सौम्य और शक्ति : किन्नर के अस्तित्व की Ch. 1

सौम्य और शक्ति : किन्नर के अस्तित्व की गरिमा - Chapter 1

Posted by Ishra Aalam • May 03, 2026 08:46 PM

भोर अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी, लेकिन शहर के पुराने हिस्से में बसे उस प्राचीन शिव मंदिर के आसपास जीवन की धीमी आहट उतरने लगी थी। आसमान के पूर्वी कोने में हल्की सुनहरी लकीरें फैल रही थीं, जैसे रात की काली चादर को किसी ने बहुत सावधानी से किनारों से मोड़ना शुरू कर दिया हो।

गलियों में सफेद धुंध की महीन परतें तैर रही थीं और हवा में ऐसी ठंडक घुली थी, जो त्वचा को छूकर भीतर तक उतर जाती थी। मंदिर के ऊँचे पत्थरीले शिखरों पर लगी भगवा पताकाएँ सुबह की हवा के साथ धीरे-धीरे लहरा रही थीं। हर झोंके के साथ उनकी सरसराहट मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि में मिल जाती और पूरा वातावरण किसी अलौकिक शांति से भर उठता। ऐसा लगता था मानो यह जगह शहर का हिस्सा नहीं, बल्कि समय से बाहर कोई ऐसी दुनिया हो जहाँ आकर मन अपने सारे बोझ खुद-ब-खुद उतार देता हो।

मंदिर के बाहर फूलों की छोटी-छोटी दुकानें सज चुकी थीं। ताज़े गेंदे और चमेली की मालाओं से उठती खुशबू, बेलपत्रों की हरी ताजगी और अगरबत्तियों से फैलती चंदन की महक हवा में इस तरह घुल गई थी कि साँस लेना भी किसी पूजा का हिस्सा लग रहा था।

बूढ़ी औरतें पीतल की थालियों में प्रसाद सजा रही थीं, बच्चे उनींदी आँखों से अपने माता-पिता के पीछे-पीछे चल रहे थे और मंदिर के मुख्य द्वार पर बैठे पंडित मंत्रों का धीमा उच्चारण कर रहे थे। लेकिन रोज़ की तरह आज भी भीड़ में एक अजीब-सी प्रतीक्षा थी।

लोग पूजा करने आए थे, पर उनकी नजरें बार-बार मंदिर के बाहर वाली सड़क की तरफ उठ जा रही थीं, जैसे वे किसी खास व्यक्ति के आने का इंतजार कर रहे हों।

“छोटे मालिक आए क्या?”

फूलों की दुकान पर बैठी बूढ़ी अम्मा ने अपनी धुंधली आँखें सड़क की तरफ गड़ाए पूछा। उनकी आवाज़ में साधारण जिज्ञासा नहीं, बल्कि वह अपनापन था जो लोग अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए महसूस करते हैं। पास बैठा दुकानदार तुरंत बोला,

“अभी नहीं अम्मा, लेकिन आते ही होंगे। पंडित जी ने तो आरती भी रोक रखी है। कहते हैं उनके आने के बाद ही शुरू करेंगे।”

बूढ़ी औरत के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने श्रद्धा से कहा,

“भोलेनाथ की बड़ी कृपा है उस बच्चे पर, जब से पैदा हुआ है, चौहान खानदान की किस्मत ही बदल गई। जिस चीज़ को हाथ लगा दे, उसमें बरकत हो जाती है।”

पास खड़े दो आदमी भी बातों में शामिल हो गए। उनमें से एक ने धीरे से कहा,

“सिर्फ चौहान खानदान की नहीं अम्मा, पूरा शहर जानता है कि चौहान ग्रुप आज जहाँ खड़ा है, उसमें छोटे मालिक का हाथ है। इतनी कम उम्र में जितना दिमाग उस लड़के में है ना, उतना बड़े-बड़े बिजनेसमैन में नहीं होता।”

दूसरा आदमी कुछ झिझका। उसने आसपास देखा, फिर धीमे स्वर में बोला,

“लेकिन लोग ये भी तो कहते हैं कि वो… थोड़ा अलग है…”

