लिए पिघल जाएगा ना, उस दिन ये आँसू खुशी में बहेंगे । क्योंकि जो जब किसी से प्यार करता है ना तो सिर्फ एक बूंद मोहब्बत नहीं करता "

" लेकिन एक बूंद मोहब्बत तो उम्मीद होती है दादी । "

दादी ने हामी में सिर हिलाया - " हां होती है , मगर वही एक बूंद अगर सच्ची हो ना, तो समंदर बनने में देर नहीं लगती । मोहब्बत कभी तौल कर नहीं मिलती । वो तो बिन मांगे दामन भर देती है । "

ऋत्विजा की आँखें दादी की बातों से और भी भीग गईं । उसने सिर झुका लिया, जैसे अपने ही दिल की कमजोरी पर अफसोस कर रही हो । दादी ने उसका ठुड्डी उठाते हुए कहा - " तेरे सब्र का फल मीठा होगा । निर्वाण जितना दूर भाग रहा है, असल में उतना ही तेरे करीब आ रहा है । बस वक्त आने दे । "

इसी बीच घर के बाहर खटखटाहट हुई । ऋत्विजा और दादी दोनो ही चौंक गई । इस वक्त कौन आया होगा , यह सोचकर वह उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई । जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला , एक बार फिर अपने सामने खड़े निर्वाण को देख और ज़्यादा चौक गई ।

क्रमशः

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