शैलकुंज की सुबह और एक अनोखी सुंदरी - Chapter 1
हिमाचल प्रदेश के सुदूर अंचल में, जहाँ देवदार और चीड़ के घने जंगल आसमान को छूने की होड़ करते हैं, वहीं बसा है एक छोटा सा, शांत गाँव—'शैलकुंज'। इस गाँव की सुबह दुनिया के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग होती थी। जब सूरज की पहली किरणें बर्फ से ढकी चोटियों को छूकर नीचे उतरतीं, तो पूरा गाँव एक सुनहरी और धुंधली चादर में लिपट जाता था। ठंडी हवा के झोंके जब लकड़ी के घरों की खिड़कियों से टकराते, तो एक अजीब सी सरसराहट पैदा होती थी।
इसी गाँव के सबसे ऊपरी छोर पर, चट्टानों के बीच बना एक दो मंजिला पुराना घर था। यह घर पत्थरों और स्लेट की छतों से बना था, जिसके आंगन में हमेशा पहाड़ी फूलों की महक बिखरी रहती थी। इसी घर में रहती थी सिमी।
सिमी हाल ही में 18 साल की हुई थी, लेकिन उम्र का यह आंकड़ा उसके लिए केवल एक संख्या मात्र था। जहाँ इस उम्र में आकर गाँव की दूसरी लड़कियाँ लज्जा, संकोच और लोक-लाज के बंधनों में बंध जाती हैं, दुपट्टे से अपना बदन छुपाने लगती हैं और पुरुषों की निगाहों से बचने के लिए नजरें झुकाकर चलती हैं, वहीं सिमी इन सब सांसारिक नियमों से कोसों दूर थी।
उसके भीतर का बचपना समय के साथ कम होने के बजाय और ज्यादा गहरा हो गया था। उसकी हरकतें, उसकी सोच और उसका अंदाज़ अब भी एक आठ-नौ साल के अबोध बच्चे जैसा था, जिसे इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि दुनिया उसे किस नजर से देखती है।
सिमी को कपड़े पहनना एक सजा जैसा लगता था। भारी-भरकम सलवार-कमीज, लहंगे या ऊनी कुर्तियों में उसे ऐसा लगता मानो उसकी आजादी किसी ने छीन ली हो। इसलिए, वह अपने घर में और उसके आसपास के निजी बगीचे में हमेशा केवल अंतःवस्त्रों में ही घूमती रहती थी। उसकी अलमारी में तरह-तरह के कपड़े थे, जिन्हें उसकी माँ ने बड़े चाव से सिलवाया था, लेकिन सिमी को सबसे ज्यादा पसंद थी अपनी काली ब्रा और उससे मैचिंग पैंटी।
वह इसी रूप में पूरे घर में, आंगन में और कभी-कभी तो बेझिझक गाँव की सूनसान पगडंडियों पर भी निकल जाती थी।
उसकी माँ, पार्वती, अक्सर उसे टोकती:
"सिमी! अरे ओ सिमी! कम से कम शरीर पर एक कुर्ता तो डाल ले बेटी। अब तू बच्ची नहीं रही, अठारह साल की जवान लड़की है। लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?"
लेकिन सिमी अपनी माँ की बात को एक कान से सुनती और दूसरे से उड़ा देती। वह अपनी माँ के गले में बाहें डाल देती और चुलबुले अंदाज में कहती:
"ओहो माँ! तुम भी न हमेशा कपड़ों के पीछे पड़ी रहती हो। इन कपड़ों में मुझे बहुत गर्मी लगती है और घुटन भी होती है। और वैसे भी, मुझे कौन देख रहा है यहाँ? ये पेड़, ये पहाड़? ये तो मेरे दोस्त हैं!"
पार्वती अपनी बेटी की इस मासूमियत और जिद के आगे हार मान लेती। वह जानती थी कि सिमी का दिल पूरी तरह साफ है, उसके मन में कोई खोट या वासना नहीं है, वह तो बस प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी एक आजाद पंछी है। लेकिन पार्वती का डर भी गलत नहीं था, क्योंकि सिमी का बदन अब एक ऐसी कयामत का रूप ले चुका था जिसे देखकर किसी भी पुरुष का संभलना नामुमकिन था।
## अध्याय : प्रकृति का तराशा हुआ रूप: दूध और अंगूर
सिमी का शरीर किसी कुशल मूर्तिकार की सबसे बेहतरीन कलाकृति जैसा था। पहाड़ों की शुद्ध हवा, झरनों के ठंडे पानी और ताजे फलों के सेवन ने उसके जिस्म को एक अनोखा निखार दिया था। उसका रंग इतना साफ, गोरा और बेदाग था कि उसे देखकर सीधे दूध का अहसास होता था। उसकी त्वचा में एक प्राकृतिक चमक थी, जो धूप पड़ते ही कुंदन की तरह दमकने लगती थी।
उम्र के इस पड़ाव पर आकर उसकी काया पूरी तरह से खिल चुकी थी। उसके बदन की सबसे बड़ी विशेषता उसके सुडौल और भारी दूध थे। सिमी के ये दूध पूरी तरह से गदरा चुके थे और उनकी गोलाई इतनी मुकम्मल थी कि काली ब्रा के कप उन्हें पूरी तरह छुपाने में नाकाम साबित होते थे। ब्रा की तंग बंदिशों से बाहर झांकते उसके ये दूध बेहद कामुक और आकर्षक लगते थे।
लेकिन इस दूधिया गोरेपन पर जो चीज सबसे ज्यादा कातिलाना थी, वे थे उसके दूध पर सजे काले अंगूर जैसे गहरे और कड़क निप्पल। सिमी के ये निप्पल आकार में थोड़े बड़े और हमेशा उभरे हुए रहते थे, जो उसकी ब्रा के पतले कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिखते थे। जब भी सिमी ठंडी पहाड़ी हवा के संपर्क में आती, तो वे निप्पल और भी कड़क हो जाते, जिससे उसके दूध का उभार और भी तीखा और गहरा हो जाता था। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी संयमी क्यों न हो, जब सिमी के उन दूध जैसे सफेद दूध पर उन काले अंगूर जैसे निप्पलों को देखता, तो उसकी निगाहें वहीं ठहर जाती थीं।
सिमी की शारीरिक बनावट का निचला हिस्सा भी उतना ही लाजवाब था। उसके चूतड़ गोल-मटोल, भारी और पूरी तरह से भरे हुए थे। उसकी पतली कमर के नीचे उन गदराए हुए चूतड़ों का फैलाव ऐसा था कि वह जब भी चलती, तो उसके नितंबों में एक खास तरह की थिरकन और लहर पैदा होती थी। उसकी तंग पैंटी उसके चूतड़ों की गोलाई को और ज्यादा उभार देती थी, जिससे पीछे से उसका बदन किसी अप्सरा जैसा प्रतीत होता था।
जब वह अपनी ही मस्ती में झूमती हुई पहाड़ी रास्तों पर चलती, तो पीछे से उन भारी चूतड़ों का मटकना और आगे से उसके सुडौल दूध का हिलना, पूरे गाँव के पुरुषों के दिलों में एक अजीब सी हलचल पैदा कर देता था। मगर सिमी? वह इन सब आकर्षणों से पूरी तरह बेखबर, अपनी आँखों में बच्चों वाली शरारत लिए बस मुस्कुराती रहती और तितलियों के पीछे दौड़ती रहती।
## अध्याय: गाँव की पगडंडियाँ और थमते कदम
एक दोपहर की बात है, आसमान में हल्के-हल्के बादल छाए हुए थे और मौसम बेहद सुहावना था। सिमी को घर के भीतर मन नहीं लग रहा था। उसने अपने लंबे काले बालों को खुला छोड़ दिया, जो उसकी पीठ पर नीचे चूतड़ों तक लहरा रहे थे। हमेशा की तरह, उसने बदन पर कोई कपड़ा नहीं डाला था—वही काली ब्रा और पैंटी उसके गोरे बदन की शोभा बढ़ा रहे थे।
उसने हाथ में एक छोटी सी लकड़ी की छड़ी ली और अपने पालतू कुत्ते 'शेरू' को आवाज दी:
"शेरू! चल, आज नदी किनारे चलते हैं। देखते हैं पानी कितना ठंडा है!"
शेरू अपनी पूंछ हिलाता हुआ उसके आगे-आगे दौड़ने लगा और सिमी उसके पीछे-पीछे भागी। जब वह दौड़ती, तो उसके दूध जैसे सफेद दूध हवा में ऊपर-नीचे थिरकते थे, और उन पर मौजूद वे काले अंगूर जैसे निप्पल ब्रा के भीतर साफ तौर पर हिलते हुए दिखाई देते थे। पीछे से, उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के तंग कपड़े के भीतर हर कदम के साथ जोर-जोर से उछलते थे।
गाँव की पगडंडी से होते हुए वह नीचे की तरफ जा रही थी। रास्ते में गाँव के कुछ पुरुष अपने खेतों में काम कर रहे थे, और कुछ नौजवान एक बड़े पेड़ की छांव में बैठकर ताश खेल रहे थे। जैसे ही शेरू के भौंकने और सिमी के पायल की आवाज (जो उसने पैरों में पहन रखी थी) सुनाई दी, सबका ध्यान उस तरफ चला गया।
जैसे ही पुरुषों की नजर सिमी पर पड़ी, पगडंडी पर मानो वक्त ठहर गया। जो नौजवान ताश के पत्ते बांट रहा था, उसके हाथ हवा में ही रुक गए। खेतों में हल चला रहे किसानों ने बैलों को रोक दिया। सबकी निगाहें सिमी के उस दूधिया बदन पर टिक गईं।
वहाँ खड़े हर शख्स की नजरें सबसे पहले सिमी के उन उभरे हुए दूध पर गईं, जहाँ काली ब्रा के ऊपर से झांकता गोरापन और उन काले निप्पलों का तीखा उभार साफ नजर आ रहा था। फिर जैसे ही सिमी उनके आगे से गुजरी, सबकी आँखें उसके पीछे घूम गईं, जहाँ उसके गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के भीतर मटक रहे थे।
गाँव का एक नौजवान, मदन, जो सिमी को बचपन से देख रहा था, उसने अपने सूखे होंठों पर जुबान फेरी और बुदबुदाया:
"भगवान कसम... यह लड़की दिन-ब-दिन कोई जादू होती जा रही है। इसकी उम्र भले ही बच्ची जैसी हो, पर इसका यह बदन किसी को भी पापी बना दे। वह दूध... और वे काले निप्पल... उफ्फ!"
पास ही बैठे एक बुजुर्ग रामलाल ने एक गहरी सांस ली और अपने हुक्के का धुआं छोड़ते हुए कहा:
"मदन, अपनी नियत साफ रख। वह बच्ची है, उसका दिमाग अभी विकसित नहीं हुआ है। उसे नहीं पता कि वह क्या पहनकर घूम रही है। वह तो पहाड़ों की रूह है, पवित्र और बेबाक।"
सिमी ने उन लोगों को अपनी तरफ टकटकी लगाए देखते हुए पाया। लेकिन डरने या शरमाने के बजाय, उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को चमकाया, अपनी छड़ी हवा में लहराई और ज़ोर से हंसते हुए बोली:
"रामलाल काका! आज खेतों में काम नहीं करना क्या? सब के सब मुझे ऐसे देख रहे हो जैसे मैंने कोई भूत देख लिया हो!"
