इल्जाम से इश्क तक - Chapter 3
रात के लगभग ग्यारह बजे थे।
जेल की कोठरी में बैठा अर्जुन बार-बार एक ही बात सोच रहा था।
"आखिर आर्या ने मेरी बात क्यों नहीं सुनी?"
उसके दिल में दर्द था, लेकिन अभी भी कहीं न कहीं वह सच जानना चाहता था।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस लड़की ने उसे वर्षों तक देखा था, वह एक पल में उसे चोर मान सकती है।
उसी समय एक पुलिसकर्मी उसके पास आया।
"तुम्हारी जमानत हो गई है।"
अर्जुन हैरान रह गया।
पता चला कि शुरुआती जांच पूरी होने तक उसे अस्थायी जमानत मिल गई थी।
कुछ देर बाद वह पुलिस स्टेशन से बाहर निकल गया।
उसकी माँ बाहर खड़ी थी।
दोनों घर की ओर चल पड़े।
लेकिन अर्जुन के मन में एक ही सवाल घूम रहा था।
उसे जवाब चाहिए था।
उसे आर्या से पूछना था कि उसने बिना उसकी बात सुने फैसला क्यों कर लिया।
आधी रात हो चुकी थी।
सिंहानिया हवेली में लगभग सभी लोग सो चुके थे।
चारों तरफ सन्नाटा था।
अर्जुन चुपचाप हवेली के पीछे वाले रास्ते से अंदर आया।
वह यहाँ के हर कोने को जानता था।
उसका इरादा किसी को नुकसान पहुँचाने का नहीं था।
वह सिर्फ आर्या से बात करना चाहता था।
सिर्फ एक बार।
सिर्फ कुछ सवाल पूछना चाहता था।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर आर्या के कमरे तक पहुँच गया।
कमरे की बालकनी का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
अर्जुन अंदर चला गया।
कमरे में हल्की रोशनी थी।
आर्या अभी जाग रही थी।
अचानक उसने किसी की आहट सुनी।
वह घबराकर उठ बैठी।
"कौन है?"
अर्जुन सामने आया।
आर्या चौंक गई।
"तुम...?"
उसके चेहरे पर डर और गुस्सा दोनों दिखाई देने लगे।
अर्जुन की आँखें लाल थीं।
उसका दिल टूट चुका था।
लेकिन उसकी आवाज़ शांत थी।
"मैं सिर्फ कुछ पूछने आया हूँ।"
आर्या पीछे हट गई।
"यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?"
अर्जुन ने दर्द भरी आवाज़ में कहा,
"मैं सिर्फ जानना चाहता हूँ कि तुमने मेरी एक बात भी क्यों नहीं सुनी?"
"तुम मुझे बचपन से जानती हो।"
"क्या तुम्हें सच में लगा कि मैं चोरी कर सकता हूँ?"
आर्या चुप रही।
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
"मैंने कुछ नहीं किया था, आर्या।"
"फिर भी तुमने सबके सामने मुझे चोर कह दिया।"
कमरे में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
आर्या पहली बार अर्जुन की आँखों में दर्द देख रही थी।
लेकिन तभी उसे अचानक डर महसूस हुआ।
उसे लगा कि अगर किसी ने अर्जुन को उसके कमरे में देख लिया तो बहुत बड़ा हंगामा हो जाएगा।
उसका दिमाग घबरा गया।
तभी बाहर से किसी नौकर की आवाज़ आई।
"मैडम, सब ठीक है?"
आर्या और ज्यादा घबरा गई।
अचानक उसने जोर से चीख मार दी।
"बचाओ!"
अर्जुन हैरान रह गया।
"आर्या... मैं तो सिर्फ—"
लेकिन आर्या लगातार चीखती रही।
"बचाओ! कोई बचाओ!"अर्जुन उसको रोकने के लिए उसके बेड पर आ गया
कुछ ही सेकंड में पूरी हवेली जाग गई।
गार्ड, नौकर और परिवार के लोग कमरे की तरफ दौड़ पड़े।
दरवाजा खुला।
सभी लोग अंदर आ गए।
उन्होंने अर्जुन को उसके रूम में उसके बेड पर दिखा में खड़ा देखा।
आर्या डरी हुई दिखाई दे रही थी।
विक्रम सिंहानिया गुस्से से चिल्लाए,
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
अर्जुन कुछ बोल पाता, उससे पहले आर्या डर और घबराहट में कह बैठी,
"यह... यह जबरदस्ती मेरे कमरे में घुस आया था!"और मेरे साथ जबरजस्ती कर रहा था
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्जुन को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई हो।
उसने अविश्वास से आर्या की तरफ देखा।
"क्या...?"
