एक बूंद मोहब्बत ! - Chapter 3
बढ़ते है कहानी की ओर---
वह काफी बुरी तरह से भीगा हुआ था । ऋत्विजा हैरानगी से उसे देखते हुए आगे से हटी तो वह अंदर आया । दादी ने जब उसे देखा तो वह भी हैरान हुई यह सोचकर कि वह जब चला गया था तो वापस क्यों आया .. ?
लेकिन उन्होंने उससे कोई सवाल नहीं किया बल्कि ऋत्विजा से कहा कि वो जल्दी से तोलिया ले आये । दादी की बात मानते हुए वह जल्दी से अंदर में भाग गई । तो निर्वाण अपने चेहरे से पानी की बूंदे झटकता, हल्का खीज और थकान में बोला - " रास्ता बंद हो गया है , आगे वाली पुलिया टूट गई । गाड़ी के जाने का रास्ता ही नहीं बचा था , इसलिए वापस आना पड़ा । "
उसकी बात सुनकर दादी ने आसमान की ओर देखा और धीरे से बुदबुदाईं - " ये सब ऊपर वाला ही कर रहा है , ताकि तू ठहरे । "
निर्वाण ने दादी की बात अनसुनी की और कुर्सी खींच कर बैठ गया । बारिश की बूंदें अब भी टपक रही थीं, और हवा में मिट्टी की भीगी महक थी । ऋत्विजा ने निर्वाण को तोलिया लाकर दिया और खुद चाय बनाने का कहकर रसोई में चली गई । दादी उसके बगल ही दूसरी कुर्सी पर बैठते हुए बोली - " बेटा... तू जितना भागेगा , किस्मत उतना ही तुझे यहीं खींच लाएगी । कुछ रिश्ते होते हैं जिन्हें ऊपर वाला जोड़ता है, उनमें इंसान की मर्ज़ी उतनी चलती नहीं । "
निर्वाण ने तौलिए से अपने बाल रगड़ते हुए गहरी सांस ली । उसकी आंखों में थकान थी और लहजे में खीझ - " दादी ! .. आपने ये बातें पहले भी कही हैं । लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो मजबूरी में लिए जाते हैं, मोहब्बत में नहीं । "
दादी ने उसकी ओर गौर से देखा - " मजबूरी कह रहा है तू... और वो लड़की जो हर रोज़ तेरे इंतज़ार में अपना दिल तोड़ती है .. उसकी मजबूरी कौन समझेगा .. ? "
निर्वाण चुप हो गया । उसकी आंखें पल भर के लिए रसोई के दरवाज़े की तरफ उठीं, जहां से हल्की रोशनी आ रही थी । वह जानता था ऋत्विजा हर शब्द सुन सकती है । क्योंकि रसोई ज़्यादा दूर थी नहीं । मगर उसने कहा कुछ नहीं... एक शब्द भी नहीं ।
इसी बीच, ऋत्विजा चाय की ट्रे लेकर आई । उसने कप दादी और निर्वाण के आगे रखे और खुद चुपचाप कोने वाली कुर्सी पर बैठ गई । तो दादी मुस्कुरा कर आहिस्ते से बोली - " अच्छा मौका है ।"
" दादी प्लीज!!!!!!!!!! " वह फिर खीज उठा । तो दादी हंसते हुए सोने का कहकर अपने कमरे में चली गई । अब वहां सिर्फ वह दोनो ही बचे थे । ऋत्विजा इंतजार कर रही थी कि कब निर्वाण बोले जबकि ऋत्विजा से बात ना करनी पड़े इसलिए वो चाय पीने लगा था ।
" म... मैने आपके कपड़े अंदर कमरे में रख दिए है । बदल लीजिए वरना तबीयत खराब हो जाएगी । " उसके भीगे कपड़ों को देखते हुए इस दफा ऋत्विजा ने फिक्रमंद होते हुए कहा था । चाय का खाली कप रखते हुए वह उठा और अंदर कमरे में चला गया ।
एक फीकी सी मुस्कान के साथ उसने वहां रखे बर्तनों को समेटा और रसोई में चली गई । लाइट बंद कर वो कमरे में आई तो निर्वाण कमरे से निकल रहा था । साफ था कि वो उसके साथ , कमरे में तो नहीं सोने वाला था । और यह बात उसे ज़्यादा बुरी भी नहीं लगी । क्योंकि वह जानती थी कि उनका रिश्ता इस हद तक भी नहीं था अभी ।