उसकी इस मासूम और बेबाक बात पर बुजुर्ग रामलाल मुस्कुरा दिए, जबकि युवा लड़के झेंपकर अपनी नजरें चुराने लगे।
सिमी खिलखिलाकर हंस पड़ी, और उसकी वह मधुर हंसी वादियों में गूंज गई। वह बिना रुके नदी की ओर बढ़ गई, और पीछे छोड़ गई पुरुषों के दिलों में एक ऐसी आग, जिसे शांत करना किसी के बस में नहीं था।
## अध्याय: नदी का किनारा और कबीर की नजर
शैलकुंज गाँव के नीचे से एक बर्फीली और साफ नदी बहती थी, जिसे 'कांच नदी' कहा जाता था क्योंकि इसका पानी शीशे की तरह साफ था। सिमी दौड़ते हुए नदी के किनारे पहुँची। चारों तरफ गोल और चिकने पत्थर बिखरे हुए थे।
सिमी ने नदी के किनारे पहुँचकर राहत की सांस ली। धूप थोड़ी तेज हो रही थी, जिससे उसके दूध जैसे सफेद बदन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें उभर आई थीं। पसीने की वजह से उसकी त्वचा और भी ज्यादा चमकदार और मखमली लग रही थी। उसके दूध पर पसीने की लकीरें बन रही थीं, जो ब्रा के कप के भीतर समा रही थीं, और उसके काले अंगूर जैसे निप्पल पानी की चाहत में और भी ज्यादा अकड़ गए थे।
उसने अपने पैर ठंडे पानी में डाल दिए और एक बड़े से चिकने पत्थर पर बैठ गई। जब वह बैठी, तो उसके भारी और गोल चूतड़ उस पत्थर पर फैल गए, जिससे उनकी गोलाई और भी ज्यादा विशाल और आकर्षक दिखने लगी। वह पानी से छोटे-छोटे कंकड़ उठाकर दूर फेंकने का खेल खेलने लगी।
उसी समय, नदी के दूसरी ओर झाड़ियों के पीछे से एक अजनबी युवक हाथ में एक कैमरा और एक डायरी लिए बाहर निकला। उसका नाम कबीर था। कबीर शहर का एक जाना-माना लेखक और फोटोग्राफर था, जो पहाड़ों के जनजीवन और यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता पर एक सचित्र उपन्यास लिखने के लिए पिछले दो दिनों से शैलकुंज में ठहरा हुआ था।
कबीर ने अब तक दुनिया भर की सुंदरियाँ देखी थीं, आधुनिक शहरों की मॉडल देखी थीं, लेकिन जो दृश्य इस समय उसकी आँखों के सामने था, उसने कबीर के होश उड़ा दिए।
कबीर की नजर जैसे ही पत्थर पर बैठी सिमी पर पड़ी, उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उसने देखा—एक लड़की, जिसका रंग दूध की तरह सफेद था, जो केवल एक काली ब्रा और पैंटी में बैठी थी। उसके सुडौल, गदराए हुए दूध और उन पर सजे वे काले अंगूर जैसे निप्पल किसी भी कलाप्रेमी के लिए एक अदभुत पेंटिंग जैसे थे।
और नीचे, पत्थर पर दबे उसके गोल-मटोल चूतड़ उसकी काया को एक अकल्पनीय कामुकता प्रदान कर रहे थे।
कबीर ने सम्मोहित होकर अपना कैमरा उठाया और लेंस को सिमी पर फोकस किया। उसने सिमी की कई तस्वीरें लीं:
1. पहली तस्वीर में सिमी मुस्कुराते हुए पानी में पैर छपछपा रही थी, जहाँ उसके दूध हवा में थिरक रहे थे।
2. दूसरी तस्वीर में उसने सिमी के पीछे का हिस्सा लिया, जहाँ पैंटी के भीतर दबे उसके भारी, गोल चूतड़ और उसकी पतली कमर का ढलान साफ दिख रहा था।
3. तीसरी तस्वीर में सिमी के चेहरे की वह अबोध और मासूम मुस्कान थी, जो उसके इस अर्द्धनग्न और कामुक बदन के बिल्कुल विपरीत थी।
तभी, पानी की एक तेज बौछार शेरू ने सिमी पर डाली, जिससे सिमी चौंक गई और उसकी नजर दूर खड़े कबीर पर पड़ी।
## अध्याय: मासूमियत और कला का संवाद
कबीर को देखकर सिमी घबराई नहीं। कोई और लड़की होती तो तुरंत अपने बदन को छुपाने के लिए पानी में कूद जाती या वहां से भाग जाती, लेकिन सिमी वहीं बैठी रही। उसने कबीर को गौर से देखा—उसकी शहरी पोशाक, उसका कैमरा और उसकी उलझी हुई दाढ़ी।
सिमी ने पत्थर पर बैठे-बैठे ही ज़ोर से आवाज लगाई:
"ऐ शहर के बाबू! तुम वहाँ झाड़ियों में छुपकर क्या कर रहे हो? और तुम्हारे हाथ में वह काला डिब्बा क्या है?"
कबीर थोड़ा हिचकिचाया, फिर उसने अपना कैमरा गले में लटकाया और धीरे-धीरे पत्थरों पर संतुलन बनाते हुए सिमी के करीब आया। जब वह पास आया, तो सिमी के दूध जैसे सफेद दूध का उभार और उन पर मौजूद काले निप्पलों की बनावट उसके ठीक सामने थी। कबीर ने अपनी नजरों को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश की, लेकिन सिमी की शारीरिक बनावट इतनी सम्मोहक थी कि उसकी आँखें बार-बार उसके दूध और भारी चूतड़ों पर टिक जाती थीं।
कबीर ने संयत होकर कहा:
"नमस्ते। मेरा नाम कबीर है। मैं शहर से आया हूँ, लेखक हूँ। और यह काला डिब्बा कैमरा है, इससे तस्वीरें लेते हैं।"
"तस्वीरें?" सिमी ने अपनी उंगली अपने गाल पर रखी, जिससे उसके दूध थोड़े और ऊपर उठ गए। "क्या तुमने मेरी भी तस्वीर ली?"
"हाँ..." कबीर ने सच स्वीकार किया। "तुम बहुत खूबसूरत हो। इस नदी और पहाड़ों के बीच तुम किसी अप्सरा जैसी दिख रही हो। इसलिए मैं खुद को रोक नहीं पाया।"
सिमी खिलखिलाकर हंस पड़ी। "अप्सरा? माँ तो मुझे जंगली तितली कहती है! वैसे, मुझे दिखाओ मेरी तस्वीर कैसी आई है।"
कबीर ने कैमरे की स्क्रीन चालू की और सिमी को तस्वीरें दिखाने लगा। सिमी कबीर के बिल्कुल पास आ गई। जब वह पास आई, तो उसके गोरे बदन की महक और उसके दूध का गर्म अहसास कबीर को महसूस होने लगा। सिमी ने स्क्रीन पर खुद को देखा—अपने दूध जैसे सफेद बदन को, काली ब्रा में कैद अपने गदराए दूध को और अपने भारी, गोल चूतड़ों को।
वह खुशी से उछल पड़ी। "अरे वाह! यह तो सचमुच मैं हूँ। कबीर बाबू, तुमने तो मुझे बहुत सुंदर बना दिया। लेकिन सुनो, तुमने मेरी पीठ के पीछे वाले उन बड़े गोलुओं (चूतड़ों) की तस्वीर क्यों ली? वे तो बहुत बड़े दिख रहे हैं!"
उसकी इस बेहद मासूम और बेबाक बात पर कबीर का चेहरा लाल हो गया। वह समझ गया कि सिमी के भीतर वासना या अश्लीलता का कोई नामोनिशान नहीं है। वह अपनी शारीरिक बनावट को भी एक बच्चे की तरह ही देखती है।
कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा:
"क्योंकि सिमी, तुम्हारी यह बनावट, यह रूप प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है। इसमें कोई बुराई नहीं है। तुम जैसी हो, वैसी ही बेहद खूबसूरत हो।"
सिमी ने कबीर की आँखों में देखा। उसे कबीर की आँखों में गाँव के बाकी मर्दों जैसी हवस या अजीब सी भूख नजर नहीं आई, बल्कि एक सम्मान और कलात्मक प्रशंसा दिखी। उसने कबीर का हाथ पकड़ा और बोली:
"कबीर बाबू! तुम अच्छे इंसान हो। चलो, मैं तुम्हें अपनी गुप्त जगह दिखाती हूँ, जहाँ सबसे मीठे पहाड़ी सेब उगते हैं!"
वह आगे बढ़ गई, और कबीर उसके पीछे-पीछे चलने लगा। आगे चलती सिमी के वे भारी, गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के भीतर मटक रहे थे, और पीछे चलता कबीर अपने नए उपन्यास के पन्नों में इस पहाड़ी तितली की कहानी को शब्दों में पिरोने की रूपरेखा तैयार कर रहा था।
## अध्याय: सूनी पगडंडियाँ और कबीर की विदाई
शैलकुंज की वादियों में उस सुबह अजीब सी खामोशी थी। देवदार के पत्तों से छनकर आती धूप हमेशा की तरह सुनहरी तो थी, पर उसमें वह पहले जैसी गर्माहट महसूस नहीं हो रही था। कबीर का जाने का वक्त हो चुका था। उसकी डायरी अब सिमी के अल्हड़पन, उसकी मासूमियत और इन हसीन वादियों के किस्सों से पूरी तरह भर चुकी थी, और उसके कैमरे के मैमोरी कार्ड में कैद हो चुका था सिमी का वह अद्भुत, प्राकृतिक रूप।
सिमी हमेशा की तरह अपनी मनपसंद काली ब्रा और पैंटी पहने, अपने लंबे बालों को खुला छोड़े नदी किनारे कबीर को अलविदा कहने आई थी। जब वह पहाड़ी रास्तों से उतर रही थी, तो उसके दूध जैसे सफेद, बेदाग बदन पर धूप की किरणें पड़ रही थीं, जिससे उसकी त्वचा मखमली चमक बिखेर रही थी। कबीर ने आखिरी बार मुड़कर उस अनोखी पहाड़ी लड़की को देखा, जिसके सुडौल, गदराए हुए दूध और उन पर सजे काले अंगूर जैसे तीखे निप्पल आज भी उसकी ब्रा के पतले कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।
"सिमी, मैं जा रहा हूँ। तुम्हारी यह बेबाकी और यह मासूमियत मेरे उपन्यास की जान बनेगी," कबीर ने भारी आवाज में कहा।
सिमी ने हमेशा की तरह अपने दोनों हाथ अपनी पतली कमर पर रखे। इस हरकत से उसके भारी, गोल-मटोल चूतड़ पीछे की तरफ और भी सुडौल होकर उभर आए, और आगे से उसके भरे हुए दूध हवा में हल्के से थिरक उठे। उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में एक शरारती चमक लाते हुए कहा, "जाओ कबीर बाबू! पर शहर जाकर अपनी इस पहाड़ी तितली को भूल मत जाना। और हाँ, जब किताब छप जाए, तो मेरे इन गोलुओं (चूतड़ों) और इन काले अंगूरों की कहानी सबको जरूर सुनाना!"
