इल्जाम से इश्क तक - Chapter 1
रात का समय था।
शहर के सबसे अमीर और प्रतिष्ठित परिवारों में गिनी जाने वाली सिंहानिया हवेली आज रोशनी से जगमगा रही थी। हवेली के बाहर एक से बढ़कर एक महंगी गाड़ियाँ खड़ी थीं। अंदर बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता और नामी लोग पार्टी का आनंद ले रहे थे।
आज सिंहानिया परिवार की इकलौती बेटी आर्या सिंहानिया का जन्मदिन था।
हवेली के विशाल हॉल में संगीत बज रहा था। मेहमान हँस-बोल रहे थे। हर तरफ खुशी और रौनक दिखाई दे रही थी।
उसी भीड़ के बीच एक साधारण कपड़ों में खड़ा लड़का सभी मेहमानों की सेवा में लगा हुआ था।
उसका नाम था अर्जुन।
अर्जुन पिछले कई सालों से इस हवेली में काम करता था। उसकी माँ भी हवेली के किचन में काम करती थी।
अर्जुन गरीब जरूर था, लेकिन मेहनती और ईमानदार था।
वह ट्रे में जूस लेकर मेहमानों के बीच घूम रहा था।
"सर, आपका जूस।"
"मैडम, कुछ और चाहिए?"
हर किसी से वह सम्मान से बात करता था।
तभी सीढ़ियों से आर्या नीचे उतरती है।
पूरा हॉल उसकी तरफ देखने लगता है।
महंगे कपड़े, आत्मविश्वास भरी चाल और चेहरे पर घमंड साफ दिखाई दे रहा था।
सब लोग तालियाँ बजाने लगते हैं।
"हैप्पी बर्थडे आर्या!"
आर्या मुस्कुराते हुए सबका अभिवादन करती है।
अर्जुन भी दूर खड़ा उसे देखता है।
उसके मन में कोई बुरी भावना नहीं थी।
वह सिर्फ सोच रहा था कि कुछ लोग कितने भाग्यशाली होते हैं और कुछ लोग कितने संघर्ष में जीते हैं।
लेकिन उसे नहीं पता था कि यही रात उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
कुछ देर बाद केक काटने की तैयारी शुरू होती है।
आर्या के पिता विक्रम सिंहानिया मंच पर आते हैं।
उनके हाथ में एक छोटा लेकिन बेहद कीमती डिब्बा था।
वह मुस्कुराकर कहते हैं,
"आज मैं अपनी बेटी को हमारे परिवार की सबसे अनमोल विरासत देना चाहता हूँ।"
पूरा हॉल उत्सुक हो जाता है।
विक्रम धीरे से डिब्बा खोलते हैं।
अंदर एक दुर्लभ हीरा रखा था।
उसकी चमक पूरे हॉल को रोशन कर रही थी।
सभी लोग हैरान रह जाते हैं।
"वाह!"
"कितना कीमती है!"
"अद्भुत!"
विक्रम गर्व से कहते हैं,
"यह हमारे परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही निशानी है।"
आर्या मुस्कुराकर हीरा हाथ में लेती है।
सब लोग तालियाँ बजाते हैं।
कुछ देर बाद वह हीरा वापस डिब्बे में रख दिया जाता है।
पार्टी आगे बढ़ती रहती है।
इधर अर्जुन अपने काम में व्यस्त रहता है।
समय बीतता है।
अचानक हॉल के एक कोने से घबराई हुई आवाज आती है।
"सर... सर...!"
एक कर्मचारी दौड़ता हुआ विक्रम सिंहानिया के पास आता है।
"वो... वो हीरा नहीं मिल रहा!"
विक्रम का चेहरा उतर जाता है।
"क्या मतलब नहीं मिल रहा?"
"सर, डिब्बा खाली है!"
यह सुनते ही पूरे हॉल में सन्नाटा छा जाता है।
संगीत बंद हो जाता है।
सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं।
विक्रम गुस्से में चिल्लाते हैं,
"पूरी हवेली बंद कर दो!"
गार्ड तुरंत सभी दरवाजे बंद कर देते हैं।
अब कोई अंदर नहीं आ सकता था और न बाहर जा सकता था।
आर्या के चेहरे पर भी चिंता दिखाई देने लगती है।
विक्रम गरजते हैं,
"जब तक हीरा नहीं मिलता, कोई यहाँ से नहीं जाएगा!"
पूरे हॉल का माहौल बदल चुका था।
कुछ देर बाद सभी कर्मचारियों और मेहमानों की तलाशी शुरू होती है।
एक-एक करके सबकी जांच होती है।
अर्जुन भी लाइन में खड़ा था।
उसके मन में डर नहीं था क्योंकि उसने कुछ गलत नहीं किया था।
लेकिन अचानक एक गार्ड जोर से चिल्लाया,
"सर! यहाँ आइए!"