"आर्या, तुम क्या कह रही हो?"
लेकिन आर्या चुप रही।
वह खुद भी घबरा चुकी थी।
अर्जुन की आँखों में दर्द भर गया।
"मैं तो सिर्फ बात करने आया था।"
"मैंने तुम्हें छुआ तक नहीं।"
लेकिन अब कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।
विक्रम सिंहानिया का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था।
उन्होंने गार्डों को आदेश दिया,
"इसे तुरंत बाहर फेंको!"
गार्डों ने अर्जुन को पकड़ लिया।
अर्जुन संघर्ष नहीं कर रहा था।
वह बस लगातार आर्या को देख रहा था।
उसकी आँखों में एक ही सवाल था।
"तुमने ऐसा क्यों किया?"
आर्या उसकी तरफ देखने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। हवेली के नौकर उसे बहुत ज्यादा मार रहे थे डंडों से
कुछ ही मिनटों बाद अर्जुन को हवेली के बाहर धक्का देकर फेंक दिया गया।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
वह सड़क पर गिर पड़ा।
उसके कपड़े भीग गए।
लेकिन उसे बारिश का एहसास तक नहीं हो रहा था।
उसके दिल में जो दर्द था, वह किसी भी चोट से बड़ा था।
धीरे-धीरे वह उठकर खड़ा हुआ।
उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।
वे टूटे हुए विश्वास के आँसू थे।
उसने हवेली की तरफ देखा।
वही हवेली जहाँ उसने अपनी जिंदगी के कई साल बिताए थे।
वही हवेली जहाँ उसकी माँ ने मेहनत की थी।
और वही हवेली जहाँ आज दूसरी बार उसकी इज्जत मिट्टी में मिला दी गई थी।
अर्जुन ने धीरे से कहा,
"पहले चोर बनाया..."
"और आज..."
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"आज तुमने मुझे ऐसा इंसान साबित कर दिया जो मैं कभी था ही नहीं।"
उसका दिल पूरी तरह टूट चुका था।
अब उसके अंदर बची हुई आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई थी।
हवेली की छत पर खड़ी आर्या खिड़की से बाहर देख रही थी।
नीचे सड़क पर खड़ा अर्जुन उसे दिखाई दे रहा था।
एक पल के लिए उसके दिल में अपराधबोध हुआ।
उसे पता था कि अर्जुन उसे नुकसान पहुँचाने नहीं आया था।
लेकिन डर और घबराहट में उसने गलत बात कह दी थी।
अब वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।
उधर सड़क पर खड़ा अर्जुन अपनी मुट्ठियाँ भींच चुका था।
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे।
वहाँ सिर्फ ठंडा गुस्सा था।
और एक गहरी नफरत।
उसने आसमान की तरफ देखा।
बिजली चमकी।
बारिश और तेज हो गई।
अर्जुन ने मन ही मन कसम खाई—
"आज के बाद मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई सम्मान नहीं बचा, आर्या।"
"जिस लड़की को मैं सबसे अच्छा इंसान समझता था, उसने ही मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी।"
"एक दिन मैं वापस आऊँगा।"
"उस दिन मैं तुम्हें वही दर्द महसूस करवाऊँगा जो आज मेरे दिल में है।"
अर्जुन मुड़कर वहाँ से चला गया। बीच रास्ते में ही उसे पुलिस ने पकड़ लिया आर्य के पापा ने पुलिस को पहले ही इन्फॉर्म कर दिया था
और उसके साथ ही उसके दिल का आखिरी भरोसा भी हमेशा के लिए मर गया।
एपिसोड 3 समाप्त। 🔥📖