कबीर उसकी इस बेबाक और अबोध बात पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। उसने सिमी को अलविदा कहा और अपनी गाड़ी में बैठकर पहाड़ी रास्तों के घुमावों में ओझल हो गया। कबीर शहर लौट गया था, अपने साथ सिमी के उस अलौकिक जिस्म और निश्छल रूह की यादें लेकर।
## अध्याय: अकेलेपन का अहसास और गाँव की बदलती नजरें
कबीर के जाने के बाद सिमी फिर से अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आई, लेकिन अब गाँव का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा था। सिमी की उम्र जैसे-जैसे दिन बढ़ रहे थे, उसका बदन और भी ज्यादा मुकम्मल, गदराया और कामुक होता जा रहा था। उसका वह दूधिया गोरा रंग और उस पर उभरे वे भारी दूध अब गाँव के नौजवानों के सब्र का इम्तिहान लेने लगे थे।
एक दुपहर, सिमी गाँव के बीचोबीच बने कुएं के पास से गुजर रही थी। हमेशा की तरह बदन पर केवल वही तंग काली ब्रा और पैंटी थी। धूप तेज थी, जिससे उसके दूध जैसे सफेद जिस्म पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। पसीने की एक पतली लकीर उसके दोनों दूध के बीच की गहरी घाटी से होती हुई नीचे पेट की तरफ जा रही थी। ठंड और उत्तेजना के बिना भी, उसके काले निप्पल ब्रा के कपड़े के ऊपर साफ तौर पर कड़क और उभरे हुए नजर आ रहे थे, जो किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए काफी थे।
कुएं पर गाँव के कुछ मनचले लड़के, जिनमें मदन और उसका दोस्त जग्गू शामिल थे, खड़े थे। सिमी को इस रूप में मटकते हुए आते देख उनके भीतर की हवस जाग उठी। जब सिमी झुकी पानी पीने के लिए, तो आगे से उसके भारी दूध नीचे लटक गए और पीछे से उसकी पैंटी में दबे भारी, गोल चूतड़ हवा में ऊपर की ओर तन गए। उनके नितंबों का वह गदराया हुआ उभार देखकर मदन से रहा नहीं गया।
उसने जग्गू के कान में फुसफुसाया, "देख रहा है जग्गू? कबीर के जाने के बाद यह माल और भी ज्यादा निखर गया है। वह शहर का बाबू तो सिर्फ तस्वीरें लेकर चला गया, पर असली मजा तो अब हमें लूटना है। इसके ये दूध और ये गोल चूतड़... उफ्फ, अब बर्दाश्त नहीं होता।"
सिमी पानी पीकर सीधी खड़ी हुई, तो उसके भारी चूतड़ एक खास लय में थिरके। उसने लड़कों की आँखों में छिपी उस भूखी और गंदी नजर को महसूस तो किया, लेकिन अपने बचपने के कारण वह उसका सही मतलब नहीं समझ पाई। उसने अपनी छड़ी हवा में लहराई और वहाँ से दौड़ पड़ी। जब वह दौड़ी, तो पीछे से उसके भारी चूतड़ों का ज़ोर-ज़ोर से उछलना उन लड़कों के दिलों में एक खतरनाक साजिश को जन्म दे गया।
## अध्याय: जंगल की सूनसान पगडंडी और मंडराता खतरा
कुछ दिनों बाद, शाम ढलने वाली थी। आसमान पर सिंदूरी रंग बिखर चुका था। सिमी अपनी धुन में मस्त, घर से कुछ दूर घने देवदार के जंगल की तरफ निकल गई। वह सूखी लकड़ियाँ और कुछ जंगली फूल इकट्ठा कर रही थी। उसने बदन पर कोई अतिरिक्त कपड़ा नहीं डाला था; उसकी वही काली ब्रा और पैंटी उसके गोरे बदन की शोभा बढ़ा रहे थे, जो अब शाम के धुंधलके में और भी ज्यादा सफेद और आकर्षक लग रहे थे।
जंगल में सन्नाटा था, सिर्फ सूखे पत्तों के टूटने की आवाज आ रही थी। अचानक सिमी को लगा कि कोई उसका पीछा कर रहा है। उसने मुड़कर देखा, तो झाड़ियों के पीछे से मदन और जग्गू बाहर निकले। उनकी आँखों में इस बार कोई झिझक नहीं थी, बल्कि एक खूंखार हवस साफ दिखाई दे रही थी।
"अरे सिमी! अकेली जंगल में क्या कर रही हो? तुम्हारे कबीर बाबू तो चले गए, अब हमारे साथ भी थोड़ा खेल खेलो," मदन ने गंदी मुस्कान के साथ आगे बढ़ते हुए कहा।
सिमी थमी, उसकी आँखों में हमेशा रहने वाला बचपना पल भर के लिए सहम गया। उसने अपनी लकड़ी की छड़ी आगे की और कहा, "मदन भैया, पीछे हटो। मुझे घर जाना है, माँ मेरा इंतजार कर रही होगी।"
"माँ को भूल जाओ सिमी," जग्गू ने उसकी पैंटी से झांकते गोल-मटोल चूतड़ों पर अपनी नजरें गड़ाते हुए कहा। "आज हम तुम्हें बताएंगे कि तुम जो यह रूप दिखाकर पूरे गाँव को पागल करती हो, उसका असली इस्तेमाल क्या होता है। तुम्हारे ये सफेद दूध और ये काले निप्पल... आज इन्हें हम चखेंगे।"
मदन ने तेजी से आगे बढ़कर सिमी का हाथ पकड़ लिया। सिमी ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, जिससे उसकी काली ब्रा के भीतर उसके भारी दूध जोर-जोर से हिलने लगे और उन पर सजे काले अंगूर जैसे निप्पल मदन के हाथों को छू गए। मदन का संयम पूरी तरह टूट गया। उसने सिमी को अपनी तरफ खींचा, जिससे सिमी के भारी चूतड़ मदन के शरीर से टकराए।
"छोड़ो मुझे! तुम गंदे हो!" सिमी ज़ोर से चिल्लाई, उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। उसकी यह अर्धनग्नता जो अब तक उसकी आज़ादी का प्रतीक थी, आज इस सूनसान जंगल में उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी थी। मदन ने उसे जमीन पर गिराने की कोशिश की, जहाँ सूखे पत्तों पर गिरते ही उसके भारी चूतड़ पूरी तरह फैल गए।
तभी, जंगल के सन्नाटे को चीरती हुई एक ज़ोरदार भौंकने की आवाज आई। सिमी का वफादार कुत्ता 'शेरू' झाड़ियों को चीरता हुआ बाहर निकला और उसने सीधे मदन के पैर पर अपने नुकीले दांत गड़ा दिए।
"आह! साले कुत्ते ने काट लिया!" मदन दर्द से चिल्लाया और उसने सिमी का हाथ छोड़ दिया। जग्गू ने शेरू को मारने के लिए पत्थर उठाना चाहा, पर शेरू की आक्रामकता और सिमी की चीखें सुनकर गाँव के कुछ अन्य चरवाहे, जो पास से गुजर रहे थे, मशालें लेकर उस तरफ दौड़ पड़े।
पकड़े जाने के डर से मदन और जग्गू लंगड़ाते हुए घने जंगल के अंधेरे में भाग गए।
## अध्याय: नया सवेरा और रूह का संभलना
चरवाहों ने सिमी को संभाला और उसे सुरक्षित उसके घर पहुँचाया। पार्वती अपनी बेटी को रोता हुआ देखकर तड़प उठी। उसने सिमी को गले से लगा लिया। सिमी जो अब तक हर बात को खेल समझती थी, उस रात वह पहली बार समझी कि इस दुनिया में उसके इस खूबसूरत, बेबाक बदन को देखने वाली हर नजर कबीर जैसी कलात्मक नहीं होती, कुछ नजरें भेड़िये जैसी भी होती हैं।
अगली सुबह, जब सूरज निकला, तो सिमी अपने कमरे की खिड़की पर बैठी थी। आज उसने अपने बदन पर काली ब्रा और पैंटी के ऊपर माँ का दिया हुआ एक हल्का गुलाबी रंग का पहाड़ी कुर्ता भी डाल रखा था। उसने अपने दूध जैसे सफेद बदन को ढक लिया था, लेकिन उसकी काया का उभार उस कपड़े के भीतर से भी अपनी सुंदरता बयां कर रहा था। उसके भारी चूतड़ और उसके गदराए दूध अब उस सूती कपड़े के नीचे सुरक्षित थे।
उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ पहाड़ वैसे ही ऊंचे और देवदार वैसे ही घने थे। कबीर शहर जा चुका था, लेकिन वह सिमी को एक सबक दे गया था—अपनी आज़ादी को बनाए रखते हुए दुनिया के भेड़ियों से खुद को बचाना। सिमी मुस्कुराई, उसकी आँखों का बचपना अब थोड़ा परिपक्व हो चुका था, लेकिन उसकी रूह आज भी उतनी ही पवित्र और आजाद थी, जितनी इन पहाड़ों की बहती नदियाँ।
## अध्याय: पुरानी रंगत और आम के बाग की मस्ती
पहाड़ों की सुबह की एक बड़ी खासियत होती है—यह अपने साथ बीती रात के सारे अंधेरे और डर को बहा ले जाती है। कल शाम जो कुछ भी हुआ, सिमी के अल्हड़ और बच्चे जैसे मन ने उसे एक बुरे सपने की तरह भुला दिया था। उसके भीतर की चुलबुली और शरारती लड़की को ज्यादा देर तक बांधकर रखना नामुमकिन था।
सुबह जब धूप खिड़की से छनकर उसके चेहरे पर पड़ी, तो वह अपनी उसी पुरानी बेफिक्री के साथ बिस्तर से उठी।
माँ का दिया गुलाबी कुर्ता आज फिर अलमारी के एक कोने में रख दिया गया। सिमी ने मुस्कुराते हुए अपनी वही पसंदीदा काली ब्रा और मैचिंग पैंटी पहनी। जब उसने आईने में देखा, तो उसका दूध जैसा सफेद बदन धूप की रोशनी में और भी ज्यादा निखरा हुआ लगा। रात के डर को पीछे छोड़, उसके सुडौल और भरे हुए दूध एक बार फिर आज़ाद हो चुके थे।
ठंडी हवा के छूते ही ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर से उसके काले अंगूर जैसे कड़क निप्पल साफ नजर आने लगे, जो उसकी काया को और भी खूबसूरत बना रहे थे।
बाहर आंगन में गाँव के छोटे-छोटे बच्चों का हुजूम इकट्ठा था। चीकू, गोलू और पिंकी हाथ में छोटी-छोटी टोकरियाँ लिए सिमी को आवाज दे रहे थे:
"सिमी दीदी! ओ सिमी दीदी! जल्दी आओ, आज नीचे वाले बाग में बड़े-बड़े आम पक गए हैं!"