सभी लोग उसकी तरफ देखने लगते हैं।
गार्ड के हाथ में वही हीरा था।
वह अर्जुन के बैग से मिला था।
पूरा हॉल स्तब्ध रह जाता है।
अर्जुन की आँखें फैल जाती हैं।
"नहीं...!"
"यह मेरे बैग में कैसे आया?"
गार्ड गुस्से से उसका हाथ पकड़ लेते हैं।
विक्रम सिंहानिया का चेहरा क्रोध से लाल हो जाता है।
"तो चोर तुम निकले!"
अर्जुन घबराकर कहता है,
"नहीं सर!"
"मैंने चोरी नहीं की!"
"मुझे नहीं पता यह मेरे बैग में कैसे आया!"
लेकिन उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।
मेहमानों के बीच फुसफुसाहट शुरू हो जाती है।
"मैंने कहा था न।"
"गरीब लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।"
"देखो कैसे मासूम बन रहा है।"
हर शब्द अर्जुन के दिल को चोट पहुँचा रहा था।
वह बार-बार कह रहा था,
"मैं निर्दोष हूँ।"
"मैंने कुछ नहीं किया।"
तभी आर्या आगे आती है।
वह गुस्से से अर्जुन को देखती है।
"हमने तुम्हें काम दिया।"
"तुम पर भरोसा किया।"
"और तुमने यही किया?"
अर्जुन की आँखों में आँसू आ जाते हैं।
"आर्या जी, मैंने सच में चोरी नहीं की।"
लेकिन आर्या उसकी एक बात भी नहीं सुनती।
वह सबके सामने कहती है,
"चोर चाहे कितना भी अच्छा बनने की कोशिश करे, सच छिप नहीं सकता।"
यह सुनकर अर्जुन टूट जाता है।
उसे उम्मीद थी कि कम से कम कोई तो उसकी बात सुनेगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उसी समय अर्जुन की माँ भीड़ को चीरते हुए वहाँ पहुँचती है।
"मेरे बेटे ने कुछ नहीं किया!"
"वह ऐसा नहीं कर सकता!"
वह रोते हुए विक्रम सिंहानिया के पैरों में गिर जाती है।
"साहब, मेरा बेटा निर्दोष है।"
लेकिन विक्रम अपना पैर पीछे खींच लेते हैं।
"बस!"
"अब अदालत में अपनी सफाई देना।"
अर्जुन अपनी माँ को उठाता है।
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर दर्द से ज्यादा अपमान दिखाई दे रहा था।
सैकड़ों लोगों के सामने उसे चोर कहा जा रहा था।
उसकी इज्जत मिट्टी में मिल चुकी थी।
वह एक बार फिर आर्या की तरफ देखता है।
शायद उसे उम्मीद थी कि वह उसकी बात समझेगी।
लेकिन आर्या ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
उसी क्षण अर्जुन का दिल पूरी तरह टूट गया।
कुछ देर बाद पुलिस हवेली पहुँच जाती है।
पुलिस अधिकारी अर्जुन के सामने खड़े होते हैं।
"अर्जुन, तुम्हें चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।"
हथकड़ी आगे बढ़ाई जाती है।
अर्जुन कुछ क्षण शांत खड़ा रहता है।
फिर वह पूरे हॉल की तरफ देखता है।
सभी लोग उसे अपराधी की तरह घूर रहे थे।
उसकी आँखों में दर्द था।
अपमान था।
और एक ऐसा घाव था जो शायद कभी नहीं भरने वाला था।
पुलिस उसके हाथों में हथकड़ी लगा देती है।
अर्जुन की माँ जोर-जोर से रोने लगती है।
लेकिन कोई उनकी मदद नहीं करता।
अर्जुन धीरे-धीरे बाहर की तरफ ले जाया जाने लगता है।
हवेली की चमकती रोशनियों के बीच उसका जीवन अंधेरे में डूब रहा था।
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
पुलिस की गाड़ी का दरवाजा खुलता है।
अर्जुन बैठने से पहले एक बार हवेली की तरफ देखता है।
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।
अब वहाँ सिर्फ एक खामोश दर्द था।
और दिल के अंदर एक सवाल—
"जब मैंने कुछ किया ही नहीं... तो मुझे सजा क्यों मिल रही है?"
बारिश तेज हो जाती है।
पुलिस की गाड़ी आगे बढ़ जाती है।
दूर खड़ी हवेली की रोशनियाँ धीरे-धीरे धुंधली होने लगती हैं।
और इसी के साथ अर्जुन की जिंदगी का सबसे बुरा अध्याय शुरू हो जाता है...
एपिसोड 1 समाप्त।