उसने निर्वाण के फिलहाल पहने हुए कुर्ते पजामे को देखा , जो उसने खुद उसके लिए सिला था । जो उसके ऊंचे वजूद पर भी काफी ढीला नजर आ रहा था । लेकिन वो कंफरटेबल था , यह उसके चहरे पर राहत बता रही थी ।
वह एक बार जाकर दादी को देख कर आया, जो पहले ही सो चुकी थी । सीलिंग फेन की स्पीड पांच से तीन पर करते हुए वह दरवाजा झपका कर बाहर आ गया और वही बरामदे में कुर्सी पर बैठ , अपने पैरों को टेबल पर रख बारिश को देखने लगा , जो अभी भी अपने पूरे जोर पर थी ।
वही ऋत्विजा ! अपने कमरे की दहलीज पर टिक कर खड़ी एकटक उसे देख रही थी । दोनो के कानो में बस बारिश गिरने की आवाज पड़ती रही ।
" सोएंगे नहीं क्या आप .. ? " काफी देर बाद ऋत्विजा बोली तो निर्वाण एकदम चौक पड़ा ।
" सोई नहीं ! " वह खुद को सामान्य करते हुए बोला । तो उसने अपना सिर ना मे हिलाया और फीका सा मुस्कुरा कर बोली - " यहां आपको अच्छा नहीं लग रहा .. ? "
निर्वाण सामने देखता हुआ बोला - " अच्छा बुरा की बात नहीं है । बस.... मन नहीं ठहरता । "
" क्या मै जान सकती हूं , क्यों .. ? " वह अब उसके बगल वाली कुर्सी पर आ बैठी थी । निर्वाण ने गहरी सांस ली , जैसे ख़ुद के मन में इस सवाल का जवाब तलाश रहा हो ।
उसे कुछ ना कहता देख वह आगे बोली - " हां ! , मन तो वैसे भी क़ासिर होता है , जब तक सामने वाला ख़ुद कोशिश ना करे । "
" मुझे ताने मार रहीं हो .. ? "
" नहीं... बिल्कुल भी नहीं । बस मै बात पर बात कह रहीं हूं । "
" ठीक है तो सुनो , हां मेरा दिल नहीं करता यहां आने का । दादी की जिम्मेदारी है मुझ पर इसलिए आता हूं । और यह मत सोचना कि वजह तुम हो , इसलिए मन नहीं करता । " निर्वाण ने काफी सहज भाव से कहा था । जबकि उसकी आंखो के पर्दे पर एक चहरा उतर आया था ।
" मै नहीं , लेकिन वजह कौन है । यह तो बता दीजिए । "
" कुछ सवाल अगर जिंदगी भर अनकहे रहे तो बेहतर होता है । "
" अच्छा!!!!!!!!!!!!!!!!!! और कहीं उन अनकहे सवाल का नाम तारा तो नहीं.... या त्रिप.... "
वह अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले ही निर्वाण सख्ती से बोला - " चुप हो जाओ । "
वह हल्की सी ताली बजा कर अपनी जगह से खड़ी हुई और आंखों में नमी लिए बोली - " शायद लोग सही कहते है कि दूसरी पत्नी तो दूसरी ही होती है । पति की नजर में उसकी कोई भी अहमियत होती ही नहीं है ।
कहकर अपने कमरे में जाने लगी तो निर्वाण ने उसकी कलाई पकड़ ली । वह जैसे करंट खाकर ठिठकी । लेकिन उसने फिर उसकी थामी हुई कलाई छोड़ दी । उसका दिल धक् से हुआ । इतना तो उसे उसकी कलाई थामने का नहीं लगा था , जितना छोड़ने का बुरा लगा ।
हां , वह यही तो करता था । थामता और फिर छोड़ देता । बिल्कुल उसकी तरफ... उसका हाथ थाम उससे शादी की और फिर यहां छोड़ दिया । अपने दिल के किरचे उठा कर वह ख़ामोशी से कमरे में चली गई । जबकि निर्माण ने एक शब्द तक नहीं कहा ।
क्रमशः
आज का भाग कैसा लगा कॉमेंट्स में जरुर बताएं बाकी पढ़ते रहें यह कहानी ❤️