बच्चों की आवाज सुनते ही सिमी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई। वह अपनी पतली कमर को मटकाती हुई, सीढ़ियों से नीचे उतरी। जब वह उतरी, तो पीछे से उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के भीतर हर कदम के साथ थिरक रहे थे। बच्चों के लिए सिमी कोई 'जवान लड़की' नहीं थी, वह तो उनकी सबसे बड़ी और सबसे प्यारी सहेली थी, जो बिल्कुल उनकी तरह ही सोचती और खेलती थी।
## आम का बाग और चुलबुली शरारतें
सिमी बच्चों की टोली के साथ गाँव के निचले हिस्से में स्थित आम के पुराने बाग की तरफ दौड़ पड़ी। जब वह दौड़ रही थी, तो उसके दूध जैसे सफेद दूध हवा में ऊपर-नीचे उछल रहे थे, और उनके ऊपर सजे वे काले निप्पल ब्रा के भीतर साफ तौर पर हिलते हुए दिखाई दे रहे थे। पीछे से, उसके गदराए और भारी चूतड़ों का वह उतार-चढ़ाव बच्चों के पीछे भागते हुए बेहद आकर्षक लग रहा था। लेकिन वहाँ कोई बड़ा नहीं था, सिर्फ मासूम बच्चे और उनकी अलमस्त दीदी।
बाग में पहुँचते ही चारों तरफ पके हुए आमों की मीठी महक फैली हुई थी। ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर पीले-हरे आम लटक रहे थे।
* **गोलू का रोना:** "दीदी! वह देखो, सबसे ऊपर वाली डाल पर कितना बड़ा और पीला आम है, लेकिन मेरा हाथ वहाँ नहीं पहुँच रहा!"
* **सिमी का अंदाज:** सिमी ने हंसते हुए कहा, "रुक गोलू, तेरी सिमी दीदी अभी उसे तोड़ती है!"
सिमी ने बिना किसी झिझक के आम के पेड़ के तने को पकड़ा और ऊपर चढ़ने लगी। पेड़ पर चढ़ने के इस प्रयास में उसका बदन पूरी तरह से तन गया। जब वह डाल पर चढ़ी और ऊपर की तरफ झुकी, तो आगे से उसके भारी दूध पेड़ की टहनी के पास लटक गए, जिससे काली ब्रा के कप से उनकी दूधिया सफेदी और साफ दिखने लगी। वहीं पीछे से, उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ हवा में पूरी तरह से फैल गए, जिससे पैंटी का कपड़ा उनके उभारों के बीच और तंग हो गया।
> "देखो! सिमी दीदी तो बंदर की तरह पेड़ पर चढ़ गई!" — चीकू ने ताली बजाते हुए कहा।
>
सिमी ने ऊपर से हंसते हुए एक-एक करके कई पके हुए आम नीचे फेंके, जिन्हें बच्चे अपनी टोकरियों में भरने लगे।
## मीठा रस और खिलखिलाती वादियों का शोर
पेड़ से उतरने के बाद, सब के सब एक बड़े पत्थर की छांव में बैठ गए। सिमी ने अपने हाथों से आम को दबाकर उसे ढीला किया और फिर उसका रस चूसने लगी। आम का मीठा और गाढ़ा रस जब उसकी उंगलियों से बहता हुआ उसकी कलाई और उसके दूध जैसे सफेद बदन पर गिरा, तो वह और भी कामुक दिखने लगी। रस की कुछ बूंदें फिसलकर उसके दोनों दूध के बीच की गहरी घाटी में जा गिरीं, लेकिन सिमी को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वह तो बस आम के स्वाद और बच्चों के साथ का पूरा लुत्फ उठा रही थी।
आम खाते-खाते सिमी ने अचानक एक आधा खाया हुआ आम चीकू के गाल पर लगा दिया। फिर क्या था, पूरे बाग में बच्चों की चीख-पुकार और हंसी का दौर शुरू हो गया। सिमी बच्चों के साथ घास पर लेट गई, जहाँ लोट-पोट होने के कारण उसके गोल चूतड़ों पर सूखी घास और पत्तियाँ चिपक गईं।
जब वह पीठ के बल लेटी, तो आसमान की तरफ उठे उसके वे सुडौल दूध और उन पर कड़क हो चुके काले अंगूर जैसे निप्पल उसकी बेदाग और निश्छल खुशी की गवाही दे रहे थे। कबीर शहर जा चुका था, मदन जैसे भेड़िए पीछे छूट चुके थे, लेकिन सिमी आज भी अपनी उसी काली ब्रा और पैंटी में पहाड़ों की सबसे हसीन, आजाद और चुलबुली तितली बनी हुई थी, जिसे अपनी मस्ती में जीने से कोई ताकत नहीं रोक सकती थी।
आम खाने की उस मीठी और चिपचिपी मस्ती के बाद, बच्चों के हाथ और चेहरे आम के रस से पूरी तरह सने हुए थे। दोपहर की धूप अब अपने चरम पर थी, जिससे बाग के भीतर उमस बढ़ने लगी थी।
सिमी ने अपनी कलाई पर लगे आम के रस को देखा और फिर तालाब की तरफ इशारा करते हुए चहकी, "अरे बाबा, सब के सब कितने गंदे हो गए हो! चलो, आज तालाब में छपाका मारते हैं!"
बच्चों की टोली खुशी से चिल्ला उठी, "हाँ दीदी! चलो, पानी में तैरेंगे!"
## तालाब का ठंडा पानी और छपाक की गूंज
बाग के ठीक पीछे, घने पेड़ों के झुरमुट के बीच पहाड़ों से आने वाले साफ पानी का एक छोटा सा प्राकृतिक तालाब था। तालाब का पानी एकदम शांत और ठंडा था, जिसके किनारे हरी-हरी घास उगी हुई थी।
सिमी दौड़ते हुए सबसे पहले तालाब के किनारे पहुँची। बच्चों के सामने उसे किसी भी तरह की हिचक नहीं थी, क्योंकि वे सब उसे अपनी सहेली ही मानते थे। वह बिना रुके अपनी उसी काली ब्रा और पैंटी में सीधे तालाब के ठंडे पानी में कूद गई।
* **छपाक की आवाज:** सिमी के पानी में कूदते ही एक ज़ोरदार छपाक की आवाज हुई और पानी की ठंडी बौछारें हवा में उड़ गईं।
* **बच्चों की मस्ती:** दीदी को पानी में कूदता देख चीकू, गोलू और पिंकी भी अपने कपड़े किनारे रखकर पानी में उतर गए और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।
## पानी की लहरें और थिरकती काया
ठंडे पानी के संपर्क में आते ही सिमी के दूध जैसे सफेद बदन पर एक सिहरन दौड़ गई। तालाब का पानी पारदर्शी था, जिसमें सिमी का तैरता हुआ बदन साफ नजर आ रहा था। जब वह पानी में हाथ-पैर मार रही थी, तो पानी की लहरों के साथ उसकी सुडौल छाती और ब्रा के भीतर थिरकते उसके भरे हुए अंग साफ दिखाई दे रहे थे। ठंडे पानी के अहसास से उसके काले अंगूर जैसे निप्पल और भी ज्यादा कड़क हो गए थे, जो ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर से साफ उभर कर आ रहे थे।
पानी में तैरते समय जब वह पलटती, तो पानी की सतह पर उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ तैरते हुए दिखाई देते। पैंटी का गीला कपड़ा उसके नितंबों से पूरी तरह चिपक गया था, जिससे उसकी काया की गोलाई और भी ज्यादा साफ और मुकम्मल लग रही थी।
सिमी ने पानी हाथ में लेकर बच्चों पर फेंकना शुरू कर दिया:
"यह लो चीकू! यह लो पिंकी! जो हारेगा, उसे कल ज्यादा आम तोड़ने पड़ेंगे!"
बच्चों ने भी मिलकर सिमी पर पानी की बौछारें कीं। पूरा तालाब बच्चों की खिलखिलाहट और सिमी की सुरीली हंसी से गूंज उठा। दोपहर की धूप जब पानी की बूंदों पर पड़ती, तो सिमी का गोरा बदन और पानी के छींटे मोतियों की तरह चमक उठते थे।
## किनारे पर सुकून
काफी देर तक पानी में मस्ती करने और तैरने के बाद, सब के सब थककर तालाब के किनारे हरी घास पर आ बैठे। धूप की गर्माहट से उनके बदन का पानी धीरे-धीरे सूख रहा था। सिमी घास पर पीठ के बल लेट गई, उसके लंबे काले बाल घास पर फैल गए थे।
गीली काली ब्रा में लिपटे उसके सुडौल और उभरे हुए अंग धूप में चमक रहे थे, और उन पर सजे काले निप्पलों का तीखा उभार उसकी बेफिक्र जिंदगी का गवाह था। कल की घटना का कोई भी साया आज उसके चेहरे पर नहीं था। वह पहाड़ों की वही आजाद तितली थी, जो प्रकृति की इस सुंदर गोद में, बच्चों की मासूमियत के बीच, अपनी ही धुन में पूरी तरह सुरक्षित और खुश थी।
आम खाने की उस मीठी और चिपचिपी मस्ती के बाद, बच्चों के हाथ और चेहरे आम के रस से पूरी तरह सने हुए थे। दोपहर की धूप अब अपने चरम पर थी, जिससे बाग के भीतर उमस बढ़ने लगी थी।
सिमी ने अपनी कलाई पर लगे आम के रस को देखा और फिर तालाब की तरफ इशारा करते हुए चहकी, "अरे बाबा, सब के सब कितने गंदे हो गए हो! चलो, आज तालाब में छपाका मारते हैं!"
बच्चों की टोली खुशी से चिल्ला उठी, "हाँ दीदी! चलो, पानी में तैरेंगे!"
