इल्जाम से इश्क तक - Chapter 2
बारिश लगातार हो रही थी।
पुलिस की गाड़ी तेज़ी से सड़क पर दौड़ रही थी। पीछे की सीट पर बैठा अर्जुन खिड़की के बाहर देख रहा था। उसके हाथों में हथकड़ी लगी हुई थी।
उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था।
सैकड़ों लोगों के सामने उसका अपमान।
आर्या का उसे चोर कहना।
और उसकी माँ का रोते हुए गिड़गिड़ाना।
अर्जुन का दिल दर्द से भर गया था।
उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस हवेली को वह अपना घर समझता था, वहीं से उसे चोर बनाकर निकाला जाएगा।
पुलिस स्टेशन पहुँचते ही एक सिपाही ने दरवाजा खोला।
"चलो नीचे उतर।"
अर्जुन धीरे से नीचे उतर गया।
थाने के अंदर सभी लोग उसे ऐसे देख रहे थे जैसे वह कोई बड़ा अपराधी हो।
एक पुलिस अधिकारी सामने आया।
"नाम?"
"अर्जुन।"
"चोरी कबूल है?"
अर्जुन ने तुरंत सिर हिलाया।
"नहीं सर। मैंने कोई चोरी नहीं की।"
अधिकारी हँस पड़ा।
"हर चोर यही कहता है।"
अर्जुन चुप हो गया।
उसकी बात पर किसी को विश्वास नहीं था।
उधर दूसरी तरफ सिंहानिया हवेली में पार्टी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।
कुछ मेहमान जा चुके थे और कुछ अभी भी उसी घटना की चर्चा कर रहे थे।
आर्या अपने कमरे में बैठी थी।
उसके सामने वही हीरे वाला डिब्बा रखा था।
वह सोच रही थी कि अर्जुन ने ऐसा क्यों किया।
हालाँकि उसके मन में कहीं न कहीं एक छोटा सा सवाल भी था।
"क्या अर्जुन सच में ऐसा कर सकता है?"
लेकिन अगले ही पल उसने अपने मन की बात को झटक दिया।
"नहीं। सबूत उसके बैग से मिला है।"
"वह दोषी ही होगा।"
उसी समय उसकी दोस्त रिया कमरे में आई।
"क्या सोच रही हो?"
आर्या ने गहरी साँस ली।
"समझ नहीं आ रहा। अर्जुन ऐसा निकलेगा, कभी सोचा नहीं था।"
रिया बोली,
"लोग चेहरे से अच्छे लगते हैं लेकिन होते नहीं।"
आर्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके दिल में हल्की सी बेचैनी जरूर थी।
उधर अर्जुन की माँ हवेली के पिछले हिस्से में बने अपने छोटे से कमरे में बैठी रो रही थी।
कमरे में सन्नाटा था।
हर तरफ दर्द फैला हुआ था।
वह बार-बार भगवान से एक ही बात कह रही थी।
"मेरा बेटा निर्दोष है।"
"उसने कुछ नहीं किया।"
लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।
कुछ देर बाद हवेली का मैनेजर वहाँ आया।
उसके हाथ में एक लिफाफा था।
"मालिक का आदेश है।"
"आज से तुम्हारी नौकरी खत्म।"
यह सुनते ही अर्जुन की माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"क्या?"
"लेकिन मैं कहाँ जाऊँगी?"
मैनेजर ने बेरुखी से कहा,
"यह मैं नहीं जानता।"
"सुबह तक कमरा खाली कर देना।"
यह कहकर वह चला गया।
महिला की आँखों से आँसू बहने लगे।
एक ही दिन में उन्होंने अपना बेटा, नौकरी और घर सब कुछ खो दिया था।
रात के लगभग दो बजे थे।
पुलिस स्टेशन में अर्जुन एक कोने में बैठा था।
उसकी आँखों में नींद नहीं थी।
सिर्फ दर्द था।
तभी एक सिपाही आया।
"कोई मिलने आया है।"
अर्जुन ने सिर उठाया।
सामने उसकी माँ खड़ी थी।
उनका चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था।
अर्जुन तुरंत खड़ा हो गया।
"माँ!"
दोनों की आँखें भर आईं।
लोहे की सलाखों के बीच से उसकी माँ ने उसका चेहरा छुआ।
"बेटा, सच बता।"
"तूने कुछ नहीं किया ना?"