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया, लेकिन आसपास खड़े लोग समझ गए कि वह किस ओर इशारा कर रहा था। एक पल के लिए हल्की चुप्पी छा गई। बूढ़ी फूलवाली ने उसे ऐसी सख्त नजर से देखा कि वह आदमी तुरंत असहज हो गया।बूढ़ी औरत ने कठोर स्वर में कहा,

“भगवान के बनाए इंसान पर सवाल नहीं उठाते, और वैसे भी, जितनी इज्जत वो दूसरों को देता है ना, उतनी तो हम जैसे सामान्य लोग भी नहीं दे पाते। भगवान किसी को जैसा बनाते हैं, उसमें कोई कमी नहीं होती। कमी लोगों की सोच में होती है।”

आदमी चुप हो गया। तभी दूर सड़क पर एक काली SUV धीरे-धीरे मंदिर की तरफ बढ़ती दिखाई दी। गाड़ी को देखते ही लोगों की बातचीत अपने आप थम गई। जैसे पूरे वातावरण ने एक पल के लिए साँस रोक ली हो।

ड्राइवर जल्दी से उतरकर पीछे का दरवाजा खोलने बढ़ा, लेकिन उससे पहले ही भीतर से शांत, मधुर और संयत आवाज़ सुनाई दी,

“रघु काका, मैंने कितनी बार कहा है कि मैं खुद उतर सकता हूँ।”

आवाज़ इतनी कोमल थी कि सुनते ही आसपास खड़े लोगों के चेहरे नरम पड़ गए। रघु काका हल्का सकुचा गए और आदर से सिर झुका लिया। उन्होंने धीमे स्वर में कहा।

“माफ कीजिए छोटे मालिक,”

अगले ही पल गाड़ी का दरवाजा खुला और वह बाहर उतरा। जैसे सुबह की पहली धूप अचानक धरती पर उतर आई हो। लाल रंग का सादा कुर्ता, सफेद पायजामा, पैरों में साधारण कोल्हापुरी चप्पलें, गले में पतली सोने की चेन और रुद्राक्ष की माला, माथे पर हल्का चंदन का तिलक और नाक में छोटी-सी काली रिंग। उम्र मुश्किल से उन्नीस साल, लेकिन चेहरे पर ऐसी गरिमा जैसे जीवन बहुत कुछ सिखा चुका हो।

उसका रंग इतना उजला था कि पहली नजर में लगता था धूप भी उसे छूने से पहले झिझकेगी। बाल हल्के बिखरे हुए थे और बड़ी-बड़ी शांत आँखों में ऐसी गहराई थी जिसमें कोई भी कुछ पल के लिए खो जाए। वह सौम्य चौहान था।

चौहान ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का इकलौता वारिस। करोड़ों की संपत्ति का मालिक। बिजनेस मैनेजमेंट का टॉपर स्टूडेंट। और इस शहर के लिए ऐसा नाम, जिसके बारे में लोग जितना जानते थे, उससे कहीं ज्यादा बातें करते थे।

लेकिन उस क्षण उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि वह अरबों की कंपनी का वारिस है। उसके चेहरे पर ना अमीरी का घमंड था, ना अपनी पहचान को लेकर कोई असहजता। उसमें सिर्फ एक शांत स्वीकार्यता थी, ऐसी स्वीकार्यता, जो बहुत दर्द सहने के बाद ही इंसान के भीतर जन्म लेती है।

सौम्य ने मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं। उसके कदम धीमे थे, मगर उनमें एक अजीब आत्मविश्वास था। वह आत्मविश्वास ताकत का नहीं था, बल्कि खुद को पूरी तरह स्वीकार कर लेने का था। उसे देखते ही लोग अपने आप रास्ता छोड़ते गए।

“प्रणाम छोटे मालिक…”

“हर हर महादेव…”

“भोलेनाथ आपकी हर मनोकामना पूरी करें बेटा…”

हर आवाज़ में स्नेह था। सौम्य हर किसी को हल्की मुस्कान और सिर झुकाकर जवाब देता जा रहा था। उसके व्यवहार में इतनी विनम्रता थी कि लोग उसे सिर्फ चौहान खानदान का वारिस नहीं, अपने शहर का बेटा मानते थे।

मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुँचते ही बड़े पंडित जी स्वयं बाहर आ गए। उम्र लगभग साठ के आसपास रही होगी, लेकिन सौम्य को देखते ही उनके चेहरे पर वैसी चमक आ गई जैसी किसी पिता के चेहरे पर बेटे को देखकर आती है।

उन्होंने स्नेह से पूछा।

“आ गए बेटा?”