## तालाब का ठंडा पानी और छपाक की गूंज
बाग के ठीक पीछे, घने पेड़ों के झुरमुट के बीच पहाड़ों से आने वाले साफ पानी का एक छोटा सा प्राकृतिक तालाब था। तालाब का पानी एकदम शांत और ठंडा था, जिसके किनारे हरी-हरी घास उगी हुई थी।
सिमी दौड़ते हुए सबसे पहले तालाब के किनारे पहुँची। बच्चों के सामने उसे किसी भी तरह की हिचक नहीं थी, क्योंकि वे सब उसे अपनी सहेली ही मानते थे। वह बिना रुके अपनी उसी काली ब्रा और पैंटी में सीधे तालाब के ठंडे पानी में कूद गई।
* **छपाक की आवाज:** सिमी के पानी में कूदते ही एक ज़ोरदार छपाक की आवाज हुई और पानी की ठंडी बौछारें हवा में उड़ गईं।
* **बच्चों की मस्ती:** दीदी को पानी में कूदता देख चीकू, गोलू और पिंकी भी अपने कपड़े किनारे रखकर पानी में उतर गए और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।
## पानी की लहरें और थिरकती काया
ठंडे पानी के संपर्क में आते ही सिमी के दूध जैसे सफेद बदन पर एक सिहरन दौड़ गई। तालाब का पानी पारदर्शी था, जिसमें सिमी का तैरता हुआ बदन साफ नजर आ रहा था। जब वह पानी में हाथ-पैर मार रही थी, तो पानी की लहरों के साथ उसकी सुडौल छाती और ब्रा के भीतर थिरकते उसके भरे हुए अंग साफ दिखाई दे रहे थे। ठंडे पानी के अहसास से उसके काले अंगूर जैसे निप्पल और भी ज्यादा कड़क हो गए थे, जो ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर से साफ उभर कर आ रहे थे।
पानी में तैरते समय जब वह पलटती, तो पानी की सतह पर उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ तैरते हुए दिखाई देते। पैंटी का गीला कपड़ा उसके नितंबों से पूरी तरह चिपक गया था, जिससे उसकी काया की गोलाई और भी ज्यादा साफ और मुकम्मल लग रही थी।
सिमी ने पानी हाथ में लेकर बच्चों पर फेंकना शुरू कर दिया:
"यह लो चीकू! यह लो पिंकी! जो हारेगा, उसे कल ज्यादा आम तोड़ने पड़ेंगे!"
बच्चों ने भी मिलकर सिमी पर पानी की बौछारें कीं। पूरा तालाब बच्चों की खिलखिलाहट और सिमी की सुरीली हंसी से गूंज उठा। दोपहर की धूप जब पानी की बूंदों पर पड़ती, तो सिमी का गोरा बदन और पानी के छींटे मोतियों की तरह चमक उठते थे।
## किनारे पर सुकून
काफी देर तक पानी में मस्ती करने और तैरने के बाद, सब के सब थककर तालाब के किनारे हरी घास पर आ बैठे। धूप की गर्माहट से उनके बदन का पानी धीरे-धीरे सूख रहा था। सिमी घास पर पीठ के बल लेट गई, उसके लंबे काले बाल घास पर फैल गए थे।
गीली काली ब्रा में लिपटे उसके सुडौल और उभरे हुए अंग धूप में चमक रहे थे, और उन पर सजे काले निप्पलों का तीखा उभार उसकी बेफिक्र जिंदगी का गवाह था। कल की घटना का कोई भी साया आज उसके चेहरे पर नहीं था। वह पहाड़ों की वही आजाद तितली थी, जो प्रकृति की इस सुंदर गोद में, बच्चों की मासूमियत के बीच, अपनी ही धुन में पूरी तरह सुरक्षित और खुश थी।
## अध्याय: शाम का धुंधलका और घर की ओर कदम
सूरज अब धीरे-धीरे पश्चिमी पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा था, और आसमान का रंग सुनहरी से बदलकर गहरा सिंदूरी और नारंगी होने लगा था। देवदार के ऊंचे पेड़ों की लंबी परछाइयाँ पगडंडियों पर पसरने लगी थीं। ठंडी पहाड़ी हवा ने एक बार फिर अपनी रफ्तार पकड़ ली थी, जो इस बात का संकेत थी कि अब पहाड़ों पर शाम घिरने वाली है।
सिमी ने आसमान की तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए बच्चों से कहा, "चलो बच्चों! अब बहुत देर हो गई है। माँ रास्ता देख रही होगी। सब अपनी-अपनी टोकरियाँ उठाओ और घर की तरफ चलो।"
बच्चों ने अपनी आमों से भरी टोकरियाँ संभालीं और सिमी के आगे-आगे चहकते हुए चल दिए। सिमी अपनी उसी पुरानी, अलमस्त धुन में उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।
## पगडंडियों पर मटकती काया
तालाब के पानी से नहाने के बाद सिमी का बदन पूरी तरह सूख चुका था, लेकिन उसकी त्वचा पर एक अजीब सी मखमली चमक बाकी थी। उसने हमेशा की तरह अपनी वही काली ब्रा और पैंटी पहन रखी थी, जो उसके दूध जैसे सफेद बदन पर किसी गहरे साए जैसी दिख रही थी।
पहाड़ी रास्तों की चढ़ाई चढ़ते समय जब सिमी छोटे-छोटे कदम आगे बढ़ाती, तो उसकी पतली कमर के नीचे उसके भारी, गोल-मटोल चूतड़ एक खास लय में मटकते थे। पैंटी की तंग पट्टी के बीच से उभरते उसके गदराए नितंबों का उतार-चढ़ाव शाम के इस धीमे उजाले में भी बेहद आकर्षक लग रहा था। आगे से, चढ़ाई के कारण जब वह थोड़ा आगे की ओर झुकती, तो उसके सुडौल, भरे हुए दोनों दूध नीचे की तरफ लटक जाते थे, जिससे काली ब्रा के कप्स से झांकती उनकी दूधिया गोलाई और साफ नजर आती थी। हवा की ठंडक से उसके काले अंगूर जैसे तीखे निप्पल ब्रा के कपड़े के ऊपर पूरी तरह कड़क और उभरे हुए थे।
## गाँव की सीमा और सुकून की छांव
जैसे ही बच्चों की यह छोटी सी टोली गाँव की सीमा में दाखिल हुई, रास्ते में मिलने वाले गाँव के बुजुर्गों और महिलाओं ने सिमी को देखा। अब गाँव वाले भी सिमी के इस रूप के आदी हो चुके थे। वे जानते थे कि इस अठारह साल की जवान काया के भीतर एक निष्पाप, अबोध बच्चे का दिल धड़कता है, जो हर तरह के सामाजिक छलावे से दूर है।
सिमी ने मुस्कुराते हुए सबको हाथ हिलाया:
* **रामू काका को:** "काका, आज बाग के आम बहुत मीठे थे!"
* **पिंकी की माँ को:** "काकी, पिंकी ने आज बहुत सारे आम तोड़े हैं, इसे डांटना मत!"
सब लोग सिमी की इस मासूमियत को देखकर अपनी बड़बड़ाहट भूल जाते और उनके चेहरों पर एक अनचाही मुस्कान आ जाती।
## आंगन में माँ का आंचल
दौड़ते-भागते आखिरकार सिमी अपने लकड़ी और पत्थरों से बने दो मंजिला घर के आंगन में पहुँच गई। आंगन में तुलसी के पौधे के पास उसकी माँ, पार्वती, मिट्टी का दीया जला रही थी। जैसे ही दीये की पीली रोशनी सिमी के दूध जैसे सफेद बदन और उसकी काली ब्रा-पैंटी पर पड़ी, पार्वती ने एक गहरी सांस ली।
"आ गई तू? पूरे दिन बंदरों की तरह पेड़ों पर घूमी है और तालाब में नहाकर आई है। देख, बाल अब भी गीले हैं तेरे," पार्वती ने नकली गुस्से के साथ कहा, लेकिन उसकी आँखों में अपनी बेटी के लिए अगाध प्रेम था।
सिमी ने अपनी टोकरी आंगन के चबूतरे पर रखी, दौड़कर अपनी माँ के गले लग गई और चुलबुले अंदाज में बोली, "ओहो माँ! देखो मैं तुम्हारे लिए कितने बड़े-बड़े और मीठे आम लाई हूँ। अब जल्दी से गुस्सा थूको और मुझे कुछ अच्छा सा खाने को दो, मुझे बहुत भूख लगी है!"
पार्वती ने सिमी के सिर पर हाथ फेरा। सिमी के इस भरे-पूरे बदन और उसकी इस निश्छल रूह को देखकर पार्वती को तसल्ली हुई कि दुनिया चाहे कितनी भी बदले, उसकी सिमी हमेशा इन पहाड़ों की सबसे हसीन और बेफिक्र बेटी ही रहेगी। सिमी मुस्कुराती हुई घर के भीतर चली गई, और उसके पीछे पहाड़ों की शांत रात ने अपनी मखमली चादर फैला दी।
## अध्याय: नींद की आगोश और वादियों का सन्नाटा
रात गहराने के साथ ही शैलकुंज गाँव पूरी तरह से खामोशी की चादर में लिपट गया। पहाड़ों पर रातें हमेशा जल्दी और ठंडी होती हैं। खिड़की के बाहर देवदार के पत्तों से टकराती हवा की सरसराहट एक लोरी जैसी लग रही थी। सिमी ने माँ के हाथ का बना गरमा-गरम पहाड़ी खाना खाया और अपनी पसंदीदा ताजे आमों का स्वाद चखने के बाद वह सीधे अपने कमरे की ओर चली गई।
दिनभर की दौड़-भाग, पेड़ों पर चढ़ना, तालाब में तैरना और बच्चों के साथ की गई शरारतों ने उसके जिस्म को बुरी तरह थका दिया था। कमरे में जल रहे छोटे से दीये की मद्धम पीली रोशनी उसकी मखमली त्वचा पर पड़ रही थी। बिस्तर पर लेटते ही सिमी ने किसी कड़े कपड़े की बंदिश को अपने बदन पर बर्दाश्त नहीं किया; वह अपनी उसी प्रिय काली ब्रा और पैंटी में मखमली गद्दे पर ढह गई।
## निश्छल रूप और नींद का सम्मोहन
नींद की आगोश में जाते ही सिमी का वह चुलबुला और शरारती चेहरा बेहद शांत और मासूम दिखने लगा। जब वह करवट लेकर सोई, तो उसका दूध जैसा सफेद बदन दीये के धीमे उजाले में किसी संगमरमर की मूरत की तरह चमक रहा था।
गहरी और बेफिक्र सांसों के साथ उसकी सुडौल छाती और ब्रा के कप्स में कैद उसके दोनों भरे हुए दूध एक सुंदर लय में ऊपर-नीचे हो रहे थे। रात की बढ़ती ठंडक की वजह से, ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर उभरे उसके काले अंगूर जैसे कड़क निप्पल और भी तीखे लग रहे थे, मानो वे नींद में भी अपनी प्राकृतिक सुंदरता बयां कर रहे हों।