अर्जुन की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"माँ, मैं कसम खाता हूँ।"
"मैंने कुछ नहीं किया।"
"मुझे नहीं पता वह हीरा मेरे बैग में कैसे आया।"
उसकी माँ रो पड़ीं।
"मुझे पता है।"
"मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।"
अर्जुन पहली बार फूट-फूटकर रो पड़ा।
"माँ, सबने मुझ पर विश्वास करना छोड़ दिया।"
"सबने।"
उसकी माँ ने आँसू पोंछे।
"लेकिन मैं नहीं छोड़ूँगी।"
"मैं सच सबके सामने लाऊँगी।"
अर्जुन ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
उस पल दोनों के पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं था।
अगली सुबह।
शहर के सभी अखबारों की हेडलाइन एक जैसी थी।
"सिंहानिया हवेली में करोड़ों की चोरी। कर्मचारी गिरफ्तार।"
अर्जुन की तस्वीर हर जगह छपी हुई थी।
लोग उसे अपराधी समझने लगे थे।
जहाँ भी उसकी फोटो जाती, लोग उसे चोर कहकर पहचानते।
उधर हवेली में विक्रम सिंहानिया अपने ऑफिस में बैठे थे।
एक वकील सामने बैठा था।
"केस बहुत मजबूत है सर।"
"हीरा उसके बैग से मिला है।"
"सजा आसानी से हो जाएगी।"
विक्रम ने ठंडे स्वर में कहा,
"उसे उसके किए की कीमत चुकानी होगी।"
उन्हें बिल्कुल भी शक नहीं था कि कहीं कोई गलती हुई है।
दोपहर का समय था।
आर्या बगीचे में टहल रही थी।
लेकिन उसका मन शांत नहीं था।
अचानक उसे कुछ याद आया।
पार्टी शुरू होने से पहले उसने अर्जुन को देखा था।
वह बच्चों को खाना बाँट रहा था।
उनसे हँसकर बात कर रहा था।
क्या ऐसा इंसान चोरी कर सकता है?
यह सवाल फिर उसके मन में आया।
लेकिन तभी उसके फोन पर दोस्तों के संदेश आने लगे।
सब लोग अर्जुन को दोषी बता रहे थे।
धीरे-धीरे उसका मन फिर कठोर हो गया।
"अगर वह निर्दोष होता तो सबूत उसके बैग में क्यों मिलता?"
उसने खुद को समझाया।
शाम हो गई।
पुलिस अर्जुन को अदालत में पेश करने की तैयारी कर रही थी।
अर्जुन को हथकड़ी पहनाकर बाहर लाया गया।
बाहर पत्रकारों की भीड़ लगी हुई थी।
कैमरों की फ्लैश लगातार चमक रही थीं।
"क्या आपने चोरी की?"
"हीरा कहाँ बेचने वाले थे?"
"क्या यह आपकी पहली चोरी थी?"
हर तरफ सवाल ही सवाल थे।
लेकिन अर्जुन चुप रहा।
उसकी आँखों में केवल दर्द था।
अचानक भीड़ के पीछे उसकी माँ दिखाई दी।
वह रो रही थीं।
अर्जुन ने उन्हें देखा और हल्का सा मुस्कुराया।
जैसे कह रहा हो—
"मैं टूटूँगा नहीं।"
माँ ने भी आँसू पोंछ लिए।
उन्हें अपने बेटे पर भरोसा था।
लेकिन अभी यह सच दुनिया से छिपा हुआ था।
रात को अर्जुन फिर जेल की कोठरी में बैठा था।
वह आसमान की तरफ देख रहा था।
उसके दिल में दर्द था।
गुस्सा था।
और एक सवाल था।
"आखिर मेरे साथ यह सब किसने किया?"
धीरे-धीरे उसकी मुट्ठियाँ बंद हो गईं।
उसकी आँखों में पहली बार एक नई आग दिखाई दी।
"जेल की कोठरी में बैठा अर्जुन पूरी रात सो नहीं पाया। उसकी आँखों के सामने बार-बार आर्या का चेहरा आ रहा था। वही आर्या, जिसे वह हमेशा एक अच्छी और समझदार लड़की मानता था।
अर्जुन ने धीरे से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
"मैंने कुछ नहीं किया था... फिर भी उसने मेरी एक बात तक नहीं सुनी।"
उसकी आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
"अगर पूरी दुनिया मेरे खिलाफ हो जाती, तब भी मुझे इतना दुख नहीं होता। लेकिन आर्या... तुमने भी मुझ पर भरोसा नहीं किया।"
अर्जुन को याद आया कि कैसे आर्या ने सबके सामने उसे चोर कहा था। कैसे उसने बिना सच जाने उसे दोषी मान लिया था।
उसका दिल टूट चुका था।
धीरे-धीरे उस दर्द की जगह गुस्सा लेने लगा।
"मैं निर्दोष था... फिर भी तुमने मेरी आँखों में एक बार भी सच देखने की कोशिश नहीं की।"
अर्जुन ने सलाखों की तरफ देखते हुए कहा,
"आज जो अपमान मुझे मिला है, उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।"
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे।
वहाँ सिर्फ एक ठंडी नफरत जन्म ले रही थी।
"एक दिन सच सबके सामने आएगा, आर्या। उस दिन तुम्हें एहसास होगा कि तुमने किस इंसान को चोर कहा था।"
अर्जुन ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कसम खाई—
"मैं वापस लौटूँगा... पहले से ज्यादा मजबूत बनकर। और उस दिन मेरे टूटे हुए विश्वास का हिसाब जरूर होगा।" 🔥
तुम्हारी जिंदगी नरक से भी बत्तर बनाऊंगा आर्या देख लेना तुम उसी दिन का मुझे इंतजार है
एपिसोड 2 समाप्त।