सौम्य तुरंत झुककर उनके पैर छूने लगा।

“आशीर्वाद दीजिए पंडित जी।”

पंडित जी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।

“महादेव हमेशा तुम्हारी रक्षा करें।”

पास खड़े कुछ नए श्रद्धालु यह दृश्य देख रहे थे। उनमें से एक युवक ने धीरे से अपने दोस्त से पूछा,

“यही हैं चौहान परिवार के छोटे मालिक?”

दूसरा बोला,

“हाँ, लेकिन मैंने जितना सुना था, उससे अलग लग रहे हैं।”

पहला आदमी धीरे से पुछता है।

“कैसे?”

वो आदमी जवाब देता है।

“पता नहीं… जिन लोगों के बारे में इतना नाम सुना जाए, उनमें अक्सर घमंड होता है। लेकिन इन्हें देखकर… ऐसा लगता है जैसे ये सच में अच्छे इंसान हैं।”

सौम्य शायद उनकी बातें सुन चुका था, लेकिन उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। वह शांत कदमों से गर्भगृह की ओर बढ़ गया। शिवलिंग के सामने पहुँचते ही उसकी आँखों में ऐसी श्रद्धा उतर आई, जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल था।

उसने धीरे से जल का कलश उठाया, आँखें बंद कीं और मंत्रों का उच्चारण शुरू किया।

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…”

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, मगर उसमें ऐसी स्थिरता थी कि मंदिर के भीतर मौजूद लोग अनायास उसकी तरफ देखने लगे। कई लोगों ने जीवन में हजारों लोगों को पूजा करते देखा था, लेकिन सौम्य में कुछ अलग था। वह पूजा नहीं करता था,

वह खुद को पूरी तरह ईश्वर के सामने समर्पित कर देता था। जल शिवलिंग पर गिर रहा था और उगते सूरज की सुनहरी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उस क्षण उसमें दो अलग-अलग व्यक्तित्व एक साथ दिखाई देते थे, एक ऐसा लड़का जो बिजनेस मैनेजमेंट का टॉपर स्टूडेंट था, और दूसरा ऐसा इंसान जिसकी आत्मा आध्यात्मिक शांति में डूबी हुई थी।

पूजा समाप्त होने के बाद वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गया। ठंडी हवा अभी भी बह रही थी। तभी एक छोटी-सी बच्ची अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उसकी तरफ भागी।

“सौम्य भैया!”

सौम्य के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई। उसने बच्ची को संभाल लिया ताकि वह गिर न जाए।

“अरे, इतनी सुबह? स्कूल नहीं जाना क्या?”

बच्ची ने मुँह बना लिया।

“आज टेस्ट है…”

सौम्य ने प्यार से पुछा

“तो मंदिर क्यों आई हो?”

वो प्यार से बोली,

“मम्मी कहती हैं आपके साथ भगवान जल्दी सुनते हैं।”

सौम्य हल्का हँस पड़ा। उसकी हँसी बहुत धीमी और सच्ची थी। उसने बच्ची के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“भगवान सबकी सुनते हैं, बस खुद पर भरोसा रखना चाहिए।”

बच्ची खिलखिलाकर हँस दी और वापस अपनी माँ के पास भाग गई। उसकी माँ ने दूर से हाथ जोड़ दिए। सौम्य ने भी हल्का सिर झुका दिया। उसी समय मंदिर के ट्रस्टी जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए उसकी तरफ आए। उनके हाथ में कुछ फाइलें थीं और चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने आदर से कहा।

“छोटे मालिक, आपको जरूरी बात बतानी थी,”

सौम्य ने शांत नजरों से उनकी तरफ देखा।

“जी?”