उसकी सुडौल टांगें थोड़ी मुड़ी हुई थीं, जिससे उसकी पतली कमर के नीचे उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ों का गदराया हुआ उभार बिस्तर पर पूरी तरह फैल गया था। पैंटी की तंग पट्टी के बीच से उसकी काया का वह मुकम्मल हिस्सा इस शांत माहौल में किसी जादुई पेंटिंग जैसा प्रतीत हो रहा था।
## सपनों की दुनिया में आज़ाद तितली
सिमी के चेहरे पर एक हल्की और प्यारी सी मुस्कान तैर रही थी। वह सपनों की दुनिया में खो चुकी थी—एक ऐसी दुनिया जहाँ न तो मदन जैसे भेड़ियों का डर था, न समाज की कड़क बंदिशें, और न ही कपड़ों की कैद। वह अपने सपनों में भी शायद उन्हीं ऊंचे पहाड़ों पर तितलियों के पीछे दौड़ रही थी, जहाँ की नदियाँ उसी की तरह आज़ाद और साफ थीं।
> "इस दुनिया की सबसे सुरक्षित और पवित्र जगह एक मासूम दिल की गहरी नींद होती है।"
>
दीये की लौ धीरे-धीरे कम होने लगी और कमरा पूरी तरह से अंधेरे और सुकून के आगोश में समा गया। सिमी गहरी नींद में सो चुकी थी, और बाहर पूरी वादी उसकी इस निश्छल और खूबसूरत रूह की पहरेदारी कर रही थी।
## अध्याय: सुबह की नई चुनौती और क्रिकेट का मैदान
अगले दिन जब सूरज की सुनहरी किरणें पहाड़ों की चोटियों को चीरती हुई शैलकुंज गाँव में उतरीं, तो सिमी की आँखें हमेशा की तरह पूरी ताजगी के साथ खुलीं। रात की गहरी नींद ने उसकी सारी थकान मिटा दी थी। बिस्तर से उठते ही उसने खिड़की से बाहर झांका, जहाँ गाँव के मैदान में बच्चों का शोर सुनाई दे रहा था। आज गाँव के बच्चों और पड़ोसी गाँव के लड़कों के बीच एक दोस्ताना क्रिकेट मैच होने वाला था।
सिमी का चुलबुला मन यह सुनते ही मचल उठा। उसने कपड़ों की अलमारी को हाथ भी नहीं लगाया। अपनी उसी सदाबहार और आरामदायक काली ब्रा और मैचिंग पैंटी में वह कमरे से बाहर निकल आई। जब वह धूप में आई, तो उसका दूध जैसा सफेद बदन कुंदन की तरह चमक रहा था। ठंडी पहाड़ी हवा के लगते ही उसके दोनों गदराए दूध पर सजे काले अंगूर जैसे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर और तीखे होकर उभर आए। अपनी पतली कमर को मटकाती हुई, वह सीधे मैदान की तरफ दौड़ पड़ी, जहाँ उसके भारी और गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के भीतर हर कदम के साथ ज़ोर-ज़ोर से थिरक रहे थे।
## मैदान में एंट्री और मैच का रोमांच
मैदान पर चीकू, गोलू और पिंकी अपनी टीम के साथ परेशान खड़े थे। विरोधी टीम के लड़कों ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 10 ओवरों में 65 रनों का एक मजबूत लक्ष्य रखा था, जो पहाड़ी उबड़-खाबड़ मैदान के हिसाब से काफी बड़ा था।
सिमी को इस रूप में मैदान पर आते देख बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठे।
"सिमी दीदी आ गई! अब हम पक्का जीतेंगे!" चीकू ने बल्ला हवा में लहराते हुए कहा।
विरोधी टीम के लड़के सिमी के इस बेबाक रूप को देखकर हैरान थे। खेल के मैदान में भी अपनी काली ब्रा और पैंटी में उतरी इस दूधिया सुंदरी को देखकर फील्डिंग कर रहे लड़कों का ध्यान गेंद से ज्यादा सिमी के गदराए बदन पर टिक गया था। उनके सुडौल दूध का हवा में हिलना और दौड़ते समय उनके भारी चूतड़ों की थिरकन ने विरोधियों के होश उड़ा दिए थे।
## सिमी की बल्लेबाजी और भारी मशक्कत
चीकू के आउट होने के बाद सिमी खुद बल्लेबाजी करने मैदान पर उतरी। उसने लकड़ी का पुराना बल्ला अपने हाथों में थामा और क्रीज पर पोजीशन ली।
* **बदन का तनाव:** जब सिमी ने शॉट मारने के लिए बल्ला पीछे की ओर खींचा, तो उसका पूरा बदन तन गया। आगे से उसके भारी दूध ब्रा की बंदिशों को चुनौती देते हुए आगे की ओर उभरे, और पीछे से उसकी पैंटी में कैद गदराए चूतड़ हवा में और ज्यादा गोल और सुडौल नजर आने लगे।
* **मशक्कत की शुरुआत:** विरोधी गेंदबाज ने तेज गेंद फेंकी। सिमी ने बल्ला घुमाया, लेकिन गेंद चूक गई। मैच फंस चुका था। आखिरी 2 ओवरों में अभी भी 18 रनों की दरकार थी और बच्चों की टीम के विकेट लगातार गिर रहे थे।
सिमी ने हार नहीं मानी। उसने अपने माथे से पसीना पोंछा। पसीने की बूंदें उसके दूध जैसे सफेद सीने से फिसलती हुई उसकी ब्रा के भीतर समा रही थीं, जिससे उसका बदन और भी चमकदार दिख रहा था। उसने बल्ले को कसकर पकड़ा। अगली गेंद फुलटॉस थी, सिमी ने पूरी ताकत से बल्ला घुमाया।
*छपाक!* गेंद सीधे बाउंड्री पार जा गिरी। शानदार चौका! पूरा मैदान बच्चों की चीख-पुकार से गूंज उठा। इस जोरदार शॉट को मारते समय सिमी के भरे हुए दूध हवा में तेजी से उछले और उनके ऊपर मौजूद काले निप्पल ब्रा के ऊपर से साफ तौर पर हिलते हुए दिखे।
## आखिरी गेंद और ऐतिहासिक जीत
अब आखिरी ओवर का रोमांच शुरू हो चुका था। जीत के लिए 6 गेंदों पर 8 रन चाहिए थे। विरोधी टीम के चालाक गेंदबाज ने कसी हुई गेंदबाजी की। पहली चार गेंदों पर सिर्फ 3 रन आए। अब आखिरी दो गेंदों पर 5 रनों की जरूरत थी। मैदान पर तनाव चरम पर था।
पाँचवीं गेंद पर सिमी ने सूझबूझ दिखाई और लेग साइड में खेलकर तेजी से दौड़ पड़ी। जब वह रन लेने के लिए दौड़ी, तो पीछे से उसके भारी, गोल-मटोल चूतड़ पैंटी के भीतर हर कदम के साथ जोर-जोर से ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जिसे देखकर फील्डर पल भर के लिए गेंद उठाना ही भूल गया। सिमी ने तेजी से दो रन पूरे कर लिए।
अब अंतिम गेंद और जीत के लिए 3 रन! गेंदबाज ने सिमी के पैरों की तरफ यॉर्कर फेंकने की कोशिश की। लेकिन सिमी ने अपने चुलबुले और फुर्तीले अंदाज में दो कदम आगे बढ़ाए और गेंद को सीधे लॉन्ग-ऑन की तरफ हवा में उछाल दिया।
गेंद हवा में तैरती हुई बाउंड्री लाइन के पार जा गिरी—एक गगनचुंबी छक्का!
## जीत का जश्न और अलमस्त खुशी
"जीत गए! सिमी दीदी ने मैच जिता दिया!" बच्चे चिल्लाते हुए मैदान की तरफ दौड़ पड़े और सिमी को चारों तरफ से घेर लिया।
काफी मशक्कत और कड़ी मेहनत के बाद मिली इस जीत से सिमी का चेहरा लाल हो चुका था और उसकी सांसें तेज चल रही थीं। तेज सांसों के कारण उसकी सुडौल छाती और काली ब्रा में कैद उसके दूध तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसके दूध पर उभरे वे काले अंगूर जैसे निप्पल उसकी मेहनत और जीत के उत्साह में और भी कड़क हो गए थे।
सिमी ने बल्ले को हवा में लहराया और खुशी से उछलने लगी। जब वह उछल रही थी, तो उसके भारी चूतड़ और गदराए अंग उसकी इस बेबाक खुशी के साथ थिरक रहे थे। वह बच्चों को अपनी बाहों में भरकर गोल-गोल घूमने लगी। पहाड़ों की यह चुलबुली, शरारती लड़की आज खेल के मैदान की भी मलिका बन चुकी थी, जो अपनी उसी काली ब्रा और पैंटी में पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने का दम रखती थी।
## अध्याय: शैलकुंज का मेला और अलमस्त सिमी
शैलकुंज गाँव के बड़े मैदान में आज सुबह से ही एक अलग ही हलचल थी। साल में एक बार लगने वाले पारंपरिक 'शैल उत्सव' यानी गाँव के मेले का दिन आ चुका था। चारों तरफ रंग-बिरंगे टेंट लग चुके थे, कहीं लकड़ी के बड़े-बड़े झूले हवा में चक्कर काट रहे थे, तो कहीं गरम-गरम जलेबियों और समोसों की महक पूरी वादी में तैर रही थी। आस-पास के कई गाँवों के लोग नए-नए कपड़े पहनकर इस मेले की रौनक देखने उमड़ पड़े थे।
इस भारी भीड़भाड़ और उत्सव के माहौल के बीच, हमारी चुलबुली और शरारती सिमी की दुनिया बिल्कुल जुदा थी। जब सहेलियाँ भारी घाघरा-चोली और नए सूट पहनकर सज-धज रही थीं, सिमी के अल्हड़ मन को भला इन भारी कपड़ों की बंदिश कहाँ मंजूर होने वाली थी। वह अपनी उसी सदाबहार आज़ादी—अपनी पसंदीदा काली ब्रा और मैचिंग पैंटी में ही मेले का लुत्फ उठाने घर से निकल पड़ी।
जब वह मेले के मुख्य द्वार से भीतर दाखिल हुई, तो दोपहर की गुनगुनी धूप उसके दूध जैसे सफेद, बेदाग बदन पर पड़कर एक मखमली चमक बिखेर रही थी। ठंडी पहाड़ी हवा के हल्के झोंकों के छूते ही उसकी सुडौल छाती पर सजे वे काले अंगूर जैसे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर और भी कड़क और तीखे होकर उभर आए। अपनी पतली कमर को मटकाती हुई जब वह खिलौनों और मिठाइयों की दुकानों की तरफ बढ़ी, तो पीछे से उसकी पैंटी में कैद भारी, गोल-मटोल चूतड़ों की थिरकन ने मेले में आए हर शख्स की निगाहों को अपनी ओर खींच लिया।
## चुलबुली शरारतें और झूले का रोमांच
सिमी को दुनिया की लोक-लाज या लोगों की टकटकी से कोई सरोकार नहीं था। उसके लिए मेला सिर्फ और सिर्फ बच्चों की तरह मौज-मस्ती करने की जगह थी। उसने चीकू, गोलू और पिंकी का हाथ पकड़ा और सीधे बड़े वाले लकड़ी के चंडोल (झूले) की तरफ दौड़ पड़ी।