उन्होंने फाइल आगे करते हुए कहा,

“नए अस्पताल प्रोजेक्ट का बजट तैयार हो गया है। अगर आप शाम तक फाइल देख लें तो काम शुरू करवा दें।”

सौम्य ने सहज स्वर में कहा, फिर जैसे कुछ याद आया हो,

“घर भेज दीजिए,,,,, और हाँ, इस बार अस्पताल में किन्नर समुदाय के लिए अलग हेल्थ विंग जोड़िए।”

ट्रस्टी एक पल को रुक गए।

“लेकिन छोटे मालिक… उसका खर्चा बहुत बढ़ जाएगा…”

उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर इतनी स्थिर कि सामने वाला आदमी तुरंत चुप हो गया। सौम्य ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

“मैंने खर्चा पूछा?..... अगर हमारी कंपनियाँ समाज के हर हिस्से से कमाती हैं, तो सुविधाएँ भी हर हिस्से तक जानी चाहिए। जिन लोगों को सबसे ज्यादा सम्मान की जरूरत होती है, उन्हें ही सबसे कम सम्मान मिलता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।”

ट्रस्टी ने तुरंत सिर झुका दिया।

“जैसा आप कहें।”

पास खड़े पंडित जी यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में गर्व साफ झलक रहा था। उन्हें हमेशा लगता था कि महादेव ने इस लड़के को सिर्फ धन नहीं दिया, एक अलग दृष्टि भी दी है।

इसी बीच मंदिर में आए कुछ कॉलेज लड़के धीरे-धीरे हँसते हुए अंदर आए। उनमें से एक की नजर सौम्य पर पड़ी और उसने अपने दोस्त से फुसफुसाकर कहा,

“यही है ना वो…?”

दूसरा हँस पड़ा।

“अरे भाई, ये लड़का है या लड़की या…”

उसकी बात पूरी होने से पहले ही सौम्य की नजर उसकी तरफ उठी। बस एक नजर। ना गुस्सा। ना अपमान। ना शर्म।

लेकिन इतनी शांत और सीधी कि लड़के की हँसी अपने आप रुक गई।

सौम्य धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा। उसके चेहरे पर वही शांति थी, मगर उस शांति में ऐसी गरिमा थी कि लड़के अनजाने में असहज हो गए। उसने सहज स्वर में पूछा।

“मंदिर पहली बार आए हो?”

लड़का हकलाया,

“ह… हाँ…”

सौम्य बोला,

“अच्छी बात है, लेकिन यहाँ लोग भगवान को देखने आते हैं, किसी इंसान का तमाशा देखने नहीं।”

बस इतना कहकर वह मुड़ गया। ना बहस, ना क्रोध। लेकिन उसके जाने के बाद उन लड़कों के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि सामने वाला इंसान कमजोर नहीं था। वह खुद को इतनी इज्जत देता था कि दूसरे उसे छोटा महसूस कराने में सफल ही नहीं हो सकते थे।

पंडित जी उसे जाते हुए देखते रहे। फिर धीमे स्वर में बोले,

“जिस इंसान ने खुद को स्वीकार कर लिया हो, उसे दुनिया कभी तोड़ नहीं सकती।”

सौम्य के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई, जैसे उसने यह बात सुन ली हो। मंदिर के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ वह अक्सर पूजा के बाद कुछ देर बैठा करता था। वह जाकर पत्थर के चबूतरे पर बैठ गया। हवा से पत्ते हिल रहे थे और दूर से आती घंटियों की आवाज़ वातावरण को और शांत बना रही थी। उसने आँखें बंद कर लीं। उसके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जैसे इस जगह आकर उसकी आत्मा सच में साँस ले पाती हो। कुछ देर बाद पीछे से कदमों की आवाज़ आई।

रघु काका धीरे से बोले,

“छोटे मालिक… घर से फोन आया है। मालकिन बात करना चाहती हैं।”

सौम्य ने फोन लिया। दूसरी तरफ उसकी माँ की स्नेह भरी आवाज़ थी।

“पूजा हो गई बेटा?”

सौम्य के चेहरे पर अनायास नरमी उतर आई।

“जी माँ।”

उनकी आवाज़ में वही ममता थी जो बचपन से हर दुख पर मरहम बनती आई थी।

“जल्दी घर आ जाओ,”

सौम्य ने उतना ही प्यार से जवाब दिया।

“जी।”

कुछ पल चुप्पी रही। फिर उनकी आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई।

“सूर्यवंशी परिवार से फिर फोन आया था। वो बात करना चाहते हैं।”

सौम्य की उंगलियाँ फोन पर हल्की कस गईं, मगर चेहरे की शांति नहीं टूटी।

“पता है मुझे।”

वो समझते हुए बोली,

“तुम घर आ जाओ, फिर आराम से बात करते हैं।”

उसने शांत स्वर में कहा।

“मैं भागने वालों में से नहीं हूँ माँ,”

दूसरी तरफ कुछ क्षण खामोशी रही। फिर उसकी माँ बहुत धीमे स्वर में बोलीं,

“तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे हो।”

यह सुनते ही सौम्य की नजर अनायास मंदिर के शिखर पर चली गई। उसने अपने पिता को कभी देखा नहीं था। उसकी पैदाइश से पहले ही उनका निधन हो गया था। लेकिन हर कोई यही कहता था कि उसका स्वभाव, उसकी आँखें और उसका धैर्य बिल्कुल अपने पिता जैसा है।

शायद इसी वजह से हर बार यह सुनकर उसके भीतर कहीं एक नरम दर्द जाग उठता था। फोन कटने के बाद वह कुछ देर वहीं बैठा रहा। हवा उसके बालों को हल्के से हिला रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था।

सूर्यवंशी परिवार का नाम सुनते ही भीतर अनजाना तनाव जाग उठा था। शहर के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक। ताकत, राजनीति और अहंकार, तीनों का संगम। और अब वे उससे बात करना चाहते थे। क्यों?

इस सवाल का जवाब शायद आने वाले दिनों में मिलने वाला था। उसी समय उसकी नजर मंदिर की सीढ़ियों के पास बैठे एक बूढ़े आदमी पर पड़ी, जो लोगों से मदद मांग रहा था। उसके कपड़े पुराने थे, आँखों में थकान और चेहरे पर बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। लोग उसके पास से गुजर रहे थे, मगर कोई रुक नहीं रहा था।

सौम्य बिना कुछ कहे उसके पास जाकर बैठ गया।

“क्या हुआ बाबा?”

बूढ़े आदमी की आँखें भर आईं।

“बीवी अस्पताल में है बेटा… पैसे नहीं हैं…”

सौम्य ने बिना एक पल गंवाए अपनी जेब से कार्ड निकाला और उसके हाथ में रख दिया।

“इस नाम से अस्पताल में बोल दीजिए। इलाज शुरू हो जाएगा।”

बूढ़े आदमी के काँपते हाथ कार्ड पकड़ते ही थरथरा उठे।

“भगवान खुश रखे तुम्हें बेटा…”

सौम्य हल्का मुस्कुराया।

“वो पहले से ही बहुत कुछ दे चुके हैं।”

रघु काका दूर खड़े उसे देखते रहे। उन्हें हमेशा लगता था कि इतना दर्द सहने के बाद भी कोई इंसान इतना शांत कैसे रह सकता है। उन्होंने बचपन से सौम्य को देखा था। लोगों की बातें, ताने, सवाल… सब कुछ।

लेकिन उन्होंने कभी उसे टूटते नहीं देखा। शायद इसलिए क्योंकि उसने बहुत पहले ही दुनिया से लड़ना छोड़कर खुद को स्वीकार करना सीख लिया था।

SUV की तरफ लौटते समय सौम्य ने एक बार पीछे मुड़कर मंदिर को देखा। सुबह का सूरज अब पूरी तरह निकल चुका था और उसकी सुनहरी रोशनी मंदिर के शिखरों पर चमक रही थी। उसकी आँखों में वही गहरी शांति उतर आई।

लेकिन उसे नहीं पता था कि आज की यह शांति उसकी जिंदगी की आखिरी आसान सुबहों में से एक थी। क्योंकि बहुत जल्द उसकी जिंदगी में एक ऐसा आदमी आने वाला था, जो उसके धैर्य, उसकी गरिमा और उसके दिल, तीनों की परीक्षा लेने वाला था।

आगे जानने के लिए बने रहीए ✨ 🙂

By ishra zafar aalam....

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