जब वह झूले की सीट पर बैठी और झूला हवा में ऊंचाइयों को छूने लगा, तो डर और रोमांच के मारे सिमी खिलखिलाकर हंस पड़ी।
* **हवा की बंदिशें:** ऊंचाई पर तेज हवा के थपेड़ों के कारण सिमी के लंबे काले बाल हवा में लहराकर उसके चूतड़ों तक छू रहे थे।
* **बदन का उभार:** झूले की हर ढलान के साथ जब वह अपनी बाहें ऊपर उठाती, तो काली ब्रा में कसे उसके दोनों भरे हुए दूध हवा में हल्के से उछलते, जिससे उनके ऊपर मौजूद काले निप्पलों का तीखा आकार और भी साफ नजर आता था।
नीचे खड़े लोग, जो दूर-दूर के गाँवों से आए थे, वे इस अर्धनग्न पहाड़ी सुंदरी के बेबाक अंदाज और दूधिया बदन को देखकर अपनी सुध-बुध खो रहे थे। लेकिन सिमी इन सब निगाहों से बेखबर, बस हवा में उड़ने का आनंद ले रही थी।
## चाट-पकौड़े की मस्ती और मेले का समापन
झूले से उतरने के बाद सिमी बच्चों की टोली को लेकर चाट और बर्फ के गोले की दुकान पर पहुँची। उसने लाल और हरे रंग का मीठा बर्फ का गोला लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी।
मीठे शरबत की कुछ बूंदें उसकी ठुड्डी से फिसलती हुई उसके दूध जैसे सफेद सीने पर जा गिरीं, जिससे उसकी गोरी त्वचा और भी चमकदार दिखने लगी। जब वह झुककर बच्चों को अपनी थाली से चाट खिला रही थी, तो पीछे से उसके गदराए और भारी चूतड़ हवा में और ज्यादा गोल व सुडौल होकर उभर आए। पैंटी का तंग कपड़ा उसके नितंबों की गोलाई को और ज्यादा मुकम्मल बना रहा था।
* **खिलौनों की खरीदारी:** सिमी ने अपने लिए मिट्टी की एक छोटी सी सीटी खरीदी और उसे ज़ोर-ज़ोर से बजाते हुए पूरे मेले में घूमने लगी।
* **अल्हड़पन का जादू:** उसकी इस अबोध और निश्छल खुशी को देखकर मेले के दुकानदार भी उसे टोकने के बजाय मुस्कुराकर मुफ़्त में खिलौने थमा रहे थे।
शाम ढलने तक सिमी ने मेले का हर एक कोना छान मारा था। वह झूली, नाची, और बच्चों के साथ खूब लोट-पोट हुई। जब सूरज की आखिरी किरणें पहाड़ों के पीछे छिप गईं और मेले की रंग-बिरंगी लाइटें जल उठीं, तब जाकर सिमी हाथ में गुब्बारे थामे वापस अपने घर की ओर मुड़ी। उसकी वही काली ब्रा और पैंटी आज फिर उसकी असीम आज़ादी और निश्छल रूह की गवाह बनी थीं, जिसे दुनिया का कोई भी नियम बांध नहीं सकता था।
## अध्याय: खिलौनों का संसार और घर की ओर वापसी
मेले की रंग-बिरंगी रोशनियों के बीच सिमी की टोकरी अब पूरी तरह से भर चुकी थी। उसने अपनी पसंद के ढेर सारे मिट्टी के बर्तन, लकड़ी की रंगीन गाड़ियाँ, प्लास्टिक की सीटी और हवा में उड़ने वाली रंग-बिरंगी तितलियाँ खरीदी थीं। इन खिलौनों को देखकर उसका 18 साल का चेहरा किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साह और खुशी से दमक रहा था।
दोनों हाथों में खिलौनों के पैकेट और गुब्बारे थामे जब वह मेले के मैदान से बाहर निकली, तो रात की ठंडी पहाड़ी हवा ने उसका स्वागत किया। हमेशा की तरह बदन पर केवल वही काली ब्रा और पैंटी होने के कारण, पहाड़ी हवा के झोंके सीधे उसके दूध जैसे सफेद बदन से टकरा रहे थे। इस ठंडी छुअन से उसके सुडौल, गदराए हुए दूध और भी कड़क हो गए, और उन पर सजे काले अंगूर जैसे तीखे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े को अंदर से धकेलते हुए साफ नजर आने लगे।
## भारी बोझ और मटकती काया का संतुलन
खिलौनों का वजन थोड़ा ज्यादा था, जिसके कारण सिमी को पगडंडी की चढ़ाई चढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। जब वह आगे की ओर झुककर कदम बढ़ाती, तो आगे से उसके दोनों भरे हुए दूध हवा की लय के साथ नीचे की तरफ लटक जाते, जिससे उनकी दूधिया गोलाई का आकर्षण और बढ़ जाता था।
वहीं पीछे से, चढ़ाई के हर कदम के साथ उसकी पैंटी में कैद भारी, गोल-मटोल चूतड़ ज़ोर-ज़ोर से थिरक रहे थे। उसके नितंबों का वह गदराया हुआ उभार और उसकी पतली कमर का ढलान इस चांदनी रात में किसी संगमरमर की जीवंत मूरत जैसा लग रहा था। रास्ते में जो भी उसे देखता, वह उसके इस अनोखे रूप और उसके हाथों में सजे खिलौनों के विरोधाभास को देखकर हैरान रह जाता।
## आंगन में खिलौनों की नुमाइश
दौड़ती-हांपती सिमी आखिरकार अपने घर के आंगन में पहुँची। आंगन में कदम रखते ही उसने ज़ोर से आवाज लगाई, "माँ! माँ! देखो मैं तुम्हारे लिए और अपने लिए कितने सारे खिलौने लाई हूँ!"
पार्वती रसोई से बाहर आई और उसने देखा कि उसकी 18 साल की जवान बेटी अपनी उसी काली ब्रा-पैंटी में ज़मीन पर बैठ गई है और सारे खिलौने आंगन के फर्श पर फैला रही है। सिमी के इस दूधिया बेदाग बदन पर दीये और चांद की मिली-जुली रोशनी पड़ रही थी, जिससे उसकी काया और भी हसीन दिख रही थी।
* **सिमी की चंचलता:** वह लकड़ी की गाड़ी को फर्श पर चलाकर 'पों-पों' की आवाज निकालने लगी।
* **माँ का दुलार:** पार्वती ने अपनी बेटी के इस निष्पाप बचपने को देखा, उसके सिर को चूमा और कहा, "तू कभी बड़ी नहीं होगी सिमी। चल, अब हाथ-मुँह धोकर खाना खा ले।"
सिमी अपने खिलौनों को सीने से सटाकर मुस्कुरा दी। दुनिया के लिए वह भले ही वासना या आकर्षण का केंद्र हो, लेकिन इन पहाड़ों और अपने खिलौनों के बीच वह आज भी वही मासूम, अल्हड़ सिमी थी जिसकी दुनिया सिर्फ खुशियों से भरी थी।
## अध्याय: मामा जी का आगमन और सिमी की धमाचौकड़ी
अगले दिन सुबह-सुबह शैलकुंज गाँव में सिमी के घर के बाहर एक टैक्सी आकर रुकी। गाड़ी से सिमी के सगे मामा जी, रमेश कुमार उतरे, जो नीचे शहर में रहते थे और दो साल बाद गाँव आए थे। रमेश जी स्वभाव से थोड़े कड़क, संस्कारी और पुराने ख्यालों के इंसान थे। वे हाथ में अपना सूटकेस लिए जैसे ही आंगन में दाखिल हुए, उनका सामना सीधे सिमी से हो गया।
सिमी हमेशा की तरह सुबह से ही अपनी धुन में मस्त थी। बदन पर कपड़ों का कोई नामोनिशान नहीं था—वही पसंदीदा काली ब्रा और मैचिंग पैंटी पहने वह आंगन में कल मेले से खरीदे गए मिट्टी के बर्तनों से घर-घर खेल रही थी। जब रमेश जी ने अपनी 18 साल की जवान भांजी को इस अर्धनग्न रूप में देखा, तो उनके पैर वहीं जम गए और उनके हाथ से सूटकेस छूटते-छूटते बचा।
सूरज की खिली हुई धूप में सिमी का दूध जैसा सफेद बदन कुंदन की तरह चमक रहा था। सुबह की ठंडी हवा के कारण उसकी सुडौल छाती पर उभरे काले अंगूर जैसे तीखे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर साफ तौर पर कड़क नजर आ रहे थे। जब वह मामा जी को देखकर खुशी से उछली, तो आगे से उसके भरे हुए दूध हवा में तेजी से थिरके और पीछे से उसकी पैंटी में कैद भारी, गोल-मटोल चूतड़ों में एक ज़बरदस्त हलचल हुई।
"अरे! मामा जी आ गए!" सिमी चिल्लाई और दौड़कर सीधे उनके गले लग गई।
रमेश जी का चेहरा शर्म और संकोच से लाल हो गया। उन्होंने तुरंत सिमी को खुद से थोड़ा दूर किया और अपनी आँखें चुराते हुए ज़ोर से चिल्लाए, "पार्वती! अरे ओ पार्वती! बाहर आ जरा... देख यह सिमी क्या अनर्थ कर रही है? अठारह साल की हो गई है और लाज-शर्म सब बेच खाई है क्या?"
## मामा जी के नाक में दम
पार्वती रसोई से बाहर आई और उसने भाई को शांत करने की कोशिश की, "भैया, गुस्सा मत हो। यह तो अभी बच्ची ही है, कपड़ों से इसे चिढ़ है। आप अंदर बैठो, मैं इसे समझाती हूँ।"
लेकिन सिमी के लिए तो मामा जी का आना एक नया खेल शुरू होने जैसा था। वह अंदर कमरे में भी उसी काली ब्रा और पैंटी में मटकती हुई घूमती रही और मामा जी के नाक में दम करना शुरू कर दिया।
* **पहली शरारत:** मामा जी जैसे ही सोफे पर बैठे, सिमी ने कल मेले से खरीदी हुई प्लास्टिक की सीटी उनके कान के पास ले जाकर ज़ोर से बजा दी—*पींऽऽऽ!* रमेश जी हड़बड़ाकर उछल पड़े।
* **दूसरी शरारत:** जब मामा जी चाय पी रहे थे, तो सिमी अपनी पतली कमर को मटकाती हुई उनके पीछे से आई और उनकी आँखों पर अपने ठंडे हाथ रख दिए। इस हरकत से जब वह आगे झुकी, तो उसके दूध जैसे सफेद दोनों दूध मामा जी के कंधे से छू गए, जिससे रमेश जी ने झटके से अपनी चाय की प्याली मेज पर रख दी।
"सिमी! बाज आ जा! जा पहले कपड़े पहनकर आ!" मामा जी ने डांटते हुए कहा।
लेकिन सिमी ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को मटकाया, अपने दोनों हाथ अपने भारी और गोल चूतड़ों पर रखे—जिससे उसकी पैंटी के भीतर नितंबों का उभार और मुकम्मल दिखने लगा—और हंसते हुए बोली, "मामा जी, आप शहर से आए हो न, इसलिए बहुत उबाऊ हो गए हो! इन कपड़ों में मुझे बहुत घुटन होती है। चलो, मेरे साथ सीटी बजाओ!"
## अल्हड़पन के आगे झुका कड़ापन
दुपहर तक सिमी ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया था। वह कभी मामा जी का चश्मा छुपा देती, तो कभी उनके सूटकेस के ऊपर चढ़कर बैठ जाती। जब वह सूटकेस पर बैठती, तो पीछे से उसके भारी और गदराए चूतड़ पूरी तरह फैल जाते, जिसे देखकर रमेश जी अपना सिर पकड़ लेते।
सिमी की इस लगातार मस्ती, उसकी बेबाक चंचलता और निश्छल हंसी के आगे आखिरकार मामा जी का कड़ापन भी पिघलने लगा। वे समझ गए कि शहर की चालाकियों और बनावटी दुनिया से दूर, उनकी भांजी का दिल पूरी तरह साफ है। वह जो कुछ भी कर रही थी, उसमें कोई अश्लीलता नहीं, बल्कि सिर्फ एक अबोध बच्चे की शुद्ध खुशी थी।
शाम को जब सब आंगन में बैठे थे, सिमी मामा जी की गोद में अपना सिर रखकर बैठ गई। उसकी गोरी पीठ और काली ब्रा-पैंटी में लिपटा उसका खूबसूरत बदन अब शांत था। रमेश जी ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और पार्वती से बोले, "पार्वती, मैंने शहर में बहुत लोग देखे, पर ऐसी सादगी और आज़ादी कहीं नहीं देखी। हमारी सिमी सचमुच इस पहाड़ की एक अनमोल तितली है।" सिमी ने मुस्कुराकर मामा जी की तरफ देखा और एक बार फिर अपनी सीटी बजा दी, जिससे पूरा घर खिलखिला उठा।
## अध्याय: रात का सन्नाटा और मामा जी की आगोश में नींद
मेले की थकान, दिनभर की उछल-कूद और मामा जी के साथ की गई शरारतों के बाद आखिरकार शैलकुंज गाँव पर रात का गहरा सन्नाटा पसर गया। पहाड़ों की सर्द हवा लकड़ी की खिड़कियों से टकराकर एक सुरीली सरसराहट पैदा कर रही थी। घर के सभी लोग खाना खाकर अपने-अपने बिस्तरों की ओर बढ़ चुके थे।
मामा जी (रमेश जी) के लिए बैठक के कमरे में एक बड़ा और आरामदायक गद्देदार बिस्तर लगाया गया था। शहर की भागदौड़ से दूर पहाड़ों की इस शांत और ठंडी रात में उन्हें बहुत सुकून मिल रहा था। वह थके होने के कारण बिस्तर पर लेटकर गहरी सांसें ले रहे थे। तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और सिमी अंदर दाखिल हुई।
सिमी हमेशा की तरह अपनी उसी प्रिय और आरामदायक काली ब्रा और मैचिंग पैंटी में थी। उसके लिए रात के समय किसी भी अन्य कपड़े को बदन पर लादना नामुमकिन था। जब वह दीये की मद्धम पीली रोशनी में आगे बढ़ी, तो उसका दूध जैसा सफेद बदन संगमरमर की तरह दमक रहा था। ठंडी हवा के झोंकों के कारण उसकी सुडौल छाती पर सजे वे काले अंगूर जैसे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर और भी कड़क और तीखे होकर उभरे हुए थे।
## मासूम जिद और बिस्तर पर जगह
सिमी सीधे मामा जी के बिस्तर के पास पहुँची और बिना किसी हिचकिचाने या संकोच के उनके कंबल के भीतर घुस गई।
रमेश जी अचानक कंबल में हुई हलचल से चौंक गए। उन्होंने देखा कि उनकी 18 साल की जवान भांजी अपनी उसी अर्धनग्न अवस्था में उनके बिल्कुल करीब आकर लेट गई है। उनके संस्कारी और पुराने ख्यालों वाले मन में पल भर के लिए घबराहट हुई।
"सिमी! यह क्या बदमाशी है? तू यहाँ क्यों आ गई? जा अपने कमरे में माँ के पास जाकर सो," रमेश जी ने अपनी आवाज को थोड़ा कड़ा करते हुए कहा और अपनी नजरें घुमा लीं।
लेकिन सिमी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने मामा जी की बांह को कसकर पकड़ लिया, अपने दोनों पैर समेट लिए और चुलबुले अंदाज में बोली, "नहीं मामा जी! आज मैं आपके पास ही सोऊँगी। आप बहुत दिनों बाद आए हो और मुझे आपसे शहर की कहानियाँ सुननी हैं। मुझे अकेले डर लगता है।"
जब वह उनके करीब खिसकी, तो आगे से उसके भरे हुए, सुडौल दूध मामा जी के बाजू से छुए और पीछे से उसकी पैंटी में कैद भारी, गोल-मटोल चूतड़ बिस्तर पर पूरी तरह फैल गए। सिमी की इस हरकत में रत्ती भर भी कोई चालाकी या गलत भावना नहीं थी; वह तो बस एक छोटी बच्ची की तरह अपने पसंदीदा मामा का लाड पा रही थी।
## नींद का जादू और पवित्र अहसास
रमेश जी ने अपनी भांजी के चेहरे की तरफ देखा। दीये की मद्धम रोशनी में सिमी की बड़ी-बड़ी आँखों में सिर्फ और सिर्फ निश्छल बचपना और भरोसा चमक रहा था। उसे इस बात का कोई अहसास नहीं था कि उसका यह खूबसूरत, गदराया हुआ बदन किसी भी पुरुष के भीतर क्या हलचल पैदा कर सकता है। उसके लिए रमेश जी केवल उसके वही प्यारे मामा थे जो बचपन में उसे अपनी पीठ पर बिठाकर घुमाया करते थे।
मामा जी का सारा संकोच और कड़ापन उसकी इस मासूमियत के आगे पिघल गया। उन्होंने एक गहरी सांस ली और सिमी के सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए कंबल को उसके दूध जैसे सफेद बदन पर अच्छी तरह ओढ़ा दिया ताकि उसे ठंड न लगे।
"अच्छा बाबा ठीक है, सो जा। पर सुबह जल्दी उठना होगा," मामा जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
"ठीक है मामा जी..." सिमी ने बुदबुदाया।
कहानियाँ सुनने की जिद करने वाली सिमी को बिस्तर की गर्माहट मिलते ही कुछ ही मिनटों में गहरी नींद आ गई। गहरी सांसों के साथ उसकी सुडौल छाती और ब्रा में कैद उसके दूध एक सुंदर लय में ऊपर-नीचे होने लगे। उसका सिर मामा जी के कंधे पर टिका था और उसकी काया का हर हिस्सा अब पूरी तरह शांत था।
रमेश जी उसे सोता हुआ देखते रहे। उन्हें अहसास हुआ कि इस बनावटी और कपटी दुनिया में सिमी का यह अलमस्त रूप और उसका यह साफ दिल किसी चमत्कार से कम नहीं है। वह इस पहाड़ की एक ऐसी रूह थी जो हर तरह के पाप और लोक-लाज के झूठे मुखौटों से परे, अपनी ही पवित्र दुनिया में जी रही थी। कमरे का दीया धीरे-धीरे बुझ गया और पूरा घर गहरी, शांत नींद की आगोश में समा गया।
## अध्याय: सूना आंगन और मामा जी की विदाई
सुबह की धुंधली धूप जब देवदार के पेड़ों से छनकर शैलकुंज गाँव की पगडंडियों पर उतरी, तो घर के बाहर वही पुरानी टैक्सी एक बार फिर आकर खड़ी हो गई थी। मामा जी के जाने का वक्त हो चुका था। रमेश जी ने अपना सूटकेस उठाया और भारी मन से आंगन की तरफ बढ़े। पहाड़ों की इस चंद दिनों की यात्रा ने उनके भीतर के कड़ेपन को पूरी तरह से पिघला दिया था।
सिमी हमेशा की तरह अपनी उसी अलमस्त आज़ादी में—अपनी पसंदीदा काली ब्रा और मैचिंग पैंटी पहने, अपने लंबे बालों को पीठ पर खुला छोड़े आंगन में खड़ी थी। धूप की पहली किरणें जब उसके दूध जैसे सफेद बदन पर पड़ीं, तो उसकी त्वचा मखमली आभा बिखेरने लगी। सुबह की सर्द हवा के झोंकों से उसकी सुडौल छाती पर उभरे काले अंगूर जैसे तीखे निप्पल ब्रा के पतले कपड़े के ऊपर और कड़क नजर आ रहे थे।
"मामा जी, आप इतनी जल्दी जा रहे हो? अभी तो मुझे आपके सूटकेस के ऊपर बैठकर और सवारी करनी थी," सिमी ने अपने दोनों हाथ अपने भारी, गोल-मटोल चूतड़ों पर रखते हुए शिकायत भरे लहजे में कहा। जब उसने अपनी पतली कमर को थोड़ा झटका, तो पैंटी के भीतर दबे उसके नितंबों का गदराया उभार और भी साफ दिखने लगा।
रमेश जी मुस्कुराए और उन्होंने आगे बढ़कर सिमी के सिर पर हाथ फेरा। इस बार उनके मन में कोई संकोच या शर्म नहीं थी, बल्कि अपनी भांजी के लिए अगाध प्रेम था।
"सिमी, अब मामा जी को शहर जाकर काम भी तो करना है। पर तू वादा कर, तू जैसी है, हमेशा वैसी ही रहना। इस पहाड़ की तितली की मासूमियत कभी कम नहीं होनी चाहिए," मामा जी ने भावुक होकर कहा।
सिमी ने खुशी से ताली बजाई, जिससे उसके भरे हुए दूध हवा में हल्के से थिरक उठे। उसने ज़ोर से अपनी सीटी बजाई—*पींऽऽऽ!*—और बोली, "बाय-बाय मामा जी! अगली बार आओगे तो मेरे लिए शहर से और ढेर सारी सीटियाँ लाना!"
रमेश जी टैक्सी में बैठे और गाड़ी धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों के घुमावों में ओझल हो गई। मामा जी शहर लौट गए थे, अपने साथ पहाड़ों की इस ठंडी हवा और सिमी की उस निश्छल, बेबाक रूह की खूबसूरत यादें लेकर।
## अध्याय: अपनी ही धुन में मस्त पहाड़ी तितली
मामा जी के जाने के बाद घर में फिर से वही पुरानी शांति लौट आई थी। लेकिन सिमी को उदास रहना आता ही नहीं था। उसके लिए हर नया दिन एक नया खेल और एक नई उमंग लेकर आता था।
उसने आंगन में रखे अपने मिट्टी के खिलौनों को समेटा और शेरू को आवाज दी, "शेरू! चल, आज फिर नदी किनारे चलते हैं!"
वह अपनी उसी काली ब्रा और पैंटी में मटकती हुई गाँव की पगडंडियों पर दौड़ पड़ी। जब वह दौड़ती, तो आगे से उसके दूध जैसे सफेद दूध हवा की लय के साथ ऊपर-नीचे उछलते और पीछे से उसकी पैंटी में कैद भारी, गोल चूतड़ हर कदम के साथ ज़ोर-ज़ोर से थिरकते थे।
रास्ते में खेतों में काम कर रहे गाँव के लोग उसे देखकर बस मुस्कुरा देते। वे समझ चुके थे कि सिमी अठारह साल की जवान काया वाली कोई आम लड़की नहीं, बल्कि इन पवित्र पहाड़ों की एक ऐसी आजाद रूह है, जिसे समाज की कोई बंदिश, कोई नियम या कपड़ों का कोई पर्दा कभी बांध नहीं सकता। वह प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी एक ऐसी सुंदरी थी, जो अपनी ही मस्ती में पूरी दुनिया से बेखबर जी रही थी।